शक्कड़ जी

पल्लवी 

अपने नाम के बारे में पूछने पर शक्कड़ जी कहा करते हैं कि “नै बुझलाहा, हमर माय बड़ पुजगरी रहे. जब आपण
भगवती गह्वर में भोग लागे और पंडा शंख फूंकें तब हमर माय जत्ते रहे वत्थय से जय भगवती बोलते बोलते
केतारी (गन्ना) काटेइ. सांझ के बेडा गह्वर लंग खड़ा रहे, ते पंडा शक्कड़ के एक टा ढेला ओकरो हाथ पर दे दइ.”
भूखे पेट हो या भरा पेट, शक्कड़ की डली का इंतज़ार करता रहता माय का दो साल का बच्चा. माय को लगता बेटा
शक्कड़ खायेगा तो शरीर में और जान आएगी, ‘कैसा तो मरियल लगता है’. पेट में जब था तो भूख लगने पर
केतारी खेत में घुस के माय केतारी चूस लिया करती. शरीर में तुरंत जान आ जाता. माय को लगता अगर केतारी
से इतना जान मिल जाता है तो उससे बना शक्कड़ तो और भी अच्छा होगा. इसीलिए इस अच्छी सी चीज़ पर ही
उसने अपने बेटे का नाम रख दिया: शक्कड़. बाद में गाम के किसी पढ़े-लिखे मानुस ने दूसरी पंचवर्सिय योजना के
तहत नेहरु द्वारा आवास आवंटन के कागज़ पर उसके बेटे का नाम लिख दिया ‘शक्कड़ ऋषिदेव’.
तो शक्कड़ जी थे बड़े मजाकिया और चाय पीने के घोर शौक़ीन. अपने इसी शौक के कारण शक्कड़ जी गाँव के
यादव टोला की बड़की बहु के बड़े चहेते थे. सालों पहले जब बड़की बहु ब्याह करके आई थी तब शक्कड़ जी ने
उन्नीस वर्षीय बड़की बहु को पहली बार देखा था, तब वह अपने आँगन में पीढ़े पर बैठ के चौरचंद की पूजा के लिए
चनंचूर चावल को सिल्ला-लोरही पर पीस के पिठार बना रही थी और मुंह में पान चबा रही थी. सात्विक टाइप की
एक भौजी ने उलाहना देते हुए बड़की बहु को टोक दिया: “पूजा का पिठार जुटठे मुंह पीस रहल छा दुल्हिन!” इतना
सुनते ही बड़की बहु तनतनाती हुई उठी और पिठार को एक ऊँगली से चाटते हुई बोली: “लियो, आब चढ़े लियो
अपन भगवान् के”. इतना कहकर वह गुस्से में सीढियाँ लांघती हुई छत पर जा बैठी और इशारे से ओसारे में खड़े
शक्कड़ जी को बुलाया. पंद्रह वर्षीय शक्कड़ जी को बड़ी भली लगी बड़की बहु, बिलकुल अपने जैसी; जिसे ना पाप
पुण्य की चिंता थी और ना ही भगवान् का डर. पास बुलाकर बड़की बहु ने शक्कड़ जी को पनवट्टी खोलकर पान के
साथ कत्था, सुपारी और जर्दा दिया. फिर कान के पास जाकर कहा: “चलल छै चौरचंद में चाँद के पूजा करेई ले,
और आपण मुंह पर गुलाब के काँट राखने छै… हूह्ह…. एकरा आर के जीवन दोसर के टोकते टोकते बीत जेते.
जाहिल सब के की पता कि लोग सच्चे में चाँद पर पहुँच गेले ये. Fools”. अंतिम शब्द शक्कड़ जी को समझ में नहीं
आया. बोले “आहन ठीक कहलिये, लोग सब सच्चे में फूल छै, धतुरा के फूल. बीख लागे बला”. सुनकर बड़की बहु
हँसते हँसते इतना बेहाल हुई कि मूंह के कोड़ से लाल पान बह निकला. शक्कड़ जी भी बड़की बहु को देखते हुए
हंस पड़े और बोले “आहन ते बानर सन के लागे छिये.” बड़की बहु बोली “और आहन बानरबा”. शक्कड़जी फिर
आश्चर्य से बोले: “चाँद पर ते भगवान् रहे छै.” सुनकर बड़की बहु फिर तुनक गयी और हिंदी में बोली: “वौइस् ऑफ़
अमेरिका नहीं सुने हो क्या जी ? जाहिल सब कहीं के. यहीं छत पर से नीचे धकेल देंगे.” शक्कड़ जी का भी
मिजाज गरमा गया, सो बड़की बहु की पीठ पर एक धौल जमा के भाग लिए.
उसके बाद नियमतः दोनों एक दुसरे को धौल ज़माने लगे. आम, लताम हो या सपाटू, दोनों का एक ही लक्ष्य होता
कि कैसे गाछ पर चढ़ा जाए और नमक-बुकनी लगा कर कच्चे फलों का भक्षण किया जाय. मचान पर बैठ कर
बड़की बहु अब शक्कड़ जी को हिंदी और अंग्रेजी का मुहजवानी पाठ देने लगी. अब दोनों फर्राटेदार हिंदी में तो कभी
टूटी-फूटी अंग्रेजी में बतियाते. एक बार बड़की बहु बैठक में जब कान लगाकर मर्दों के ठहाके की कंसोही ले रही थी

तब उसने पारिवारिक मित्र रेणु को कहते सुना कि उनकी किताब “मारे गए गुलफाम” पर फिल्म बन रही है. फिर
क्या था: बड़की बहु ने खाने के बाद रेणु को पान देते हुए उनके मुंह से उगलवा ही लिया कि फिल्म की शूटिंग
रानीगंज और पुरनिया के इलाके में हो रही है. अगले दिन से बड़की बहु ने घर में घोर संग्राम छेड़ दिया कि वो
सिनेमा की शूटिंग देख कर हीं अन्न-जल ग्रहण करेगी. वैसे अपनी बात मनवाने के लिए अन्न-जल त्यागने का
फ़लसफ़ा बड़की बहु ने महापुरुष गाँधी से सीखा था, जिनकी कहानियां बड़की बहु को उसके बाबूजी बड़े चाव से
सुनाते थे. आगे यह हुआ कि हारकर बड़की बहु के पूजनीय ससुर ने उनको घर की और औरतों के साथ सम्पनी में
बिठाकर रानीगंज के लिए विदा कर दिया. साथ में शक्कड़ जी को भेजा गया, गाड़ीवान बनाकर. वहां पहुंचकर दोनों
रोज शूटिंग देखने के लिए पेड़ की सबसे ऊँची डाल पर जा बैठते, बिलकुल ‘तीसरी कसम’ के ‘हिरामन’ और
‘हीराबाई’ की तरह.
खैर, दोनों की मतवाली दोस्ती देखकर आस पास के लोग खूब चिढ़ते, मुह दवा के हँसते. बड़की बहु को कई प्रकार
के देसी विशेषण से नवाजते, जैसे कि “बड़की बहु के बहत्तर हाथ के अंतरी छै”, “बड़की बहु बड़ छहत्तर छै”, “इ ते
छोटका घोर के छै” इत्यादि . लेकिन किसी की क्या मजाल जो बड़की बहु को सामने से कुछ बोल दे. काली और
चंडी का रूप धारण करने में बड़की बहु को कुछ सेकंड ही लगता था. और लोग उनको नाखुश भी तो नहीं करना
चाहते थे. वक़्त बेवक्त लोगो को चोंगा भर भर के अनाज देती और परिवार से छुपाकर जरुरतमंदों को पैसे भी. टोले
में उनके फैन ज्यादा थे, और बुराई करने वाले कम. बड़की बहु खुद अपने और शक्कड़ जी की दोस्ती को सीता और
शूर्पनखा की दोस्ती कहती. लोग जब पूछते कि कौन सीता और कौन शूर्पनखा है तो वह पनामा का काश लेते हुए
हिंदी में समझती: “पहले सही सवाल पूछना सीखो. ये पूछो कि सीता और शूर्पनखा की दोस्ती पर राम और रावण
की क्या प्रतिक्रिया होगी?”. इसी सवाल पर एक बार बहस करते हुए शक्कड़ जी और बड़की बहु ने अपना ही
रामायण लिख डाला था, जहाँ राम बदहवास सा रावण से पूछता: “भाई कुछ तो उपाय करो कि युद्ध हो और
असत्य पर सत्य की विजय हो? इन सीता और शूर्पनखा की दोस्ती के चक्कर में युद्ध रुका हुआ है.” और रावण
तिलमिलाकर जवाब देता: “सही कह रहे हो भाई, इन दोनों औरतों ने तो नाक में दम कर रखा है”. राम और रावण
को ऐसे संवाद देकर दोनों खूब हँसते. रामनवमी में गाम भर के खरहू सब को येही संवाद देकर रामलीला करवाया
जाता. लोग हाथ में पुष्प, जल और अरवा चावल लेके शक्कड़ जी और बड़की बहु द्वारा पुनररचित और निर्देशित
रामलीला देखने आते.
बड़की बहु थी बड़ी धाकड़. उम्र बढ़ने के साथ उसके आवाज़ में और निखार आ गया था. उसी आवाज़ को कुछ लोग
दहाड़ भी बोलते. अब वह खुले में मर्दों से भरे बैठक में जाके बराबरी की कुर्सी पर बैठ के लिखा-पढ़ी भी कर आती
और शक्कड़ जी से ‘पनामा’ ‘केप्स्टेन’ सिगरेट माँगा के खुले में पीती भी. बदले में बड़की बहू उनको खूब शक्कड़
वाली चाय पिलाती, जिसमे वो ऊपर से मोटी परत वाली छाली (मलाई) जरूर डालती. लेकिन शक्कड़ जी का
पसंदीदा था “शक्कड़ वाली पूरी”. इलाके में ‘नाक बला पूरी’ के नाम से प्रसिद्द उस पूरी में शुद्ध घी, शक्कड़ और
दरदरा आटा ड़लता, फिर दूध में गूँथ के सांचे पर दबा कर ठीक पीपल के पत्ते जैसा आकार दिया जाता. शुद्ध देशी
घी में छना “नाक बला पूरी” दोनों का पसंदीदा था. ‘नाक बला पूरी’ को वहां ‘लोल बला पूरी’ भी कहते हैं. ‘लोल’
माने आगे की तरफ निकले ओंठ. जिनके पास मुह के अनुपात में सामान्य अथवा अन्दर की तरफ धंसे ओंठ होते

हैं, आधुनिक जगत में प्लास्टिक सर्जरी से लोग ओंठ को ‘लोल’ जैसा बना लेते हैं, जिसे अंग्रेजी में ‘पाऊट’ (pout)
भी कहा जाता है. लेकिन ‘लोल’ ज्यादा नुकीला होता है, ‘पाऊट’ के मुकाबले. शक्कड़ जी ने किसी न्यूज़ चैनल में
लालू प्रसाद यादव को किसी पत्रकार को डांटते सुन लिया था ”मारेंगे लोल पे, चढ़ जाओगे पोल पे“. तब से शक्कड़
जी ‘लोल बला पूरी’ खाले वक़्त लालूजी के इस फैक्करा का जिक्र जरूर किया करते और दोनों हँसते हँसते
लाहटलोल होते. हँसते हुए उनके चहरे की झुर्रियां यूँ लगती मानो पोखरे में पड़ी जलतरंगें. मग्न मछलियों के तैरने
से पानी पर पड़ी सिलवटों जैसी.
फिर एक दिन बड़की बहु बहुत बिमाड़ हो गयी. बहुत इलाज हुआ, लेकिन बच नहीं सकीं. उनका अंतिम संस्कार हुए
दो दिन हो गए थे लेकिन शक्कड़ जी कोई अता-पता नहीं. दो दिन बाद अचानक से शक्कड़ जी आये और आँगन
के कोने से छोटका बाल्टी और झाड़ू उठा लिए और अपने मचान और चबूतरे को खूब बढ़िया से बुहार के, गोहाल से
गोबर लाकर आस-पास में नीप दिए. उसके बाद शक्कड़ जी पहले की तरह रोज आने लगे और अकेले ही उस मचान
पर बैठेने लगे, जहाँ वह नियमतः बड़की बहु के साथ बैठा करते थे. उनका शरीर पहले से और भी जर्जर लग रहा
था. १२ – १३ दिनों में हीं वो पहले से और कमजोर दिखने लगे थे, लेकिन आँखें अब भी पहले के जैसी चुश्त दुरुष
थीं. कुछ नहीं तो बडकी बहु की चहेती १० साल की पोती तितली के साथ बैठ कर टीवी देखते. उन दोनों के बीच ये
करारनामा था कि “मोगली” देखने के बाद वो उनको जंगल और जानवर वाला चैनेल देखने देगी. शक्कड़ जी नेशनल
जियोग्राफिक चैनेल और डिस्कवरी चैनेल को इसी नाम से बुलाते.
एक दिन सबने बड़की बहु का लोहा का बक्सा निकल कर धुप में रख दिया, वही बक्सा जो बड़की बहु ब्याह में साथ
में लाई थी, वही जिसमे पीतल की कड़ी लगी हुई थी. जो पंडा आजतक बड़की बहु की दहाड़ सुनकर रास्ता छोड
देता, वही अब घर का शुद्धिकरण करने आया था. घरवालों ने खोलकर देखा तो बड़की बहु के बक्से में एक दो जोड़ी
साड़ी और सिल्क के बटुवे थे, और पूरा बक्सा हिंदी के इंडिया टुडे, आउटलुक और बाबा नागार्जुन, प्रेमचंद और
शरदचंद के उपन्यास भरे पड़े थे. शक्कड़ जी बक्से में से इंडिया टुडे का १९९१ का अंक उठाकर बोले: “इ ते उमा
भारती और आडवानी छै”. शक्कड़ जी वहीँ बैठ गए और किताबों के पन्ने उलटने लगे, झाड़ने लगे. बाबा नागार्जुन
की “बलचनमा” उठा के हँसते हुए बोले “इ पिल्का जिल्द वाला किताब पैढ के तारा दू दिन कानले रहे”. बड़की बहु को
सिर्फ वही उसके नाम से बुलाते थे: “तारा”. घरवालों ने तारा का बक्सा आँगन में ऐसे ही रख छोड़ा. वैसे भी उन
पुरानी किताबों से उस घर में किसी को लगाव नहीं था. दो दिन बाद किताबों के बक्से के साथ शक्कड़ जी अपने
घर जाते दिखे. इतने दिनों में पहली बार उनकी चाल में आत्मबल था. दुसरे दिन शक्कड़ जी फिर आये और जाने
क्या घर के अंदर इधर-उधर ढूढने लगे. पता चला तारा का टोर्च ढूढ रहे हैं. घर के और लोगों को पुराने ज़माने का
स्टील का लम्बा सा, भारी सा टोर्च, जिसके अन्दर तीन बैटरीयां लगती हैं, दिखा-दिखा के बोले “अरे इ टोर्च तारा के
ओकर बाबूजी देने रहे, की मज़ाल कि कोई इ टोर्च के छू ले.” फिर टोर्च को हिला कर, जलाने की कोशिश करते हुए
बोले “लागे छै बैटरी ख़तम भे गेले ये”. फिर कुरते की जेब से तीन नयी बैटरी निकाल कर टोर्च में लगा दी और
पुरानी बैटरियों को जेब में डाल लिया.
उनके छोटे से कमरे में, जहाँ शक्कड़ जी आस –पास के बच्चों को प्रेमचंद, शरतचंद और नागार्जुन की कहानियां
सुनाया करते, अब एक तरफ बक्से के अंदर और उसके ऊपर किताबों, पुरानी पत्रिकाओं और अखबारों का ढेर लगा
हुआ था. ऊपर बिजली के पतले से तार से तीन पुराणी बैटरीयों जुडी थी, जिससे एक पीली रौशनी वाला एक छोटा
सा बल्ब जल रहा था. उस रौशनी में नहाई पुरानी किताबों, मैगज़ीन और अखबारों और साथ में नहाया शक्कड़ जी
का चेहरा. जिस मचान पर बैठ कर तारा के मुह से निकले शब्दों को कल्पनाओं में ले जाते, वह मचान शक्कड़ जी
अपने छोटे से कमरे में ले आये थे. दीमक लगे पन्नों को झाड़ पोंछ कर, किताब गोद में लिए बच्चो को “पारो” और
“उग्रतारा” की कहानी सुना रहे थे. तभी एक बच्चा पूछता है: “आपको तो किताब मुहजुवानी याद है. बिना देखे ही
कहानी कैसे पता है आपको?”. शक्कड़ जी ठठा कर बोले: “काला अक्षर खेत में लगे केतारी के डंडे जैसा होता है.
एक डंडे पर “क” तो दुसरे पर “ख” लिखा होता है. मेरी माय ने इसी “क” और “ख” को बोकर, उसको बड़ा कर,
उसकी सिंचाई कर मुझे पाला है. इसलिए सारे “क” और “ख” मेरे अंदर ही है. बस, कोई उसपर रौशनी डाल दे.”
कहते हुए शक्कड़ जी ने बल्ब से निकल रही पीली रौशनी को देखा और कहा “तुमलोग कभी उग्रतारा देखे हो जी?”
सारे बच्चे एक साथ चिल्ला उठे “नहीं” और इतना कहकर बस बाहर की तरफ निकल गए, अवसर की तलाश में कि
मुसहरी से दिख रहे आसमान में कहीं उग्रतारा दिख जाए.

असिस्टेंट प्रोफेसर 
विदेशी भाषा विभाग 
तेजपुर यूनिवर्सिटी ,आसाम 
Email: 007manjari@gmail.com

 

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