पापा का जन्मदिन
5 सितंबर, 2020

 प्रिय सपना,
पिछले दिनों एकल मातृत्व पर जो पथराव हुए, इस संदर्भ में लिख रही हूँ और तुम्हीं को लिख रही हूँ क्योंकि उन चश्मदीद गवाहों में तुम ही हो जिससे मेरा परिचय पुराना है और जिसपर मुझे विश्वास है कि यह जो रायता फैला  है, वह फिर न फैले – इसमें मेरे साथ तुम भी एक सजग भूमिका निभाओगी – गाली गलौज का जवाब गाली गलौज से दिए बिना। तुम्हें यह भी पता है कि  हमारी जिन युवा लेखिकाओं पर प्रहार हुआ है, वे कितनी महत्वपूर्ण लेखक और कितनी ज़िम्मेदार माएँ है। उनकी तो आँख में मातृत्व है। जिसकी आँख में ममता होती है, वह स्त्री हो या पुरुष, अराजक और क्रूर हो ही नहीं सकता!

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पिछले अनुच्छेद में ‘विश्वास’ शब्द लिखते हुए मुझे वह श्लोक याद आया जो अपने पिता के मुँह से अक्सर सुना था ( अंकम् + आरूह्य + सुप्तानाम् …. वंचनम् किं विदग्घ्ता! ) वे एक अच्छे अभिभावक और गुरु थे ! जो समझाते थे, दृष्टांत के आश्रय यानी कि उपदेश नहीं देते थे, दिखा देते थे बात का मर्म ! ‘सीइंग इज़ बिलीविंग’ या जानना ही मानना है के तर्क से उन -जैसे सब गांधीवादियों ने सत्य के ‘प्रयोग’ ही किए। प्रयोगों की ख़ासियत होती है कि कुछ प्रयोग सफल होते हैं, कुछ विफल। पर हम दोनों भाई -बहन (और दूसरे आत्मीयजनों) के मन में (आकस्मिक मृत्यु के 35 बरस बाद तक भी ) पापा की अपनी छवि सर्वथा विश्वसनीय और आश्वासनकारी छायादार व्यक्तित्व की है!

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हाँ तो विश्वास के बारे में यह श्लोक एक अद्भुत दृष्टांत सामने रखता है। जिसने भरोसा कर लिया, उससे छल करने में कौन सी विचक्षणता (कौन सा कमाल)! जो गोदी में आकर सो ही गया, उसका वध करने में कैसी बहादुरी! बहनापा दुनिया की सबसे बड़ी गोद है -वहाँ वध? भाई तो भाई की हत्या करते रहें हैं, क्या बहनें भी बहनों की हत्या पर या उनके चरित्र हनन पर उतारू हो जाएंगी? पितृ सत्ता की एजेंट बन जाएंगी?

अनामिका

जब हम किसी विश्वास को ठोकर मारते हैं, और किसी की आँख में गिरें न गिरें, अपनी आँख में तो गिरते ही हैं! और हमारा अहंकार जल्दी यह स्वीकार करना नहीं चाहता कि हमने इतना गर्हित काम किया तो वह उसके समर्थन में पचपन कुतर्क जुटा लेता है। पचपन कुतर्कों से घिरे -घिरे हम स्वयं एक चिड़चिड़े, जजमेंटल कुतर्क हो जाते हैं : जिसको अकेला देखा, उसपर ही पत्थर दे मारा, और अगर वह अकेला व्यक्ति ‘स्त्री’ है, वह भी एकल माँ- तब तो सीधा प्रहार उसकी विश्वसनीयता पर ही होता है! ‘ब्लेम द विक्टिम’ गेम में चौके -छक्के लगने शुरू हो जाते हैं। ये छक्के लगाने वाले स्वयं सोचें कि इस कृत्य से उनकी अपनी विश्वसनीयता कितनी बाधित होगी! विश्वसनीयता माने क्या? मनसा -वाचा -कर्मणा आप एक नहीं हैं! बहनापे में आपकी आस्था नहीं है। आपकी कथनी और करनी में फ़र्क है क्योंकि आपका मन ही आश्वस्त नहीं है – उस आदर्श में आपकी आस्था ही कच्ची है जिसके पैरोकार आप बन रहे हैं। हाथी के दाँत -खाने के और, दिखाने के और ! हाथी के दीखने वाले दाँतों की तो कुछ कीमत होती भी हो इस बाज़ार में, पर मनुष्य का ढोंग और उसकी श्रेष्ठता -ग्रंथि (जो अपने मौलिक स्वरूप में हीनता ग्रंथि ही है )- उसको जल्दी ही दो कौड़ी का बना देते हैं ! लोकप्रज्ञा कहती है : रँगा सियार कब तक रँगा रहेगा, या काठ की हड़िया क्या दुबारा चढ़ेगी? ये तर्क बहुत प्रबल है, और यह लोकप्रसूत अनुभव भी एकदम पुख्ता कि ‘समय दूध का दूध, पानी का पानी‘ कर देता है! इसी विश्वास के सहारे शकुंतला, सीता, मदर मेरी और उनकी तरह की तमाम एकल माताएँ जीवन का एक -एक क्षण काटतीं हैं। अकूत श्रम और धीरज – इनके ही आश्रय इनका जीवन कटता है क्योंकि जो दैहिक/ मानसिक/ बौद्धिक हिंसा झेलकर वे एक अंतर्व्यवस्था के बाहर आती हैं, वह तो उन्हें किसी तरह का आर्थिक मुआवजा नहीं ही देती, वह परिवार भी अक्सर अपनी ज़िम्मेदारियों से पल्ला झाड़ लेता है जहां वे पैदा हुई थीं। ऐसे में अपनी और अपनी संतान की उचित देखभाल के लिए चौबीस घंटे उन्हें तरह -तरह के छोटे -मोटे काम करने होते हैं -पंद्रह-पंद्रह घंटे कंप्यूटर पर रहना होता है -अनुवाद, रिव्यू, एडिटिंग के छोटे-मोटे कॉन्ट्रैक्ट! बाकी समय खाना बनाना, घर के छोटे -बड़े काम और सबसे बड़ा काम हहरे हुए बच्चे का मनोबल उठाना, फिर उससे चिपककर सो जाना! रात के अंधेरे में धक् से नींद टूट जाये तो अपनी अधूरी कहानी, कविता पूरी करना ! इन चौबीस घंटों में विलास क्या, वाग्विलास की भी उन्हें फुर्सत नहीं होती, समझिए कि मरने की भी फुर्सत नहीं – ऐसे में ऐसी अराजकताओं के लांछन ?

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जो ऐसे लांछन लगाता है, उसे ठहरकर एक बार ज़रूर सोच लेना चाहिए कि वह क्या कर रहा है, अगर कर्त्ता स्त्री है तो कहीं वह पितृसत्ता के हाथ की कठपुतली तो नहीं बन रही? उसमें ‘टोकेन वूमन’ ( आदर्श स्त्री ) के रूप में अपनी छवि प्रोजेक्ट करने का शौक़ तो नहीं चर्राया ? जिसकी सारी ऊर्जा ‘प्रोजेक्शन’ में जाए, धीरे -धीरे वह अपने -आप से ही दूर हुआ जाता है। मॉरेल पुलिसिंग का ठीका भी एक ठीका ही है जिसके पीछे कोई और बड़ा खिलाड़ी छुपा होता है, यह तथ्य पितृसत्ता के गहनतम षड्यंत्रों में एक है कि स्त्री पर झूठी प्रशंसा/ छद्म शक्ति बरसाकर उसे स्त्री के खिलाफ़ ही खड़ा कर दो और हँसो उस बंदर की हँसी जो दो बिल्लियों की लड़ाई में पूरी रोटी खा गया!

एक कार्यक्रम मे अनामिका के साथ मैत्रेयी पुष्पा, शबाना आजमी और जावेद अख्तर

जिन्हें अकेली माँओं से यह अपेक्षा है कि वे ‘निसि दिन बरसत नैन हमारे’ भाव से क्यों नहीं जीतीं, सारा गरल पीकर भी ख़ुश क्यों दीखतीं हैं, लाख रोड़े अटकाने पर भी अपने काम किए क्यों जातीं हैं – उन्हें यह समझना चाहिए कि सबसे बड़ी अदालत तो अपने बच्चे की आँख होती है। जिसकी उँगली पकड़कर वे आसमान के नीचे आ गईं, उसके प्रति उनका लगाव और उनका दायित्व -बोध साधरण माँओं से ज़्यादा ही होगा, कम नहीं। साम -दाम आज़माकर ही कोई माँ दंड -भेद की मुद्रा में आती है, और आती है तो इस हिम्मत के साथ कि अपने बलबूते पर अपनी संतान पाल लेगी – चाहे इसके लिए उसे दो पाली की नौकरी ही क्यों न करनी पड़े। कुछ स्त्रियाँ करती होंगी बाप -भाई से आसरे की उम्मीद, पर स्वाभिमानी स्त्रियाँ वहाँ भी हाथ फैलाने नहीं जातीं !

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मैं जो भी कह रही हूँ, वह मेरे आगे प्रत्यक्ष है। मेरे जीवन का आधार प्रमेय ही है विश्वसनीयता -जानना ही मानना है ! इसलिए बिना जाने मैं कुछ नहीं बोलती ! दूर बैठकर अललटप्पू टिप्पणियाँ तो बिल्कुल नहीं करती और अपनी सब अनुजाओं से मेरी यह स्पष्ट विनती है कि कोई भी क्षण जीवन का अंतिम क्षण हो सकता है, कोई मुलाक़ात अंतिम हो सकती है, इसलिए अपना समय और अपनी ऊर्जा किसी संघर्षसिद्ध व्यक्ति पर पत्थर चलाने में जाया न करें, मुद्दों पर बात अवश्य करें, विवाद करें पर शालीनता लाँघे बिना -कुछ ऐसा न कर बैठें जो अगली पीढ़ी की आँख में भी आपको गिरा दे! स्त्री फैंटेसी और स्त्री नागरिकता -दोनों में सम्यक संतुलन ज़रूरी है। इस समझ के साथ ही हमारी एकल माताएँ, जो बेहतरीन लेखिकाएँ भी हैं, कभी अतिरेकी नहीं होतीं! कुछ गैर- कानूनी कभी नहीं करतीं, ख़ुश रहने की कोशिश करती हैं और स्त्रियों का ख़ुश रहना अभी तक तो  गैर -कानूनी नहीं हुआ, आगे जो हो !

सस्नेह,
अनामिका

अनामिका वरिष्ठ कवयित्री, लेखिका हैं. संपर्क:anamikapoetry@gmail.com

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