ज्ञानेन्द्र प्रताप सिंह (शोधार्थी)

    आज हम लोग जिस समाज में रह रहे हैं, उसमें समाज के उपेक्षित वर्गों के हित के पक्ष में खड़ा होना बुद्धिजीवी होने की असल निशानी मानी जाती है, जो कि है भी। समाज के उपेक्षित वर्गों के हितों के बारे में सभी समुदायों के बुद्धिजीवियों के विचार करने का परिणाम यह हुआ, कि आज करीब-करीब पूरे विश्व में विमर्शों का एक दौर ही चल निकला है। अगर हम भारत के संदर्भ में बात करें तो मोटे तौर पर हमें यहाँ तीन-चार विमर्श प्रमुखता पाते नजर आते हैं, जैसे स्त्री-विमर्श, दलित-विमर्श, आदिवासी-विमर्श आदि। इनके अलावा भी ऐसे कई विमर्श हैं जिनके नाम गिनाए जा सकते हैं, जो कि यहाँ अप्रासंगिक है। कई सुविधाओं के चलते आज सम्पूर्ण विश्व में विचारों के परस्पर आदान-प्रदान में बहुत सहूलियत हुई है। आज हम सब एक वैश्विक इकाई के रूप में अपना निर्वाह करते हैं। इसलिए एक स्थान की विचारधारा से दूसरे स्थान की जनता का प्रेरित-प्रभावित होना बहुत ही सहज और स्वाभाविक है। स्त्रीवादी चिंतन के भी उद्गम स्थल तो पश्चिमी देश ही हैं, लेकिन भारतीय चिंतकों ने भी इस क्षेत्र में अपने-अपने ढंग से विचार किया।

जर्मेन ग्रीयर की पुस्तक ‘बधिया स्त्री’ स्त्रीवादी आन्दोलन के इतिहास में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाली पुस्तक है। अगर इस पुस्तक के विस्तार और इसकी समग्रता पर गौर करें, तो हम यह देखेंगे कि यह पुस्तक अपने ढंग की एक बेहतरीन कृति है। थोड़ा और आगे बढ़कर कहें तो हम यह कह सकते हैं कि स्त्री-विमर्श के सम्बन्ध में कोई भी स्वस्थ और संतुलित राय बनाने या प्रकट करने से पहले इस पुस्तक से गुजरना अनिवार्य होगा। अगर हम सार रूप में देखें तो हम यह पाएंगे कि यह पुस्तक स्त्री उत्पीड़न की स्थितियों, उनके कारणों और उन कारणों के पीछे की मनोवृत्तियों को समग्रता में विश्लेषित करने का प्रयास है। इस प्रयास की अपनी सीमाएं अथवा संभावनाएं हो सकती हैं, परन्तु लेखकीय ईमानदरी कोई भी इन्कार नहीं कर सकता है। पुराने समय की विद्रोही स्त्रियों के विद्रोह में भी एक प्रकार से अपने विद्रोह के प्रति अविश्वास का भाव रहता रहा है, इस बात को स्वीकारते हुए लेखिका कहती है कि, “पुराने जमाने में महिलाएँ यह बताने को व्यग्र रहती थी कि वे समाज को अस्थिर करने या ईश्वर का तख़्ता नहीं जा रहीं। उनकी कार्रवाहियों से विवाह, परिवार, निजी संपत्ति और राज्य को खतरा था लेकिन वे पुरातनपंथियों के डर को दूर करने को व्यग्र थीं। … … स्त्री राजनीतिज्ञ अब भी स्त्री-हितों का प्रतिनिधित्व करती हैं लेकिन अक्सर ही यह हित आश्रित स्त्री के होते हैं।”1 इस प्रकार हम यह देखते हैं कि ‘जर्मेन ग्रीयर’ तमाम पुराने नए स्त्री-हितों की रक्षा करने वाले अभियानों की कलई भी खोलती नजर आती हैं।

अगर हम इस पुस्तक का समग्रता में अवलोकन करें तो एक बात बहुत साफ नजर आती है कि लेखिका स्त्री की उपेक्षा की पूरी प्रक्रिया का अध्ययन करती है और उन तमाम कारणों की पड़ताल करती है जो उसकी उपेक्षा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। ‘काडेर्लोस डे लाक्लोस के अग्रांकित कथन को लेखिका काफी महत्वपूर्ण मानती है, उसका कहना है कि, “ऐ औरत … आ और जान कि कैसे तू पैदा तो पुरुष की साथिन के रूप में हुई थी और बन गई उसकी गुलाम; कैसे तू इन स्थितियों को पसंद करने लगी और यह मानने लगी कि ये सहज हैं; और आखिर कैसे गुलामी की लंबी आदत ने तुझे ऐसा पतित बना दिया कि तू आजादी और इज्जत के कहीं मुश्किल सद्गुणों की जगह उसके खून चूस लेने वाले दोषों को पसंद करने लगी।”2 लेखिका का यह मानना अवश्य है कि अब तक के स्त्रियों के शोषण में पुरुषों की बड़ी भूमिका है, लेकिन इस कार्य में स्त्रियों की भूमिका से भी वह इन्कार नहीं करती हैं, कोई निष्पक्ष अध्ययन करने वाला इन्कार कर भी नहीं सकता। क्योंकि पुरुष वर्चस्ववादी सोच केवल पुरुषों के भीतर ही पाई जाती है ऐसा कहना गलत होगा, जो कि इस पुस्तक में कई बार विवेचित-विश्लेषित करने का प्रयास किया गया है।

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इस पुस्तक की शुरुआत देह से होती है क्योंकि स्त्री-विषयक हमारी तकरीबन सारी मान्यताओं का मूलाधार स्त्री-देह ही होती है। देह पर विचार करते हुए लेखिका ने नारी देह के आंतरिक और बाह्य सभी पक्षों पर विस्तार से विचार किया है, एवं अब तक चली आ रही अनेक भ्रांतियों का बड़े ही तार्किक ढंग से खंडन भी किया है। वह पूरे आत्मविश्वास के साथ कहती है कि, “अड़तालीस गुणसूत्रों में से एक ही गुणसूत्र अलग है और इस अंतर को हम स्त्री और पुरुष के पूरे अलगाव का आधार बनाते हैं जैसे कि अड़तालीस के अड़तालीस गुणसूत्र अलग हों।”3 दरअसल लेखिका तो हमारा ध्यान इस बात की ओर आकर्षित करना चाहती है कि स्त्री पुरुष के बीच जो अंतर है उसे ही असमानता का स्वरूप प्रदान कर देने की जो साजिश है वह कितनी अन्यायपूर्ण है। कई बार ऐसा होता है कि स्त्री-पुरुष के सामान्य से अंतरों को भी बढ़ा-चढ़ाकर बताया जाता है, तो कई बार ऐसे अंतरों का भी आविष्कार कर लिया जाता है जिनका अस्तित्व है ही नहीं।

लेखिका ने इस बात को भी जगह देना जरूरी समझा है कि यह एक मानसिक व्याधि है जिसके चलते दुबली से दुबली स्त्रियाँ या तो किसी कल्पित भारीपन की वजह से डाईटिंग करती हैं या इस वजह से भन्नाई रहती हैं कि उनका शरीर उभारों से भरा नहीं है। जबकि ऐसा करते हुए ये दोनों ही तरह की मानसिकता वाली स्त्रियाँ खुद को खरीददारों के लिए बाजार के रूप में तैयार कर रही होती हैं। स्त्री किस प्रकार बधिया होकर अधिक स्त्रियोचित बनती है इस बात को समझने के लिए हमें उन दबावों को देखना होगा जो कि एक स्त्री-शिशु पर जन्म लेते ही पड़ने शुरू हो जाते हैं। शैशव-काल के बाद उसे अपने सभी प्रकार के सम्पर्कों में नकारना सिखाया जाता है, और जब तक वह अपने लैंगिक अधिकारों के प्रति सचेत होती है तब तक उसमें कामना और उत्सुकता पर भारी पड़ने के लिए जड़ता का पर्याप्त बल जमा हो चुका होता है। ‘बधिया स्त्री’ कहने से लेखिका का आशय शायद इसी प्रकार की मनःस्थिति में रहने वाली स्त्री से है। हमें यह समझने का प्रयास करना होगा की योजनाबद्ध रूप से स्त्रियों की ऊर्जा को उनके बचपन से लेकर कैशोर्य तक कैसे लक्ष्यभ्रष्ट किया जाता है जिससे कि वयस्क होते-होते उनमें संसाधन और सृजन शक्ति छिटपुट ही बच पते हैं।

लेखिका यह स्वीकार नहीं करना चाहती कि लड़कियाँ अपने सांस्कृतीकरण को पूरे का पूरा, बिना प्रतिरोध किए स्वीकार कर लेती हैं, जो कि ठीक भी है। देखने में तो यह भी आता है कि माताएँ लड़कियों पर साफ-सुथरी और नजर चोर होने के लिए जितना दबाव डालती हैं, लड़कियों का प्रतिरोध भी उससे कुछ कम नहीं होता है। लेकिन एक बात पूरे निश्चय के साथ कही जा सकती है कि तालमेल बैठाने की समस्याओं का सामना लड़कियों को लड़कों की तुलना में अधिक करना पड़ता है। उन्हें यह पता चलता है कि एक खास समय के बाद उनकी कद्र उन्हीं गुणों के कारण होती है जिनको स्कूली प्रशिक्षण के दौरान उनके दोषों में शुमार किया जाता रहा है। इन सबके अनुकूलन के द्वारा अपनी स्वायत्ता तजकर उन्हें जीवन का निर्वाह करने के लिए ढाल लिया जाता है। इसी क्रम में लेखिका ने फ्रायडीय मनोविश्लेषण का भी स्त्रियों के संदर्भ में एक सम्यक मूल्यांकन प्रस्तुत किया है।

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जहां तक स्त्री का प्रश्न है लेखिका को मनोचिकित्सा उसके लिए एक बहुत बड़ी धोखाधड़ी लगती है। क्योंकि जब स्त्री अपनी उलझनों के साथ मनोचिकित्सक के पास जाती है तो वह उसे यही समझाता है कि वह खुद को टटोले, अपनी परेशानियों का कारण उसे अपने अंदर ही मिलेगा। मनोविश्लेषण का आमतौर पर विज्ञान के रूप में सम्मान किया जाता है परन्तु ‘जर्मेन ग्रीयर’ उसको आध्यात्मिकता के रूप में देखने की वकालत करती हैं क्योंकि इसका सारा क्रियाकलाप मानसिक स्तर पर ही सम्पन्न होता है। मनोविश्लेषण के बारे में अपनी राय स्पष्ट करते हुए वे लिखती हैं कि, “अगर हम बाहरी यथार्थ का सम्मान करें तो हम फ्रायडीय मनोविश्लेषण की धारणाओं को स्वदमन के प्रक्रम में रखा गया फालतू भार मानते हुए ठुकरा दें और खुद के देखे समझे और अपने वातावरण के साथ खुद के प्रयोगों पर भरोसा करें। फ्रायडवादी व्याख्या एकतरफा तो है ही यह जीने का मानदंड भी नहीं बन पाती। … … स्त्री के लिए आत्मपीड़क की भूमिका की सिफ़ारिश करके मनोविज्ञान उसी शैशवीकरण के हाथ मजबूत करता है, जिसे स्त्री जन्म से झेल रही है।”4 आम तौर पर स्त्रियाँ बिना यह महसूस किए कि वे कोई त्याग कर रही हैं वे अपनी उपलब्धियों का परित्याग करने को तत्पर रहती हैं। ऐसी स्त्री एक व्यक्ति बिलकुल नहीं हो सकती क्योंकि वह अपनी शर्तों पर नहीं जीती। उसका महत्व उसके साथ खड़े उस पुरुष की उपस्थिति से ही हो सकता है जिस पर वह पूरी तरह निर्भर होती है।

लेखिका का मानना है कि स्त्रियों को अपनी मुक्ति का यह अर्थ कदापि नहीं लगाना चाहिए कि वे मर्दाना भूमिका को अपना लें। वह लिखती हैं कि, “स्त्री शक्ति का अर्थ है स्त्रियों का आत्म निर्णय और इसका अर्थ यह है कि पित्रसत्तावादी समाज का कूड़ा कबाड़ा बुहारकर बाहर फेंकना होगा।”5 अनेक स्थानों पर अब भी स्त्रियों की मजदूरी पुरुषों की तुलना में काफी कम है, स्थिति तो यह भी है कि अब भी स्त्री द्वारा किए जाने वाले कार्यों की जब व्यावसायिक परिणति होती है तब उनके महत्वपूर्ण पदों पर अनायास ही पुरुषों का कब्जा हो जाता है। कई बार ये भी कहा जाता है कि अपनी स्वतंत्र आमदनी की वजह से वेश्याएँ अन्य स्त्रियों की अपेक्षा भावनात्मक रूप से अधिक स्वतंत्र होती हैं लेकिन लेखिका का यह मानना है कि वेश्यावृत्ति के धंधे में प्रस्तुतकर्ता या दलाल की भूमिका इतनी स्थापित होती है कि हम यह नहीं मान सकते कि वेश्याओं ने एक आत्म नियंत्रित जीवन शैली प्राप्त कर ली है।

प्रेम सम्बन्धी अहम-भाव में स्त्रियों के लिए सबसे अधिक करुण पक्ष है स्त्रियों और पुरुषों का अपने संगी को लेकर गर्व का भाव। ज़्यादातर पुरुष ऐसी स्त्रियों की कामना करते हैं जिन्हें दूसरे पुरुषों को दिखाया जा सके, विडम्बना यह कि खुद इन स्त्रियों की कामना अपने पति तक ही सीमित होना चाहिए, ऐसी अपेक्षा रखी जाती है। जबकि लेखिका का मानना है कि सच्चे और झूठे दोनों ही किस्म के प्रेम वासना और कल्पना के मिश्रण हैं अंतर केवल इतना है कि सच्चा प्रेम विवाह की ओर ले जाता है और झूठा नहीं। लेखिका यह आरोप लगाती है कि आमतौर पर पुरुष स्त्रियों को एक मानवीय पीकदान की तरह इस्तेमाल करता है और अपना कार्य सध जाने पर वितृष्णा दर्शाते हुए उसकी ओर से बेफिक्र हो लेता है। यह पुस्तक यह भी ध्यान दिलाती है कि स्त्रियों के लिए प्रयुक्त होने वाले शब्द बड़े ही अपमानजनक हैं, केवल इतना ही नहीं उनके लिए प्रयुक्त प्रेम-सम्बोधन भी उतने ही अपमानजनक हैं। यह करीब-करीब एक स्थापित तथ्य है कि अपनी रुढ़छवि से जरा भी इधर-उधर होते ही स्त्री को बहुत भेदभाव और अपमान झेलना पड़ता है।

विवाह के बारे में विचार करते हुए लेखिका का यह कहना है कि, “विवाह न करके स्त्रियाँ स्त्रियों के दुख से बच जाती हों, ऐसा भी नहीं है, क्योंकि स्त्रियोचित सफलता के प्रमाण के तौर पर विवाह कर लेने का भयंकर दबाव उन पर बना रहता है।”6 लेकिन यह न समझना चाहिए कि स्त्रियों ने हमेशा ही सब कुछ को स्वीकार कर लिया है, उन्होने समाज में समय-समय पर अपनी भूमिका के प्रति विद्रोह भी किया है। ऐसी विद्रोही स्त्रियों को लेखिका सुझाव भी देती है कि स्त्रियों को नीचा दिखाने की प्रवृत्ति के खात्मे की जो सबसे जरूरी शर्त है वह यह है कि उन्हें अपना भिखारी-भाव छोडना पड़ेगा।

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लेखिका का यह भी कहना है कि स्त्रियाँ यदि अचानक हिंसक मुठभेड़ों के विजेताओं से प्रेम करना बंद कर दें तो यह असली क्रांति होगी। हम लोग स्वातंत्र्य से बहुत डरते हैं विशेषकर स्त्रियों की स्वतन्त्रता से, लेकिन इस डर को यथास्थिति के बने रहने के घटक के रूप में देखा जाना चाहिए। वह लिखती है कि, “स्त्रियों की मुक्ति अगर पित्रसत्तात्मक परिवार का खत्म करती है तो यह सत्तावादी राज्य के एक आवश्यक उपढाँचे का खात्मा होगा, और एक बार जब यह सूख-मुरझा जाएगा तो मार्क्स सच ही साबित होगा, इसलिए हमें काम शुरू कर देना चाहिए।”7 आखिर में लेखिका की उस बात की ओर ध्यान दिलाना जरूरी है कि जहाँ वह कहती है कि पवित्र परिवार को नकारने दिव्य मातृत्व की निंदा, और इस निष्कर्ष पर पहुँचने में कि स्त्रियाँ नैसर्गिक रूप से एकगामी नहीं हैं, परंपरागत नैतिकतावादी इन सब में बहुत कुछ ऐसा पा लेंगे जो निंदनीय है।

समीक्ष्य कृति से गुजरते हुए यह तो सहज ही कहा जा सकता है कि यह अपने आप में एक विचारोत्तेजक पुस्तक है। इसमें स्त्री के संबंध में एक समग्र और सर्वांगपूर्ण चिंतन देखने को मिलता है। स्त्री के विषय में तो ठीक ही है परंतु इस कृति में पुरुष के संबंध में भी जो विचार प्रस्तुत हुए हैं वे काफी दूर तक संतुलित है। कहीं-कहीं विचारों का दोहराव होना खटकता है, परंतु स्पष्टीकरण की दृष्टि से यह जरूरी भी है। भाषागत समस्याएँ यत्र-तत्र देखने को मिल जाएँगी जो लेखक या अनुवादक की समस्या मानी जा सकती हैं, क्योंकि इस पुस्तक में कई स्थलों पर बहुत जटिल शब्दावली का प्रयोग किया गया है, जो कि दुरूह होने के साथ-ही-साथ अनावश्यक भी प्रतीत होती है।

संदर्भ सूची –

1.ग्रीयर, जर्मेन, अनुवाद-मधु बी. जोशी, बधिया स्त्री, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, पहला संस्करण 2001, दूसरा संस्करण 2005, पहली आवृत्ति 2014, पृष्ठ 13, 14.

2.वही, पृष्ठ 18.

3.वही, पृष्ठ 30.

4.वही, पृष्ठ 90, 91.

5.वही, पृष्ठ 106.

6.वही, पृष्ठ 256.

7.वही, पृष्ठ 297.

हिन्दी अध्ययन केन्द्र,
गुजरात केन्द्रीय विश्वविद्यालय,
गाँधीनगर, गुजरात, 382029.

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