पूजा यादव

1- दोस्त

तुम जैसे हो वैसे ही रहना मेरे दोस्त
तुम मत बदलना किसी के लिए
मेरे लिए भी नही
क्योंकि
तुम जैसे हो उसी से मैंने प्रेम किया था
मेरे दोस्त
मुझे असह्य पीड़ा हो
फिर भी तुम मुस्कुराना
क्योंकि
तुम मुझे मुस्कुराते ही अच्छे लगे मेरे दोस्त
भले ही तुम मुझसे बहुत बाते मत करना
भले ही मेरा जिक्र किसी से न करना
लेकिन अपने मौन में ही सही
वक्त बेवक्त ही सही
अपने अकेले सफ़र मे
मेरी कही बातों को
गज़ल की तरह गुनगुना लेना मेरे दोस्त
मैं खिल उठूंगी फूलों की तरह
और उसी बहाने तुम्हारी सांसो में
खुश्बू की तरह ढ़ल जाऊँगी
तब तुम मुझे एहसास कर पाओ, शायद
मैं घुल जाना चाहती हूँ
तुम्हारी रगों में बिना किसी शर्त के मेंरे दोस्त
मुझसे तुम खफ़ा मत होना
जी लेना अपनी जिंदगी
जितना मैं न जी पाई मेंरे दोस्त
तुम जैसे हो वैसे ही रहना मेरे दोस्त ।

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2- साथी

तुम लिखना नफ़रत के ज़माने में भी
मोहब्बत का पैगाम साथी
तुम बनना नाउम्मीदी में भी
उम्मीदी की किरण साथी
तुम बोलना चुप करा दी गई
आवाम की आवाज़ बन साथी
तुम लड़ना आख़िर तक
हुक्मरानों के खिलाफ़ साथी
तुम गाना इंकलाब के गीत
हवाओं में उठाकर हाथ साथी
तुम लिखना नफ़रत के ज़माने में भी
मोहब्बत का पैगाम साथी ।

3- इंक़लाबी लड़कियाँ

तू आज़मा ले आज
अपने दांव सारे
ज़ुल्मों के आयाम सारे
ये लड़कियां निकल पड़ी
हाथों में लेकर जो मशाल
अब न बुझा सकेगा तू
कर ले कोशिशें हज़ार
ये न अब झुकेंगी
तेरी नफ़रतों के जाल से
फ़ौलाद बन निकलेंगी
तेरी नफ़रतों के आग से
ये लिखेंगी अब खु़दी
संघर्षों का पैगा़म सुन ले
ये बनेंगी अब पूरे
आवाम की आवाज़ सुन ले
ये ढहा देंगी तेरी
तानाशाही दीवार को
तू न रोक पाएगा
अब इस इंक़लाब को।

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4- क्रांति

सदियों से ख़ामोश लब
जब पहली बार बोले
तब हुई क्रांति
काँपते हाथ मुठ्ठी बांधकर
जब पहली बार तने
तब हुई क्रांति
डरी हुई आँखों में भरा
जब पहली बार आत्मविश्वास
तब हुई क्रांति
बेड़ियों से बँधे पाँव देहरी को
जब पहली बार किए पार
तब हुई क्रांति
बुझी हुई राख में बची एक चिंगारी
जब पहली बार बनी आग
तब हुई क्रांति
एक स्त्री ने हिम्मत की जलाई
जब पहली बार मशाल
तब हुई क्रांति
और
जिस दिन आधी आबादी निकल पड़ेगी,
बेख़ौफ़
लेने अपने अधिकार,चुनने अपनी राह
उस दिन दुनिया की
सबसे खूबसूरत और नायाब क्रांति होगी।

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5- फटी बेवाइंयां

मां की फटी बेवाइंयों की चुभन
रात को  हल्की छुवन से
मुझमें भर जाती है
मैं सिहर जाती हूँ
अपने पैरों को खींच लेती हूँ
लेकिन वह दर्द धीरे धीरे मेरे भीतर रिसता जाता है
और मेरी नींद उन बेवाइंयों के खुरदुरे पन में जा उलझती है
मैं देखती हूँ अंधेरे में
खिड़कियों से आती रोशनी के बीच
मां के चेहरे को
उसके माथे को सहलाती हूँ
उसकी सांसो की आवाजाही को
चुपचाप सुनती हूँ
और सोचती हूँ
क्या सचमुच सो गई है मां?

शोधछात्रा
काशी हिन्दू विश्वविद्यालय, वाराणासी।
Email-py014886@gmail.com

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