अनामिका अनु 

1.माई ली गाँव के बच्चियों की कब्र(1968)

माई ली गाँव में मारी गयी
कुछ बच्चियाँ शिन्ह पेंटिंग बन गयी
कुछ फूलों की क्यारियाँ
कुछ प्राचीन लाल टाइलों वाली छत
और दीवारें

कुछ अब भी विचरती रहती हैं
गोल नाव में बैठकर
वे देखती हैं
कभी आकाश
तो कभी नारियल के पेड़

संयुक्त राष्ट्र संघ की सभा में रो रही थी
एक ईराकी लड़की,
उसके रोने भर से जाग गयी थी क़ब्रों में सोयी
उन बच्चियों की आत्माएँ
जिनके देह पर उम्र से ज्यादा बड़े घाव थें

उस यज़ीदी लड़की ने एक बार कहा था
कि काश युद्घ में सतायी गयी वह अंतिम लड़की
हो पाती!
और आमीन से गूँज उठी थीं सब क़ब्रें।

2.पेशमेगा(वे लोग जो मौत का सामना करते हैं)

गले में फारावार की माला पहन कर
एक कबीलाई संस्कृति
से आया कुर्द बालक आज पारसी बन गया

दर-ए मेहर पर रखी है
बबूल और चंदन की कुछ टहनियाँ
एक आग जल रही है अनवरत
बहुत भीतर
उतनी ही प्राचीन जितनी उद्वदा
की सदियों से जल रही पवित्र आग

जरथुष्ट धर्मग्रंथ अवेस्ता से कुछ छंदों के पाठ
के बाद
उसकी कलाई पर बाँध दिया गया
तीन गाँठों वाला धागा
अच्छे शब्द
अच्छे विचार
अच्छे काम

ईरान में रहने वाला सईद कल तक कुर्द था
लोग कहते हैं कि
वह अब पारसी हो गया
यह झूठ है
वह जो था अब भी वही है

कल भी उसकी आँखें जुगनू सी भुकभुकाती थीं
आज भी उसके सपनों में दो नन्हें -नन्हें पंख लगे हैं

धर्म न स्वप्न बदलता है
न मन की इच्छाओं का रंग ही

फ्रेडी मर्क्यूरी के गानों को वह गौर से सुनता है
उसके गले से बह रही
कलकल साफ मीठी नदी है
गायक के हाथ में गिटार नहीं हरा पेड़ है
और वह माइक नहीं झरने के सम्मुख गा रहा है

उसे और श्रोताओं की जरूरत नहीं है
क्योंकि पूरा जंगल उसका श्रोता है

वह नन्हा बच्चा
नन्हें ख्वाब देखता है
वह युद्घ से दूर और प्रकृति के पास रखना चाहता है
अपनी उदास और फटी किताबों को

वह कई जन्म से मारा जा रहा है
उसका जीवन युद्ध भूमि का खिलौना
जो हर बार खेल-खेल में गया उड़ाया

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3. लौट आओ स्त्रियाँ

पुरूष पिशाचों की भीड़ ने
वशीभूत कर रखा है
उस टोली को जिसमें
स्त्री-सी कई आकृतियाँ हैं
जिनकी जिह्वा घृतकुमारी-सी
टँके हैं जिनमें काँटों के गोटे
भीतर के अमृत से अनभिज्ञ
जो मिला रही हैं हैलोवीन रिंग टोनों से
स्वर

ये कौन गरज रहा है?
किसका है ये निर्मम अट्टहास ?
किनकी तपती इस्त्री सी हथेलियों
में पिघल गये हैं
केश कई स्त्रियों के

ये कौन सा चलचित्र चल रहा
जिसमें एक कटघरा
जिसमें हर बार खड़ी है
एक नयी स्त्री
उठती कई उंगलियों में
कुछ उँगलियाँ उन्हीं
वशीभूत गुड़ियों की है
जो अब नहीं रही स्त्रियाँ
जो अब नहीं रही माँए

पहले गु़ड़ियाँ, फिर कठपुतली
तब जाकर वे बनी पिशाचिनी

याद है वह पिशाचिनी
जो अग्निकुण्ड में
रही डालती बहुओं को

वह लटकी रही बाँसों पर पतंग
सी उल्टी उम्रभर
और गिनती रही
धन संदूकों के
उन्होंने मृत बहुओं के देह पर
रखकर लिखे विवाह के आमंत्रण पत्र
जो तेरहवीं के बाद ही
ले आयी नयी गुड़िया रबड़ वाली

जिसने जँतसार गाती बहू-बेटियों से
पूछी नहीं प्रसव की पीड़ा
जिसने बेटी के मुँह पर मल
दिया मिर्च
होली कह कर

जिसके राज पाट में बेटी
खाती रही बचा-खुचा
जो बेटों के हाथ में देती रही
भाला
तब कितनी बेटी और बहू के
पीठ और छाती से रिसा खून था
ऐसी कितनी पिशाचिनों
को जना है पितृसत्ता ने
पाला तिक्त धतूरे के बीजों का
पिला-पिला कर कारहा
भीतर मौत रोपकर
दिया आमंत्रण उनके निष्ठुर प्रेतों को

जाँच जरूरी कि तुम गुड़िया हो
या कठपुतली
या बन गयी पिशाचिन

छूकर देखो चमड़ी अपनी
कितनी मोटी और संवेदन शून्य है
सोचो कितनी बार उठाई हैं उँगलियाँ
स्त्रियों की ओर
जाने अनजाने

सूँघ कर देखो तन अपना
मामला खतरनाक है
अगर देह आ रही
गंध आदमखोर किसी पशु की

बचा लो स्त्रैण
जो वीरता रोपता है तन में
जो न्याय का जयघोष है करती
जो करूणा का करती और कराती
हैं अमृतपान

लौट आओ स्त्रियाँ
तोड़कर सब काले जादू
कि तुम्हें बुलाती हैं स्त्रियाँ ।

परिचय – कवयित्री,
विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में प्रकाशन

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