‘सखुआ’ एक पहल

आदिवासी महिलाओं की एक नयी पहल है – ‘सखुआ’

आईआईएमसी की छात्रा रह चुकी मोनिका मारांडी की एक अनूठी पहल है- ‘सखुआ’। इसके संचालन का जिम्मा आदिवासी महिलाओं के हाथ में होगा।इस लिंक सखुआ पर क्लिक करके आप सखुआ की उन आदिवासी महिलाओं से रूबरू हो सकते हैं, उनके कार्यों को देख सकते हैं और उनका हौसला भी बढ़ा सकते हैं । मोनिका मारांडी जी और उनकी टीम बधाई की पात्र हैं। यह एक ऐसा मंच है जहां पहली बार आदिवासी महिलाओं की आवाजों , उनके हकों को सुन सकते हैं ।

सखुआ का मतलब साल का वृक्ष,  ये मुहिम पूरी तरह से वो महिलाएं चला रही हैं, जो खुद ट्राइबल कम्युनिटी से हैं. इनका मकसद है, देश भर की आदिवासी महिलाओं के हक में आवाज उठाना, उनकी बातों को, उनकी हंसी को, उनके क्राफ्ट को, उनकी बेचैनियों को मंच देना. ये वेबसाइट अपने आप में भारत की आदिवासी महिलाओं का हिंदी में विश्वकोश  बनने का लक्ष्य रखती है ।

आदिवासी समाज के बारे में जानने के लिए ही बहुत कम साधन है। एक्का -दुक्का जो मिलते हैं, आधी अधूरी जानकारी वाले। आप और हम जैसे लोगों को उसी से काम चलाना पड़ता है। आदिवासी महिलाओं पर कुछ पढ़ना चाहो , तो सब कुछ ‘निल बटा सन्नाटा’। मीडिया भी आदिवासी महिलाओं के सवालों पर मौन साधे खड़ी है। इसलिए आदिवासी महिलाओं को अपनी आवाज बुलंद करनी होगी। इसी मकसद की तरफ एक कोशिश है ‘Sakhua’।  सभी आदिवासी महिलाओं को एक मंच प्रदान करना और उनकी आवाज सुनाने का एक जरिया बनना।

आज ‘World Indigenous Day’ पर ये वेबसाइट लॉन्च हो रही है. इसी मौके पर एक डिस्कशन रखा गया है.

“आदिवासी महिलाओं के सवालों पर मीडिया चुप क्यों?” पर मिलें 

फेसबूक के पेज सखुआ पर मिलें आज शाम 7 बजे ।

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