प्रेमकुमार मणि

यह अजीब संयोग है कि कपिला वात्स्यायन जी के निधन की सूचना मुझे तब मिली ,जब मैं उन्ही द्वारा लिखित एक किताब में डूबा हुआ था . यह किताब है – ‘इंडियन क्लासिकल डांस ‘ . किताब से फुर्सत पा कर जैसे ही फेसबुक खोला , कवि अशोक वाजपेयी और विमल कुमार के पोस्ट ने यह मनहूस खबर दी . वह उम्र के 92 वे में थीं और चूँकि हर किसी को एक दिन जाना है, इसलिए कहा जाएगा कि वह भरपूर जीवन जी कर गईं , लेकिन उनका नहीं रहना हमें खाली तो कर ही गया है .

कपिला जी अपने आप में एक संस्थान थीं . हमारी सांस्कृतिक पहचान . उनके होते जैसे यह अनुभव होता था कि वह हमारी सांस्कृतिक अभिभावक हैं . प्राचीन और नवीन का अद्भुत सम्मिलन उनके व्यक्तित्व की खासियत थी . इंदिरा गाँधी नेशनल सेंटर फॉर द आर्ट्स से वह लम्बे समय से जुडी रहीं और उसके डायरेक्टर से लेकर चेयरपर्सन तक के रूप में उसे संवारती रहीं . 2006 में राज्यसभा में सदस्य मनोनीत की गईं . भारतीय नृत्य -कला की वह विशेषज्ञ थीं और उनकी किताबें सम्मान के साथ पढ़ी जाती रही हैं . एक ब्यूरोक्रेट के रूप में भी उन्होंने देश की महती सेवा की थी . मेरी जानकारी के अनुसार वह केंद्रीय शिक्षा विभाग में सचिव के रूप में भी रहीं .

25 दिसम्बर 1028 को रामलाल मलिक और सत्यवती मलिक की पुत्री रूप में जन्म लेकर कपिला जी ने अपना एक स्वतंत्र व्यक्तित्व निर्मित किया . दिल्ली विश्वविद्यालय से अंग्रेजी साहित्य में स्नातकोत्तर और फिर बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय से पीएचडी किया . 1956 में ख्यात हिंदी लेखक सच्चिदानंद वात्स्यायन अज्ञेय से उन्होंने विवाह किया . 1969 में यह सम्बन्ध बिखर गया . इसकी थोड़ी -सी कथा कवि नागार्जुन ने बहुत आहत स्वर में तब सुनाई थी ,जब 1987 में अज्ञेय जी का निधन हुआ था .

आज वह नहीं हैं ,यह स्वीकारना दुःखद है . वह हमारी सांस्कृतिक धड़कन थीं और ऐसा लगता है ,हम ने कुछ अंशों में अपनी सांस्कृतिक ऊंचाइयां खो दी हैं .

मेरी श्रद्धांजलि ।

लेखक प्रख्यात विचारक व साहित्यकार हैं।

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