ललिता यादव 

1. हाशिमपुरा का प्रेत   

मेरे घर और हाशिमपुरा के मध्य
बहता है एक बेहद गंदा नाला
इक्कीस वर्ष पूर्व मुझ नववधू को
बड़े गर्व से छत पर बताया था पति ने
इधर से चलीं थी गोलियां
और उस छत के घर  के
मारे गए थे दो नवयुवा
दिखाएं थे दीवारों में
गोलियों के निशान

इक्कीस वर्ष बीत गए अदृश्य हाशिमपुरा
शहर के विशिष्ट तनाव के क्षणों में
आकार पाता है
वर्जित हो जाता है
बच्चों का छत पर जाना
सनसनाती आती गोली की
ध्वनि और तीव्रता
बढ़ाए रखती है मेरा रक्तचाप
उन तनाव क्षणों में
घर से निकले पति और बच्चे
वापस लौट आने तक
कंपाए रखते हैं मेरा कलेजा

हाशिमपुरा जो पुलिया के उस पार
रखता है अपनी पृथक सत्ता
किसी गली के रूप में
खुलता है हमारे रास्ते पर
अदृश्य प्रेत सा
हमें झपट निगल लेने को तत्पर
मैं झांकना चाहती हूं उस गली में
लड़ना चाहती हूं हाशिमपुरा के प्रेत से
मिलना चाहती हूं उसके स्त्री बच्चों से

पर जब ऐन उस गली के सामने होती हूं
भूल जाती हूं गली में झांकना
मैं शपथपूर्वक कहती हूं
इतने वर्षों में गली से निकलते
किसी स्त्री बच्चे ने मेरा ध्यान नहीं बंटाया
शायद उनके निकलने की गली कोई और हो
और हाशिमपुरा का प्रेत उन्हें भी डराता हो

मैं लिखना चाहती हूं एक बड़ी लेखिका को
शोध कर लिख दे एक बड़ा सा उपन्यास
हाशिमपुरा के अदृश्य स्त्रियों बच्चों पर
जो दूर नाले के उस पार
छतों पर दिखाई देते हैं हमारी छत से कभी कभी
पुरुषों के लिए क्या कहना
उनका अदृश्य होना ही तो इतिहास होना है
कोरोना के भयानक समय में
रोके गए कुछ सब्जी वाले
क्या वह नाले पार के थे?
भय की खेती वाले

कभी चिन्ह क्यों नहीं पाई?
कब आए, कब गए, कब रोक दिए गए
ये एग्जेक्ट हाशिमपुरा आखिर कहां था?
इतने निकट था तो हमें दिखा क्यों नहीं?
एक लम्बे लाकडाउन के बाद
अचानक घर पधार रहे मित्र ने कहा
हाशिमपुरा चौकी पर खड़े हैं
कतई भूतिया पजल
राम जाने कैसे पहुंच गए हाशिमपुरा
आना तो पुलिया पर था
अरे! बच्चू पुलिया के आगे ही तो
हाशिमपुरा पुलिस चौकी है
या यूं कहो चौकी के पीछे पुलिया है
और पुलिया पर प्रेत है
जिधर प्रेत है उधर पुलिस की पीठ है
अब जब भी पुलिया से आगे आती हूं
पुलिस कलर की धमक में भास्वर
नयी बनी पुलिस चौकी को देख कांप जाती हूं
असल में हाशिमपुरा यहां था।

यहाँ भी आयें – कविता में स्त्री और स्त्रियों की कविता

2. इन दिनों

वरवर राव की रिहाई
की मुहिम को
लाइक करने से बचती हूं
टेबल पर रखती हूं
बड़े हो गए बच्चों के
शिशुकाल की तस्वीरें
अन्फ्रेंड कर देना चाहती हूं
एक बड़ी कवयित्री और
एक पत्रिका के संपादक को
संशय में सूंघती हूं
पृष्ठभूमि और सरपरस्ती
सार्थक हो या निरर्थक
फक्कड़ो वाली अकड़
भला यूं ही कैसे
अकड़ सकता है कोई
इन दिनों

बड़ा झेंपा हुआ सा
लगता है चेहरा
अर्जुन अवार्डी
प्रिय पत्रकार का
अतिबौद्धिकता की मार मर रहे उस चैनल पर
जाने से बचती हूं
इन दिनों

गौर फरमाती हूं
सुर्खुरू आत्मचेतस न्यूज एंकरों की
मुखाकृति और ड्रेस पर
विचार कैरी करने की थकन और
रजनीगंधाओं के स्वप्न और अस्मिता
के विषम पर
इन दिनों

विक्षिप्त सी देखती हूं
सज्जनकुमार के सपाट चेहरे के पाट में
और समतल होने की सम्भावना को
उफ़! कितने महत्वपूर्ण
इनके काम
वाइफ इंडिया बनते बनते
रह गई एक स्त्री
महज सौ किलोमीटर के फासले से
त्वचा भर की दूरी और
वर्षो के समय पर खाक डालूं
निरखना सत्ता संपत्ति की लालसा में
उलझे स्त्री के स्वरूप को
कितना दुष्कर हो उठा है
इन दिनों

सूक्ष्म वायरस की गिरफ्त से
भयभीत बैठ गई सखियों!
उपचार करो मन का
चलो, करें रुख जंगल का
हिस्र वासिन्दो का मिज़ाज
कुछ बदला सा है
इन दिनों।

3. अधकचरी कविताएं

कुछ अधकचरी सी कविताएं
ताजा ताजा लिखकर
मेल कर देती हूं
सहृदय मित्रों को
ये प्रिवेंटिव मेजर हैं
माइग्रेन की चपेट से
बचने के

ठीक जिस वक्त
तड़कने लगती हैं
दिमाग की नसें
बेहद फ्लो में
बह उठते हैं विचार
चरम पर पहुंचा तनाव
छींट देता है कुछ शब्द
रक्त सने

रक्त हो या विचार
उनका बह जाना
अच्छा या बुरा होना
देश-काल परिस्थितियों के अधीन
होता आया है सदा
उन्हें पकने तपने सींझने तक
दिमाग में रुके रहने देना
सदी की सबसे ख़तरनाक
साजिश

साजिश से खुद को
अलगा लेने की
साधना
नीरो न हो सकने का
दर्द
मौन में चुभता बहुत।

यहाँ भी आयें – कविता का जोखिम: मियां कविता के विशेष सन्दर्भ में

4. रूह पर चुम्बन

जिस्म की चोटों पर
रखे जा सकते हैं चुम्बन
रखतीं ही हैं
पत्नियां प्रेमिकाएं माएं
अब भी

रूह की चोटों पर चुम्बन रखने का मार्ग
अज्ञात और दुर्लभ
रेयरेस्ट आफ रेयर केस
आते हैं इन चोटों के
नहीं बन पाते शोध के महत्व का विषय

न्यूरोलॉजिस्ट के केबिन के बाहर
प्रतीक्षा में बैठी रहती है स्त्रियां
अपने चोटिल पुरुषों के साथ
महंगी दवाओं और फीस के साथ
मिनटों में मिलता है उपचार
चोटों को अनदेखे अनछुए

हालांकि वह खुद भी घायल हैं
रूह की चोटों से
पर इतने हीनतर हैं
उनकी चोटों के प्रकार
कि भूल से भी रख दिया गया
किसी पुरुष का चुम्बन!
खो बैठेगा अपना महत्व
पीड़ा नाशक शक्ति

सुना है पुरुष के चुम्बन की तासीर
बड़ी गर्म होती है
दहकाती है सारी देह
सदियों शताब्दियों
अनंत में विलीन होकर भी
नहीं खोती अपना ताप

बैचेन डोलती सदी की स्त्रियों के
अनछुए चुम्बन विहीन जिस्म
किसी स्त्री की देह पर चुम्बन की
प्रतीति में
दहका करते हैं रातभर

जिस्म के चुम्बन
तुम्हें मुबारक हों मित्र
मैं शोध करना चाहती हूं
रूह के चुम्बन पर
दुनिया के गणित में
अपनी कमजोर पकड़ के बावजूद
कि रख सकूं रूह की चोट पर चुम्बन
अपने प्रिय अनिवार्य पुरुष की।
(अरुण देव की कविता “दर्दनाशक की मदद” से प्रेरित)

यहाँ भी आयें – कविता विकास की कवितायेँ

5. सामर्थ्य

भव्य मंदिर का शिलान्यास हुआ है मेरे प्रदेश में
अपने घर से सुदूर दिल्ली के हस्पताल में
एडमिट है मेरा मित्र
प्रार्थना में जुड़े हैं हाथ
कृपा करना राम
द्वार पर पांच दीपक जला
दिपदिपाते चेहरे वाली सेल्फी
पोस्ट करना
मेरे सामर्थ्य की वस्तु नहीं।

डाॅ0 ललिता यादव,
एसोसिएट प्रोफेसर,
हिन्दी विभाग, एन0 ए0 एस0 काॅलेज, मेरठ।
’समकालीन लेखिकाओं के उपन्यासों में नारी विमर्श’ विषय पर पीएच-डी0।
‘कथाक्रम‘, ‘समालोचन’, ‘समावर्तन‘, ‘परिकथा‘ आदि पत्र-पत्रिकाओं में कहानी
एवं विविध शोध पत्रिकाओं में  समकालीन साहित्य पर
आलोचनात्मक साहित्य का प्रकाशन।  ईमेल lalita.yadav09@gmail.com
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