उमा मीना 

स्त्री-पुरुष दोनों ही जीवन का सृजन कर पीढ़ियों को आगे बढ़ाते हैं इसलिए सामाजिक संरचना में दोनों की महत्वपूर्ण भूमिका  हैं l लेकिन भारतीय समाज में जेंडर के आधार पर सामाजिक अधिकार तय किये गए हैंl यहाँ पुरुषों ने अपना वर्चस्व स्थापित करते हुए स्त्री को दोयम दर्ज़े  पर रखा l ऐसे समाज में ‘तृतीय लिंग’ जो कि न पूर्णत: पुरुष ही है और न पूर्णत: स्त्री या कहें कि  जिसमें पुरुषत्व और स्त्रैण दोनों ही  भाव समान रूप से विद्यमान रहे हैं ,उस वर्ग को एक गैरज़रुरी खांचे में डाल  दिया गया l प्रत्येक जीव के लिए उदार रही भारतीय संस्कृति में दुर्भाग्यवश इस जीव के साथ न्याय नहीं हो पाया l जैविक भिन्नता उतनी बड़ी समस्या नहीं थी जितनी कि सामाजिक संरचना l अवसर और आवश्यकता के वक़्त  गहरे मेकअप से पुते चेहरे लिए , तालियां बजाकर और नाचकर मनोरंजन करने वाले इस तीसरे लिंग को समाज इनके आशीर्वाद और दुआओं के लिए ही ज़रुरी मानता है लेकिन उपहास और हिकारत के सिवा उसे कुछ नहीं देता l

आज विश्व धरातल पर हाशिए के समाज को मुख्य धारा में लाने की अनेक कोशिशें हो रही हैं। दलित, स्त्री और आदिवासी आदि के अधिकारों के लिए जो प्रयास हुए हैं उसके सकारात्मक परिणाम हम देख रहे हैं। किन्नर या हिजड़ों के लिए ‘तीसरे लिंग’ के रूप में इनके अधिकारों को मान्यता दी गई है और इन्हें मुख्य धारा में लाने के प्रयास तेज़ हुए हैं। चिकित्सा के माध्यम से पुरुष या स्त्री बनने का और बच्चे को गोद लेने का अधिकार भी उन्हें दिया है, किंतु सभ्य समाज आज भी उनके अधिकारों और अस्तित्व को अनदेखा कर रहा है। थर्ड जेंडर के साथ अभी भी अमानवीय व्यवहार हो रहा है। आगे बढ़ते हुए उनके क़दमों को रोकने की कोशिशें भी साथ-साथ होती रही हैं l संघर्ष कर शिक्षा प्राप्त करके आगे बढ़ रहे हाशिये के लोग अपने समाज को निर्धारित  दायरे से बाहर लाकर मुक्त और उन्नत करने के उच्च संकल्प के साथ अपने जीवन और समाज की सच्चाई को सामने ला रहे हैं l आत्मकथाएं इस दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं l

अस्तित्व और अस्मिता के संघर्ष की कहानी है मनोबी बंद्योपाध्याय  की आत्मकथा ‘पुरुष तन में फँसा मेरा नारी मन’,  जिसमें अपने पुरुष तन में झटपटाती एक स्त्री की आत्मा को स्त्री शरीर के रूप में अपने असल अस्तित्व तक पहुँचाने के साहसपूर्ण संघर्ष  के साथ समाज के उस घिनौने चेहरे को भी उद्घाटित किया है जो अपने सभ्य होने का दंभ भरता है l यह सोमनाथ के मनोबी बनने की कहानी है l यह उनकी अंग्रेजी में लिखी आत्मकथा ‘ए गिफ्ट ऑफ़ गॉडेस लक्ष्मी’ का हिंदी अनुवाद है l  यह आत्मकथा “उनके जीवन का हर उतार चढाव, सच्चाई और परीक्षा की हर घडी ,समाज की हकीकतों के परदे खोलती चलती है कि किस तरह यह पारंपरिक समाज, सब को एक साथ लेकर चलने की घोषणा के बावजूद, उसे अपने साथ लेकर चलने से कतराता है और निष्काषित कर देता है जो इसके नियमों के अनुसार नहीं चलता l हमारी आधुनिकता के झीने आवरण तले, शिकारी कुत्ते की तरह टोहने और शिकार करने की मध्ययुगीन प्रवृति छिपी है”l (पृo 160)

आत्मकथा के आरम्भ में ही आत्मकथाकार स्पष्ट कर देती है कि “मैंने इस विश्वास के साथ यह सब लिखा है कि इस तरह समाज हम जैसे लोगों को बेहतर तरीके से समझ सकेगाl हम बाहरी तौर पर दिखने में भले ही थोड़े अलग लगें पर आपकी तरह ही इंसान हैं और आप सबकी तरह ही शारीरिक और भावात्मक जरूरतें रखते हैंl “(पृ o 7)  इसलिए उन्हें केवल नपुंसक कहकर छोड़ देना न्यायोचित नहीं होगा l आज के शिक्षित और आधुनिक समाज में समाज के प्रत्येक तबके से जुड़ना और उन्हें समझना जरुरी है l ट्रांसजेंडर केवल ताली बजाकर मनोरंजन करने के लिए नहीं हैं ,वे बुद्धिजीवी भी हैं और यदि उन्हें समाज का सहयोग मिले तो वे किसी भी ऊंचाई को प्राप्त कर सकते हैं l देश की पहली ट्रांसजेंडर प्रोफेसर होने के साथ-साथ मानबी बंद्योपाध्याय  देश की पहली ट्रांस पर्सन भी हैं, जिन्होंने डॉक्टर ऑफ फिलॉसोफी (पीएचडी) की है। मानबी ने कोलकाता के विवेकानंद सत्वार्षिकी महाविद्यालय में बंगाली भाषा साहित्य के एसोसिएट प्रोफेसर के रूप में पहली नियुक्ति पाई और जून, 2015 को वह कोलकाता के कृष्णानगर वुमेंस कॉलेज में प्रिंसिपल के तौर पर पदस्थापित हुईं l अपने परिवार के सहयोग और समाज में अपने अस्तित्व की स्थापना की इच्छा शक्ति और होसले से आगे बढ़ते रहने के कारण ही वे इस मुकाम को पा सकीं l

अपने अतीत को याद करते हुए उनकी दृष्टी सबसे पहले उस समय के समाज और अपने परिवार पर पड़ती है l ये ऐसा समाज था जहाँ पुत्र का जन्म स्त्री के लिए सौभाग्य और पुरुष के लिए वंश वृद्धी के तौर पर उतराधिकारी प्राप्त करने के कारण गर्व की बात थी l जहाँ व्यक्ति के क्रिया- कलाप समाज की सोच और निर्धारित नियमों से संचालित होते थेl सितम्बर, 1964 में शुरू होती है मनोबी की जीवन-यात्रा जब दो बेटियों के बाद चित्तरंजन बंद्योपाध्याय  के घर बेटा पैदा होता है । बेटे सोमनाथ के जन्म के साथ ही पिता के भाग्य ने बेहतरी की ओर तेज़ी से ऐसा कदम बढ़ाया कि लोग हँसते हुए कहते कि अक्सर बेटियाँ पिता के लिए सौभाग्य लाती हैं पर  इस बार यह  बेटा घर के लिए  किस्मत वाला साबित हुआ है । वे कहते, “चित्त! यह तो एक पुत्र  लक्ष्मी है!’(पृ.12)  नवजात को जन्म देने के बाद शारीरिक रूप से कमजोर हो गयी पत्नी अपने पीहर में कुछ दिन रहना चाहती है लेकिन पति को पत्नी के स्वास्थ्य से अधिक समाज की परवाह है जो यह ताने देता है कि ” ब्याही हुई बेटी को लम्बे समय तक अपने घर रखना शुभ नहीं होता l इसे इसके ससुराल वापस भेजो l क्या तुम्हारे दामाद को लज्जा नहीं आती ?ऐसा कौन सा पति है जो अपनी पत्नी को इतने समय तक मायके में रहने की अनुमति देता है ?” उनके पिता को भी लोगों से इसी तरह के कटाक्ष सुनने को मिलते l “तुम्हारी पत्नी तो तुम्हारे साथ रहती नहीं l तुम वहीं जाकर घरजवाई क्यों नहीं बन जाते l”(पृ.13) एक अन्य कारण भी था “पुत्र का पिता न बन पाने के लिए जो लोग अब तक मेरे पिता का उपहास करते आये थे ,मेरे जन्म से उनके मुह बंद हो गए l अब मेरे पिता के पास एक पुत्र था ,एक ट्रॉफी, जिसे वे अपने परिवार को शान से दिखाते l”(पृ. 9-10)

जिस समाज में पुत्र सबसे अनमोल रत्न है वहां बेटियों का जन्म अनावश्यक भार भर है l मनोबी के पिता का व्यवहार पितृसतात्मक समाज के उस पुरुष के जैसा ही है जो पुत्र के लिए अतिरिक्त उदारता रखता है और पुत्रियों को अपने कठोर शासन से अनुशासित करता है l अपने परिवार में घटित एक घटना को याद करते हुए वे बतातीं हैं  “ यह मेरे जन्म से बहुत पहले की बात है l एक दिन पिता ने गुस्से के आवेश में आकर ,मेरी नवजात बहन को बिस्तर से फेंक दिया था l”….मेरी दोनों बहनें; सोनाली और रुपाली,पिता से इतना डरती थीं कि एक बार पटाखे चलाते समय उनमें से एक का हाथ इतनी बुरी तरह जल गया कि वह दर्द के मारे बेहोश हो गयी पर उसने पिता को नहीं बताया l उसे डर था कि पता चलने पर पिता पिटाई भी कर सकते हैं l” (पृ.13)

सोमनाथ जैसे-जैसे बड़ा होता गया उसमें लड़कियों जैसी हरकतें, भावनाएँ पैदा होने लगीं  और लाख कोशिश करने के बाद भी  दब नहीं सकीं। पिता बचपन में ही अपने पुत्र के बदल रहे व्यवहार को माँ के अत्यधिक दुलार और विनम्रता के कारण उत्पन्न भटकन समझ रहे थे किन्तु माँ कहीं अधिक गहरे से परिचित थीं कि कुछ अनुचित है जिसका वे प्रतिकार नहीं कर सकतीं l बदलते शारीरिक और व्यावहारिक बदलाव के कारण तिरस्कार का सिलसिला स्कूल के दिनों से ही शुरू हो गया था “वे मुझे चुटकी काटते ,बाल खींचते,मेरे कान उमेठते और ज़रा- सी बात पर चेहरे पर घूंसा जमा देते l मैं उन बच्चों में से थी जो शिकायत करने के बजाय चुपचाप रोने लगते हैं l मुझ पर किसी को तरस नहीं आता l”(पृ.15) उसे मासूम को एहसास होने लगा था कि संसार में अधिकतर लोग उसे स्वीकार नहीं करते l

लोगों के तरह-तरह के तानों के बीच पिता अभी भी उसे औरों से अलग मानने को तैयार नहीं थे ,वे स्वयं को यह कहकर धैर्य बंधाते कि उनका बेटा जीनियस है तभी तो औरों से अलग है और यौवनावस्था तक आते आते उसे स्वयं यह लगने लगा था कि केवल शिक्षा के बल पर वह “असमानता की इस जंग को जीत सकती थी “l(पृo 18) पर उसका यह विचार भी गलत साबित हुआ l ऐसे ही अपमान के डर से दलित अपनी पहचान छुपाता है क्यूंकि जब तक लोग नहीं जानते कि वह दलित है तब तक स्थिति सामान्य बनी रहती है पर पहचान खुलने पर उसे अपमानित होना पड़ता है पर यहाँ तो पहचान भी नहीं छुपाई जा सकती थी l उसकी बदलती शारीरिक संरचना उसकी पहचान का खुलासा आप कर रही थी l शिक्षा और ओहदा भी ‘हिजड़ा’ होने की पहचान से बड़ी पहचान उसे नहीं दिला पाया l लोगों की फब्तियां, तालियां और इशारे  चारों ओर से घेर कर उसपर कोड़े बरसाने लगे l

उसके आस-पास दो ही तरह के लोग हैं एक वे जो उसकी लैंगिकता का मखौल उड़ाकर मज़ा लेते हैं और दूसरे वो जो यौन मार्गदर्शन की आवश्यकता बताकर यौन शोषण करते हैं l जे.यू के खुले वातावरण में उसे अपनी बौद्धिक और रचनात्मक क्षमता को विकसित करने का भरपूर अवसर मिलता है l देश-विदेश की बदलती परिस्थितियों,उत्पन्न नवीन समस्याओं और उनके प्रति बदलती मानसिकता से वह परिचित हो रही थी l नृत्य और संगीत की दुनिया में उसे समानता और प्रेम का भाव प्राप्त होता  हैl

नौकरी और शिक्षा के लिए वह गाँव और शहर दोनों ही वातावरण में रही है l शहरी परिवेश में वह अधिक सुरक्षित महसूस करती है “मुझे अहसास हुआ कि पहले मेरी असुरक्षा का भाव इसलिए बढ़ा क्योंकि मैंने खुद को अपने चिर-परिचित शहरी परिवेश से अलग कर लिया था और अपने निजी संघर्ष को उस अनजान देहाती परिवेश में पूरा करने की कोशिश कर रही थी ,जिसके लिए मैं एक बाहरी व्यक्ति थी l”(पृ.104) असुरक्षा का भाव ग्रामीण परिवेश में अधिक था l शिक्षा प्राप्त कर नौकरी पाना उसकी एक बड़ी उपलब्धि थी l लेकिन उच्च शिक्षा के शैक्षणिक संसथान में बौद्धिक लोगों के बीच झारखण्ड के कॉलेज में उसे  विभिन्न प्रकार से प्रताड़ित करके निकालने की लगातार कोशिश की जाती रही l  कभी निर्वस्त्र करने की कोशिश, शराब पिलाना  और यौन शोषण की लगातार कोशिशें होती रहीं लेकिन अपने माता-पिता के पालन -पोषण और अपने करियर की खातिर सब कुछ सहन करके भी नौकरी में बने रहने का संघर्ष वह लगातार करती रही क्यूंकि अभी भी उसे विश्वास था कि “ मेरे शैक्षणिक करियर में मेरी मुक्ति छिपी है l”(पृ. 101)

लैंगिक पहचान के साथ नाम परिवर्तन के कारण उन्हें व्यवसाय में अपनी पहचान साबित करने में बहुत सारी कठिनाईयों का सामना करना पड़ा और वरिष्ठता के कई लाभ भी खोने पड़े l

शिक्षा-शिक्षण के मोर्चे पर यह उनकी बड़ी विजय थी कि उनके छात्र उनसे पाठ्यक्रम को लेकर जिरह करते थे और पारितोष महतो की उपलब्धि इस दिशा में उलेखनीय सफलता थी जिसने एक अच्छे शिक्षक के रूप में उन्हें  स्थापित किया l छात्रों को वह पूरे समर्पित भाव से सहयोग करती है l वह कहती है “मेरी सबसे बड़ी सफलता यह रही कि मैं अपने छात्रों के लिए पढाई में रूचि पैदा कर सकी …उन्हें केवल हलकी -सी थपकी की जरुरत थी l बस मैं उन्हें वही थपकी देने की कोशिश करती और उस दौरान अपने सारे निजी संघर्ष और विसंगतियों को भुला देती l”(पृ. 86) कोलेज प्रोफेसर पद पर कार्य करते हुए वे अपने अनुभवों के आधार पर कॉलेज की शिक्षा व्यवस्था और छात्रों के शैक्षणिक स्तर का विश्लेषण कर यह सुझाव पेश करती है कि “एक समाज के रूप में , हमें पारंपरिक उच्च शिक्षा के बारे में नए सिरे से विचार करना चाहिए l इसकी बजाय अगर हम उन बच्चों को पेशेवर प्रशिक्षण दे सकें तो वे अपने जीवन में कोई काम कर सकेंगे और उन्हें बेरोजगार नहीं रहना होगा l”(पृ. 86)

वह महसूस करती हैं कि सिंगल बोट मणिमेखला अभियान की संस्थापक माया सिध्दांत ने जब उन्हें पत्रकारिता से जोड़ा तो लोग उन्हें गंभीरता से लेने लगे l इसने  उनमें  स्वाभिमान की भावना को जन्म दिया l अपने आपको ट्रांसजेंडर कहलाने,अपनी लैंगिकता दर्शाने में संकोच और लज्जा को अब मनोबी ने त्याग दिया l यद्यपि अभी तक ट्रांसजेंडर शब्द से परिचित न होने के कारण लोग उन्हें होमेसेक्सुअल कहते थे l वह  ज़ोरदार शब्दों में बच्चों का यौन शोषण करने वाले वैवाहिक पुरुषों की समलैंगिकता का सवाल उठाती हैं जिनके विषय में समाज चुप रहना ही उचित समझता है किन्तु ट्रांसजेंडर को एक अलग खांचे में डालकर उसपर ज्यादतियां करता है lभारत की पहली ट्रांसजेंडर पत्रिका ‘अबोमनोब’ निकालने का श्रेय मनोबी को जाता है जिसकी प्रेरणा नोबल पुरस्कार विजेता अमर्त्य सेन की भूतपूर्व पत्नी और लेखिका नबनीता देव सेन से प्राप्त हुईl वे कहती हैं कि “यह हमारे समाज के खिलाफ़ मेरा विद्रोह था जो बाहरी तौर पर उदारमना और सब को एक साथ लेकर चलने का दिखावा करता है और भीतर से पूरी तरह से ज़ालिम और निर्दयी है l मेरी पत्रिका में ट्रांसजेंडर लोगों से जुडी हर बात को प्रकाशित किया गया l” (पृ.100)

सम्पूर्ण आत्मकथा में पुरुष तन में नारी की आत्मा झटपटाटी दिखाई देती है “मेरी आत्मा और लैंगिकता दर्पण में दिखने वाली छवि से मेल नहीं खाते थे l मैं अपनी उस सम्पूर्ण छवि को पाने के लिये घंटों बिसूरती और जी में आता कि अपना जिस्म फाड़कर उस पुरुष देह से बाहर निकल जाऊं जिसमें मेरा जन्म हुआ थाl”(पृ.97) उसकी इच्छाएं हैं कि वह  भी नारीत्व और उसकी सुन्दरता की पराकाष्ठा को प्राप्त करे किन्तु प्रकृति ने उसे जो रूप दिया उसमे इन इच्छाओं को दबा देने के सिवा कोई रास्ता नहीं l वह  स्वयं को अभिनेत्री सुचित्रा सेन की तरह दिखाना चाहती है l वह अक्सर कल्पना करती कि “ मैं दुल्हन हूँ और मेरा वर पहली बार नेह भरी दृष्टी से मुझे निहार रहा है l और जब माला बदलने का समय आता,तो मैं मन ही मन जैसे उस दृश्य में कहीं खो जाती और कई दिन तक उसका खुमार मुझ पर छाया रहता l” (पृ.18-19)

उसे एक ऐसी स्त्री होने का गर्व है जिसको पाने के लिए लड़कों की होड़ लगी थी l जिस स्त्रीत्व की वह निरंतर चाह करती रही वह स्त्रीत्व उसे श्वेत ने दिया जो उसपर अपना पूरा अधिकार मानता था l जिसे उसकी हर अच्छी बुरी बात से कोई ऐतराज़ नहीं था l इन सब अच्छाइयों के बाद भी वह  पत्नी श्याम की बनना चाहती है क्यूंकि “यह एक अनकहा समझौता था कि जब तक अपने माता-पिता को इस बात के लिए राज़ी नहीं कर लेते कि हम पति और पत्नी की तरह रहना चाहते हैं,तब तक एक दूसरे के घर नहीं जायेंगे l”(पृo 29) श्वेत को पसंद करने के बावजूद वह श्याम के प्रति आकर्षण को अधिक महसूस करती है और उसे वरीयता देती है l वह स्पष्ट करती है कि ‘शारीरिक संबंधों में संतुष्टि मात्र उसका ध्येय नहीं’ उसे एक ऐसा सम्बन्ध चाहिए जो उसे ” किसी भविष्य और एक परिवार तक ले जा सकेl”(पृ.30)  एक ओर श्याम है जो अब तक यह समझ चुका था कि उसका और स्त्री रूप में सोमनाथ का कोई मेल नहीं हो सकता और उससे दूरी बना लेता है और दूसरी ओर श्वेत उसके श्याम के प्रति आकर्षण के कारण एक अच्छा प्रेमी होने की अक्षमता को स्वीकार कर कलकत्ता चला जाता है l

स्त्रियोचित शारीरिक विशेषता न होने की वजह से उसे किसी भी सम्बन्ध को बनाये रखने के लिए सेक्स से जुड़ना पड़ता है जिससे शरीर और मन दोनों आहत होते हैं    किन्तु इसके बाद भी जब वह रिश्ता अधिक समय तक शारीरिक संबंधों के बल पर टिक नहीं पाता ,भावात्मक स्तर को नहीं छू पाता तो उसके जीवन में लगातार खालीपन आ जाता है और वह  फिर से नए सम्बन्ध की तलाश में जुट जाती है l अपने लिए एक अदद विश्वासी और समर्पित साथी की तलाश उसे कई भारतीय और विदेशी युवकों से शारीरिक सम्बन्ध जोड़ने को प्रेरित करती है l सच्चे सार्थक सम्बन्ध की तलाश श्वेत,श्याम और देब से होते हुए कॉलेज के दिनों में अभि  तक पहुँचती है l कॉलेज के दिन जहाँ औरों के लिए आनंद और मस्ती के होते हैं वहीं मनोबी  लिए अस्मिता का संकट बनकर फिर से उभरता है l

हर बार प्रेम एक भ्रम ही साबित होता है l एक सामान्य व्यक्ति द्वारा, समाज द्वारा अमान्य घोषित व्यक्ति से सम्बन्ध जोड़ने के लिए जिस साहस ,दृढ़ निश्चय और विश्वास की आवश्यकता होती है वह बिमान, श्याम और अभि में नहीं है l ऐसा लगता है कि उसे पा लेने की होड़ में लगे तमाम पुरुष केवल उसकी देह को ही पाना चाहते हैं और हर किसी की प्यार भरी दृष्टी को प्यार मानकर सहज स्वीकार कर लेने की उसकी प्रवृति उसे शिकारी का शिकार स्वयं बना देती है l पुरुष के प्रेम को पाने की खतरनाक शरीरिक और भावात्मक यात्रा की अंतहीन शृंखला ही यहाँ दिखाई पड़ती है l

बचपन से लेकर अपने कॉलेज के दिनों तक वह पुरुष रूप में है किन्तु उसमें स्त्रियोचित गुण अधिक हैं, तभी तो उसे अपनी बहनों की छीट की फ्रॉक पहनना ,माँ की लिपस्टिक और काजल लगाना पसंद है और अपने जननागों से नफरत है l सुन्दर नौजवानों की ओर उसका आकर्षण बढ़ने लगा है  l तीव्र शारीरिक आकर्षण के कारण मात्र पांचवी कक्षा में ही उसने सेक्स का अनुभव पा लिया l आठवीं कक्षा तक आते आते उसने स्वीकार कर लिया था “परन्तु माँ ! मैं एक स्त्री हूँ….क्या आपको विश्वास नहीं आता ?क्या मुझे आप लोगों से बेहतर तरीके से कपडे पहनने नहीं आते ?माँ,आप मुझे एक लड़की बनने दो ..l”(पृ.17)  माँ की उस समय की पीड़ा की कल्पना वह आज कर सकती है l

लेखिका में एक बौद्धिक व्यक्ति का संकोच है l वह स्वीकार करती है कि सेक्स उसके लिए सबसे बड़ी प्राथमिकता था किन्तु वह चतुराई से अपनी इस बात को छिपाने की कोशिश करती  है l वह जगदीश की तरह बेबाक और निडर नहीं l आत्मकथा विधा  ,आत्मकथाकार से निर्मम सच्चाई के उद्घाटन की मांग करती है l आत्मकथाकार ने स्वीकार किया है कि  उसे अपने कजिन द्वारा किये गए यौनाचार का कोई दुःख नहीं है वरन सेक्स के अनुभव को प्राप्त करने के लिए वह उसका शुक्रिया अदा करती है “मैं सेक्स के लिए सक्रीय थी और श्याम से कहीं अधिक अनुभवी थीं ,जिसके लिए मुझे अपने से बड़े कजिन का शुक्रिया अदा  करना चाहिए जिसके बारे में मैंने आपको बताया था l ….यह अपने आप में एक तरह का पाशविक प्रेम था,जिसकी मैं तब तक अभ्यस्त हो गयी थी l अगर मैं कहूँ कि मैं इसे पसंद नहीं करती थी तो यह मेरी ओर से बईमानी होगी l”(पृ.25) कजिन से एक ओर पाशविक प्रेम है तो दूसरी ओर श्याम के प्रति रोमानी प्रेम, जिसमें हर एक स्पर्श स्वर्गीय सुख देता था l

वह मानती है कि हर वक़्त सेक्स के लिए सोचते रहने के आलावा भी जीवन में बहुत कुछ है l वह सेक्स से अधिक प्रेम को तरजीह देती है इसलिए उसका दायरा अन्य ट्रांसजेंडर से अधिक बड़ा और विस्तृत है l वह  दोनों लिंगों के लोगों के साथ बौद्धिक तौर पर मेलजोल रखती है l यह जानते हुए भी कि उसके और जगदीश के विचारों में बहुत अन्तर है और जगदीश उसकी सामाजिक स्वीकृति के कारण कुंठा का शिकार है फिर भी  लेखिका उसपर तरस करती है l उसके साहस, प्रतिभा और जिन्दादिली की जी खोलकर प्रशंसा करती है l वह कहती है “ट्रांसजेंडर लोग अपनी-अपनी आजीविका के लिए जो जो काम करते हैं ,मैं उन सभी का समर्थन नहीं करती ,पर मैं अपने इस तथाकथित भद्र समाज के पाखंड को भी नहीं सह सकती l”(पृ.75)  यह भद्र समाज ही है जो ट्रांसजेंडर को एक ऐसे खांचे में डाल देता है जो सर्वथा उपेक्षित और अस्वीकार्य है , भीख मांगना,सेक्स वर्कर बनना या लोगों का मनोरंजन करने के लिए मजबूर हैं l जिन्हें कोटी, चेली,छिबडी,हिजड़ा बनना पड़ता है l भड़वों द्वारा बेहद कम उम्र में इन्हें फुसलाकर अपने परिवार से दूर कर दिया जाता है और यौन शोषण के धंधे में ढकेल दिया जाता है l

वे जानती थी कि अगर “मैं लोगों के बीच पुरोषोचित वस्त्र पहनकर वैसा ही आचरण करूँ तो उन सब अपमानों और छीछालेदर से बच सकती थी जो मेरी जिंदगी के एक एक क्षण के  अटूट अंग बन गए थे l”(पृ.97) लोगों की जहालत को कम करने के लिए स्वभाव के विपरीत केवल पुरुष देह के कारण वह पुरुषोचित कार्य करके लोगों की अपने प्रति प्रतिक्रिया जानने की कोशिश भी करती है , पर इस नतीजे पर पहुँचती है कि “मैं एक स्त्री हूँ और मुझे किसी भी हाल में ,किसी भी दशा में अपने खोल से बाहर आना था “यह जानते हुए भी कि “अगर मुझे अपनी सच्ची लैंगिक पहचान स्थापित करने में मौत का भी सामना करना पड़ता ,तो मैं ऐसा करने को भी तैयार थी l”(पृ o98)

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सेक्स चंगे के ऑपरेशन की प्रक्रिया शारीरिक और मानसिक रुप से एक बड़े परिवर्तन के लिए भीतरी-बाहरी संघर्ष को झेलते हुए दृढ़तापूर्वक डटे रहने की चुनौतीपूर्ण प्रक्रिया थीl वे बताती हैं  “तब मुझे समझ आया कि जन्मजात पुरुष देह के साथ नारीत्व को महसूस करना एक अलग बात थी और शरीर की कुदरती प्रक्रियाओं को रोककर ,सजग भाव से दूसरे सेक्स में बदलने का निर्णय,पूरी तरह से अलग बात थी “(पृ.107) पुरुष देह को स्त्री में परिवर्तित करने की प्रक्रिया सुखद थी क्योंकि यह उसकी आत्मा की आवाज़ थी l किन्तु स्त्री बन जाने के बाद अपनी देह उघाड़ कर स्त्री होने का प्रमाण देना एक स्त्री की अस्मिता का दलन था जिसने उन्हें गहरे सदमे में डाल  दिया l  आधुनिक विज्ञान के चमत्कार से अनभिज्ञ डॉक्टरों का दल, डॉ. खन्ना के कथनानुसार “वे जो देखेंगे,उसे देखकर भौचक्के रह जायेंगे l मैं गारंटी देता हूँ,उन्होंने पूरे जीवन में कभी ऐसी चीज़ नहीं देखी  होगी”(पृ.135) शारीरिक परिक्षण के बाद उसके स्त्री होने की प्रामाणिकता सिद्ध करता है l  अरिंदम के साथ नए जीवन के सपने ने उसे उत्साहित किया और सेक्स चंगे के निर्णय की दृढ़ता और शक्ति प्रदान की l उसने पुरुष तन को स्त्री तन में रूपांतरित तो कर लिया किन्तु अरिंदम के विश्वासघात ने उसे उस स्त्री सुख से वंचित कर दिया जो उसका लक्ष्य था l अवसाद ने उसे अपनी जीवन लीला समाप्त कर देने की स्थिति में ला पटका l शराब सिगरेट के जिन दुर्गुणों से उसने अपने आप को हमेशा बचाए रखा वे ही अब उसका सहारा बन गए l यद्यपि कालान्तर में डॉ.खन्ना, सुजातो भद्र, वकील जोयमल्या बागची के सहयोग और सहायता से वह शोषकों को दंड दिलाने में कामयाब होती है  l

यह मानव स्वाभाव है कि हम किसी के व्यवहार की आलोचना तो करने लगते हैं किन्तु उस व्यवहार के पीछे के सामाजिक और मनोवैज्ञानिक कारणों की पड़ताल किये बगैर उस पर आरोप तय कर देते हैं l मनोबी का हर वो व्यवहार जो उसने अपने को जिलाए रखने और समाज में अपना सम्मानजनक स्थान बनाये रखने के लिए किया, आलोचना का कारण बना  l औरों की गलतियाँ भी उसपर लाद दी गयीं l ऋतंभर का गाँव के आदमी के साथ भाग जाने का दोषी भी उसी को माना गया l  हर ओर से हताश, निराश होकर अंततः वह आध्यात्म की ओर बढती है l

स्त्री तन प्राप्त कर लेने के बाद उसके भीतर स्त्रैण भाव बढ़ने लगते हैं l जब हर कोशिश के बाद भी वह अपने लिए जीवनसाथी की तलाश में नाकामयाब और हताश होती है तब मातृत्व की कामना से आप्लावित हो देबाशीष को पुत्र के रूप में स्वीकार करती  है l देबाशीष अब उसके जीवन का एकमात्र संबल बन गया था और उसके प्रति अपनी सभी आवश्यक जिम्मेदारियों को वह  पूरी ईमानदारी और समर्पण भाव से  निर्वाह करती है l

अपनी अर्जित अदभुत सफलता से मिली ख्याति उसे माया लगती है जिसे वह   सन्यासी के वीतराग की तरह ग्रहण करना चाहती है l वे लोग भी हैं जो उसके असली रूप में उसकी अर्जित सफलता से बेहद खुश हैं और तिरस्कार से खिसियाते तमाम लोग भी हैं जिनके लिए वह  मात्र तमाशे की वस्तु है ,जिनकी नज़र इस बात पर नहीं पड़ती कि समाज में तमाशे की वस्तु बनकर हमेशा तिरस्कार और घृणा की शिकार रहते हुए ऐसे वातावरण में इस ऊंचाई तक पहुंचना उसके जैसों के लिए कितना मुश्किल रहा होगा l किन्तु समाज ने उसे कभी मनुष्य ही नहीं समझा l वह भी एक संवेदनशील प्राणी है ,उसे भी पीड़ा होती है l आपके मुँह से निकले तमाम विश्लेषण उसे मानसिक आघात पहुंचाते हैं l

यद्यपि आत्मकथाकार से अपेक्षा की जाती है कि वह  अपने जीवन के प्रत्येक रहस्य से पर्दा उठाये किन्तु उसे इस बात का ख्याल भी रखना होता है कि वह अन्य व्यक्तियों के सम्बन्ध में ऐसे रहस्य उद्घाटित न करे जिनसे समाज में उनकी प्रतिष्ठा किसी भी प्रकार कम हो lआत्मकथा लेखक सजग होकर भावात्मक स्तर पर जीवनानुभव को चुनता और विन्यसित करता है l इस चुनाव में वह अपने उद्देश्य,कलात्मकता और सामाजिक हित आदि को ध्यान में रखता है l वे स्पष्ट करती  हैं कि  “मैं इस जगह उनके नाम नहीं देना चाहूंगी ,क्योंकि मैं उनकी पहचान को प्रकट नहीं करना चाहती l वे लोग मेरी तरह नहीं थे ,उन्होंने अपनी पुरुष देह की कैद में ही रहना पसंद किया और संसार के लिए आज भी वे पुरुष नर्तक ही हैं,भले ही उनमें  स्त्रैण कोमल भाव ही मौजूद हैं l”(पृ.21)  वह समलैंगिकता के प्रति समाज के  दृष्टिकोण से परिचित है इसीलिए अपने संपर्क में आये सभी लड़कों के नाम छुपाती है क्योंकि  “यदि उनके नाम लिए तो समाज उन्हें एक लड़के से प्रेम करने का दोष दे सकता है ?अब वे सामान्य पारिवारिक जीवन जी रहे हैं l”(पृ.24)

भारतीय समाज जब अपने ही पूरे वर्ग को दलित कहकर बहिष्कृत कर देता है वहां ट्रांसजेंडर तो सबसे अधिक दलित,दमित ,बहिष्कृत और उपेक्षित तबका है l वहां किसी भी प्रकार से समाज में अपने अस्तित्व को बचाए रखने का ही प्रयास है l जरुरी नहीं कि हरेक पाठक अपनी संवेदनशीलता से इस कथा को ग्रहण करे जिसकी अपेक्षा लेखिका ने की है l कुछ लोगों के लिए यह मात्र मनोरंजन का विषय भी हो सकता है जिसके कई खतरे हैं l

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वे समाज की  इस हकीक़त  का भंडाफोड़ भी करती हैं  कि सेक्स वर्कर्स या ट्रांसजेंडर के लिए आयोजित होनेवाली सभाओं में उनके हित में काम करने वाले लोगों के आलावा ऐसे लोगों की भीड़ भी होती है जो केवल ‘मौजमस्ती करने या सेक्स वर्कर्स को ताड़ने’आते हैं जैसे लोग चिड़ियाघर में जानवरों को देखते हैं l”(पृ.77)

अतीत की स्मृतियाँ प्राय:सुखद होती हैं और हर व्यक्ति उन्हें याद करना चाहता है किन्तु दलित और मनोबी जैसे लोगों के लिए ये गुजरे हुए दर्दनाक दिनों को फिर से जीने जैसा है l मनोबी बताती हैं कि “मेरे मामले में इस कहावत ने थोडा अलग तरह से अपना प्रभाव दिखाया है l कष्ट तो अब भी है पर समय के साथ-साथ दर्द घट गया है l यह मेरे जीवन  के एकांत क्षणों में मुझे आ घेरता है ,जब मैं अपने अस्तित्व सम्बन्धी यथार्थ से जूझ रही होती हूँ l मैं कौन हूँ और मैं एक पुरुष की देह में कैद स्त्री के रूप में क्यों जन्मी ? मेरी नियति क्या है ?”(पृ.5)  मनोबी ने जीवन भर जातिच्युत और परित्यक्त होने की पीड़ा को सहा ,उसके बाहरी रंग-रूप के नीचे चोटिल और शर्मसार वैयक्तिकता आज़ाद होने को बेचैन है l अपनी शर्तों पर अपनी वास्तविकता के साथ आज़ादी से जीने की ललक है l

आतंरिक अशांति और चिंताएं व्यक्ति को अंतर्मुखी बना देती हैं l आत्मकथा की प्रत्यक्ष अभिव्यक्ति का गुण इस अंतर्द्वंद से पूर्णतया निवृति दिला देता है l आत्मकथा में मनोबी इस रहस्य का खुलासा करती है कि ट्रांसजेंडर पर फिल्म  बनाने वाला कपिल एड्स का शिकार बनता है और उसकी मौत का जिम्मेदार लेखिका  को माना  जाता है l वह स्पष्ट स्वीकार  करती है कि वह उसकी मौत के लिए दोषी नहीं थी l

मनोबी अपने माता-पिता के प्रति कृतज्ञता को बार-बार व्यक्त करती हैं  “एक बार फिर से मुझे अहसास हुआ कि भले ही मेरे माँ-बाप और बहनों ने जीवन में मेरी लैंगिकता को दिल से नहीं स्वीकारा ,पर इसके बावजूद इस जीवन में उनके योगदान को भुला नहीं सकती l अगर उन्होंने मुझे अपनी निगरानी में रखते हुए, शिक्षा और करियर के लिए दबाव न डाला होता ,तो कौन जाने मेरी क्या दशा होती ?”(पृ.101)  बाकि ट्रांसजेंडर की तुलना में वे स्वयं को इस अर्थ में भाग्यशाली मानती हैं  कि उनके परिवार ने उनके विचित्र रूप के बावजूद उन्हें  सहारा दिया और पढने का भरपूर अवसर भी दिया lलेखिका अपने माता-पिता के प्रति बेहद संवेदनशील है l उनके द्वारा लगाई गयी पाबंदियों के पीछे के कारणों को भलीभांति समझती है l उन पाबंदियों के कारण कहीं कुछ खो दिय्रे जाने पर उन्हें दोषी नहीं ठहरती l

मनोबी ने अपने उन शिक्षकों और मित्रों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त की है जो उसके जीवन को नई दिशा देने वाले रहे हैं l शंख घोष, पवित्र सरकार ऐसे लोग हैं जिनसे  वह  अपनी आत्मा साँझा करती है l अंत में वह अपने परिवार का और तत्कालीन मुख्यमंत्री ममता बनर्जी का आभार प्रकट करती है  जिन्होंने उसे उसके जीवन के हर मोड़ पर संभाला और न्याय दिलाया l वह आभार प्रकट करती है आर.जी कर मेडिकल कॉलेज के मैनाक मुख्योपाध्याय का जो उसकी इस विचित्र लगने वाली पीड़ा को सहजता से लेते भी हैं और पुरुष देह में कसमसाती स्त्री आत्मा को उम्मीदों की एक नई रौशनी प्रदान करते हैं l

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इस आत्मकथा के माध्यम से ट्रांसजेंडर के जीवन से जुड़े तमाम प्रसंग सामने आये हैं जो उनकी दुनियां के भीतरी उजालों और अंधेरों से हमें परिचित कराते हैं l  समाज से निरंतर जूझते हुए मनोबी भारत की पहली ट्रांसजेंडर कॉलेज प्रिंसिपल का गौरव प्राप्त करती हैं l यह आत्मकथा निश्चय ही उनके जैसों के लिए प्रेरणात्मक सिद्ध होगी l

आत्मकथा सबसे ज्यादा लोकतांत्रिक विधा है l यह किसी भी शैली में लिखी जा सकती है l दूसरे व्यक्ति द्वारा लिखी जाने के कारण यह एक जीवनी होते हुए भी आत्मकथा इस अर्थ में है कि  यह उतम शैली में लिखी गयी है l लेखिका झिमली पांडेय ने स्पष्ट किया है कि मनोबी ने अपने जीवन की कहानी कहने के लिए मुझपर भरोसा किया, वे मेरा हाथ थामकर अपने जीवन की उन गहराईयों में ले गयी जिनमें संभवतः वे किसी को झाकने तक न देती l दिन-प्रतिदिन मैं सुबह जल्दी उठकर, उनसे बात करने का आग्रह करती, जब वह  क्रोध, उत्साह, हँसी, आंसुओं के बीच अपनी कहानी कहती तो मैं उसे लिखने का प्रयास करती l”(पृo160)  लगता है जैसे अपने जीवन की तमाम पीडाओं को लिखने में असमर्थ उनकी कलम को झिमली मुखर्जी ने थाम लिया है l मनोबी की कहानी को उन्होंने पूरी ईमानदारी और तटस्थता से प्रस्तुत किया हैl हिंदी में इसका सफल  अनुवाद किया है रचना भोला यामिनी ने l

हिन्दी साहित्य और समाज की मानसिकता में अभी किन्नर विमर्श बेहद अपरिपक्व तथा पूर्वाग्रहपूर्ण अवस्था में है, समाज की वैचारिकी अभी इन्हें स्वीकार करने में हिचक रही है फिर भी यह तो मानना ही होगा कि दिन प्रतिदिन खुल रहे और विकसित हो रहे समाज ने अब इन्हें भी थोड़ा सा ही सही स्पेस देना शुरू कर दिया है और शीघ्र ही वह  दिन भी आएगा जब ये भी समाज में सामान्य लोगों की भांति अपने मानवाधिकारों के साथ जीवन-यापन कर सकेंगेl

संपर्क: मिरांडा हाउस,दिल्ली विश्वविद्यालय ,दिल्ली l
प्रकाशन :”स्मृतियों का प्रत्याख्यान” वर्ष 2015 में प्रकाशित, अंतःकरण के आयतन (शीघ्र
प्रकाश्य) दलित चेतना, स्त्री विमर्श और आत्मकथा साहित्य से सम्बंधित लेख विभिन्न पुस्तकों
और पत्रिकाओं में प्रकाशित l
ईमेल : druma.miranda@gmail.com

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