पूनम प्रसाद

जयशंकर प्रसाद आधुनिक हिन्दी साहित्य के गौरान्वित व महान लेखक हैं।जिनके कृतित्व का गौरव अक्षुण है। उनकी प्रतिभा का निरूपण कविता, कहानी, नाटक, उपन्यास, निबन्ध, आलोचना आदि सभी साहित्यिक रूपों में देखा जा सकता है | जिससे हमारे साहित्य की चेतना अधिक सप्राण एवं सबल हो उठी है। प्रसाद छायावाद के चार स्तंभों में से एक प्रमुख स्तंभ थे। उन्होंने हिंदी काव्य में छायावाद की स्थापना की जिसके द्वारा खड़ी बोली के काव्य में न केवल माधुर्य की रससिद्ध धारा प्रवाह हुआ, बल्कि जीवन के सूक्ष्म एवं व्यापक आयामों के चित्रण की शक्ति भी संचित हुई।

वस्तुतः प्रसाद द्वारा रचित ग्रंथ हमारे साहित्य के लिए गौरव के प्रतीक है।इतिहास, दर्शन, पुरातत्व, दर्शन एवं मनोविज्ञान उनके अध्ययन के प्रिय विषय रहे हैं| उनका भावुक ह्रदय  प्रायः नारी प्रेम और सौन्दर्य जैसी सरस एवं मोहक विषयों में अधिक रमा। उनकी रचनाओं की मूल चेतना सौन्दर्य और प्रेम रहा। वह नारी स्वतंत्रता के बड़े समर्थको में एक थे। उनकी रचनाओं स्त्रियाँ बंधन मुक्त हैं | उनकी स्त्री पात्र परिवर्तन के लिए विद्रोह करती दिखाई देती है। उनके पास दूरदृष्टि है और ऐसे पुरषों को मुहतोड़ जवाब देना जानती हैं, जो स्त्रीयों को हीन और असक्षम समझते है।

सदियों से स्त्रीयां पितृसत्ता की चादर के नीचे दबी रही हैं। वस्तुतः जिस युग में प्रसाद साहित्य सृजन कर रहे थे, उस दौर में स्त्रियों की स्थिति अच्छी नहीं थी। बाल-विवाह, अनमेल-विवाह, सती-प्रथा आदि ने नारी जीवन को ध्वस्त कर दिया था। उनकी स्थिति दयनीय और चिन्तायुक्त थी। मसलन प्रसाद अपनी लेखन का आधार उन नारी पात्र को बनाते हैं, जिन्हें समाज और साहित्य में जगह न मिला था| प्रसाद की नारी पात्र बोलती है, लड़ती है अपने अधिकारों के लिए, देश के लिए, अपने अभिमान और मन-सम्मान के लिए |

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उनका भावुक कवि ह्रदय प्रायः नारी प्रेम और सौन्दर्य जैसे सरस एवं मोहक विषयों में अधिक रमा। उनके काव्य की मूल चेतना सौन्दर्य और प्रेम हैं। वह नारी स्वतंत्रता के बड़े समर्थक रचनाकारों में थे। उनकी रचनाओं में स्त्रियाँ किसी बंधन में स्वीकार्य नहीं है। वह समझदार है और ऐसे पुरषों को मुहतोड़ जवाब देना जानती हैं, जो स्त्रियों को हीन समझते है।

प्रसाद की रचनाओं में स्त्री के लिए विशेष आदर एवं सम्मान को देखा जा सकता है, जो एक लेखक का स्वाभाविक कर्तव्य भी है | जिसमें प्रसाद बखूबी सफल हुए। जिस प्रकार निराला, महादेवी वर्मा एवं पंत ने नारी लोकल्याणकारी, प्रेरणादायी, पूज्य, शक्ति, देवी, पुरुषों की सहचरी आदि का रूप दिया उसी प्रकार प्रसाद के यहाँ नारी पात्र पावन, माधुर्य, स्नेहमयी आदि रूपों में चित्रित हुई है। नारी के प्रति प्रसाद की इसी उदार दृष्टि ने ‘आँसू‘ को व्यापकत्व प्रदान किया। नारी के जिस महान स्वरूप के दर्शन हमें आगे चलकर उनके महाकाव्य ‘कामायनी‘, परवर्ती नाटक, उपन्यास और कहानियों में मिलते हैं, उसकी प्रथम झांकी ‘आँसू’ में मिलने लगती है। ‘आँसू’ में नारी वासना एवं ऐन्द्रियता का प्रतीक नहीं है बल्कि यह तो पुरुष के अंधकारमय जीवन की आलोक है। उसका सौन्दर्य पावन आलोक से मंडित है-

‘‘चंचला स्नान कर आवे

च्ंद्रिका पर्व में जैसी

डस पावन तन की शोभा,

आलोक मधुर थी ऐसी”

इस तरह प्रसाद ने ‘कामायनी‘ की रचना नारी की श्रेष्ठता सिद्ध करने के लिए की है। प्रसाद भारतीय आदर्श नारी श्रद्वा को शील, सेवा, लज्जा, दया, क्षमा, माया, ममता, त्याग, समर्पण, वात्सल्व और उदारता आदि अनेकानेक उदात्त गुणों से युक्त उसके आंतरिक सौंदर्य का प्रभावोत्पादक निरुपण किया। उसका हृदय विश्व कल्याण कामना, दुःख-संतोष से द्रवित तथा करुणा से ओतप्रोत है। वह देव-सृष्टि के विनाश से संतप्त मनु के हृदय में आशा का संचार करती है तथा उसको साहसी और कर्मशील बनाती है। यही नहीं, श्रद्वा अगाध दया, माया, ममता, मधुरिमा एवं विश्वास के साथ मनु और अपने को सदैव के लिए आत्म-समर्पण करती है तथा भावी मानव समाज के कल्याण एवं विनाश के लिए प्रेरणा देती है-

“समर्पण लो सेवा का सार

सजल संसृति का यह पतवार

आज से यह जीवन उत्सर्ग

इसी पदतल में विगत विचार

दया, माया, ममता लो आज

मधुरिमा लो, अगाध विश्वास

हमारा हद्य रत्न निधि स्वच्छ

तुम्हारे लिए खुला है पास।’’

नारी सदा से ही पुरुषों के यहाँ असक्षम रही है। परंतु प्रसाद ने ‘कामायनी’ के माध्यम से यह सिद्व कर दिखाया है कि नारी अपनी हीनता को स्वयं ही दूर कर सकती है-

“तुम भूल गए पुरुषत्व मोह में

कुछ सत्ता है नारी की।

समरसता है सम्बन्ध बनी

अधिकार और अधिकारी की|”

श्रद्वा मनु की प्रेरणा है। वह मनु को जीवन के चरम लक्ष्य तक पहुँचाती है। उसकी चंचलता के आगे अडिग खड़ी रहती है। मनु जितना दुर्बल था श्रद्वा उतनी ही सशक्त और दृढ़। मनु से विरहित होकर भी श्रद्वा विचलित नहीं होती और न ही अपने साहस और विवेक को खोती। प्रसाद की नारी का वास्तविक एवं सत्य स्वरूप कामायनी की नायिका श्रद्धा के रूप में दिखाई देता है। प्रसाद के मन में एक आदर्श भारतीय नारी के विषय में जो विशेष प्रकार की उदात्त कल्पना थी वह श्रद्धा के रूप में मूर्तिमान हुई है। उन्होंने श्रद्धा का चित्रण एक सर्वांगीण नारी के रूप में किया है।

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प्रसाद का साहित्य-साधना सामाजिक चेतना से अनुप्राणित है। उनकी सामाजिक विचारधारा का अधिक स्पष्ट स्वरूप उनके साहित्य में मिलता है। समाज का नग्न स्वरूप उन्होंने अपने उपन्यासों में अंकित किया और धार्मिक आडंबर, सामजिक विषमता आदि को सामने रखा है।

‘तितली’ उपन्यास में प्रसाद का स्त्रीवादी दृष्टिकोण दिखाई देता है। उपन्यास में मूर्तिमान नारीत्व, आदर्श भारतीय पत्नीत्व जागृत हुआ है। तितली उपन्यास कृषि और ग्रामीण जीवन को केंद्र में रखकर एक नारी की कहानी है। इसमें वर्णित नारी की छवि एक आदर्श प्रेमिका और आदर्श पत्नी की है। तितली प्रसाद की वह नारी पात्र है, जिसमें स्वाभिमान का तीव्र भाव है। उसके पति मधुबन को सजा हो जाने पर एवं उसके पूर्वजों का शेरकोट बेदखल हो जाने पर तथा बनजरिया पर लगान लग जाने पर, इतनी दुरवस्था में भी वह किसी से सहायता की भीख नहीं माँगती बल्कि वह खुद मेहनत करके लड़कियों की पाठशाला चलाती है। यहाँ प्रसाद स्त्रीयों की शिक्षा पर बल देते हैं, क्योंकि एक शिक्षित नारी समाज को शिक्षित बना सकती है। वह अपने पुत्र को स्वयं पालती है। अपनी दुरवस्था में अपने ही अवलम्ब पर स्वाभिमानपूर्वक जीना चाहती है। इस तरह वह अपने अस्तित्व को बनाए रखने में समर्थ होती है।

उपन्यास ‘इरावती‘ की नारी पात्र इरावती एक अज्ञातकुल शीला बालिका है। जिससे महादंड नायक पुष्यमित्र का पुत्र अग्निमित्र प्रेम करता है। परंतु गुरुजनों के विरोध के कारण एक बार अग्निमित्र उसे छोड़कर चला जाता है तब से इरावती, महाकाल मंदिर में देवदासी का जीवन व्यतीत करती है। कई बार वह कामुक वृहस्पति मित्र की कू दृष्टि का शिकार बनती है। वह अपनी जीवनव्यापी कष्टों को अपने हृदय में दबाकर रखती है तथा उसे किसी के सम्मुख प्रकट नहीं करना चाहती और न ही किसी की सहानुभूति का पात्र बनना चाहती है। अग्निमित्र से कहे इन शब्दों में उसका स्वाभिमान व्यक्त होता है- ‘‘स्त्री के लिए, जब देखा कि स्वालंबन का उपाय कला के अतिरिक्त दूसरा नहीं, तब उसी का आश्रय लेकर जी रही हूँ। मुझे अपने में जीने दो..!”

प्रसाद की कहानियों में स्त्री पात्र विभिन्न सामाजिक दायरों से ग्रस्त है परंतु फिर भी वह स्वाभिमानी, त्यागशील, संघर्षशील, स्वावलम्बी एवं प्रेम और कर्तव्य का निर्वाह करने वाली स्त्री पात्र है।

‘पुरुस्कार’ कहानी की मधुलिका में स्वाभिमान का भाव प्रबल दिखाई देता है। मधुलिका अपने पूर्वजों की भूमि बेचना नहीं चाहती, इसलिए वह राजा का दिया हुआ मूल्य स्वीकार नहीं करती। महाराज मधुलिका को कुछ स्वर्ण मुद्राएँ खेत के बदले पुरस्कार देता है, परंतु मधुलिका उस पुरुस्कार को वापस न्यौछावर कर देती है। वह अपने पितृ-पितामहों की भूमि को बेचना अपराध समझती है। इसलिए मूल्य स्वीकार नहीं करती। प्रसाद इस कहानी में स्त्री की इमानदारी को बखूबी चित्रित किया है। जब मधुलिका अपने राज्य के प्रति इमानदारी दिखाती और अपने प्रेम का साथ नहीं देती। किन्तु जब राज्य सुरक्षित हो जाता है फिर वह अपने प्रिय अरुण का साथ देते हुए अपने लिए भी मृत्यु दंड मांगती है। इस प्रसंग से वह अपने राज्य के साथ-साथ अपने प्रेम के साथ भी इमानदारी दिखाती है।

‘ममता’ कहानी में ममता एक ब्राह्यण-विधवा है। उसका पिता वृद्व तथा पुत्री के स्नेह में विहवल है। पिता उसके मन को उलझाकर उसकी वेदना को धीरे-धीरे विस्मृत करना चाहता है। इसलिए वह शेरशाह से धन स्वीकार कर लेता है, किन्तु स्वाभिमानी ममता को वह ‘अर्थ’ नहीं ‘अनर्थ’ लगता है। वह उस धन को भविष्य के लिए एवं विपत्ति के लिए भी नहीं संचय करना चाहती। वह कहती है- ‘‘क्या भीख न मिलेगी? क्या कोई हिन्दू भूपृष्ठ पर न बचा रह जाएगा, जो ब्राह्यण को मुट्ठी अन्न न दे सके।” यह प्रसाद की स्त्री पात्र की  त्याग एवं सात्विकता का परिचय है।

‘सालवती’ कहानी की पात्र सालवती अत्यंत दरिद्र है, परंतु दरिद्रता उसके स्वाभिमान को मिटा नहीं सकती। जब वैशाली का उपराजा अभयकुमार उसे उपहार स्वरूप अपने कंठ की मुक्ता की एकावली देता है, तो वह उसके दान को ग्रहण करने से अस्वीकार कर देती है।

नाटकों में प्रसाद का दृष्टिकोण ऐतिहासिक तथा सांस्कृतिक अधिक है। इतिहास से वे राष्ट्र की खोई हुई चेतना लौटाना चाहते। उनका विश्वास था कि इतिहास का पुनर्जागरण राष्ट्रीय उत्थान के लिए आवश्यक है। प्रसाद के नाटकों में नारी-पात्र जहां एक ओर भावुक, त्यागशीला, कर्तव्यपरायण, सेवा-परायण, कोमल, उदार इत्यादि है, वहीं दूसरी ओर उनमें आत्मसम्मान का भाव प्रबल दिखाई देता है। ‘जनमेजय का नागयज्ञ’ की शर्मा एक स्वाभिमानी स्त्री है। मनसा द्वारा किए गए जातिगत अपमान को वह सह नहीं पाती। इसलिए नागकुल के अपमानपूर्ण राजसिंहासन को वह ठुकरा देती है। परंतु इतने पर भी वह नागों का अनिष्ट नहीं चाहती। यह उसके उदारता का परिचय है।

‘राज्यश्री’ नाटक की पात्र राज्यश्री भी स्वभाव से क्षमाशील, उदार एवं कोमल है। उसे अपने कुल की मर्यादा का पूरा-पूरा ध्यान है। इसलिए वह तलवार लेकर देवगुप्त पर निर्भयता से वार करती है। उसे राज्य का छीना जाना अपमानजनक लगता है।

‘चंद्रगुप्त‘ नाटक में प्रायः सभी स्त्री पात्रों में देश भक्ति प्रबल दिखाई देता है। अलका देश  सेवा से प्रेरित होकर अपने विरोधी भाई एवं पिता का परित्याग कर देती है। मालविका द्वारा उद्भाण्ड सेतु का मानचित्र बनाना तथा चंद्रगुप्त की शाया पर सोकर आत्मोत्सर्ग करना भी प्रबल राष्ट्रीयता का परिचायक सिद्ध हुआ। प्रसाद की नायिकाएँ कल्याणी, मालविका, कार्नेलिया, सुवासिनी केवल मात्र प्रेमिकाएँ ही नहीं बल्कि उनमें आत्मसम्मान की ज्योति भी है। पर्वतेश्वर द्वारा विवाह संबंध ठुकराएँ जाने पर कल्याणी का स्वाभिमान जाग उठता है। जिसका प्रतिशोध वह युद्व क्षेत्र में पर्वतेश्वर की मदद करके, उसे नीचा दिखाकर लेती है। इतना ही नहीं, वह अपनी मान रक्षा के लिए महीप पर्वतेश्वर की हत्या भी करती है। एक ब्राह्यण द्वारा शकटार की पुत्री सुवासिनी को वैश्या इत्यादि कहे जाने पर उसके आत्मसम्मान पर ठेस पहुँचता है। इसलिए वह अपने प्रेमी को उससे बदला लेने के लिए प्रेरित करती है। एक ओर जहाँ ‘चंद्रगुप्त’ की नारी पात्रों में स्त्री सुलभ आचरण है वहीं उनमें प्रतिकार की भावना प्रबल रूप में दिखाई देता है।

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‘ध्रुवस्वामिनी’ नाटक की मुख्य समस्या ही पुनर्विवाह के लिए स्त्री अधिकार है। इसमें दो प्रकार की नारी पात्रों का चित्रण प्रसाद ने किया है, एक कोमा-जो पति के व्यवहार से क्षुब्ध तो है, परंतु उसे हृदय से त्यागने पर असमर्थ है। दूसरी विद्रोहिणी नारी ध्रुवस्वामिनी, जो क्लीव पति के अत्याचार से क्षुब्ध होकर विद्रोह करती है और अंत में चंद्रगुप्त से परिणय कर पुरुषों के अत्याचार को चुनौती देकर नारी-स्वतंत्रता का मार्ग प्रशस्त करती है। तत्कालीन समय में तलाक के मुद्दे ही सुनने में नही थे। एक स्त्री अपने पति से अलग होने के बारे सोच नहीं सकती चाहे उसका पति कितना ही क्लिष्ट व्यक्ति क्यों न हो। किन्तु इसकी कल्पना प्रसाद जी ने की और ध्रुवस्वामिनी न सिर्फ अपने पति से अलग हुई बल्कि चन्द्रगुप्त से दोबारा विवाह किया।

नारी स्वतंत्रता को प्रसाद अपनी रचनाओं में अधिक महत्व दिया है। उनके यहाँ स्त्री का राजनीतिक पक्ष भी दिखाई देता है | उनकी स्त्री पात्र स्वालंबी बनती हैं | स्त्री जाति की दुर्दशा ‘ध्रुवस्वामिनी’ में ध्रुवस्वामिनी की अंतर चेतना द्वारा मुखरित होता यह प्रश्न –“परन्तु राजनीति का प्रतिशोध क्या एक नारी को कुचले बिना पूरा नहीं हो सकती।” इसके परिणामस्वरूप स्वस्थ सामाजिक निर्माण के लिए घर को सुव्यवस्थित रखने वाली और वंश-परम्परा को आगे बढाने वाली स्त्री को गौरव देने का अभियान आरम्भ हुआ।

प्रसाद स्त्रियों से कोमल स्वभाव की अपेक्षा तो रखते हैं| साथ ही आत्मसम्मान की रक्षा के लिए उनसे हर संभव विद्रोह की भी कामना करते हैं। यद्यपि प्रसाद का मानना है कि स्त्रियों के विद्रोहिणी रूप के लिए समाज की पितृसत्ता सोच है। अन्यथा स्त्रियों में वह प्राकृतिक शक्ति है जिसके द्वारा वह समाज में अपनी बराबर की जगह बना सके।

वस्तुतः प्रसाद के स्त्री पात्रों में गंभीरता, भाव सम्पन्नता, साहस आदि तो है ही साथ ही देश, समाज एवं परिवार के प्रति दायित्व एव कर्तव्य का भी बोध है। ये स्त्रियाँ नेतृत्वकारिणी भी हैं और राजनीति में पूर्णरुपेण सक्रिय भी। वे उदात्त आदर्शों को स्थापित करने वाली हैं तथा पुरुषो की प्रेरक शक्ति भी | प्रसाद युग की नारी की विशेष आवश्यकता थी। प्रसाद के साहित्य में ऐसी स्त्री-पात्र भी है, जिन्होंने अपनी करुणा, माया, ममता, सेवा-त्याग, कर्तव्य एवं बलिदान से अपने चरित्र को स्मरणीय बना दिया है, जैसे श्रद्वा, मल्लिका, तितली, देवसेना, देवकी, वासवी इत्यादि जिनकी क्षमामयी मूर्ति के सामने पुरुष भी नतमस्तक होते हुए।

प्रसाद के स्त्री-पात्र आजस्वी, शक्तिशाली, प्रतिभा संपन्न, साहसी, संघर्षशीला, नेतृत्वकारिणी, व्यक्तिक जीवन को सामाजिक जीवन के लिए उत्सर्ग करने वाली राजनीति में सक्रिय होने वाली, रणक्षेत्र में तत्पर तथा अन्याय एवं अत्याचारों का विद्रोह करने वाली है। वस्तुतः प्रसाद की नारी अपने दृढ़ विद्रोह से क्लिष्ट पुरषों को चुनौतियाँ देकर पूरे समाज व्यवस्था को बदलने पर मजबूर करती है।

 

सन्दर्भ सूची

  1. कहानीकार प्रसाद, अवतार शर्मा, के.एल. पचैरी प्रकाशन 1993
  2. प्रसाद की साहित्य साधना, डॉ. शम्भूनाथ पाण्डेय, सरस्वती पुस्तक सदन, आगरा 1971
  3. इरावती, जयशंकर प्रसाद, लोकभारती प्रकाशन,इलाहाबाद 2015
  4. प्रसाद रचना संचयन, सं. विष्णु प्रभाकर, रमेशचन्द्रशाह, साहित्य अकादमी ,दिल्ली 2015
  5. तितली, जयशंकर प्रसाद, वाणी प्रकाशन, दिल्ली 2005
  6. आशारानी वोहरा, औरत: कल, आज और कल, कल्याणी शिक्षा परिषद, दिल्ली 2011
  7. आकाशदीप, जयशंकर प्रसाद, भारती भण्डार, इलाहाबाद 2007

 

शोधार्थी
भारतीय भाषा केंद्र
जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय
impoonamprasad@gmail.com

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