बेटियों के हक का फैसला

दीप्ति शर्मा 

बेटियों के अधिकार की बात करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है जिसमे जन्म से ही बेटियाँ होंगी पिता की संपत्ति की अधिकारी। बेटों की ही तरह बेटियों को भी संपत्ति में पूरा हक है उन्हें इस हक से वंचित नहीं किया जा सकता, गौरतलब बात यह भी है कि बेटी चाहे हिन्दू उत्तराधिकार कानून ,1956 में हुए संसोधन से पहले पैदा हुए हो या बाद में उसका संपत्ति पर उतना ही हक है जितना बेटों का, इस अहम फैसले में कहा गया कि कानून लागू होने की तारीख नौ सितंबर,2005 से पहले पैदा हुई बेटी भी संपत्ति पर अधिकार का दावा कर सकती है इस बिल में एक शर्त यह रखी गई है कि वह पैतृक संपत्ति 20 दिसंबर, 2004 से पहले किसी कानूनी वंशपत्र के द्वारा बिक्री, वसीयत या अन्य किसी तरह से समाप्त ना कर दी गई हो। विशेषज्ञों कहा कहना है कि हमारे देश में अभी लोग जागरूक नहीं हैं, इसके बारे में लोगों को जागरूक करने की जरूरत होगी। जिस तरह भारतीय समाज की परम्परात्मक सोच है उस हिसाब से सामाजिक स्थिति को देखते हुए यह फैसला बेहद अहम है। इससे महिलाएं और मजबूत होंगी और फैसले का दूरगामी परिणाम आएगा। इस संपत्ति को अधिकार के हिसाब से संपत्ति को बेच भी सकती हैं

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हिंदू लॉ में संपत्ति को दो श्रेणियों में बांटा गया है- पैतृक और स्वअर्जित। पैतृक संपत्ति में चार पीढ़ी पहले तक पुरुषों की वैसी अर्जित संपत्तियां आती हैं जिनका कभी बंटवारा नहीं हुआ हो। ऐसी संपत्तियों पर संतानों का, वह चाहे बेटा हो या बेटी, जन्मसिद्ध अधिकार होता है। 2005 से पहले ऐसी संपत्तियों पर सिर्फ बेटों को अधिकार होता था, लेकिन संशोधन के बाद पिता ऐसी संपत्तियों का बंटवारा मन मर्जी से नहीं कर सकता। वह बेटी को हिस्सा देने से इनकार नहीं कर सकता
देश की सर्वोच्च अदालत की तीन जजों की पीठ ने स्पष्ट कर दिया है कि भले ही पिता की मृत्यु हिंदू उत्तराधिकार (संशोधन) कानून, 2005 लागू होने से पहले हो गई हो, फिर भी बेटियों का माता-पिता की संपत्ति पर अधिकार होगा यानि अब बेटी चाहे तो पैतृक संपत्ति में अपनी हिस्सेदारी का दावा कर सकती है। पीठ में जस्टिस अरुण मिश्रा, जस्टिस एस नजीर और जस्टिस एमआर शाह शामिल थे। वाकई यह एक महत्वपूर्ण फैसला साबित होगा बेटियों के हक में।

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संपादक 
वेब पोर्टल ‘स्त्रीकाल’

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