मनोरमा

हमारे प्रिय कवि, साहित्यकार और पत्रकार मंगलेश डबराल जी नहीं रहे, कोविड-19 ने आखिरकार उन्हें भी हमसे छीन लिया। वो हमारी भाषा के सबसे महत्वपूर्ण कवियों में से एक थे और हमेशा रहेंगे, वे प्रतिरोध और क्रांति की एक मुखर आवाज़ भी रहे, अपने समय, परिवेश, समाज, राजनीति को कविताओं में दर्ज़ करने वाले और कविताओं से बाहर उन्हीं मूल्यों के लिए हमेशा खड़े होने वाले। साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित मंगलेश डबराल जी साहित्य में देश दुनियां के प्रतिष्ठित और बड़े नाम थे लेकिन ये उनका एक पक्ष था दूसरा पक्ष पत्रकारिता का है वो एक बेहतरीन संपादक, गंभीर अध्येता और सामाजिक, राजनीतिक विश्लेषक थे, मैंने उनके इस पक्ष को ज्यादा बेहतर तरीके से जाना समझा था। पत्रकारिता उन्होंने लखनऊ में अमृत प्रभात से शुरु की थी, उनकी जिम्मेदारी में जनसत्ता का रविवारीय एडिशन जैसा निकलता था वो हिंदी पत्रकारिता के लिए हमेशा धरोहर रहेगा।

उनके जाने की ख़बर स्त्रीकाल के लाइव कार्यक्रम के दौरान मिली जब मैं कार्यक्रम होस्ट कर रही थी, इस खबर ने इस तरह से विचलित किया कि मैं बातचीत में सहज नहीं रह पायी और अब भी ऐसी मनः स्थिति नहीं है कि उनके बारे में सहेज कर संभल कर कुछ लिख सकूँ। उनके अस्पताल जाने से पहले एक शाम उनसे सात मिनट की हुई बातचीत आखिरी बातचीत रही, अपने स्वास्थ्य को लेकर आश्वस्त थे वो उस दिन, दो बार मुझे याद दिलाया कि उन्हें मामूली बुखार है कोविड -19 नहीं, बल्कि वो अपनी बेटी अल्मा और पत्नी के बुखार को लेकर चिंतित थे! उन्होंने पुराने दिनों के बारे में बात की जब “पब्लिक एजेंडा ” और “शुक्रवार” दोनों पत्रिकाओं के संपादकीय दायित्यों के कारण हमारी हर हफ्ते बात होती थी, बात करते हुए उन्हें याद आया तो शुक्रवार की मेरी कुछ स्टोरीज़ की पेंडिग पेमेंट के बारे में भी पूछने लगे और कहा ठीक होता हूँ तो फिर से बात करेंगे, मैंने कहा सर ये 2016 -17 की बात है अब मैं भूल भी गयी, आप ठीक हो जाएँ बस, उस दिन वो फिक्र और उम्मीद से भरे आम दिनों की ही तरह से थे, उनके पास ठीक हो जाने के बाद के कई बचे हुए काम की लिस्ट थी… उन्हें भी अपनी ही आसन्न मौत का आभास नहीं था और यही बात और ज्यादा अफ़सोस से भर रही है, ये सच है कि आपकी दुनियां में शामिल किसी प्रिय की मौत अपने साथ आपको भी थोड़ा सा मार देती है इसलिए ऐसी हर घटना के बाद खुद में ही वापस लौटने में संभलने में वक़्त लगता है और कुछ कहने को थोड़ा और ज्यादा वक्त लगता है। लेकिन हम लोग जो पढ़ने लिखने की दुनियां के लोग हैं, उनके लिए हर दवा भी यही शब्द हैं, हम लिखकर, व्यक्त कर ही गुस्सा, निराशा, अवसाद, दुःख , तकलीफ, शोक से बाहर आते हैं, नाउम्मीदी और उम्मीद दोनों इन्हीं में मिलते हैं हमें।
मंगलेश जी चले गए तो अब उनकी स्मृतियों का एक कोलाज़ सा बन रहा है इस कोलाज़ में उनकी कविताएं , उनके लेख, फोन पर उनसे स्टोरीज को लेकर होने वाली चर्चाएं, टेक्स्ट मेसेजेज और किसी रात देर तक जागने पर उनसे फेसबुक इनबॉक्स में हुई चैट्स,उनकी अलग अलग तस्वीरें सब एक दूसरे में घुल रही हैं और कौन से वाले मंगलेश सर ये पूछ रही हैं। शायद “पब्लिक एजेंडा ” और “शुक्रवार” के संपादक …मैं इसी मंगलेश सर को ज्यादा जानती थी जिनसे पहली बार नोएडा में जनसत्ता अखबार के दफ्तर में मिली थी, मैं फ्रीलांस पत्रकारिता कर रही थी तब, उन्होंने ही प्रियदर्शन सर से मिलाते हुए किताबों की समीक्षा लिखने को कहा, मैंने तीन किताबों की समीक्षा लिखी भी थी लेकिन फिर मैंने दैनिक भास्कर में नौकरी शुरू कर दी तो आगे जनसत्ता में लिखने का स्कोप ख़त्म हो गया लेकिन एक बिल्कुल नौसिखिया पत्रकार के लिए वो मुलाकात इतनी आत्मीय और खुद में भरोसा देने वाली रही कि उसकी तासीर हमेशा साथ रही मंगलेश जी और प्रियदर्शन जी दोनों के लिए एक बराबर।
2006 में बेटे के जन्म के साल से 2009 के मध्य तक मैंने पत्रकारिता से ब्रेक लिया था, इसी दौरान रांची जाना हुआ और बुकस्टॉल पर “पब्लिक एजेंडा” का अंक दिखा, नई पत्रिका देख उत्सुकता हुई पलटने लगी, स्तरीय लगी तो मैंने इससे जुडी टीम को चेक किया वहां मंगलेश जी का नाम देखकर अच्छा लगा, उनका फोन नंबर पहले था मेरे पास मैंने बात की और कहा अब मैं फिर आपके लिए लिख सकती हूँ जो “जनसत्ता” में नहीं हो पाया था। पब्लिक एजेंडा को मैंने इसलिए अप्रोच किया था कि वहां मंगलेश जी थे और मैं उनके साथ काम करना चाहती थी, ये शुरुआत हुई तो फिर “शुक्रवार ” में भी जब लिखना शुरू हुआ तो मंगलेश जी वहां सलाहकार संपादक रहे। कितनी स्टोरीज उनके सुझाव और मार्गदर्शन में किया, कई बार उन तनाव और फ्रस्ट्रेशन के भी साक्षी रहे जब इन पत्रिकाओं में बजट की सीमाओं ने हमें कभी मन का ग्राउंड रिपोर्टिंग नहीं करने दिया, वो हौसला देते रहे इन्हीं सीमाओं में भी काम करते रहिये, आप अच्छा लिखती हैं कई मौकों पर मेरी स्टोरीज को अपनी ओर से फर्स्ट रेटिंग दी उन्होंने और काम डेडलाईन क्रॉस करने के कुछ घंटों के बाद भी मेल करने की सहूलियत, नाराज होने के बजाय ये कहने हुए कि चलिए आपकी स्टोरीज पर तथ्य और भाषा की गलतियों पर मुझे काम नहीं करना पड़ता वो जैसे आती हैं लगभग उसी स्वरूप में प्रिंटिंग में चली जाती हैं तो आपको ये फ्लेक्सिबिलिटी है मेरी ओर से।

ऐसी ही जाने कई बातें हैं, राग मल्हार सुंनाने से लेकर किशोर कुमार का गाना, ” ये लाल रंग कब मुझे छोड़ेगा मेरा ग़म, कब तलक़, मेरा दिल तोड़ेगा” तक, जिसमें लाल पानी से लेकर लाल सलाम सभी का जिक्र हुआ करता, उन्हें किशोर कुमार के कई गाने अपनी आवाज़ में गाना बहुत पसंद था, अपने युवा दिनों में वो खूब गाते रहे थे जबकि मुझे लगता था वो कुमार गंधर्व, भीमसेन जोशी, बड़े गुलाम अली खान, रविशंकर, एम एस सुब्बालक्ष्मी और किशोरी अमोनकर जैसे महान शाष्त्रीय कलाकारों को ही सुनते होंगे केवल। वैसे ही ये बात भी कि सिनेमा मेरा कविता से बड़ा प्रेम है लेकिन हिंदी सिनेमा नहीं, जिसने पांच रूपये में दुनिया का महान सिनेमा देखा हो वो मॉल्स के मल्टीप्लेक्स में सिनेमा नहीं देख सकता, मैंने दुनिया का महानतम सिनेमा देखा है और मेरी कविताओं पर उन सबका गहरा असर है। हिंदी की दुनियां के ग़लीज़पन का इल्म था उन्हें, उनकी टिप्पणी थी कि हिंदी की दुनिया एक महा -मनोरंजक नाटक है और हिंदी अवार्ड और रिव्यू एक प्रपंच, फिर भी इसी दुनिया के बीच काम करते रहने की गुंजाईश पैदा करने और दूसरों के लिए भी जगह बनाने का हुनर भी उतना ही रहा उनमें। वो कुछ लोगों में रहे जिन्होंने लगातार मुझमें एक कवि की संभावनाओं को देखा जो भी पसंद आयी उसे सराहा और हमेशा सलाह देते रहे कि मुझे अपने इस हुनर को गंभीरता से लेना चाहिए, तब भी और आज भी मेरे लिए कहीं भी छपने और किसी भी वैलिडेशन से ज्यादा महत्त्व इस बात का है कि मेरी कुछ कवितायें मंगलेश जी को अच्छी लगीं, उन्होंने खासतौर पर दिवाली अंक के लिए मुझसे कवितायें मांगी भी लेकिन मैं झिझक में रह गई नहीं समय से नहीं भेज सकी, इसी सिलसिले में एक बात याद आ रही है जब उन्होंने अपने डिप्रेशन में आ जाने को लेकर कहा था कि डिप्रेशन एक बहुत मजेदार तवा है, वह तब ही पैदा होता है जब एक कवि अपने साथ, अपने भीतर नहीं रह पाता , मैं बहुत समय से बाहर ही रह रहा हूँ, अपने भीतरी घावों के पास नहीं जा पा रहा और ये मुझे अवसाद से भर रहा है। वो अपने नास्तिक होने का जिक्र करते थे और अपनी बातों में अपने मित्र असद जैदी के नाम का भी, एक दिन मेरे फेसबुक पर पॉम्फ्रेट मछली की तस्वीर देखकर तुरंत कॉल करके कहा मैं बंगलोर यु आर अनंतमूर्ति से मिलने के लिए आना चाहता था अब ये पॉम्फ्रेट मछली खाने के लिए भी ….
उन्हें याद करते हुए आखिरी में उन्हीं की बात कहूँगी जो वो ग्राम्शी को कोट करतु हुए वो कह रहे थे कि ग्राम्शी ने कहा है कि “पुराना नष्ट हो रहा है और नया कुछ जन्म नहीं ले पा रहा है” आगे अपनी बात जोड़ते हुए कहा, ये सब विकृति है राजनीति से लेकर साहित्य तक इसलिए ये आज ये सब है। उनके जाने के साथ फिलहाल ये तकलीफ दोनों तरह से है।

लेखिका स्वतंत्र पत्रकार हैं तथा स्त्रीकाल से जुड़ी हैं ।

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