अलविदा ‘इलीना सेन’

‘संजीव चंदन’

इलीना (मैडम) सेन क्या भूलूँ क्या याद करूं …!

इलीना मैडम चाहता हूँ कि आपको अपने स्वर्णिम यादों में याद रखूं, याद रखूं कि आपने विनायक सेन के साथ मिलकर शंकर गुहा नियोगी के साथ काम किया, यह याद रखूं कि आपने दो आदिवासी लड़कियों को अपनी बेटी के रूप में अपनाया और उन्हें उच्च शिक्षित किया, इस आधार पर कहूं कि आपके कर्म और सिद्धांत में बहुत साम्य था. चाहता हूँ कि यहीं फुल स्टॉप लगा दूं. लेकिन नहीं यहाँ कॉमा लगा रहा हूँ.

कॉमा इसलिए कि यादों का एक सिलसिला है. कहाँ से शुरू करूं. पिछले 7 सालों से आपके बारे में सिर्फ इतना ही पता था कि आप बीमारी से उबरने लगी हैं. ब्रेस्ट कैंसर की बीमारी को आपने पराजित कर दिया है. इससे अधिक आपके बारे में जानने की कोई उत्कंठा ही नहीं थी. लेकिन 2013 तक की यादें हैं, उन यादों में भी तो आपकी छवि देखी जा सकती है. उसे श्रद्धांजलि भी तो हमें देना ही चाहिए.

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कहाँ से याद करूं. चलिये यही याद करता हूँ-2013 में जेएनयू में स्त्रीकाल के दलित स्त्रीवाद अंक का विमोचन था और बातचीत थी. हमने टीआईआईस से भी एक प्रोफेसर को आमंत्रित किया था. आपको पता चला तो आपने भरपूर कोशिश की कि उन्हें न आने दिया जाये. आपके प्रयासों के बावजूद वे आयीं. क्या ऐसे याद करते हुए यादों की सीढियां उतरूं मैडम? नहीं-नहीं डिसेन्डिंग क्रम में नहीं असेंडिंग क्रम में ठीक-ठीक रहेगा.

आप एनजीओ की मालकिन थीं-रूपांतर नामक एनजीओ. शुरू-शुरू में आप हिन्दी विश्वविद्यालय में हमारे कुछ क्लासेज के लिए आती थीं. आप अच्छी शिक्षिका नहीं थीं, जबकि हमें कई अच्छी शिक्षिकाओं और विद्वानों ने तबतक पढ़ाया था. हमें पढ़ाने अकैडमिया से लोग आते थे अथवा सोशल एक्टिविस्ट भी. आप कायदे से सोशल एक्टिविस्ट भी नहीं थीं. आप विशुद्ध एनजीओ की मालकिन थीं. लेकिन आपका मृदु व्यवहार, मीठा बोलना और देश भर के स्त्री अध्ययन की विदुषियों और एक्टिविस्टों से आपके निजी सम्पर्क से हमें लग रहा था कि अच्छा होगा विभाग के लिए कि आप प्रोफेसर होकर वहां आयें. डर था कि तत्कालीन कुलपति किसी परम्परावादी हिन्दी प्रोफेसर को विभाग में न नियुक्त कर दें. हम विद्यार्थी आपस में प्रतिस्पर्धा करते थे, लेकिन आपके लिए एक मत थे. तत्कालीन रजिस्ट्रार और कुलपति से हमसब अलग-अलग आपके लिए कहने पहुंचे भी. कुलपति तैयार नहीं थे. हालांकि तत्कालीन कुलपति को न चाहते हुए भी आपकी नियुक्ति आपके मित्र और मानव संसाधन विकास सचिव सुदीप बनर्जी के दवाब में करना पड़ा. नियम से आपकी नियुक्ति अवैध थी, क्योंकि आपका टीचिंग एक्सपीरिएंस नहीं था और आपने अपने एनजीओ रूपान्तर का ही अनुभव अपने बायो में दिया था. विश्वविद्यालयों में प्रोफेसर की नियुक्तियां एमिनेंट आधार पर होती है या इंटरव्यू से. इंटरव्यू के लिए मानक योग्यता चाहिए. आपकी नियुक्ति इंटरव्यू से हुई थी, मानक योग्यता के बिना. हालांकि आपने इस नियुक्ति को सीढ़ी की तरह इस्तेमाल किया था क्योंकि आपको आगे चलकर टीआईआईएस या जेएनयू पहुंचना था. आप टीआईआईएस पहुँचीं भीं.

यादों के कोलाज में कितना कुछ है. देश भर में विनायक सेन की गिरफ्तारी को लेकर सोशल एक्टिविस्ट प्रदर्शन कर रहे थे. आप होतीं तो आपको याद दिलाता कि कैसे कुछ दर्जन सोशल एक्टिविस्टों के द्वारा रायपुर जेल के पास चल रहे धरने के बीच एक प्रभावी व्यक्ति को आपने हमारे खिलाफ कहना शुरू किया. तब हम विश्वविद्यालय की अनियमितताओं के खिलाफ लड़ रहे थे, आपके खिलाफ नहीं. आपको टका सा जवाब मिला था, ‘ छोडो भी यार, हम कुछ बड़ा काम कर रहे, तुम कहाँ उन बच्चों को लेकर बैठी हो.’ ऐसा ही कुछ प्रत्युत्तर मिला था आपको.

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विनायक सेन से याद आया कि उस दिन हमसब आश्चर्यचकित थे. मीडिया के मेरे वे दोस्त जो विनायक सेन का बाईट (बयान) लेने गये थे आपके घर. तब विनायक जेल से छूट गये थे. ममता बनर्जी की सरकार ने सलवा जुडूम जैसा कोई प्रयोग की घोषणा की थी. विनायक सेन ने सहजता से बाईट दे भी दिया. उन्होंने सरकार की तीखी आलोचना की थी. आप अंदर से बाहर बैठके में आयीं और आपने मीडिया के उन दोस्तों को कहा कि आपको वे बाईट सुनायें. आपने सुना और डिलीट करवा दिया. आपके सुझाव पर विनायक सेन को सॉफ्ट बाईट देना पड़ा. मीडिया के साथी अभी इस सोशल मीडिया में भी हैं. वे भी याद करेंगे वह घटना मेरा यह संस्मरण पढ़कर.

कितना कुछ तोल-मोलकर करती थीं आप. आप विश्वविद्यालय के कार्य परिषद् की सदस्य थीं. आपसे एक प्रोफेसर, जिन्हें कुलपति विभूति राय ने टर्मिनेट कर दिया था, बहुत उम्मीद रखते थे. आपसे उनकी दोस्ती थी. लेकिन कार्य परिषद में जब उनका विषय रखा गया और राय ने टर्मिनेशन कन्फर्म करवाया तो आपने एक शब्द उनके पक्ष में नहीं बोला. आपने तीन साल के अपने परिषद-कार्यकाल के दौरान सिर्फ एक बार मुंह खोला. एक फ्रॉड थर्ड डिविजनर ब्राह्मण के लिए, जिसके थर्ड डिवीजन के कारण परिषद के एक दलित प्रोफेसर ने आपत्ति की थी. आप चिल्लायी थीं, ‘ यू आर थर्ड डिविजनर, यूअर मेंटैलिटी इज थर्ड डिविजनर.’ यह क्रोध, यह भाषा, यह हिकारत! वैसे आप सामान्यतः क्रोध नहीं करती थीं, सायलेंट फीचर था आपका. आपके जातिवाद की यादें थोड़ा और आगे भी.

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क्या भूलूँ क्या याद करूं! पूरे देश में महिलाएं आपके कुलपति विभूति नारायण राय का विरोध कर रही थीं. महिलाओं का उनके द्वारा अपमान को लेकर. आपने उनके पक्ष में माहौल बनवाया. उसी वक्त आपने स्त्री-अध्ययन असोसिएशन का सम्मेलन कैम्पस में करवाया. विश्वविद्यालय के टीए, डीए पर ‘पिकनिकी संवाद’ करने वाले असोसिएशन की विदुषियों का वह अंदाज निराला था. लेकिन उससे भी बढ़कर देश भर की लेखिकाओं को मुंह चिढाते हुए आपने विभूति राय को ‘जेंडर समानता’ का सम्मान भी दे दिया. स्थानीय दलित महिला एक्टिविस्टों ने तब विरोध प्रदर्शन किया था. आपने उन्हें भी कहाँ सम्मान दिया!

यादें तो उसी सम्मेलन के समय की और भी हैं. हायपर एक्टिव खुफिया विभाग ने आपके खिलाफ एक मूर्खतापूर्ण एफआईआर दर्ज करवा दिया था कि बिना सी फॉर्म के श्रीलंका से आयी एक गेस्ट वहां सम्मेलन में रुकी. मैंने तब एक पत्रकार की भूमिका निभाई. थाने के इंस्पेक्टर से लेकर सीआईडी और आई बी और एटीएस के अफसरों तक को मैं कह रहा था कि यह ठीक नहीं है और वे हाइपर एक्शन में हैं. टाइम्स ऑफ़ इंडिया में आपके पक्ष में और पुलिस के खिलाफ रिपोर्ट भी छपी मेरी. हाँ यह जरूर था कि साथ ही वीमेन स्टडीज कान्फ्रेस के खिलाफ भी मेरी रिपोर्टें छप रही थीं. आप उससे बौखलाई हुई थीं. आपने एफआईआर एटीएस के तत्कालीन चीफ राकेश मारिया के जरिये मैनेज किया और पहली फुर्सत में टाइम्स ऑफ़ इंडिया के मुम्बई संपादक से अपना बंगाली कनेक्शन सेट किया. टाइम्स से मेरा कॉन्ट्रैक्ट खत्म हो गया.

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आप ऐसे ही थीं. आप होतीं तो आपको बताता कि कैसे एनडीटीवी के पत्रकार के साथ आपके प्रोफेसरों से आपके पक्ष में तब बयान लेने के हमने प्रयास किये. आपका बेहद करीबी प्रोफेसर संतोष भदौरिया अनुमान के अनुरूप उस पत्रकार से बयान का परपस सुनकर अपना फोन बंद कर चुका था. एक-दो कन्नी काट गये. तब जाकर आरपीआई के विदर्भ सचिव अशोक मेश्राम से आपके लिए मैंने बयान दिलवाया. हालांकि मेरा यह स्टैंड आपके लिए नहीं था, सोशल कॉज और स्टेट की एजेंसियों की निरंकुशता के खिलाफ था.
आज सुबह-सुबह एक मित्र का फोन आया. उन्होंने आपके साथ रूपान्तर में काम किया था. आपने उन्हें पर्याप्त अपमानित ही नहीं किया था, जब वे एक विवि में नौकरी के लिए कुलपति के सामने पहंचे तो कुलपति ने भी अपमानित किया. कुलपति का रूपान्तर में आना-जाना था. मेरे उक्त ओबीसी मित्र का कुसूर था कि वे कुछ छद्मो के खिलाफ मुखर थे.

सारे किरदार सोशल मीडिया में हैं मैडम. वे पढेंगे भी मेरी यह श्रद्धांजलि. मुझे आपके जाने का दुःख जरूर है, लेकिन मेरे हिस्से आपका ग्रे शेड्स ही आया तो क्या करें. चलते-चलते यह भी याद कर लूं क्या कि मेरा एमफिल इंटरव्यू में एक्सपर्ट ने बोलकर कहा, ‘बहुत बढिया,’ लेकिन आपने एमफिल का पूरा मार्क्स कुछ यूं दिलवाया कि मैं जेएनयू नहीं जा सकूं. उसी साल जेएनयू ने एमफिल में भी 55% अनिवार्य किया था. ऐसा नहीं है कि आपने विद्यार्थियों की मदद नहीं की है. कुछ की जरूर की है, लेकिन मेरे सामने तो आपकी यादों में ये ही कोलाज हैं. मैं विभूति राय के बताये एक प्रसंग को यादों के कोलाज में नहीं रखता कि आप उनके पास गयी थीं कि मेरा पीएचडी में एडमिशन न हो. क्योंकि मैं विभूति राय को ही ‘खिलाड़ी’ मानता हूँ, जानता हूँ. उन्होंने तबतक मायग्रेशन का अपना खेल सम्पन्न कर रख लिया था, जिसका क्रिमिनल इस्तेमाल वे मेरे खिलाफ करने वाले थे.

अलविदा इलीना मैडम. आपकी स्मृतियाँ ताउम्र रहेंगी!

‘संपादक स्त्रीकाल’

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