भारती वत्स
करवा चौथ गुजर गई,अब देश के कई हिस्सों में छठ मनाया जा रहा है,थोड़े समय बाद तीज आयेगी ,स्त्रियों के व्रतों की लंबी सूची है जो वे परिवार के सदस्यों के लिए निरंतर करती रहती है जिनसे हासिल होता है उन्हें सुकून; उन्हें महसूस होता है जैसे तमाम प्रतिकूलताओं से निपटने का अस्त्र उनके पास है पूरे परिवार की सुरक्षा कवच बन जेसे पी पी ई किट पहने तैनात रहती हैं पर कभी ये सवाल नहीं उठता की उनके लिए भी कोई भूखा रहता है क्या ? शिक्षित स्त्रियों का छोटा प्रतिशत व्रत को स्वास्थ्य से जोड़ता है और अपने शिक्षित होने का प्रमाण देता हैं ये अच्छी बात है परन्तु वो ये नहीं बताती की उसी दिन व्रत क्यों रखा ?या घर की बुजुर्ग औरतों की तसल्ली के लिए रखने बाध्य हैं ये दूसरा शिक्षित तर्क है ।जिन्दगी की अन्य तमाम प्रगतिशील सुविधाओं/ विकल्पों को अपनाने के लिए इन बुजुर्ग औरतों को मना लिया जाता है या उनकी अनदेखी कर दी जाती है परन्तु इन मामलों मै उनकी आज्ञा मानने की बाध्यता कहीं वह कमज़ोर नस तो नहीं है जो स्त्रियों के अंदर भय बन फडकती रहती है?
अक्सर लगता है इस दुनिया की बदसूरती को खत्म करने कोई व्रत रखने का विचार कभी क्यों नहीं आया?अमूर्त दुनिया के लिए अन्न जल त्याग की लंबी परंपरा है परन्तु मूर्त रूप से दिख रही भूखी प्यासी, उत्पीड़ित दुनिया के लिए अन्न जल त्यागने किसी महापुरुष की प्रतीक्षा हम करते हैं दुनिया की आधी आबादी की यह अप्रतिम ताकत क्या समाज के इस उत्पीड़ित पक्ष के तरफ खड़ी होकर एक खूबसूरत दुनिया का कोई स्वप्न देख सकती है?
तीज,करवा चौथ की औरतों के जीवन मै मौजूदगी और उसके प्रति बढ़ता रुझान इस समय की द्वैतता को जाहिर करता है।एक ओर परंपरावादी इसमें दाम्पत्य जीवन का आधार और मेड फॉर ईच अदर जैसे आदर्श परिवार के
यूतोपीय का साकार रूप देख रहे हैं या दिखाने का भ्रम पैदा कर रहे हैं तो दूसरी ओर स्त्रियों का बड़ा प्रतिशत परिवार के परंपरागत ढांचे के विरूद्ध अपनी पहचान के साथ अपनी उपस्थिति दर्ज कराने मै लगा है । इस व्रत के पक्ष में खड़े होने वाले इसकी महानता तो बताते हैं परन्तु यह नहीं बताते की इस तरह की परम्पराओं की ज़रूरत कब और क्यों पड़ी? कौन सी परिस्थितियां थीं जिनमें पति के दीर्धजीवी होने की कामना करने का विचार समाज मे जन्मा? और पत्नी की आयु और उसका सुखद भविष्य पति के जीवन से अभिन्नता के साथ जुड़ गया !!!स्त्री की एकल और मानवीय पहचान की जगह उसके सौभाग्य चिन्हों ने ले ली। स्त्री के भविष्य,उसके स्वास्थ्य,उसके दीर्घ जीवन की कोई चाहत या संकल्पना समाज में दिखाई नहीं देती इस बात का रहस्य पुत्र के चिरंजीवी होने और स्त्री के सौभाग्यवती होने मै निहित है ।सोचिए दोनो ही शुभाशिषों मै आयु पुरुष की ही इच्छित है। ( यहां एकदम यह न समझा जाए की ये पुरुष विरोधी मानसिकता के चलते कहा जा रहा है , स्त्री और पुरुष तो इस प्रकृति की अदभुद संरचना हैं जहां प्यार है आल्हाद है पर समाज ने जिस गैर बराबरी को बना रखा है जिस तरह सत्ता सम्बन्धों ने दास और मालिक के सम्बन्धों को रचा जहां समर्पण हैं ,समझौते हैं पर मित्रता नहीं है इस सब के चलते जब भी बात स्त्री के जीवन की करते है पुरुष निशाने पर आ ही जाता हैं)
मुश्किल ये है कि जिन रिश्तों में चौबीसों घंटे तनाव ,बेकद्री ,अपमान मौजूद रहता है वहां भी निर्जला व्रत बखूबी निभाया जाता है क्या यह सामाजिक दबाव है जहां अपने पतिव्रता और सच्चरित्र होने के प्रमाण देने होते हैं? या आधुनिक समाज की एक लहर है जिसे ये स्त्रियां एन्जॉय करती हैं या एक दिन ही सही घर का केंद्र बनती हैं या इसी बहाने साजो श्रृंगार का वाजिब कारण मिलता है ?कर्मकाण्ड तो सदियों से था जहां स्त्रियां चुपचाप व्रत करती हुई सेवा में लगी रहती थीं पर अब ये जताया जाता है कि तुम्हारे लिए भूखी हूं ये एक बढ़ा हुआ कदम माना जा सकता है स्त्रियों का जो बाज़ार से भी कदमताल कर रहा है बाज़ार अपनी शर्तों पर सब तय कर रहा है और मीडिया उसमे घी की आहुति दे रहा है पूरी मुस्तैदी से। परन्तु ये सवाल फिर भी गायब है कि आखिर उपवास किया ही क्यों जाए ?इस समय जब स्त्री न सिर्फ घर बल्कि बाहर की जिम्मेदारियां भी बखूबी निभा रही है बाज़ार और कार्यालयों की हिंसक कार्यवाहियों एवं व्यवहारों के बीच…।जबकि पुरुष रोज़ की एक सी दिनचर्या वो भी पूरे परिवार के लिए कुछ दिन भी उस समर्पण और प्रेम से निभाने मै सक्षम नहीं है ज्यादातर…। तब भी स्त्री की आमदनी जिस से पूरे परिवार को सुरक्षा मिलती है, उसकी परिवार मै सेवादार की तरह उपस्थिति ,उसकी शिक्षा यानि एक मजबूत व्यक्तित्व के बावजूद उसके दीर्धजीवन के लिए कोई नया भावनात्मक टोटका (व्रत इत्यादि) ईजाद करने की हिम्मत समाज में आज भी नहीं है ।घर का स्वामी अपने आर्थिक स्त्रोतों के कारण वर्चस्व हासिल करता है परन्तु स्त्री के पास आर्थिक स्त्रोत का होना,उसकी बिना शर्त सेवा और उसकी सशक्त छवि भी उसके दीर्घ जीवन की आकांक्षा के आधार नहीं बनते क्योंकि पितृसत्ता की जड़ें इतनी गहरी और सूक्ष्म हैं कि वो हमारी रक्त शिराओं में बहती हैं जिनसे दूर होने का खयाल भी तो तभी आयेगा न जब स्त्रियों को अपने रक्तसंचार में कहीं कोई गांठ नजर आयेगी?
धार्मिक मूल्य मान्यताओं का सीधा संबंध भय,सुरक्षा और आस्था से है और ये सभी, तर्क और विवेक के बन्द होने के बाद शुरू होते हैं ।पति, व्रतधारी पत्नी के साथ चांद के सामने उपस्थित हो अपने आप को उनके सहचारी सिद्ध करते हैं पत्नी की भोली भावनात्मकता पर मुस्कुराते हैं इस तरह इन परम्पराओं को जीवित रखने की साजिश मे कभी जान कर कभी अनजाने शामिल होते हैं।
क्या स्त्री-पुरुष की समानता मूलक, प्यार और सम्मान से भरे समाज की कोई संकल्पना नहीं की जा सकती? क्या आवश्यकता है एक के दीर्घ जीवन के लिए दूसरे को व्रत रखने की?( वैसे तो यही समझ नहीं आता की व्रत रखने और चांद देखने से उमर कैसे बढ़ती होगी ,पर आस्थाओं के आगे तो तर्क और शिक्षा कोई मायने नहीं रखती न) परस्परता और समभाव के साथ क्या जीवन नहीं जिया जा सकता?
इस तरह की परम्परों का श्रेष्ठता गान उसी पितृसत्ता को और मजबूत करता है जिसके चलते दो मानवीय कायाओं को कभी समानता का दर्जा हासिल नहीं हो सका । स्त्री की दुनिया को पुरुष के चारों ओर समेट कर रखने की पितृसातक सोच उसे उन संभावनाओं से दूर कर देती हे जो वह अपने जीवन में हासिल कर सकती थी और उसकी आत्मनिर्भर गरिमामय छवि को खण्डित करता है।ये रोमेंटिक आदर्शवादी गुलामी है। जिसे स्त्रीयां खुद चुन रही हैं जिसका सम्बन्ध शिक्षा या विवेक से नहीं है बल्कि उनके शिक्षित होने के, ऊंचे पद पर काम करने के बावजूद पितृसत्ता से ग्रस्त होने का प्रतीक है एवम् अपनी परंपरागत आदर्शवादी छवि को बनाए रखने का मोह भी है ।
परिवार के प्रति, रिश्तों के प्रति स्त्री की दीर्ध सहिष्णुताएं उसका ईमानदार तप है जिसका विकल्प कोई व्रत या कर्मकाण्ड हो ही नहीं सकता, उस तप पर स्त्री यदि पूरा भरोसा करती है तो उसे और किसी पाखण्ड की जरूरत नहीं होती।स्त्री की निर्द्वंद्व छवि को धर्म ने अपच्यियत किया है जो उसके देवीय रूप का महिमा मंडन करता है परन्तु मानवीय छवि नहीं बनने देता ।इसलिए मुक्ति का रास्ता धर्म से होकर गुजरता है ,धार्मिक मूल्य मान्यताओं को प्रश्नांकित किए बिना स्त्री की आत्मनिर्भर छवि सम्भव नहीं है।
साजो श्रृंगार निजी पसंद है परन्तु उससे स्त्री की पूरी पहचान ही बदल जाना व्यक्ति स्वतंत्रता के आगे प्रश्न चिन्ह है। धर्म भय को साधता है और भय रूढ़ियों को । यदि समानता और प्यार से बनी परंपरा होती तो धर्म की आवश्यकता ही नहीं पड़ती न ही ऐसे किसी कर्मकाण्ड की जो मनुष्य – मनुष्य के बीच भेद करता हो ।मृत्यु ,जीवन का एक सोपान है जिसे घटना ही है फिर भी दीर्घ जीवन की कामना जाे सिर्फ पुरुष के लिए ही हो, का समाज मे चिरकाल से अनंत तक बने रहना क्यों हमारे अंदर कोई खुदबुदाहट पैदा नहीं करता ?
हमारी बेटियों (माता पिता भी)को आज भी पूरी तरह आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर होने के बाद भी विवाह आदि के दौरान दोयम दर्जे के मनुष्य की तरह सिर झुका कर पेश होना पड़ता है, इससे ऐसा नहीं हे की लड़कियां ही, लड़के भी उतने ही बन्धन एवं दबाव मै जीवन जीते हैं। भारतीय परिवारों मै साझापन नहीं समर्पण है जिसे स्त्रियां बहुत बेहतर तरीके से समझती और निभाती हैं।जहां सवाल है ,सम्मान के ,गरिमा के , असहमतियां है विचारों से, वहां टूटन है फिर चाहे करवाचौथ, तीज और छठ के प्रति पूरी निष्ठा क्यों न हो।

लेखिका विगत 33 वर्ष से अध्यापन कर रही हैं
हवाबाग महाविद्यालय, जबलपुर
और सामाजिक कार्यकर्ता भी हैं ।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here