प्रो. आशा शुक्ला
कुलपति, डॉ. बी. आर. अम्बेडकर सामाजिक विज्ञान विश्वविद्यालय, महू, इंदौर, म. प्र., भारत

(यह व्याख्यान दिनांक 12 जून 2020 को माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल द्वारा आयोजित ‘कुलपति संवाद कार्यक्रम’ में प्रो. आशा शुक्ला द्वारा दिया गया था । इस व्याख्यान का विषय ‘मीडिया में स्त्री मुद्दे’ था । यह व्याख्यान विश्वविद्यालय के आधिकारिक फेसबुक पेज (https://www.facebook.com/mcnujc91/) पर लाइव किया गया था । इसका लिप्यंतरण म. गां. अं. हिं. वि., वर्धा के स्त्री अध्ययन विभाग के शोध छात्र रजनीश कुमार अम्बेडकर द्वारा किया गया है । यहाँ व्याख्यान का संपादित अंश प्रस्तुत किया जा रहा है ।)

नमस्कार मित्रों, आज के इस कुलपति संवाद कार्यक्रम में मीडिया के साथ स्त्री मुद्दों पर बात करने के लिए विषय दिया गया । इस बातचीत हो प्रारंभ करूँ उसके पहले मैं, माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय के नवनियुक्त यशस्वी कुलपति डॉ. संजीव द्विवेदी जी आपको आपके कार्यकाल की शुभकामनाएं देती हूँ और आपके समस्त संकायाध्यक्ष, विभागाध्यक्ष, शोधार्थियों एवं विद्यार्थियों के साथ आपको प्रमाण भी करती हूँ । माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय की चर्चा होते ही मैं एक मिनट का समय लूंगी क्योंकि वहाँ पर मेरे कई सारे मित्र कार्य कर रहे हैं । विशेष तौर पर सम्मानीय श्री पुष्पेन्द्र पाल सिंह जी का ये वो लोग हैं । जिन्होंने पत्रिकारिता जगत में बड़ा काम, बड़ा नाम किया है । आदरणीय सच्चिदानंद जोशी जी का और ऐसे ही बहुत विद्वान व्यक्ति, मीडिया में स्त्री, स्त्री मुद्दे बड़ा गंभीर विषय है । इस विषय की शुरूआत अपने पूर्व विभाग में जो अचानक आपात संकट उपस्थित हुआ था 2007 में और उस संकट के निवारण में दो सहयोगियों की बहुत भूमिका रही है मीडिया और पुलिस प्रशासन की । तो कोई भी बात कहने से पहले मैं इस सामूहिक प्लेटफार्म या इस सोशल मीडिया प्लेटफार्म के माध्यम से उन तमाम पत्रकारों के प्रति कृतज्ञता ज्ञापित करता हूँ ।

          जिन्होंने अपने सामाजिक और अकादमिक दायित्वबोध के साथ उस विभाग के लिए अपनी भूमिका का निर्वाहन किया और वह आज महिला अध्ययन विभाग प्रदेश का एक मात्र स्थाई विभाग है । मित्रों इस विषय में दो बिंदु समाहित हैं पहला मीडिया समूह जो है उसमें तीनों जो जोड़ती हूँ । प्रिंट मीडिया, इलेक्ट्रॉनिक मीडिया और सोशल मीडिया । और सोशल मीडिया के तमाम अंग और उपांग जिनके माध्यम से हम लोग निरंतर बातचीत करते हैं और इस समय जो प्रत्यक्ष माध्यम है । फेसबुक का तो इन तीनों माध्यमों के साथ मीडिया में स्त्री दृष्टिकोण दो तरीके से मेरा देखने का प्रयास होगा कि मीडिया हाऊसेस में जो स्त्रियाँ कार्यरत हैं विभिन्न भूमिकाओं में हैं उसके प्रति स्त्री दृष्टि क्या है? उनके बारे में स्त्री मुद्दें क्या है? और दूसरा लोकतंत्र का जो चौथा स्तंभ हमारा मीडिया है । वो बाहरी जगत को या बाहरी दुनिया को इन स्त्री मुद्दों के साथ अपने आपको किस तरीके से उपस्थित कर रहा है अथवा करना चाहिए । कुछ बुनियादी प्रश्नों के साथ बातचीत करूँ । जिससे उत्तर तलाशने की कोशिश हम सब मिलकर करेगें और यह चलता ही रहेगा कि हमारा मीडिया लोक शिक्षण के महत्व और दायित्व का निर्वाहन उसी प्रकार कर रहा है जिसकी उसे आपेक्षा है । दूसरा मीडिया प्रचारक या पक्ष-विपक्ष का समर्थक है अथवा आम आदमी की आवाज है क्या ये प्रश्न और इसका उत्तर जीवन्त है अथवा समाप्त हो गया है । और इन दो प्रश्नों की पृष्ठभूमि में एक प्रमुख बात को और जोड़ना चाहूँगी कि जिन मान्यताओं के आधार पर कोई भी समाज या मानव जाति जीती है । उसी के आधार पर राज्य-व्यवस्था, शिक्षा-व्यवस्था, धर्म-व्यवस्था, परिवार-व्यवस्था और अर्थ-व्यवस्था रहती है कहने का आशय यह है कि किसी स्त्री के बारे में उस राज्य की दृष्टि देखना हो तो सर्वप्रमुख उसकी ‘महिला नीतियों’ को देखना चाहिए । वर्तमान में प्रमुख दो विचारधाराएं हैं आदर्शवादी और भौतिकवादी प्रचलन में हैं । किंतु मैं दोनों के एक सूत्र को नहीं देख पाती हूँ । ये दोनों ही इंसान को अलग-अलग ढांचों में बाँट देते हैं । मीडिया को भी अपने प्रत्येक विमर्श में स्थिरता के उन दो बिंदुओं की पड़ताल व पहचान आवश्यक है । जो स्त्री और पुरुष के दैहिक विभेद, भौतिक विभेद, अकादमिक विभेद, आर्थिक विभेद के प्रश्न चिन्हों के साथ प्रस्तुत होते हैं । इस परिदृश्य में इस विमर्श को आगे बढ़ाने से पूर्व यह जानना बहुत जरुरी है कि आखिर वो कौन से प्रमुख स्त्री मुद्दे हैं । जिन पर बात होनी चाहिए, सोचा जाना चाहिए । जेंडर-सेंसटाइजेशन, जेंडर-इक्वलिटी, वुमेन एम्पावरमेंट, क्राइम अगेंस्ट वुमेन, ह्यूमन ट्रैफ़िकिंग मीडिया में स्त्री की स्वतंत्र छवि, भ्रूण-हत्या, परिवार-व्यवस्था में स्त्री, क्राइम अगेंस्ट वुमेन के अंतर्गत प्रमुख बलात्कार, रेप और गैंग रेप, कानूनी एवं सामूहिक जागरूकताएं । ह्यूमन राइट्स इन सारी चीजों को एक मोटे स्तर पर महिला मुद्दों के अंतर्गत देखा जाता है । जिस तरीके से चीजें साहित्य में आती हैं और कहा जाता है ‘साहित्य समाज का दर्पण है ।’ उसी प्रकार से हम सब देखते हैं कि बहुत सारी चीजें मीडिया में आती हैं तो यह विचार किया जाना चाहिए कि मीडिया की संवेदनशीलता, भूमिका, भाषाई संतुलन, जेंडर-संवेदनशीलता से लेकर अन्य तमाम जो मैंने विषय और उपविषय बताएं हैं । उसमें किस प्रकार के हम सब जानते हैं कि बहुत सारे ऐसे अपराध जगत के अनगिनत किस्से हैं । जो मीडिया के कारण ही प्रकाशित हुए हैं यानि तमाम स्टैक होल्डर जो न्याय-व्यवस्था में काम करती हैं । महिलाओं के लिए उनमें मीडिया ही प्रमुख है । मेरे साथ इन विविध मुद्दों पर काम करने वाले चार शोधार्थी हैं । तीन जिन्होंने एम. फिल. स्तर के डिजरटेशन किए । जो मीडिया से ही जुड़े हुए हैं और एक जो अभी कार्य कर रही हैं संजना चतुर्वेदी वो यह कार्य कर रही है कि जो राष्ट्र के चर्चित दस अपराध हुए हैं । जिसमें एक निर्भया कांड है उसमें मीडिया की भूमिका क्या थी? मैं जहाँ तक समझती हूँ स्वतंत्र भारत में ‘निर्भया कांड’ एक ऐसा कांड था । जिसमें मीडिया की प्रमुख भूमिका एक आंदोलनकर्ता या एक जनांदोलनकर्ता के तौर पर दिखाई पड़ी है । पूरे समूह को जोड़ना हर बात की जागरूकता लाना ये मीडिया की प्रमुख भूमिका में था और मैं ये तो यह नहीं कह सकती कि निर्भया को न्याय मिला । लेकिन जो इससे जुड़े हुए अपराधी थे उनको दंड निश्चित तौर पर मिला । अब वो कितना विलंब हुआ? क्या हुआ? ये तो बहुत सारे कारण होते हैं क्योंकि जितने सारे केसेस होगें उनकी पैंडेंसी जितनी होगी । उसके निराकरण में उतना समय लगेगा । हालांकि हम सब यह माँग करते रहे हैं कि इनका निराकरण प्राथमिकता के स्तर से जल्दी होना चाहिए । लेकिन निराकरण में अकेले ज्यूडिशरी की भूमिका प्रत्यक्ष दिखती है । ऐसा होता नहीं है शुरूआत वहाँ से होती है कि अगर कोई ऐसी घटना घटित हुई तो उसके परिवार ने उनके आस-पड़ोस वालों ने कितनी निर्भीकता से समाज के समाने डटके पूरी निडरता के साथ इसकी FIR करवाई । पहला स्टेप होल्डर, दूसरा पुलिस ने उस FIR को करने और उसकी विवेचना में कितना अमल किया, कितना समय लिया और इसको कितना आगे प्रस्तुत किया । मध्य प्रदेश में बात करें तो जैसे बाई स्ट्रोक गवरमेंट सेंटर भी प्रमुख भूमिका में उपस्थित होता है । अगर कोई किशोरों से जुड़ा हुआ मामला है तो ‘किशोर न्याय बोर्ड’ भी आएगा । बच्चों से जुड़ा मामला है तो वो अभिकरण भी आएंगे । यानी ये सारे अभिकरण जिनकी सभी की संयुक्त भूमिका किसी भी बच्ची, किसी भी महिला को न्याय दिलाने में है ज्यूडिशरी तक पहुंचाने में है । वो क्या एक के बाद दूसरी कड़ी है? मुझे लगता है अभी ये सब स्वतंत्र अभिकरण हैं तो जब सभी स्तर पर कार्य हुआ । लेकिन जब न्यायालय में परिवार पहुँचा तो चूंकि ये सब एक दूसरे से संयुक्त कड़ी । उस गंभीरता से नहीं हैं या बनने के उपक्रम में हैं । इनका जो डेटाबेस है इनकी जो रिपोर्टिंग है वो बिलकुल संयुक्त नहीं है तो वो एक पुनः विवेचना में समय लगता है । एक वकील साहब हैं जो इसी के अंतर्गत कार्य कर रहे हैं । मेरे साथ ही बीएससी कर रहे थे कि संयुक्त अभिकरणों कि भूमिका महिला न्याय के लिए किस तरीके से त्वरित हो सकती है । एक और बात कहने की कोशिश करूंगी एक कानूनी न्याय होता है और एक समाज का न्याय होता है । मैं मीडिया के सामने यह प्रश्न रखती हूँ कि उस सामाजिक न्याय, उस आत्मा की आवाज को कितना गंभीरता से वो प्रस्तुत करने के लिए स्वतंत्र हैं । जब एक बार आपके ही विश्वविद्यालय में मुझे जो यंग नवनियुक्त महिला रिपोर्ट्स है । उनकी भूमिका और कार्यों के बारे में बातचीत करने के लिए ‘अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस’ पर बुलाया गया था । तो मैंने अपनी समझ को बढ़ाने के लिए मध्य प्रदेश के कुछ युवा महिला पत्रकारों से बातचीत कही और उन बातचीतों में यह बात उभर के आई । जिसमें हो सकता है दिन-प्रतिदिन परिवर्तन हो रहे हो और कहीं न कहीं उन सब बातों को लिखने के लिए अंशता मजबूर होते हैं । जिस प्रकार की दृष्टि उनकी मीडिया हाऊसेस की होती है ।

          मीडिया का पूंजी से नियंत्रण कोई छुपा हुआ तथ्य नहीं है । लेकिन उसके बावजूद लोकतंत्र के इस चौथे स्तंभ में उसकी पैनी कलम में एक शब्द में वो चमत्कार जरुर छुपा हुआ है । जो किसी को भी बचा सकता है किसी के समर्थन में भी खड़ा हो सकता है । इस बात को विचार करना चाहिए लेकिन अगर हम महिलाओं के बारे में स्त्री मुद्दों के बारे में मीडिया की भूमिकाओं को देखते हैं । तो मैं निश्चित तौर पर तथ्य के समर्थन में खड़ी होऊंगी कि मीडिया जगत में एक ऐसा महिलाओं का वर्ग है । जो पूरी बेबाकी निर्भीकता और अपनी योग्यता के साथ समाज के समक्ष प्रस्तुत होता है । लेकिन वह एक वर्ग है यह समस्त वर्ग हैं ऐसा मैं नहीं समझती लेकिन मैं बड़ी ईमानदारी से स्वीकार करती हूँ कि मेरी ही समझ पूरी हो इसका मैं दवा नहीं करती । मैं अपने इर्द-गिर्द रिसर्च करने की कोशिश करती हूँ । उससे निकले हुए जो कुछ निष्कर्ष हैं उनको आपके साथ शेयर करने की कोशिश करती हूँ । अभी हमारे विश्वविद्यालय में एक किताब का लोकार्पण हुआ महिला मुद्दों पर केंद्रित पुस्तक है ‘अलगनी पर औरतें’ अलगनी जिसका न आसमान है न जमी है, बीच में झूलती हुई चाहे उस पर कपड़ा सुखा लो चाहे कुछ भी कर लो । अगर स्त्रियाँ उस अलगनी पे झूलती हुई प्रकाशित होती है तो निश्चित तौर पर वो महिला मुद्दों के प्रश्न जिसमें ह्यूमन राइट्स मानवीयता सब प्रश्न चिंहित हैं या उभारे गए होंगे । मेरा भी उसमें एक शोधपरक आलेख है विधवा स्त्रियों की स्थिति तमाम आलेख हैं । देवदासी प्रथा पे है, बोलने पे है, जोगनी पे है, वस्त्र न पहनने देने का है, केरल की उस परम्परा पे है जिसमें दलित स्त्रियों को कटि (कमर) के ऊपर वस्त्र पहनने की मनाही है एक विशेष समुदाए में और अगर इसको पहनने का वो अपराध करती है तो अर्थदंड के तौर पर उसका जो भुगतान करना होता है । उसकी प्रक्रिया इतनी मानसिक कष्ट देने वाली है जिसका वर्णन नहीं हो सकता है । वो उस स्त्री के स्तनों के वजन के आधार पे उस अर्थदंड को तय करते हैं । कौन एक संभ्रांत स्त्री इस प्रकार की प्रक्रिया को मंजूर कर सकती है । तो एक स्त्री जब उसने ऐसा लोगों की स्थिति में दुश्साहस किया और वहाँ के कुछ लोग जब पहुँचें तो उसने अपने स्तनों को काट के ही रख दिया । ये कहे कहाए किस्से नहीं हैं ये सारी बातें बड़ी गंभीर हैं । स्त्री के प्रश्न-पुरुष के प्रश्न से बहुत अलग हैं । मैं स्त्री और पुरुषों की बेसिक बुनियादी अंतर पे बात नहीं करती । प्राकृतिक जो विभेद स्त्री और पुरुष के बीच में है । वो बायोलॉजिकल है प्राकृतिक है । लेकिन जेंडर-संवेदनशीलता का अंतर तो नहीं है और जेंडर में तो सब समाहित हैं । स्त्री-पुरुष, थर्ड-जेंडर सब समहित हैं । लेकिन जो स्त्री के प्रति जो भेद है कोई भी गर्भवती माता किसी भी जाति व धर्म की हो । मेरी जानकारी में नहीं है हो सकता है आप में से बहुत सारे विद्वानों की जानकारी में हो कि उसको ये आशीर्वाद दिया जाता हो, उसको ये ब्लेसिंग दी जाती हो कि आपके पुत्री ही पैदा हो भले ही उन माता-पिता के पुत्री की चाह न हो । लेकिन आशीर्वाद पुत्रवती भव का ही दिया जाता है । ये चीज हमारी पितृसत्तात्मक सोच का स्पष्ट नमूना है । कहीं पर मातृसत्तात्मक भी व्यवस्थाएँ है । इस समय पितृसत्तात्मक ही है लेकिन मानवीय व्यवस्था कहाँ है । स्त्री और पुरुष दोनों को इंसान के तौर पे समझ लिया जाए । तो ये मेरा प्रश्न मीडिया से जुड़े मित्रों से है कि मानवीय व्यवस्था कहाँ है? क्या वो अपने तमाम प्लेटफॉर्म एवं समस्त मीडिया के माध्यमों से स्त्री के मानवीय स्वरूप के पक्ष में प्रस्तुत हो रहे हैं । या उन्हें होना चाहिए या नहीं होना चाहिए । ये मीडिया जगत और उनसे जुड़े हुए संबंध संस्थान अपने पाठ्यक्रमों में विचार करेंगे । जब इस मुद्दे पर बात करने की बात आई । तो मैंने और खोज पड़ताल शुरू करी । मुझे ये लगा कि एक तरफ तो जब हम स्त्री-अधिकरों की बात का समर्थन करते है । लेकिन स्त्री का अपनी देह पर कितना अधिकार है । अगर ये बात जरा भी प्रस्तुत हो जाए तो हम अचानक इतना विचलित क्यों हो जाते हैं । सब कोई जानता है दुनिया में मानव जगत में माता ही वो है जब अपनी संतान का परिचय समाज से कराती है । ये प्रमाणित है वो पुत्र या पुत्री जिससे भी माँ का रिश्ता है । माँ का संबंध है उसकी अपने निर्णयों पर अपने अधिकारों पर इतना विचलित समाज क्यों है? और वही समाज दोहरी मानसिकता में तब प्रस्तुत होता है । जब वो अजीब-गरीब प्रकार की खबरों को सनसनी खेज बना के प्रस्तुत करता है । क्या सिने जगत कुछ अलग है? वहाँ की प्रेम प्रसंग की खबरें बड़े चटकारे के साथ प्रस्तुत की जाती है? यौनिकता से जुड़े प्रश्न बड़े आजीब तरीके से प्रस्तुत किए जाते हैं । परस्पर संबंधों में अगर दो स्त्री और पुरुष के बीच में कोई संबंध है तो स्त्री के प्रति दृष्टि कुछ अलग होगी और पुरुष के प्रति कुछ अलग होगी । भाई ये विभेद मीडिया में कैसे प्रस्तुत हो सकता है? क्या वो दो इंसानों के तौर पे प्रस्तुत नहीं करेगे? मैं फिर से वहीँ लौटूंगी कि मीडिया समाज का आइना है जो सोच समाज और परिवार-व्यवस्था में होती है । मीडिया उसी तरीके से उसी भाषा शैली में उसको प्रस्तुत करता है । और मीडिया अचानक जो प्रचारक या पक्ष या विपक्ष का निर्माता हुआ यह विभेद है । मीडिया का दायित्व बोध, समाजिक दायित्वबोध सूचना को संप्रेषित करना है नाकि पक्ष-विपक्ष में खड़े होना है । मेरी कई लोगों से चर्चा हुई कि अचानक कुछ ख़बरें तत्कालिक के कारण आती है । उनमें स्त्री-मुद्दों पर विवेचना में अड़चन उपस्थित होती है क्योंकि मीडिया एक प्रमुख अभिकरण है । यह तो हम सब तत्काल मानेगें कि कहीं न कहीं जो मीडिया में स्त्रियाँ हैं वो इस बात की ज्यादा गवाही दे ज्यादा विचार करें । उनकी प्रतिभाओं का, उनके स्वतंत्र निर्णयों का, उनकी स्वतंत्र छवि का, उनकी स्वतंत्र कलम का क्या सही मूल्याकंन हो रहा है? या नहीं हो रहा है अगर हो रहा है तो अच्छी बात है । जिस पर मैं अंशमात्र सन्देह कर रही हूँ । लेकिन अगर नहीं हो रहा है तो समस्त मीडिया से जुड़े विश्वविद्यालयों और संस्थानों की यह भूमिका है कि इस प्रकार के स्त्री जेंडर-संवेदनशीलता, जेंडर-इक्वलिटी एवं वुमेन एम्पावरमेंट के मुद्दों को प्रमुखता से अपने पाठयक्रमों में जोड़ें और कहीं न कहीं मीडिया में जो स्त्री छवि और उसकी दैहिक संदर्भ में न ले के भौतिक संदर्भों में और प्रमुखता के साथ प्रस्तुत किया जाए । हो सकता है कि कोई देखने सुनने में उतना खुबसूरत न हो तो खुबसूरती का पैरामीटर मीडिया में उसका आंतरिक अकादमिक उत्कृष्ट है । इस बात पर भी विचार होना चाहिए साथ में इस बात पर भी विचार होना चाहिए कि मीडिया में एक बड़ा दायित्व वो था कि जब सब लोग कहते थे अरे ये खबर तो अखबार में निकली, तो अखबार में निकली गई तो इसका अर्थ स्पष्ट है कि इतना ज्यादा व्यापक सामाजिक यश पर अपयश हो गया है । दोनों ही पक्षों पे बात है कि मीडिया में लोकलाज का जो प्रतिरोधक तत्व था जो समाज से बहिष्कृत कर देने का मानदा रखता था ।

          उसने अपनी भूमिका को विस्तृत किया है या सीमित किया है इस पर विचार किया जाना चाहिए । मुझे लगता है कि लोकलाज का जो प्रतिरोधक तत्व था उस पर अभी मीडिया जगत को बड़े संवेदनशीलता के साथ कार्य करने की आवश्यकता है । चूंकि महिला मुद्दों पर काम करने पर विद्यार्थी अक्सर देखते है कि जो लापता हो गई बच्चियां हैं । जो ‘फोर्स्ड मैरिज’ की शिकार बेटियां है वो उसी की देन है जो मुख्य रूप से जो भ्रूण-हत्याओं में मारी गई बेटियां हैं अगर एक बच्ची भ्रूण-हत्या की शिकार होती है । तो आप तय मानिए कि पाँच बच्चियों को ह्यूमन ट्रैफ़िकिंग में तमाम फॉर्म्स में उसका शिकार होना पड़ेगा और उनकी भरपाई करनी पड़ेगी । ऐसे तमाम केसेस हैं ऐसा नहीं है कि वे मीडिया की परेशानियों से वाकिफ नहीं है । जो न्यूनतम भुगतान है वो बहुत ज्यादा वर्किंग ऑवर (कार्य समय) है । बहुत सारी चीजें है प्रमोशन का स्थायित्व का संकट है । स्पेशली इस कोविड-19 के दौर में बहुत सारे ऐसे प्रश्नों से सूझते हमारे पत्रकार भाई और बहन जो है लेकिन उनका दायित्वबोध पत्रकारिता के प्रोफेशन के साथ थोड़ा तो मिलता ही है । इस पे तो बात करनी ही पड़ेगी । उसको विस्तृत नहीं किया जा सकता । तो जो एक-आधा पन्ना, ऐसा अच्छा भोजन बनाओ, अच्छे चुटकुले, सिने जगत के प्रेम प्रसंग, खाना पकाना इस प्रकार की जो चीजे हैं । ये वो निश्चित तौर पर आमदनी तो होगी । एक आध उस प्रकार की भी चीजे लेकर आएँ । इनका उनका जो विज्ञापन छप रहा है कि उन्होंने वो सामाजिक सर्वश्रेष्ठ कार्य किया, उन्होंने वो अकादमिक सर्वश्रेष्ठ कार्य किया । तो पता चला कि ये तो अघोषित एक विज्ञापन है पैसे से सब होता है अब ये तो मैं पहले से सब मान चुकी हूँ कि मीडिया पूंजी के नियंत्रण में है तमाम प्रकार के दबावों में भी है लेकिन उस सब के बावजूद भी यह प्रश्न तो पूरी ज़िम्मेदारी के साथ उपस्थित होगें कि अक्सर वो प्रश्न वो ब्लॉग किस तरीके से चर्चा आए । किस तरीके से उपस्थित हुए मीडिया के माध्यम से जैसे एक विडियो आया था ‘माय च्वाइस’, तो एक तरफ मेरा इस विडियो के पक्ष एवं विपक्ष की बात नहीं कहनी मेरा पक्ष या संदर्भ इतना मात्र सीमित है कि स्त्री के अधिकारों और जेंडर-संवेदनशीलता के शब्द सह-वकालत करने वाले हम सब और मीडिया जगत को यह बात सोचनी पड़ेगी कि अगर माय च्वाइस का प्रश्न है तो उसमें इतना विचलन और विवाद की स्थितियां क्यों है? विचार करना पड़ेगा दोहरी मानसिकताओं से ग्रस्त स्त्री घर के फ्रंट पे भी उतना जूझती है और बाहर भी । अगर कोई स्त्री अपना सर्वश्रेष्ठ घर और बाहर जगत दोनों में देना चाहती है तो उसके अवदान को उसकी भूमिकाओं को उस तरीके से प्रस्तुत करने में मीडिया की भी एक बड़ी गंभीर भूमिका होती है । आप याद करें मैंने सबसे पहले शुरुआत कहाँ से की थी कि मेरे पूर्व विभाग को बचाने में मीडिया और पुलिस की गंभीर भूमिका थी । प्रबल जनमत साथ खड़ा हुआ तो अगर आज स्त्री मुद्दों के साथ मीडिया की संपादकीय और उनके श्लोगन जनांदोलन बनके प्रस्तुत होगें । तो समाज में बहुत फर्क पड़ेगा समाज में संवेदनशीलता बहुत बढ़ेगी ।

          कोई भी स्त्री न देवी तौर पे प्रस्तुत होना चाहती है न दासी के तौर पर, हर स्त्री चाहती है उसको मानवीय तौर पर एक इंसान के तौर पर एक ह्यूमन बीइंग के तौर पे देखा और समझा जाए । उसे उसी तौर पर प्रस्तुत कर दिया जाए । सौ अच्छे कामों को करने के बावजूद अगर एक कोई कार्य गलत काम हो जाए तो एकदम दौड़ भाग नहीं मच जानी चाहिए कि कुछ गलत काम तत्कालिकता का शिकार हो की सनसनी खोज बना दिया जाए । यह भी देखे जाए उस व्यक्ति का चाहे स्त्री हो या पुरुष । चूंकि महिला मुद्दों की ज्यादा बात है तो मैं महिलाओं की ज्यादा बात कह रही हूँ कि उसकी भूमिका, उसकी सामाजिक दृष्टि, उसकी सामाजिक व्यापकता और दायित्वबोध किस स्तर का है नाकि बिना जाने पूंछे सिर्फ एक ये सामने वाले की कोई एक छोटी चीज मिल रही है क्या? किस तरीके से मिल रहा है सामने वाले को देखा जाए और अचानक से आक्रमण कर दिया जाए । यह मीडिया के दायित्वबोध में नहीं है चूंकि स्त्रियाँ परिवार में चाहे वो एक परिवार में चाहे वो एक गृहणी के तौर पे उनके आर्थिक श्रम का मूल्यांकन हो रहा हो या न हो रहा हो अगर मीडिया उनका मूल्याकंन करेगा तो सामाज की दृष्टि में परिवर्तन आएगा । और जो बाह्य जगत में बैठी हुई स्त्रियाँ है तमाम मीडिया हाउसेस में हैं या अन्य पुलिस प्रशासन या अकादमिक हर जगत में बैठे अपने सर्वश्रेष्ठ दायित्वों को दे रही है । तो आप तय मानिए कि जितने मुद्दों को मैंने कहा स्वयं भी वो निजी स्तर पर उन मुद्दों से जूझ रही है कार्य-स्थल पर यौन-प्रताड़ना से कौन इंकार कर सकता है? तभी तो ये सब समितियां बनी । लेकिन कार्य-स्थल पर जो चीजें कमजोर है उसको कितनी संवेदनशीलता के साथ उठाया जा सकता है । यह भी एक प्रश्न उठ खड़ा होता है । जो लोग इन चीजों को उठाते हैं उनके प्रति उन सस्थानों की नेगेटिव भूमिका हो जाती है । तो अगर उसमें कहीं मीडिया की भी नेगेटिव भूमिका हो गई तो कितना मुश्किल होगा और हम कितना गलत समझें जाएंगे । इन तमाम स्त्री प्रश्नों में जब रेप और गैंगरेप की बात आती है क्या कोई घटना है? आज तक की जो न्याय-व्यवस्था जो दंड-व्यवस्था बना रहे हैं उसमें भी दंड मिलता है । अपराधियों को उसमें भी कितना समय लगता है वो अलग बात है । लेकिन न्याय उस लड़की को न्याय मिला क्या? समाज ने उसको उसी तौर पर स्वीकार किया क्या? तमाम विषय है आम जनता के कितने है ये बात छोड़ी जाए । लेकिन समाज के बहुत मजबूत स्तम्भ जिस पर हम लोग आँख बंद करके विश्वास करते हैं कहीं न कहीं किसी स्त्री के बारे में कोई खबर लिखने के पूर्व मीडिया हाऊसेस को चार बार और विचार-विमर्श और पड़ताल कर लेनी चाहिए । क्योंकि किसी स्त्री की बिगड़ती हुई सामाजिक छवि उसको कितना क्षति पहुँचा सकती है । इसकी तुलना आप पुरुषों से नहीं कर सकते क्योंकि स्त्रियों को देखने के प्रति समाज कि दृष्टि अभी दोहरी है ।

          हम उनको बड़े आदर्श स्वरूप में देखना चाहते हैं लेकिन अगर कोई इंसान है । दस काम करता है तो उससे एक गलती की संभावना है । आप उसके साथ में खड़े होते है या उसके विपक्ष में खड़े होते हैं । उनके मुद्दों को कानूनी साक्षरता, कानूनी राइट्स, ह्यूमन राइट्स, मानवीय मूल्य के साथ पेश करते हैं । अथवा ये सोच के बस प्रस्तुत करते है कि नहीं आज यह खबर आई और आज ये खबर शाम तक अख़बार में शाम तक चली जानी चाहिए क्योंकि हमें अपने सामने वाले ने दिया है । इस पर जरुर विचार करना चाहिए । किसी की जिंदगी की खबर हो सकती है क्या? किसी के प्रतिष्ठा की खबर हो सकती है क्या? मीडिया को खबर चाहिए निश्चित चाहिए । लेकिन उसका स्त्री मुद्दों के साथ बहुत ज्यादा संजीदगी के साथ प्रस्तुतीकरण व विवेचन होना चाहिए । जो हमारी महिला मित्र मीडिया हाऊसेस में अपना सर्वश्रेष्ठ योगदान दे रही है । मेरा उनसे भी विनम्र अनुरोध है कि जो शुरुआत कर रही है । हमारे साथ कि छोटी-छोटी लड़कियां जो महिला अधिकार उनके हाथों को मजबूती से पकड़े रहे हैं । एक बार का पकड़ा हुआ आपका हाथ इतना आत्मविश्वास पैदा करेगा कि वो समाज के लिए बहुत उत्कृष्ठ कर सकती है । मीडिया के बारे में मुझे कहीं न कहीं लगता है एक ऐसा सामाजिक रेगुलेटिव प्रावधान होना चाहिए । जो उनको उनका उत्कृष्ठ करने के लिए दिशानिर्देश दे सकें । मैं मानती हूँ मीडिया के कारण बहुत सारी चीजें सुलझी हैं । लेकिन सारी चीजों में मीडिया उत्कृष्ठ तौर पर प्रस्तुत हो इसलिए मीडिया की अंदरूनी जो समस्याएं हैं । उनका भी निराकरण जरुरी है । स्त्री मुद्दों के प्रति समाज संवेदनशीलता भी जरुरी है क्योंकि मीडिया हाऊसेस में बैठे हुए । वे लोग समाज के ही व्यक्ति हैं । परिवार से गए वो व्यक्ति हैं जो अपने लिए विशेष दृष्टिकोण लेकर वहाँ जाते हैं । लेकिन पत्रकारिता जगत में होने के कारण उनके दायित्वबोध अलग हो जाते हैं । तो अगर हम सब मिलके कोशिश करेंगे तो मुझे लगता है कि हर कोई यह कह सकेगा कि किसी एक विभाग को बचाने में, किसी एक व्यक्ति की छवि को उभारने में मीडिया की बड़ी सशक्त भूमिका रही है और यही स्त्री मुद्दों के लिए मीडिया का दायित्वबोध भी है । और यही अपेक्षा भी है मेरे से जुड़े हुए कुछ प्रश्न अगर आपके पास आते हैं । तो कृपया आप अपने कुलपति जी को दे दें । वो मुझे ईमेल कर देगें मैं समस्त प्रश्नों के उत्तर अपनी समझबूझ के साथ आपको भेज दूंगी ।

बहुत-बहुत नमस्कार, बहुत-बहुत धन्यवाद!

प्रस्तुति और लिप्यन्तरण –

रजनीश कुमार अम्बेडकर

पी-एच.डी. शोध छात्र, स्त्री अध्ययन विभाग

महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा, महाराष्ट्र, भारत

Mob. 8421966265

Email: rajneesh228@gmail.com

 

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