सरोज कुमारी 

कवितायें 

1.
हाथ में चाय की ट्रे लिए
धीरे से खोलती है दरवाजा
वे साठ पार की माएं आज भी जल्दी उठ जाती हैं
माथे की सलवटों में छुपाए अपनी पीड़ा
कपड़े सुखाने के बहाने
कभी-कभी बालकनी से नाप लेती हैं
पार्क में बिछी हुई हरी मखमली घास का सुख

अदहन में दाल की तरह पकती वों
रोटियों की परतों में बेल देती हैं खुद को
घर के कामों में खटती है दिन भर मिल मजदूर सी

वे साठ पार की माएं दोनों बच्चियों को मुंह अंधेरे कर देती हैं तैयार
गूथ देती हैं उनकी चोटियों में अपना स्नेह
और उनके लंच बॉक्स में भर देती हैं अपना प्रेम

बस स्टॉप की तरफ दौड़ती वे हर सुबह भूल जाती हैं अपनी उम्र का पड़ाव
कंधे पर बस्ता हाथ में बच्चे की उंगली को थामें
वह पूरे जोश से चढ़ा देती हैं उन्हें बस के पायदान पर
उन्हें साफ नहीं दिखता है स्कूल की बस का नंबर
हरा नीला पीला रंग ही उनकी वर्णमाला है
उम्र का यह कैसा दौर है

वे साठ पार की माएं कभी-कभी दोपहर में करती हैं फोन
कभी बहन को और कभी अपनी पुरानी सहेली को
वे सुनाना चाहती हैं अपने इस दौर की कहानी
जिसमें ना कोई रंग है ना कोई रस
गोधूलि की इस बेला में खड़ी वे साठ पार की माएं भूल गयी हैं अपने देवता ,मंदिर ,बाजार और श्रृंगार जीवन के इस धुंधलके में गुम हो गया है उनका चारों धाम की यात्रा का स्वप्न

2. भूख का वायरस

” धूल धूसरित तन,
चिंता ग्रस्त मन
टूटे हुए सपनों को गठरी में बांध
भूख प्यास और तमाम समस्याओं के बीच झूलती
निर्मम जीवन लीला के तांडव से त्रस्त
बिना किसी साधन के
आज पैदल ही चल पड़ा अपनी जड़ों की ओर
जहां उसे अब भी पनपने की आस है
वह कभी रोप ही नहीं पाया खुद को
इस बनावटी और खोखली जमीन में,
अपने प्रवासी जीवन को विराम देते हुए
उसके कदम बढ़ चले
अपनी उसी देहरी की ओर
जिसे छोड़ आया था कभी रोटी की तलाश में
मैंने कहा “रुक जाओ ,सब इंतजाम हो गया है “
मेरी ओर लगभग घूरते हुए
अपने माथे की नसों को तानकर बोला “कोरोना आया है चला जाएगा
फिर इलेक्शन आएगा चला जाएगा
फिर नेता जी आयेगे और चले जाएंगे
न जाने क्या-क्या आएगा और चला जाएगा
पर यह जो भूख का वायरस
सदियों से निगल रहा है हम गरीबों को
कौन जाने उसका अंत कब होगा?
और कैसे होगा?”

यह भी देखें – इशारा की फिल्मों में स्त्री- छवियां

3. लिफाफा

भैया मेरे रूठे हुए प्रेम का दस्तावेज
राखी का यह लिफाफा
कब से पड़ा है तुम्हारी चौखट पर
दरवाजा खोलो
अपने उसी प्यार वाले स्पर्श से दुलारो इसे
इस पर लिखे तुम्हारे नाम के
एक एक अक्षर में अटकी है मेरी सांसे
इनमे सुनाई देगी तुम्हें मेरे हृदय की धड़कन
ध्यान से पढ़ों,
दिखेगा तुम्हें मेरे प्रेम का बचा हुआ रंग
जब तुम धागों को बंधवाओगे,
थोड़ा सा बांध लेना मुझे भी अपनी कलाई में
उसी तरह जैसे बचपन में बांध देते थे
मेरे बिखरे सपने
जोड़ देते थे मेरी टूटी हुई लालसा
और भिगो देते थे मुझे स्नेह से
तुम्हारे आसमान की फीकी धूप
मुझे रोक देती है बार- बार उड़ने से
तुम्हारा स्वाभिमान खड़ा हो जाता मेरी राहों में
बरसों से तुम्हारे प्रेम की बरसात में भीगने को तरसती मैं
अब भी करती हूं इंतजार
एक नए इन्द्रधनुष का जिसमें होंगे-
हमारे प्रेम के सात रंग
जो फिर से रंग देंगे मेरे सपने
मेरी हथेली पर लगी मेहंदी और गहरी हो जाएगी तब
मेरा बचपन, यौवन,हंसी ,रुदन,
मौन ,मनुहार तुम्हारा दुलार
लिपटकर इन राखी के धागों में
पहुंच गए आज फिर तुम्हारे पास ,
पुरानी यादों में लौट जाने को
इस लिफाफे में बन्द है
मेरे हाथों का स्पर्श
छुओ इसे , महसूस होगा तुम्हें
मेरा होना,
मम्मी के बक्से में रखा मेरा दुपट्टा
अलमारी में रखी मेरी किताबें
दीवार पर टंगी वह पुरानी पेंटिंग
फेक मत देना
भेज देना मेरे पास
मेरी इस बेरंग दुनिया में
अपने स्पर्श के रंग भर के

4.
उसके जुड़े में अब नहीं खिलता गुलाब
उलझी लटों में खो गई है उसकी खुशबू
निष्प्रभ गाल, सूखे होठ,
काले चंद्रमा की आकृति में कैद उसके तारे
बिंदिया और काजल से दूर उसका मलिन मुख
संघर्ष का नया महाकाव्य रच रहा है ।
वह कामकाजी स्त्री अब दफ्तर नहीं जाती
‘घर ही दफ्तर है,” की परिभाषा में सिमट गया है उसका आकाश।
रोटी,कपड़े और बर्तन के बोझ तले दबी
उसकी बोली भूल गई है मिठास
माथे की सलवटों में बन गया है एक उदास शब्द ,- चित्र
हड्डियों की चरमराहट में सुनाई देता है उसके भीतर का शोर

मेज पर पड़े हुए ताजी बासी अखबार
उसे अपनी और खींच रहे हैं ,
वे पहले की तरह उसकी आखों में खो जाना चाहते हैं।
कई पेंडिंग आर्टिकल उसे बड़ी मायूसी से देख रहे हैं वे लिपट जाना चाहते हैं उसकी उंगलियों से
अधूरा पड़ा उपन्यास भूल गया है अपना भाषा
उसके पात्र उससे अपना पता पूछ रहे हैं।
डायरी के पन्नों में गुम हो गए हैं कई महत्वपूर्ण । व्याख्यान
और चुप हो गई है कई फोन कॉल
उससे बिना बोले ही
खिड़कियों और दरवाजों को अपने कंधे पर साधे
वह स्त्री एक अदृश्य लक्ष्मण रेखा को लांघ जाना चाहती है
कमरे की रंगीन दीवारों में कैद उसके सपने
सामने लटकी हुई पेंटिंग में खुद को ढूंढ रहे हैं।
अशोक चक्र की चौबीस तीलियों के चक्रव्यू
फंसे उसके पैर एक ही धुरी पर लगातार नृत्य करते हैं।

अपनी पीठ पर रख लिया है उसने ऑफिस का नया प्रोजेक्ट
कई बंद फाइलों पर धूल ने अपना नाम लिख दिया है।
उसका सबसे खूबसूरत पैन अब अज्ञातवास काट रहा है
गमलों की दरारों में देखती है वह अपनी तस्वीर जो अब कैक्टस बन गई है।

यहाँ भी आयें – अनामिका अनु की कवितायें ( ‘लौट आओ स्त्रियाँ’ तथा अन्य )

5.
एक लड़का इधर उधर राशन की दुकान में दौड़ता है सरपट ।
तोलता है अपनी भूख तराजू के दोनों पलडों में।
उसके हाथों की नसें तन जाती हैं
,आंखें और पीली हो जाती हैं, वह कभी-कभी उन पलड़ों में बैठ जाता है,
कभी दाल कभी चावल, कभी आटा, और नमक-मिर्च की दुनिया में खो जाता है ।

एक लड़का भारी वजनदार ठेले को ठेलता है,
उसके पहियों में लपेट देता है अपनी आत्मा।
ठेला चलता जाता है
उसकी भूख तीलियों में फंसकर, कोई राग गुनगुनाती है

एक लड़का भट्टी में तपा देता है अपना सीना
गरम लपटें झुलसा देती हैं उसके बचपन की इबारतें,
जिनसे सीखना चाहता था वह इन लपटों को ठंडा करने के तरीके ।
वह भाग जाना चाहता है, छुप जाना चाहता है ।
उस सूखी रोटी की पतली पर्त में जिसमें है उसकी मां का गर्म स्पर्श ।

एक लड़का बस के पायदान पर खड़ा,
जिंदगी के उबड़ खाबड़ रास्तों पर आगे बढ़ जाता है।
बस की रफ्तार में गुम हो जाती है उसकी लोरी, भयानक गड़गड़ाहट में खो जाता है उसका संगीत ।

कवयित्री विवेकानंद कॉलेज (दिल्ली विश्वविद्यालय), हिन्दी विभाग में सहायक प्रोफेसर हैं ।

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