राजाराम भादू

इस समय मुम्बइया सिनेमा में तुमुल कोलाहल व्याप्त है। यद्यपि इसके कई गूढ अभिप्राय और निहितार्थ हैं। इसी के बीच अभिनेत्री कंगना रनौत ने कहा है कि हिन्दी सिनेमा में फेमिनिज्म की लहर वे लेकर आयीं। असल में वहाँ दीगर मुद्दे इतने गर्म हैं कि इस पर किसी ने सलीके से चर्चा ही नहीं की। यह सचाई है कि हिन्दी सिनेमा के केन्द्र मुम्बई की फिल्म इंडस्ट्री में पितृसत्ता ही नहीं, सामंती दंभ और शक्ति प्रदर्शन, पूंजीवादी गलाकाट प्रतिस्पर्धा और कार्पोरेट संस्कृति के पतनशील मूल्य विद्यमान रहे हैं। साथ ही, यह भी सही है कि फिल्म नगरी के वजूद में आने के साथ ही वहाँ स्त्रियों ने अपनी सक्रिय सहभागिता दर्ज करायी है और पितृसत्तात्मक वर्चस्व को अनवरत रूप से चुनौती दी है। बालीबुड कहे जाने वाले उद्यम में व्याप्त इस विषमता से द्वंद्व में कई फिल्मकारों ने स्त्रियों की पक्षधरता की है। लेकिन मुनाफे पर आधारित लोकप्रियतावादी कथित मुख्यधारा सिनेमा ने इस द्वंद्व को निर्णायक परिणति तक नहीं पहुंचने दिया है।

हिन्दी सिनेमा की जिसे मध्यधारा कहा जाता है उसमें विमलराय, बासु भट्टाचार्य, गुलजार और बासु चटर्जी जैसे फिल्मकार रहे हैं जिन्होंने स्त्रियों को ऑब्जेक्ट नहीं मानकर उन्हें अपनी फिल्मों में कर्त्ता की तरह प्रस्तुत किया। सातवें- आठवें दशक के न्यू बेव और समानान्तर सिनेमा ने और आगे बढकर स्त्रियों को, यथार्थ के दायरे में ही सही, लेकिन उनकी स्वतंत्र इयत्ता के साथ प्रस्तुत किया। मृणाल सेन, श्याम बेनेगल , गोविन्द निहलानी के साथ इनमें सई परांजपे भी शामिल थीं। बाद के सिनेमा में तो महिला निर्देशकों की एक कतार है जिनमें विजया मेहता, अरुणा राजे, तनूजा चन्द्रा से नंदिता दास और मेघना गुलजार तक ने अपनी खास पहचान बनायी है। इन्होंने स्त्रियों के बहुआयामी चरित्र ही नहीं प्रस्तुत किये बल्कि अपने कथानकों में उनके वस्तुकरण ( कमोडिफिकेशन ) का तीव्र प्रतिकार किया है।

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मुख्यधारा सिनेमा को निर्णायक रूप से प्रभावित करने में महेश भट्ट के बड़े योगदान को भी नकारा नहीं जा सकता। सिनेमाई बाजार से किये समझौतों के बावजूद उन्होंने  फिल्मों में कहानी को तरजीह दी, संगीत की वापसी के साथ गीतों की अन्तर्वस्तु में बदलाव को प्रेरित किया, स्त्रियों को रूढ भूमिकाओं से उबार कर उन्हें सक्रिय चरित्रों में बदला और पुरुष- स्टार केन्द्रिकता पर चोट की। उन्होंने अनेक नये प्रयोगशील निर्देशकों के लिए जमीन तैयार की। हिन्दी सिनेमा में आरंभ से ऐसी नायिकाएं रही हैं जिन्होंने संरचनात्मक विभेद से टक्कर ली है। उनमें मीनाकुमारी से स्मिता पाटिल, शबाना आजमी और दीप्ति नवल तक एक लंबी कतार है। इस परिप्रेक्ष्य और पृष्ठभूमि ने ही हिन्दी सिनेमा में वह उर्वर जमान तैयार की जिसमें कोंकणा सेन, विद्या बालन, कंगना और तापसी पन्नू का यह रूप संभव हो सका। वैसे हमें ये नहीं भूलना चाहिए कि फिल्म उद्योग में पुरुष- प्रधानता की जडें इतनी कमजोर नहीं हैं कि कोई स्टार- अवतार अकेले ही उन्हें उखाड फेंके।

हम यहां ऐसे बिसराये हुए एक निर्देशक की बात कर रहे हैं जिसने इसी सिनेमा में स्त्रियों के लिए जगह बनाने के लिए जद्दोजहद की थी। इस शख्स का नाम है- बाबूराम इशारा, जिन्हें हिन्दी सिनेमा बी. आर. इशारा के रूप में जानता है। आखिरी बार उनका नाम खबरों में तब आया जब २५ जुलाई, २०१२ को उनका निधन हो गया।सामान्य अभिनेताओं पर भी जबरदस्त कवरेज देने वाले मीडिया ने सिनेमा की धारा को प्रभावित करने वाले इस फिल्मकार की मृत्यु का ठीक से नोटिस तक नहीं लिया था। हालांकि मीडिया पहले भी ऐसी कई शख्सियतों की उपेक्षा करता रहा है, उसके लिए ये कोई नयी रीत नहीं रही है।

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नवें दशक में फिल्मों की विषयवस्तु और प्रस्तुति में जिस साहस और नयेपन के लिए महेश भट्ट की सराहना की गयी थी, उसका असल श्रेय बी. आर. इशारा को मिलना चाहिए। खुद महेश भट्ट का कहना था कि इशारा ने हिन्दी सिनेमा की धारा बदल दी। उनके अनुसार वे एक क्रांतिकारी फिल्मकार थे जिन्होंने साहसी और लीक से हटकर फिल्में बनायीं। उन्होंने अपनी तरह के प्रयोग किये। महेश भट्ट ने यह भी बताया था कि अर्थ बनाने के दौरान उन्होंने इशारा से विचार- विमर्श किया था।

सातवें दशक की शुरुआत में बी. आर. इशारा की कथित बोल्ड फिल्मों ने धूम मचा दी थी। उनकी पहली फिल्म चेतना ( १९७० ) ने एक साथ कई नयी बहसों को जन्म दिया। इनमें फिल्मों में सेक्स- चित्रण, यौन- शुचिता और नैतिकता के साथ फिल्म सेंसर बोर्ड की भूमिका को भी घेरे में लिया गया था। इशारा की आगे आने वाली फिल्मों ने उनके सिनेमा को सही संदर्भ दिया। इनमें चरित्र ( १९७१ ) , जरूरत ( १९७३ )  और कागज की नाव (१९७५ ) शामिल हैं। यह संदर्भ उनकी फिल्मों से उभरकर आने वाली स्त्रियों की नयी छवि था। इशारा ने सही मायनों में आधुनिक स्त्री को यथार्थवादी ढंग और महिलावादी नजरिये के साथ प्रस्तुत करने की कोशिश की थी। हिन्दी सिनेमा में ये रोमांटिक सुपर स्टार का युग था जिसमें इशारा नये उभरे मध्यवर्ग की संस्कृति पर सवाल उठाते हुए स्त्री- केन्द्रित फिल्में बना रहे थे।

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स्त्रियाँ दुनिया भर की सभी कलाओं में वक्त के साथ परिवर्तित भूमिकाओं में चित्रित होती रही हैं। हिन्दी सिनेमा में अभिनेत्रियों से चाहे जितना भेदभाव किया जाता रहा हो, लेकिन पर्दे पर तो उन्हें बहुविध चित्रित किया जाता रहा है। यह सही है कि हिन्दी फिल्मों की मुख्यधारा नायक प्रधान रही है तथापि कई फिल्मकारों ने धारा से हटकर नायिकाओं को केन्द्र में रखा है। इस पर कुछ संक्षिप्त चर्चा तो हम आरम्भ में कर चुके हैं, यहां विस्तार में न जाकर संदर्भगत महबूब खान की मदर इंडिया की लार्जर देन लाइफ स्त्री- छवि और विमल राय की सुजाता और बंदिनी जैसी रूमानी फिल्मों को याद किया जा सकता है। इशारा ने अपने स्त्री चरित्रों को यथार्थवादी संदर्भों में प्रस्तुत किया। यह एक चुनौतीपूर्ण युगान्तरकारी काम था।

भारतीय इतिहास में सातवां दशक कई पहलुओं से एक अहम मुकाम है। आजादी के बाद नयी राजनीतिक व्यवस्था स्थापित हो चुकी थी। देशी उद्योग घरानों का विकास उभार पर था। नये महानगर वजूद में आ चुके थे। आधुनिक जीवन शैली अपनाने वाले शिक्षित मध्यवर्ग की एक विशाल जमात खड़ी हो चुकी थी। दूसरी ओर राष्ट्रीय पंचवर्षीय योजनाओं के बावजूद कृषक और मेहनतकश वर्गों की दुर्दशा बरकरार थी। देश भर में यह व्यापक रूप से मोहभंग का दौर भी था जो विभिन्न कलाओं में समानांतर धाराओं के रूप में अभिव्यक्ति पा रहा था। हिन्दी सिनेमा में अवांगार्द धारा के बाद एंग्री यंगमैन का उभार इसी का परिणाम था। इशारा की स्त्रियाँ एंग्री यंग वुमैन हैं। कुछ लोग हंटरवाली नाडिया को हिन्दी सिनेमा की पहली एंग्री यंग वुमैन कहते हैं। वास्तव में नाडिया और चेतना की रेहाना सुल्तान में गुणात्मक फर्क है। यह वैसा ही अंतर है जो तब दारासिंह और अमिताभ बच्चन में था।

चेतना में रेहाना सुल्तान ने एक काल गर्ल की भूमिका अभिनीत की है। लेकिन ये पारंपरिक वेश्याओं से नितान्त भिन्न है। हिन्दी सिनेमा में वेश्या चरित्र इससे पहले भी आ चुके हैं। उनमें से कई आदर्शीकृत अथवा रूमानी हैं। रेहाना देह की शक्ति को पहचानती है, साथ ही मस्तिष्क का इस्तेमाल करती है। चेतना के संवाद खासे चर्चित रहे थे। मैं ने इतने नंगे मर्द देखे हैं कि मुझे कपड़े पहने हुए मर्दों से नफरत हो गयी है, नायिका का संवाद था। इस फिल्म में एक भूमिका नादिरा की थी। कहा जाता है कि वे वेश्याओं की दुनिया से ही आयीं थीं। उनका एक संवाद था जिसमें वे कहती हैं कि कोई उनका अतीत देखना चाहे तो इसका ( नायिका )का वर्तमान देख ले और   इसका भविष्य देखना चाहें तो उसे देख सकता है। कहने का अर्थ था कि एक सेक्स वर्कर की युवा अवस्था का ही मोल है, उसका बुढापा बहुत तकलीफदेह होता है। असल में ये सोचने वाली स्त्रियाँ हैं। चेतना के आसपास ही लगभग इसी थीम पर रामदयाल निर्देशित प्रभात आयी थी। किन्तु दोनों में फर्क निर्देशकीय दृष्टि और ट्रीटमेंट को लेकर था।

चरित्र की परवीन बाबी और जरूरत की रीना राय ने इस स्त्री- छवि को और पुख्ता किया। इशारा ने उन्हें महिलावादी नजरिये से प्रस्तुत किया था। हालांकि इसी के समानांतर बासु भट्टाचार्य ने भी स्त्रियों का इसी नजरिये से चित्रण किया है। लेकिन उनकी स्त्रियाँ सामान्य मध्यमवर्गीय चरित्र हैं जो पितृसत्ता की किसी प्रदत्त भूमिका अथवा प्रचलित मर्यादा के उल्लंघन की मुश्किलें झेलती हैं। बासु की फिल्मों में उन स्त्रियों का अन्तर्जगत है। जबकि इशारा ने उन स्त्रियों को अपनी फिल्मों में केन्द्रीय स्थान दिया है जो तब तक बम्बइया सिनेमा में खलनायक की सहयोगी ( वैम्प ) की स्तर पर चित्रित हुआ करती थीं। यहां वे समाज के जटिल यथार्थ से टकराते हुए अपने होने को स्थापित करने के लिए लड रही हैं। पितृसत्ता के तमाम निषेधों को वे ठेंगा दिखाती हैं, सिगरेट व शराब पीती हैं और अपनी देह पर अपना अधिकार मानती हैं। अगर इतना ही होता तो शायद वे सिनेमाई नायकत्व की हकदार नहीं होतीं। उनमें गहरी मानवीयता, प्रेम और करुणा के भाव हैं। वे गैर- बराबरी, अन्याय और खोखले आदर्शों पर टिके समाज की नियति से लड रही हैं। इसीलिए वे हिन्दी सिनेमा के यादगार चरित्रों में बदल जाती हैं।

बी. आर .इशारा इसलिए भी महत्वपूर्ण हैं कि उन्होंने अपनी तरह की फिल्में जिद से बनायीं। वे सफलता के पीछे दौड़ते लोगों की जमात में कभी शामिल नहीं हुए। वे विमल राय के सिनेमा से वाकिफ थे। विमल राय के सहायक असित सेन इशारा के मित्र और सहयोगी थे। बासु भट्टाचार्य को उन्होंने तीसरी कसम के निर्देशन में सहयोग किया था। इसके बावजूद इनसे भिन्न किस्म की स्त्री- छवियां प्रस्तुत करना जाहिर करता है कि इशारा का यह निर्णय उनकी सोच पर आधारित था। और सही बात तो यही है कि यह एक अग्रणी सोच था।

बी. आर. इशारा ने संघर्षशील जीवन जिया। वे हिमाचल प्रदेश ( कंगना रनौत भी वहीं से है।) के ऊना जिले में किसी पहाड़ी गाँव के रहने वाले थे। अपनी किशोर उम्र में भागकर मुंबई ( तब बंबई) आ गये और कहते हैं कि एक फिल्म स्टुडियो में चाय देने का काम करने लगे। फिर उन्होंने फिल्म से जुड़े अनेक छोटे- मोटे काम किये और निर्देशक को सहयोग देने की भूमिका तक पहुंचे। उन्होंने बासु भट्टाचार्य के अलावा दुलाल गुहा को निर्देशकीय सहयोग दिया। अपनी फिल्मों में नये लोगों को ब्रेक देने वाले इशारा ने अमिताभ की फिल्म एक नज़र का निर्देशन किया था। यह अमिताभ का सुपर सितारे से पहले को दौर था। इशारा ने कई पटकथाएं लिखी हैं जिनमें राजेन्द्रसिंह बेदी की दस्तक भी शामिल है। वैसे दस्तक इशारा की फिल्मों से इतना मेल खाती है कि उन्ही की फिल्म लगती है। रेहाना सुल्तान तो इसमें हैं ही। बेदी अच्छे निर्देशक होते तो उनकी फागुन औसत फिल्म नहीं होती। काश, बेदी की महत्वपूर्ण कृति पर आधारित फिल्म एक चादर मैली- सी को इशारा ने निर्देशित किया होता !

बी. आर. इशारा का अंत भी हट कर था। उन्होंने अपनी हीरोइन रेहाना से विवाह कर लिया था। उनके संदर्भ में जो जानकारी मिलती है, वह मुम्बइया सिनेमा की सालिडेरिटी का प्रमाण देती है। इशारा और रेहाना की कोई संतान नहीं है। रेहाना के भाई ने इशारा की बीमारी के दिनों में बहुत सेवा की। उन्हें मुखाग्नि भी रेहाना के भाई ने ही दी और बाकी सभी मृतक संस्कार भी हिन्दू रीति से संपन्न करवाये। जाहिर है कि रेहाना और उसका भाई मुस्लिम हैं। फिल्म उद्योग में इस पर किसी ने हाय- तौबा नहीं मचाई। इशारा की शवयात्रा में बहुत कम लोग थे लेकिन इनमें निर्देशक महेश भट्ट, पटकथा लेखक सलीम साहब,अभिनेता रजा मुराद सहित गीत और संगीत से जुड़ी हस्तियां थीं। ये सभी लोग इशारा और रेहाना को लंबे समय से मदद कर रहे थे। ऐसे तथ्यों से पता चलता है कि अच्छे काम को अहमियत देने वाले लोग रहे हैं, भले ही वे संख्या में कम रहे हों। अब जब महिला संगठनों की नज़र हर तरफ जा रही है, उम्मीद की जानी चाहिए कि इशारा की फिल्मों का कोई पुनरावलोकन कार्यक्रम आयोजित होगा और इनका स्त्री- दृष्टि से अध्ययन किया जायेगा।

लेखक –

24 दिसम्बर 1959 को पूर्वी राजस्थान के भरतपुर जिले के एक गाँव लुधावई में जन्मे, इनकी कविता के संदर्भ, शब्दों की दुनिया, सृजन- संदर्भ, कला- प्रसंग ( आलोचना); स्वयं के विरुद्ध, जीवन ही कुछ ऐसा है ( कविता- संकलन) ; शिक्षा के सामाजिक सरोकार, हाशिये के समुदायों में शिक्षा तथा धर्म सत्ता और प्रतिरोध की संस्कृति एवं संस्कृति के प्रश्न पुस्तकें प्रकाशित हैं।
इन्होंने समकालीन जनसंघर्ष ( मासिक), महानगर ( दैनिक- मुम्बई), दिशाबोध ( पाक्षिक) और शिक्षा- विमर्श ( मासिक) का संपादन किया।
वर्तमान में समान्तर संस्थान के निदेशक हैं और संस्कृति- केन्द्रित पत्रिका मीमांसा का संपादन कर रहे हैं।
सम्पर्क : 86, मानसागर कोलोनी, श्योपुर रोड
प्रतापनगर, जयपुर- 302033
ईमेल : rajar.bhadu@gmail.com

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