जितेन्द्र विसारिया

यदि हमें हमारे घर, गाँव और शहर के आसपास ही शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और आवास की बेहतरीन सुविधाएँ प्राप्त हों, तो महानगरों में ऐसा क्या है जिसके लिए हम वहाँ की गन्दगी और सीलन भरी किराए की कोठरियों और नालों के किनारे बदबू मारती सल्मस और झोंपड़ पट्टियों में रहकर हम अपना जीवन खटाएँ???

जी हाँ! आधुनिकीकरण और महानगरीय व्यवस्था के तथाकथित विकासवाद की चपेट में देश के सत्ताधीशों की नज़र से ओझल और जीवन की मूलभूत आवश्यकताओं से महरूम गाँवों से शहरों की और पलायन करते, हर गोरे-काले, दलित-सवर्ण, हिन्दू-मुसलमान नागरिक की यह एक सार्वभौमिक और सर्वकालिक व्यथा है।

इस व्यथा को एक नए अंदाज़ में प्रस्तुत किया है बागी बलिया से चलकर बाया जेएनयू सपनों की नगरी मुंबई में बतौर गीतकार अपनी पहचान बनाने वाले साथी DrSagar Jnu ने। …साहिर, शैलेन्द्र और फ़ैज़ अहमद ‘फ़ैज़’ को अपना आदर्श मानने वाले डॉक्टर सागर द्वारा लिखे इस “रैप सॉन्ग” को आवाज़ दी है प्रसिद्ध चरित्र अभिनेता मनोज बाजपेयी ने और निर्देशित किया है, ‘मुल्क’, ‘आर्टिकल-15’ और ‘थप्पड़’ जैसी विचारोत्तेजक फिल्मों को निर्देशित करने वाले डायरेक्टर अनुभव सिन्हा ने।

ठेठ भोजपुरी में रची गई यह लम्बी कविता आख्यान है गाँवों से महानगर की ओर मज़बूरीबस पलायन करने वाले मनुष्यों का। कुछ माह पूर्व लोकडाउन जैसी घोर त्रासदी में बेवशी के बीच वहाँ भूखे पेट और नङ्गे पाँव घर वापसी की व्यथा भी अपने बड़े ही मार्मिक और यथार्थ रूप में हुई है।

यह ‘रैप’ अपने आप में गहन पीड़ा की अभिव्यक्ति भी है, तो देश और देश के कर्णधारों से सवाल भी और सुझाव भी…एक स्थान पर गीतकार कहता है :

काम काज ना गाँव में बाटे
मिलत नाहीं नोकरिया हो
देखs कइसे हाँकत बाड़ें
जइसे भेंड़ बकरिया हो
काम धाम रोजगार रहित त
गंउवे स्वर्ग बनइतीं जा
जिला जवारी छोड़िके इहवाँ
ठोकर कांहें खइतीं जा
ना त बम्बई में का बा? इहवाँ का बा?
ना त बम्बई में का बा ? इहवाँ का बा?

डॉ. सागर यदि केवल साम्यवाद से प्रभावित होते तो वे गाँव के इस तरह के आर्थिक शोषण के एकांगी चित्रण के साथ ही शायद वहीं रुक जाते, किन्तु उनका गहरा जुड़ाव फुले-अम्बेडक्राइट्स मूवमेंट्स से भी है, सो वे गाँव में आर्थिक शोषण के साथ जाति आधारित दमन की भी गहन पड़ताल कर वहाँ के दलित दुःख को भी गीत में सहज अभिव्यक्त कर देते हैं :

जबरा के हथवा में भैया
नियम और कानून उहाँ
छोटी छोटी बतियन प ऊ
कइ देलन स खून उहाँ

एह समाज में देखs केतना
ऊँच नीच के भेद हवे
उनका खातिर संविधान में
ना कौनो अनुच्छेद हवे

बेटा बेटी लेके गाँवे
जिनगी जियल मोहाल हवे
ना निम्मन इस्कूल कहीं बा
नाहीं अस्पताल हवे
ना त बम्बई में का बा? इहवाँ का बा?
ना त बम्बई में का बा? इहवाँ का बा?

डॉ. सागर के इस गीत की एक खास विशेषता यह भी कि वह अपने गीत में शुष्क सत्ता और व्यवस्था का विरोध और शिकायत ही करके नहीं रह जाते, बल्कि उनके इस गीत में एक मार्मिक अपील भी है। एक संवाद भी है वर्तमान देश के कर्णधारों से कि आख़िर यह भेदभाव, यह शोषण और यह ग़ैर बराबरी कब तक?

जुलुम होत बा हमनी सँगवा
केतना अब बरदास करीं
देस के बड़का हाकिम लो पर
अब कइसे बिस्वास करीं

हम त भुइयां लेकिन तोहार
बहुते ऊँच सिंघासन बा
सबके पता ह केकरा चलते
ना घरवा में रासन बा

ए हाकिम लो! ए साहेब लो!
हमरो कुछ सुनवाई बा
गाँव में रोगिया मरत बाड़ें
मिलत नाहीं दवाई बा
ना त बम्बई में का बा? इहवाँ का बा?
ना त बम्बई में का बा? इहवाँ का बा?

यूट्यूब चैनल पर यह ‘रैप’ अपनी नई कहन और भोजपुरी की पुरानी गँवई मिठास के चलते उसकी लोकप्रियता का आलम यह है कि उसे मात्र 3 दिन में कोई 37-38 लाख लोग देख, सुन और सराह चुके हैं। आप भी एक बार उसे देखिए।

लेखक युवा साहित्यकार हैं।

 

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