पूजा मदान

भारतीय पितृसत्तात्मक समाज में वर्षों से लड़की की परवरिश पराया धन मानकर ही होती आई है | बेटे की चाह रखते पुरुषप्रधान समाज में जब अनचाही बेटी के कदम पड़ते हैं तब न सिर्फ उसे दुत्कारा जाता है बल्कि जन्म देने वाली माँ को भी शारीरिक और मानसिक रूप से प्रताड़ित किया जाता है | बचपन से ही लड़कियों के मन-मस्तिष्क में ‘लड़की हो लड़की की तरह सलीके से रहा करो’ जैसी बात डाल दी जाती है ताकि वह जीवन भर खुद को लड़के की अपेक्षा कमजोर एवं कमतर महसूस करती रहे| शिक्षा के स्थान पर भी उसे गृहस्थी सीखने की ही सलाह दी जाती है| यह भारतीय समाज का दोगला चरित्र ही तो है कि जिसमें एक तरफ लड़की के पैदा होने पर शौक मनाया जाता है तो वहीं दूसरी तरफ धार्मिक प्रतिष्ठान पर ‘कन्यापूजन’ तथा वैवाहिक अवसर को ‘कन्यादान’ का नाम देकर पुण्य कमाने की बात की जाती है| लड़की को शारीरिक और मानसिक रूप से कमजोर कहने वाले इस तथाकथित समाज की जड़ें अत्यंत खोखली है जिसे वरिष्ठ साहित्यकार भगवानदास मोरवाल ने अपने नवीनतम उपन्यास ‘शकुंतिका’ में न सिर्फ उजागर किया अपितु उसके बदलते रूप को भी दिखाने का कार्य किया है| ‘वंचना’ उपन्यास में लाशों में तब्दील होती लड़कियों की सिनाख्त के बाद उनका यह नवीनतम उपन्यास पितृसत्ता के सदियों पुराने पिंजड़े तोड़ती शकुंतिकाओं का वह महत्त्वपूर्ण आख्यान है जिसकी कल्पना पितृसत्तात्मक व्यवस्था के बोझ तले दबी हुई प्रत्येक भारतीय लड़की करती आई है| शकुंतिका का अर्थ उस चिड़िया से हैं जो जन्म से लेकर यौवनावस्था की दहलीज तक माता-पिता तथा दादा-दादी के साथ घर-आँगन की डाल पर चहकती-फुदकती रहती है, जिसकी सुगंध भरी चहचाहट परिवार रूपी पेड़ को निरंतर नया जीवन और गति प्रदान करती है| फिर क्यों एकदम से वैवाहिक बंधन में बंधने के पश्चात घर-आँगन की इस चिड़िया को पराये धन का दर्जा दे दिया जाता है? क्यों अपनी ही चौखट बेटी के लिए दूसरी देहरी अर्थात् बेगानी हो जाती है? आख़िर क्यों बेटों को पारिवारिक वंश बेल का दर्जा और बेटी को महंगा दहेज़ माना जाता है? इन सभी प्रश्नों की जाँच-पड़ताल करता यह उपन्यास तथाकथित भारतीय समाज और पितृसत्ताक व्यवस्था को कटघरे में खड़ा करता नजर आता है | बरसों से पितृसत्तारूपी चादर को सहेजकर लड़के-लड़की में भेद करते इस अंध समाज की जड़ें कितनी रुखी और बेजान है यह मोरवाल जी के इस कथन से स्पष्ट तौर पर जाहिर होती जान पड़ती है- “हमारे समाज में आज भी बेटियों की बजाय बेटों को प्रधानता दी जाती है, मगर हम यह भूल जाते हैं कि समय आने पर बेटियाँ ही सबसे अधिक सुख-दुःख में काम आती है |”1  

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उपन्यास की शुरुआत गली में थाली बजने जैसे प्रकरण से होती है | थाली जिसे भारतीय पद्धति के अनुसार लड़का होने पर ख़ूब हर्षोल्लास के साथ घर-गली में बजाकर पास-परिवेश में शुभ संदेश दिया जाता है | पितृसत्ता ने यह कार्य घर की स्त्रियों के हाथों सुपुर्द कर बड़ी ही सूझ-बूझ के साथ उन्हें मानसिक रूप से गुलाम बनाया हुआ है जिससे कि उनके भीतर खुद लड़के-लड़की का भेद बना रहे| इस थाली की आवाज सुनकर दशरथ और भगवती की न सिर्फ गहरी नींद टूटती है बल्कि दोनों के चहरे पर मायूसी के गमगीन बादल भी छा जाते हैं| अपने ही पड़ोसी उग्रसेन के घर चौथे पोते होने पर दशरथ और भगवती खुश तो होते हैं लेकिन अपनी तीन-तीन पोतियों को देखकर पोते न होने का विलाप उनकी बूढ़ी आँखों में स्पष्ट नजर आता है | वहीं दूसरी ओर उग्रसेन के घर में दोनों बेटों नागदत्त और अभय के दो-दो बेटे होने पर उग्रसेन का सीना गर्व से चौड़ा हो जाता है | दुधिया के व्यापार से काम धंधा जमाने वाले उग्रसेन चार-चार पोतों के दादा बनने पर फूले नहीं समाता जिसे लेखक ने इस प्रकार दर्शाया है-“जिस दिन से उग्रसेन के छोटे बेटे अभय को पुत्र-रत्न प्राप्ति हुई है उसी दिन से उग्रसेन और उनकी पत्नी दुर्गा की पूरी तरह देहभाषा यानी बॉडी लैंग्वेज ही बदल गई है | भला क्यों नहीं बदले, आख़िर दोनों बेटों, नागदत्त और अभय के इस पुत्र को मिलाकर, वे चार पोतों के दादा-दादी जो हो गये हैं | एक दिन तो सीना तानते हुए उग्रसेन ने मोहल्ले में किसी से कह भी दिया कि वे एक नहीं चार-चार रत्नों के दादा हैं |”2  

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यह भारतीय समाज की दोहरी मानसिकता का ही परिचायक है कि जहाँ बेटे या पोते होने की ख़ुशी में तो पूरे गाजे-बाजे के साथ गाँव-मोहल्ले को महाभोज के लिए आमंत्रित किया जाता है लेकिन वहीं बेटी या पोतियाँ पैदा होने पर कोई जलसा तो दूर अपितु उन्हें पराया बोझ मान गहरा दुःख जताया जाता है| दशरथ की सबसे बड़ी पोती सिया जो पढ़ाई-लिखाई में काफी तेज है| बाहरी शोर-शराबे से न सिर्फ उसकी आगामी परीक्षा का गहन अध्ययन बाधित होता है बल्कि एक क्षण के लिए उसका चेहरा गीली उदासी से भर भी जाता है| इतनी भारी चहल-पहल, हलवाई के बारदानों की खनक, टेंट वालों के दरी-कनातों से उड़ती धूल और रही-सही रात में बजने वाले डी.जे. की धड़-धड़ से वह एकाएक मौन हो जाती और भीतर ही भीतर गंभीर चिंतन-मनन कर अनेक प्रश्नों से रूबरू होने का प्रयास करती- “दुर्गा अम्मा के यहाँ अक्सर क्यों इतनी धूमधाम से जन्मदिन मनाया जाता है? जबकि उसने अपने घर में न कभी गार्गी का जन्मदिन इतनी धूम धाम से मनते देखा, न कभी बुलबुल का | हाँ, शुरू में एकाध बार उसका जरुर मनाया गया था लेकिन बाद में किसी का जन्मदिन मनते नहीं देखा |”3  पितृसत्ता के भेदभाव की यह उपज लड़कियों अर्थात् बेटियों के न सिर्फ बाल मन पर प्रहार करती है बल्कि उनके भीतर ‘लड़की’ शब्द के प्रति घृणा का विस्तार भी करती दिखती है| उपन्यासकार ने सिया के जरिये जिस प्रकार बेटियों के जन्मदिन न मनाने को दिखाया है वह वास्तव में भारतीय पुरुषप्रधान समाज में लड़के के बरक्स लड़की को उत्तराधिकार मानने से वंचित करना भी रहा है |

पितृसत्ता की पेंगे भरता भारतीय समाज शिक्षा के क्षेत्र में भी लड़कों को ही महत्त्व देता है | बचपन से ही लड़कियों को सरकारी स्कूल में भेजता यह समाज लड़कों को अति आधुनिक प्राइवेट स्कूल में पढ़ाने की जिस तरह बढ़-चढ़कर डिमांड करता दृष्टिगत होता है उस पर भी उपन्यासकार ने कटाक्ष किया है | पोतों को चमकीला हीरा मानने वाले उग्रसेन और दुर्गा को जब यह पता चलता है कि स्कूली शिक्षा के दौरान दशरथ की बड़ी पोती सिया के बारहवीं में बानवे परसेंट और गार्गी के चौरानबे परसेंट आए है जबकि उसका पोता विभोर दसवीं में ही फैल हो गया और विजय बड़ी मुश्किल से ले देकर पास हुआ है तब उनके न सिर्फ होश उड़ते हैं बल्कि बेटियों को बेटों से कमतर मानने का घमंड भी सिर से उतरता है | अपने निट्ठले पोतों के आगे दशरथ की पोतियों की सफलता को देख दुर्गा के मुँह से अक्समात ही यह वाक्य फूट पड़ता है- “हे राम! ये सारे कौरव इसी घर में पैदा हो गए ?”4 वहीं लड़कों के इतने कम नंबर देख पिता अभय गुमसुम खड़े दोनों बेटों रोहन और अमित को खरी-खोटी सुनाते हुए कहता भी है- “इतने महँगे स्कूल में पढ़ाने का आख़िर क्या फायदा हुआ ? इनसे तो सरकारी स्कूल में पढ़नेवाली ये लड़कियाँ लाख दर्जे अच्छी निकलीं | अरे, सरकारी स्कूल में पढ़नेवालों के बानबे परसेंट और प्राइवेट स्कूल में पढ़ने वालों के बस पचपन परसेंट |”5     

प्रस्तुत उपन्यास के माध्यम से भगवानदास मोरवाल पितृसत्ता के पैरों तले दबी लड़के-लड़की के भेद की लकीर को मिटाने का प्रयास करते हैं| लड़के-लड़की के मध्य भेद की लकीर खींचने वाली इस पितृसत्ता के हाथ न जाने कितनी दफ़ा कन्या भ्रूण हत्याओं के खून से रंगे हुए हैं| अपने रुढ़िवादी रूप में बौखलाती यह पितृसत्ता कितनी माँओं और कितनी बेटियों की दोषी रही है इसका हिसाब लगा पाना भी बेहद मुश्किल है| आज भी लड़के की जगह लड़की के पैदा होने पर माँ और बेटी दोनों की चीत्कारी गूंज भारतीय चौखटों पर साफ तौर पर सुनी जा सकती है| इस संबंध में प्रसिद्ध कानूनविद एवं आलोचक अरविंद जैन स्त्रियों का पक्ष लेते हुए लिखते हैं- “स्त्री के लिए बाँझ होना भी अपराध और बेटियों की माँ होना भी सजा| वह सिर्फ बेटों की माँ के रूप में ही स्वीकृत या सम्मानित होती (रही) है |”6  परन्तु लेखक ने अपने इस उपन्यास में लड़कियों के पैदा होने पर मातम न मनाते हुए कुँए पूजन जैसी विधि को दिखा भारतीय समाज में एक नई मिशाल प्रस्तुत की है| आमतौर पर उत्तर भारत में कुआँ पूजन जैसा रीति-रिवाज केवल लड़के के पैदा होने पर ही किया जाता है लेकिन बदलते समय और बढ़ते शिक्षा के स्तरानुसार लोगों की परम्परागत मान्यताएं एवं रुढ़िवादी सोच में भी परिवर्तन आ रहा है| एक अच्छी शिक्षा ग्रहण करके ही समाज में बदलाव किया जा सकता है, जैसी बात अब लोगों को समझ में आने लगी है| दशरथ के छोटे बेटे रुपेश के कोई भी बच्चा न होने पर लड़के के स्थान पर लड़की को अनाथ आश्रम से गोद लिया जाता है जिसका नाम सिया, गार्गी तथा बुलबुल तीनों बहने बड़े चाव से पीहू रखते हैं | दशरथ और भगवती गोद ली गयी पीहू का कुआँ पूजन कराके समाज में न सिर्फ एक नई पेशकश प्रस्तुत करते हैं बल्कि लड़के-लड़की के बीच भेद की सदियों पुरानी लकीर को मिटाने का कार्य भी करते दिखते हैं- “पूरी कालोनी में दशरथ और उसके बेटे-बहुओं द्वारा लिए गए इस साहसिक कदम की चर्चा होने लगी | जिसने भी सुना उसे अपने कानों पर जैसे यकीन नहीं हुआ | दूर-दूर तक किसी ने ऐसा नहीं सुना, जैसा दशरथ के परिवार में हुआ | हैरानी तो पूरे मोहल्ले को पाँचवें दिन तब हुई, जब ज्यादातर घरों में आनेवाले एक अख़बार के स्थानीय संस्करण के पहले पन्ने पर सबसे नीचे इसकी ख़बर प्रकाशित हुई |”7

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उपन्यास की मुख्य पात्राएं सिया और गार्गी शिक्षा के कारण ही पूरी कालोनीभर में प्रसिद्ध होती है वहीं उग्रसेन के चारों पोते अपनी आवारागर्दी के कारण बदनाम होते हैं | लड़कियों की अगाध सफलता को देखकर उग्रसेन की पत्नी और भगवती की सहेली दुर्गा अत्यधिक हैरान होती है | सिया के वकील बनने की इच्छा जानकर और आगे जुडिशियली की परीक्षा में बैठने की उत्सुकता को देखते हुए दुर्गा नैन मटकाते हुए तीर की भांति व्यंग्य मारते एक जगह कहती भी नजर आती है-“अच्छाऽऽऽ तो इसे जज बनाओगी !”8  सिया की भांति दूसरी बेटी गार्गी की भी डॉक्टरी की परीक्षा में उत्तीर्ण होने की खबर से पूरे मोहल्ले में दशरथ की पोतियों के नाम का परचम लहराने लगता है जबकि ठीक दूसरी तरफ उग्रसेन के पोतों द्वारा आए दिन लड़कियों को छेड़ने जैसी खबर से उग्रसेन की इतने वर्षों की बनी बनाई इज्जत मिट्टी में मिल जाती है- “उग्रसेन के रत्नों ने अपने मोहल्ले में नहीं, बल्कि पूरी कालोनी की नाक में मानो दम किया हुआ है | जब तक आपस में छोटी-मोटी मारपीट तक सीमित थी, तब तक ठीक था | मगर अब बात उससे भी आगे बढ़ने लगी है | नागदत्त और अभय के दोनों बड़े लड़के की एक के बाद एक लड़कियों से छेड़खानी की आए दिन शिकायतें आने लगीं | इसका परिणाम यह हुआ कि जो उग्रसेन एक समय अपनी कालोनी में डेरीवाले के नाम से जाना जाता था, तेज़ी से उसकी शोहरत दूधिए के रूप में फैल गई |”9  दो बेटे और चार-चार रत्नों के दादा-दादी होने के बाद भी उग्रसेन और दुर्गा अपने मकान में अकेले रहने पर मजबूर हो जाते हैं जबकि वहीं दशरथ और भगवती की चार पोतियाँ पढ़ाई के साथ-साथ माता-पिता और दादा-दादी की सेवा टहल करने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ती | एकाकी जीवन और वृद्धावस्था की मार सहते उग्रसेन अपने दोनों बेटों-बहुओं को बुलावा भेज अपने मकान (जिसमें उग्रसेन और दुर्गा रहते हैं) के अलावा संपूर्ण वसीयत का बंटवारा करने की बात करते हैं | बंटवारे के कागज देखकर छोटी बहू तुरंत तीखे तेवर दिखा अपना पासा फेंकते हुए बोलती है- “मम्मी जी, बाऊजी ने इस घर को तो शामिल ही नहीं किया है ?…वसीयत में यह भी लिखवा दें तो क्या हर्ज होगा कि हमारे मरने के बाद इस मकान पर किसका हक़ होगा ?”10  छोटी बहू के मुँह से इस तरह के कटु वाक्य सुन दुर्गा हतप्रभ रह जाती है और कहती है- “इसका मतलब यह हुआ बहू कि तुम हमारे मरने का इंतजार कर रही हो, कि कब हम मरें और कब तुम इस पर कब्जा करो |”11   वास्तविक जीवन में भी यही सच विद्यमान है कि बेटों और पोतों की ख़ुशी मनाने वाले भारतीय समाज में ऐसे बहुत से उग्रसेन और दुर्गा मौजूद है जिनका बुढ़ापे में कोई सहारा शेष नहीं बचता परिणामस्वरूप जीवन के अंतिम दिन उन्हें किसी श्रवणकुमार की लाठी की बजाय वृद्धाश्रम के जीर्ण-शीर्ण बैड पर ही गुजारने पड़ जाते हैं |

शिक्षा के माध्यम से पितृसत्ता और जात-पांत के पिंजड़े तोड़ सिया और गार्गी जहाँ अपनी-अपनी पसंद के लड़कों से शादी कर हंसी-ख़ुशी अपना जीवन व्यतीत करती है वहीं भगवती बुलबुल की शादी अपनी जिद के चलते बिरादरी में ही करवाती हैं | सिया एक बंगाली लड़के तपन दत्ता से शादी करती है जो उसके साथ ही पढ़ा-लिखा जज है वहीं गार्गी भी एक पंजाबी डॉक्टर को अपने जीवन साथी के रूप में चुनती है जबकि बुलबुल का पति न तो कोई काम धंधा करता है उलटे उसे दहेज़ के लिए बार-बार प्रताड़ित भी करता है | पोती की ऐसी दशा देख भगवती खुद को दोषी ठहराते हुए शिक्षा को महत्त्व देती हुई कहती है- “हमने क्या नहीं दिया था दहेज़ में | तुझसे ज्यादा तो मेरी ये सिया और गार्गी सुखी हैं | मुझे अब लगता है कि मैं उस समय कितनी गलत थी | तुझे बिरादरी में ब्याह कर क्या मिला |”12 पितृसत्ता से उपजे परिवारवाद ने बचपन से ही स्त्रियों के भीतर इज्जत, मान, मर्यादा जैसे शब्दों को बोया है और इन तीनों शब्दों को भारतीय संस्कृति का पोशक बता स्त्री को घर की चार दीवारियों के भीतर कैद करने का कार्य किया है | संस्कृति और परंपरा की दुहाई देकर जिस तरह से स्त्री का मानसिक एवं शारीरिक शोषण किया जाता रहा है उसे देखते और महसूस करते हुए प्रसिद्ध नाइजीरियन स्त्रीवादी लेखिका ‘चिमामंडा न्गोजी अदिची’ लिखती है कि-“संस्कृतियां इंसानों को पैदा नहीं करतीं, बल्कि इसका उल्टा होता है—इन्सान है जों किसी संस्कृति का निर्माण करते हैं अगर हमारी संस्कृति में इंसानों की बिरादरी में स्त्रियों को बराबरी का दर्जा नहीं दिया गया है तो हमें नई संस्कृति बनाने के बारे में सोचना चाहिए | इस प्रकार की संस्कृति का निर्माण करना जरूरी है |”13

दहेज की प्रताड़ना सहती बुलबुल को उसकी वकील बहन सिया जिस सूझबूझ और होशयारी का प्रयोग कर न्याय दिलवाती है वह वाक़ई में पितृसत्ता की चूले हिलाने और स्त्री शिक्षा की पक्षधरता करता प्रतीत होता है | शिक्षा के बल पर दशरथ की सबसे छोटी पोती पीहू भी दादा-दादी का नाम रोशन कर विदेश में एक बड़ी कंपनी की सीईओ बन परिवार  के साथ-साथ उस अनाथ आश्रम की भी प्रतिष्ठा बढ़ाती है जहाँ से उसे गोद लिया गया था | ऐसा कर वे (सिया, गार्गी और पीहू) न सिर्फ तथाकथित भारतीय पितृसत्ताक व्यवस्था को चुनौती देती है बल्कि समाज में लड़कियों को पराया और महँगा दहेज़ कहे जाने वाली रीत को बदलने का साहस भी दिखाती है |

अत: बेटियों के इस अदम्य परिश्रम, धैर्य और साहस को देखते और महसूस करते हुए स्पष्ट तौर पर कहा जा सकता है कि भगवानदास मोरवाल ने ‘शकुंतिका’ उपन्यास में घर-गृहस्थी में पिसती स्त्रियों का वर्णन न करते हुए शिक्षा प्राप्त कर पितृसत्ता और जातिगत जंजीरें तोड़ बेहतर समाज निर्मित करने वाली सुनहरी शकुंतिकाओं का महत्त्वपूर्ण आख्यान प्रस्तुत करने का जज्बा दिखाया है |

 

संदर्भ सूची:

  1. मोरवाल, भगवानदास, ‘शकुंतिका’, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, सं-2020, (फ्लैप)
  2. वहीं,(पृष्ठ-9)
  3. वहीं,(पृष्ठ-10)
  4. वहीं,(पृष्ठ-18)
  5. वहीं,(पृष्ठ-17)
  6. जैन, अरविंद, ‘औरत होने की सजा’, राजकमल प्रकाशन, सं-1996, (पृष्ठ-71)
  7. मोरवाल, भगवानदास, ‘शकुंतिका’, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, सं-2020, (पृष्ठ-72)
  8. वहीं, (पृष्ठ-22)
  9. वहीं, (पृष्ठ-15)
  10. वहीं, (पृष्ठ-42)
  11. वहीं, (पृष्ठ-42)
  12. वहीं, (पृष्ठ-97)
  13. sadaneera.com, मार्च 8, 2018

 

पीएच.डी शोधार्थी
हिंदी अध्ययन केंद्र  
गुजरात केंद्रीय विश्वविद्यालय
ईमेल पता-poojamadan91@gmail.com

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