पूजा तिवारी

तसलीमाएं 

कब-कब बनती हैं ‘तसलीमाएं’ ? उसने पूछा ।
मैंने कहा, जब-जब रौंदा जाता है एक स्त्री के आत्मसम्मान को
तभी तसलीमा जनमती है,
जब स्त्री की सांस उसके बदन से खींच लेना चाहता है कोई पुरुष
तब तसलीमा जनमती है,
जब टूटते हैं सम्मान से बंधे रिश्ते,
जब चिटकती है बराबरी की दीवार,
जब धकेल देता है एक लिंग दूसरे को सात पर्दों के पार,
जब चीखती है औरत भीतर ही भीतर घुटन से,
जब रुपयों के बिस्तर पर सेज सजाई जाती है औरत की,
जब तौलता है आदमी निगाहों से स्त्री का बदन,
जब तीखीं नजरें उतरती हैं एक जवान होती लड़की के वक्षों, नितम्बों को छलनी करते हुए उसकी योनि तक,
जब स्त्री निचोड़ लिए जाने वाले गुलाब की तरह महसूस होती है पुरुष को,
जब प्यार पर परिवार हावी होने लगता है,
जब पुरुष स्त्री को छोड़ आना चाहता है जीवन से दूर किसी गुमराह करते जंगल में,
जब स्त्रियाँ ही स्त्रियों को तोड़ती हैं खण्डों-खण्डों में,
जब स्त्रियों को ‘टार्सो’ बनाया जाता है,
जब सोच पर ताला जड़कर चाबी सात समुन्दरों में फेंक दी जाती है
तब जन्म लेती हैं तसलीमाएं ।”
वह बिना सोचे ही बीच में बोल पड़ी, ”लेकिन इस तरह तो सब औरतें तसलीमा बन सकती हैं!”
फिर थोड़ा रुककर पूछा, ”सच-सच बताओ असली तसलीमा कौन हैं ?”
उसकी आशंका दूर कर सकी या नहीं यह तो नहीं मालूम,
बस अकुलाती भावनाएं उमड़ कर उत्तर का रूप धर प्रस्तुत हो गयीं, ”वह जो सात समुन्दरों में डूब-उतराकर अपनी अक्ल की चाबी खोज ही लेती है, वही है, असली तसलीमा ।”
इस बार, मेरे जवाब पर वह ‘मोनालिसा-सी’ मुस्कान छोड़कर चली गयी
और मैं फिर तसलीमाओं के बारें में सोचने लगी ।

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आत्मकथा पढ़ते हुए

तुम्हारी आत्मकथा पढ़ते हुए
घूम आई हूँ कई-कई बार ब्रह्मपुत्र के किनारे;
देख आई हूँ तुम्हारा ‘अवकाश’ (घर)
जो अब भी तुम्हारे इंतजार में पलके बिछाये बैठा है;
मिल आई हूँ उन पड़ोसियों से
जो धुंधली-धुंधली यादों में तुम्हे आज भी संजोये हुए हैं;
कोई-कोई तो ऐसे बोल देता था जैसे आज भी तुम उनके साथ हो
यह सुन मैं नाच उठी हूँ कई-कई बार;
चूम आई हूँ उस मिट्टी को
जिसकी ख़ुशबू से कभी तुम सराबोर रहती थी;
दौड़ आयीं हूँ सड़क से लगे मैदान में
जहाँ तुम लड़कियों संग ‘गोल्लाछूट’ खेलती थी;
देख आयीं हूँ उस शिक्षा के गढ़ को
जहाँ तुमने विज्ञान और साहित्य का संतुलन बनाया था;
देख आई हूँ उन टोपीधारियों को
जो तुम्हारा नाम सुनते ही काला झंडा फहराने लगते हैं;
उन भगवा रंगों को छू आई हूँ
जो भय के साये में तुम्हे याद नहीं करना चाहते;
मिल आयीं हूँ उन सत्तानवीसों से
जो तोड़ देते हैं किसी सुकून से खिलते ‘बनैले गुलाब’ को;
टहलते-टहले झांक लिया है उन प्रकाशकों की गलियों में
जो तुम्हारे नाम से कमाए सिक्कों की खनक के बल पर आज भी जिन्दा हैं;
सड़क पर भिनभिनाते आम आदमी की आँखों में झाँकने का कोई मतलब ही नहीं निकला
उसने अपनी आँखे ‘झप’ करके बंद कर ली;
पलटकर देखा था मैंने कई-कई अखबारों को
वहाँ कोई जिक्र नहीं तुम्हारा
लिख दिया था तब मैंने कागज के एक किनारे पर ‘तसलीमा’,
उसी क्षण उस देश की मिट्टी मुट्ठी में भींच लौट पड़े थे मेरे कदम
किन्तु वह मिट्टी सीमापार ही मेरे हाथ से रेत की तरह झर गयी
या
तुम्हे उस देश की जरूरत नहीं यह सोचकर जानबूझकर वहीं छोड़ दी मैंने
ठीक से कुछ याद नहीं
तुम्हारे लिए तुम्हारे देश से कुछ न ला सकी !
लेकिन सुन लो मुझसे
सब कुछ वैसा ही है जैसा तुमने छोड़ा था
बस एक तुम नहीं हो वहाँ !
अब भी तसल्ली नहीं ?
तो मेरी आँखों में झाँकों
मेरे दिल की नब्जों को
टटोलो छू लो मेरे हाथ
जो अभी-अभी तुम्हारे वतन की मिट्टी को छू कर आयें हैं
शायद तुम्हे अपने देश की कोई ख़बर मिल जाए ।

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मैंने तसलीमा को देखा है

मैंने तसलीमा को देखा है!
उफनती उबलती लड़कियों में;
माचिस की डिब्बीनुमा महलों में;
बड़े-बड़े महलनुमा दड़बों में कैद उन तस्वीरों में
जो लड़ते-लड़ते शहीद हो गयीं मुक्ति की राह में;
उन आँखों में, जो बोलती नहीं एक शब्द;
और उनकी बातों में सुना है जो बोलती बहुत हैं;
अपने-अपने घरों, सीमाओं और दायरों के भीतर लाखों अरबों तसलीमाएं पनप रही हैं
लड़कियाँ तसलीमा होना चाहती थीं, हैं और हो रही हैं
आज भले ही स्वीकार न करो
कल ये तसलीमाएं तुम्हे सामने से दिखाई देंगी,
और तुम भी तसलीमा बनने की ख्वाहिश करने लगोगे
भले तुम ‘पुरुष’ ही क्यों न हो
क्योंकि ‘तसलीमा’ एक नाम नहीं एक ‘विचार है !

पूजा तिवारी
विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में कवितायें, अनुवाद एवं
आलोचनात्मक लेख प्रकाशित |
तसलीमा नसरीन की आत्मकथा में धर्म, पितृसत्ता और
राजनीति विषय में हैदराबाद केन्द्रीय विश्वविद्यालय, तेलंगाना से शोध
कार्य पूर्ण किया है एवं डाक्टरेट की उपाधि अर्जित की है |
ईमेल-tipu1615@gmail.com

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