मीडिया में स्त्री उपभोक्ता और उपभोग

सुभाष कुमार गौतम

भूमंडलीकरण के बाद स्त्री आर्थिक रूप से सम्पन्न हुई है। बाज़ार ने उसके लिए अनेक अवसर उपलब्ध कराए हैं। आज स्त्री हर क्षेत्र में अपने कौशल का परचम लहरा रही है। जोसेफ ई. स्टिगलिट्स ने लिखा है, ‘‘स्त्री श्रम पर निर्भर बाज़ार स्त्री के वस्तुकरण और जींस की भांति उसके उपयोग से नहीं हिचकिचाता है। टी.वी. चैनलों पर दो प्रमुख
धारावाहिक देखने को मिलते हैं। एक करिश्मा जो ‘वुमेन आॅफ सन्सटेंस’ है अर्थात औरत की दृढ़ता और उसके श्रम का प्रतीक और दूसरा जस्सी जैसी कोई नहीं जो सब्स्टेंस यानी कार्य जगत के दांव-पेंच सीख रही है।’’ इस प्रकार की स्त्री छवि टी.वी. और समाचार माध्यमों द्वारा दिखाकर एक तरफ तो इसमें भारतीय स्त्री की छवि पेश करता है और उसके माध्यम से एक बाज़ार का निर्माण करता है। प्रभा खेतान लिखती हैं, ‘‘उपभोक्तावादी संस्कृति के दौर में एक ओर यदि स्त्री की स्थिति मज़बूत हुई है तो दूसरी ओर वह कमजोर भी हुई है। यदि एक ओर उसे धन कमाने के नए अवसर मिले, तो दूसरी ओर पारंपरिक उद्योग के बंद होने पर पुरूषों से पहले निकाला भी गया। एक ओर वह सीधे बाज़ार से बातचीत कर रही है, विज्ञापन की दुनिया में माॅडल के रूप में उभरी है, सेक्स श्रमिक के रूप में अपनी पहचान मांगती है और उसको यह पहचान बहुतेरे देशों में मिली भी है, तो दूसरी ओर व्यवस्था उसे जींस की भांति खरीदने-बेचने या उसका उपयोग करने में पीछे नहीं रहती।’’ भूमंडलीकरण के पश्चात् स्त्री की जिस छवि को बाज़ार मीडिया के माध्यम से दिखाता है उससे भी स्त्री की छवि प्रभावित हुई है। इस बाज़ारवादी दौर में शहरी स्त्रियां एक तरफ जहां मज़बूत हुई हंै वहीं ग्रामीण स्त्रियों की हालत बहुत खस्ता है। आज गांवों में चलने वाली योजना मनरेगा में सबसे अधिक पुरुष लाभान्वित हो रहे हैं। स्त्रियों की संख्या बहुत कम है। गांव में तकनीकी विकास से सबसे अधिक स्त्री ही प्रभावित है।

प्रभा खेतान के शब्दों में, ‘‘उपभोक्ता संस्कृति संपूर्ण रूप से क्षण-भंगुरता, खंड-खंड में बिखराव, विच्छिन्नता और असंगतता को स्वीकारती है। यह न तो इनसे परे जाने की कोशिश करता है न इनकी प्रतिक्रिया में शाश्वत को प्रस्तुत करने की कोई चेष्टा। औरत इसलिए खुश है क्योंकि यह भूमंडलीय बाज़ार औरत को पुरुषवादी व्यवस्था द्वारा प्रदत्त आदरणीय स्त्री के रूप में गढ़ने की चेष्टा नहीं कर हित में बोलता हुआ नज़र आता है और उसके आर्थिक अधिकारों के लिए सक्रियता पर जोर डालता है। समस्या तो यह है कि भूमंडलीय दृष्टिकोण के अनुसार किसी अंतरराष्ट्रीय स्त्री संगठन का सही ढांचा कैसे नियोजित किया जाए, इसकी चर्चा नहीं होती है। बल्कि किसी विशिष्ट स्त्री की ज़रूरत के संदर्भ में विशिष्ट उपायों को ही खोजने का प्रयास किया जाता है। चूंकि समकालीन श्रमिक व्यवस्था दिन पर दिन और अधिक लचीली होती जा रही है, अतः स्त्री को अवसर तो मिलते हैं किंतु व्यवस्था के भीतर अपने पैरों को वह जमाए रख पाएगी या नहीं, इस पर ज़रूर संदेह है। क्योंकि स्त्री के वैचारिक संसाधन कमज़ोर हैं। आंदोलन की परंपरा उसके पास नहीं है। अपने इतिहास का उसे ज्ञान नहीं है। वह तो पुरुष द्वारा प्रदत्त ज्ञान व्यवस्था में जीने की अभ्यस्त है। यह तो आने वाला व़क्त बताएगा कि इस आंधी में वह अपना संतुलन रख पाएगी या नहीं।’’ इस प्रकार लेखिका ने भूमंडलीकरण के उस चरित्र की तरफ इशारा किया है। जो हमें दिखाई नहीं देता। इस दोहरे भूमंडलीकरण के चरित्र में स्त्री संतुलन बनाए रखने की बात करती है। स्त्री अपने को कैसे स्थापित कर पाएगी यह भी एक महत्त्वपूर्ण मुद्दा है। प्रभा खेतान आगे लिखती हंै, ‘‘भूमंडलीकरण के संदर्भ में सवाल उठता है कि स्त्री भी बाज़ार का संचालन करने में समर्थ होगी? क्या वह बाज़ार को अपने हित में नियोजित कर पाएगी? क्योंकि आर्थिक अधिकारों के संदर्भ में किसी महाआख्यान के प्रति स्त्री के मन में संदेह और अनास्था है, मुख्यधारा के आत्मसातीकरण का दबाव अपने अनुभूत जगत में महसूस करते हुए वह सामंजस्य नहीं खोज पा रही है। स्वाभाविक है कि वह स्थानीय योजनाओं में सीमित रहना चाहेगी।’’ आज स्त्री को किसी तरह का मानवीय अधिकार प्राप्त नहीं हुआ है। बाज़ार स्त्री से है न कि स्त्री के लिए बाज़ार है। आज भी स्त्री चाह कर भी बाज़ार का संचालन नहीं कर पा रही है और न ही बाज़ार उसके हित में। बाज़ार के उत्पाद आये दिन स्त्री को कमज़ोर और नाजुक बना रहे हैं। उनके परिधान से लेकर जेवर तक स्त्री की मज़बूती में रुकावट डालते हैं। सीएसडीएस के संपादक अभय कुमार दुबे भूमंडलीकरण में नारी मुक्ति को पितृसत्ता के नए रूप में देखते हैं ‘‘नब्बे का दशक शुरू होने से ठीक पहले नारीवादी सिंथिया एनलों ने भूमंडलीकरण के समर्थकों से पूछा था कि तुम्हारी व्यवस्था में औरतें कहां हैं? अंतरराष्ट्रीय वित्तीय पूंजी के अलमबरदारों ने इस छोटे-से सवाल का लंबा जवाब दिया। उन्होंने तरह-तरह से कहा कि औरतें राजनीति में हैं और स्त्री-समर्थक राजनेताओं को वोट देने की तैयारी कर रही हैं। इसके अलावा वे निर्यात कर रही हैं। नयी विश्व अर्थव्यवस्था ने उन्हें सबसे ज़्यादा रोज़गार दिया है। साथ ही वे फ़िल्मों में, माॅडलिंग में, टी.वी. सीरियलों में, पाॅप संगीत में, विज्ञापनों में और सौंदर्य प्रतियोगिताओं में छायी हुई हैं। वे धीरे-धीरे शासन में ऊंचे पदों पर पहुंचती जा रही हैं और बहुराष्ट्रीय निगमों के बीच उनकी प्रबंधन क्षमता का इस्तेमाल करने की होड़ मची हुई है।’’ स्त्रियों ने हर क्षेत्र में प्रगति की है लेकिन सच्चाई यह भी है कि एक सीमित वर्ग ही इस प्रगति से लाभान्वित हुए हैं। इस तरह इन सारी प्रक्रिया में मुख्य रूप से बाज़ार ही प्रमुख है। जो बाज़ार में बिकता है वही बाज़ार में टिकता भी है। आगे लिखते हंै कि ‘‘यह भूमंडलीकरण का युग था। औरत के लिए इस युग की खास बात यह थी कि इसकी आधारभूत विचारधारा में लैंगिक टकराव के लिए कोई प्रावधान नहीं था। बाज़ार की संरचना लैंगिक तटस्थता के आस-पास बतायी जा रही थी। नारीवादियों की बौद्धिक गति अंतरराष्ट्रीय संबंधों और आर्थिक विज्ञान के क्षेत्र में न के बराबर थी। यह कहना ठीक होगा कि इन दोनों सर्वाधिक मर्दवादी अनुशासनों में उनका बकायदा प्रवेश ही नहीं था। अर्थशास्त्र को ‘जेंडर’ की दृष्टि से व्याख्यायित करने की बहस जरूर शुरू हो गई थी। लेकिन इस समाज-विज्ञान की मुख्यधारा में नारीवादियों को प्रारंभिक मान्यता भी प्राप्त नहीं हो सकती थी।’’

उपर्युक्त कथन में यह दर्शाया गया है कि स्त्रियों को सामाजिक स्तर पर अभी स्वीकृति नहीं मिल पाई है। अगर उन्हें आज़ादी मिली है तो वह आर्थिक कारण है। स्त्रियां जैसे-जैसे आर्थिक रूप से मज़बूत हुई है उसे बाज़ार ने अपने आगोश में लेना शुरू कर दिया था। अमित सिंह ने लिखा है, ‘‘नवभारत के एक सर्वे के अनुसार, भारत में 95 प्रतिशत महिलाओं को अपना शरीर बेडौल लगता है। आत्मा की अमरता की चर्चा करने वाले भारत जैसे देश में शरीर केंद्रित यह चिंतन निःसंदेह ही चिंता पैदा करता है। दरअसल, मुक्त मंडी की उपभोक्ता संस्कृति ने जो ग्लोबल गांव बनाया है, वह अपने संस्कार एवं चरित्र में तीसरी दुनिया के पिछड़े से पिछड़े गांवों से भी गया-गुजरा है, क्योंकि यह विशुद्ध सामंती सोच से संचालित है। इस कथित ग्लोबल गांव में पुरुष और स्त्री दोनों के दिमाग में कूट-कूटकर यह भर दिया जाता है कि स्त्री केवल भोग्या है।’’ स्त्रियों को बाज़ार अपना उपभोक्ता बनाने के लिए संचार माध्यमों के द्वारा उनके मन में सौन्दर्य और काया को लेकर एक तरह की हीनभावना पैदा करता है। जैसे अगर आप महंगे शैम्पो नहीं लगाती तो आप बाल खुले नहीं रख सकते, वे आवारगी नहीं कर सकते। अगर आप क्रीम नहीं लगाती तो आपको कोई लड़का पसंद नहीं करेगा। अगर आप मैरी गोल्ड का बिस्कुट नहीं खाती तो आप स्लिम नहीं हो सकतीं आदि। इस प्रकार विज्ञापन मनोविज्ञान के माध्यम से स्त्रियों को अपना शिकार बनाता है। इन सब में संचार माध्यमों की अहम भूमिका होती है। रमिता गुरव ने ‘मीडिया और स्त्री’ के विषय में लिखा है, ‘‘1991 से पहले हमारे देश में मीडिया का कोई अस्तित्व नहीं था। प्रिंट मीडिया के साथ रेडियो, सिनेमा का अपना प्रभाव सामाजिक जीवन में बखूबी देखा जा सकता था, परंतु निजी कम्पनियों द्वारा संचालित सैटलाइट टेलीविजन के आगमन के साथ घर बैठे 24 घंटे सूचना और मनोरंजन उंगली के इशारे पर उपलब्ध होने लगा। घर बैठे रेडियो पर भी ये सब मिल जाता था, परन्तु दृश्य-श्रव्य रूप में मौजूद इस इलेक्ट्राॅनिक अनुभव के आकर्षण ने सबको बांधकर रख दिया। विशेषतः घर में रहकर समय बिताने वालों के लिए यह एक अच्छा मनोरंजन का साधन सिद्ध होने लगा। यह मानकर कि अधिकतर घर में स्त्रियां होती हैं, उन्हें टारगेट करते हुए फिर ऐसे धारावाहिकों की बाढ़ आने लगी, जहां केंद्रीय भूमिका में स्त्री होती थी। यह सिलसिला आज भी जारी है, परंतु अतिरंजित ढंग से प्रस्तुत इन धारावाहिकों में स्त्री की जो छवि प्रस्तुत होती है, उसका यथार्थ आम स्त्री-जीवन के यथार्थ से कोसों दूर होता है।’’ रमिता गुरव की बातों पर गौर करें तो हम पाते हैं कि 1990 के बाद हमारे घरों में जो विचार संचार माध्यमों की नाव पर सवार होकर आए वे मनोरंजन कम उपभोक्ता ज़्यादा तैयार किए। इस संबंध में देशबंधु समाचारपत्र के संपादक ललित सुरजन का कहना है, ‘‘भारत ही नहीं विश्व में कोई भी देश, समाज ऐसा नहीं है जो स्त्री को खुले मन से बराबरी का दर्जा देता हो जिसमें उसे उपभोग न माना जाता हो। आधुनिक मीडिया ने इस दुरागृह को मज़बूत करने का काम किया है। यह बात सिर्फ विज्ञापनों में प्रस्तुत स्त्री की नहीं है बल्कि हर कदम पर मीडिया ऐसा कोई मौका नहीं छोड़ता जिसमें स्त्री को दोयम दर्जे की छवि के रूप में पेश किया जाता हो। सच तो यह है कि औरत की गिनती भी हमें हाशिए के समाज में करनी चाहिए। शायद फर्क इस बात का है कि अपेक्षाकृत सुविधा संपन्न समाज की औरतें जाने-अनजाने में खुद ही उस पारंपरिक परिभाषा में ढल जाती हंै।’’

भूमंडलीकरण के बाद स्त्रियों में दो तरह का वर्ग बना एक तो वे स्त्रियां जिन पर बहस होती है, पत्र-पत्रिकाओं में लिखा जा रहा है। दूसरी वे स्त्रियां भी जिन पर कोई चर्चा या बहस, विमर्श नहीं होता। उनको आज भी हाशिए पर रहने के लिए छोड़ दिया गया है। यह इसलिए हुआ क्योंकि वे स्त्रियां कंज़्यूमर/उपभोक्ता नहीं है इसलिए जिन स्त्रियों की बात होती है वे शुद्ध रूप से कंज़्यूटर हैं। इसलिए उन पर बहस, विमर्श होता है। जिस कारण हाशिए के समाज की स्त्रियों पर अमानवीय हिंसा लगातार बढ़ रही है। साथ ही स्त्रियों का एक वर्ग ऐसा है जिसे उपभोक्ता बनाने के लिए बाज़ार तरह-तरह के प्रयास कर रहा है। उपभोक्ता बाज़ार के संदर्भ में प्रभा खेतान का कहना है, ‘‘विक्रेता तरह-तरह के लुभावन विज्ञापन, नारे और उपहार, भावनात्मक अपील आदि के जरिए स्त्री उपभोक्ताओं को फुसलाने की चेष्टा करते हैं। बाज़ारीकरण की पूरी नीति ही बहलाने-फुसलाने पर आधारित है। इसका प्रमुख टार्गेट स्त्री वर्ग है। बाज़ार के ये कुछ ऐसे क्षेत्र हैं जहां सूक्ष्म स्तर पर या फिर बहुधा क्रूर तरीके से स्त्री के प्रति हिंसा जारी रहती है। मगर इस हिंसा की सूचना किसी को नहीं है। इस हिंसा को न तो आंकड़ों में प्रस्तुत करना संभव है और न ही इसका वर्गीकरण संभव है, किंतु इससे उपभोक्ता स्त्री के अधिकारों का हनन जरूर होता है। यदि बाज़ार की नैतिकता का सही रूप में विश्लेषण किया जाए तो पाएंगे कि लैंगिक संदर्भ में यह स्त्री को अधीनस्थ स्थिति में ही रखना पसंद करता है। उपभोक्तावाद का विवाहित जीवन स्तर पर भी असर पड़ा है। और कुछ ऐसी गलत सामाजिक प्रथाएं हैं, मसलन-दहेज प्रथा आदि जो बाज़ार के कारण प्रोत्साहित होती हैं।’’ बाज़ारीकरण के चपेट में स्त्री सबसे पहले आ जाती है। रोजमर्रा के हर सामान को बेचने के लिए विज्ञापन में स्त्री का सहारा लेकर स्त्री को टार्गेट किया जाता है। बाज़ार और उपभोक्ता के बीच हमेशा स्त्री होती है। समाचारपत्रों के पृष्ठों पर डियोड्रेंट के विज्ञापन में भी स्त्रियों को कामुक दिखाकर पुरूषों को बाॅडी परफ्यूम बेचा जाता है। इस तरह से आज स्त्री पूरी तरह से उपभोग और उपभोक्ता की चक्की में पिस रही है। आज बाज़ार स्त्री को उपभोग और उपभोक्ता के खांचे में देखता है। विज्ञापन की मुख्य पात्र स्त्री को बनाया जाता है। मीडिया भी स्त्री छवि को उपभोक्तावाद की संस्कृति के लिए सही ठहरा रहा है और दिनोदिन बाज़ार का वर्चस्व बढ़ रहा है।

संदर्भ-
1-श्रीवास्तव, आलोक, अख़बरानामाः पत्रकारिता का साम्राज्यवादी चेहरा, संवाद प्रकाशन, मेरठ
2-जेफ्री, राॅबिन, भारत की समाचारपत्र क्रांति, भारतीय जनसंचार संस्थान, नई दिल्ली
3-नैनन, सेवंती, हेडलाइन्स फ्राम द हार्टलैंड, सेज प्रकाशन, नई दिल्ली
4-चमडिया, अनिल (ले.) भारतीय मीडिया में दलित आदिवासी प्रतिनिधित्व, चमडिया अनिल (सं.), जन मीडिया, अप्रैल, 2013
5-स्टिगलिट्स जोसेफ ई, ग्लोबलाइजेशन एण्ड इट्स डिसकन्टेन्टस, पेंगिविग बुक्स प्रकाशन, नई दिल्ली
6-खेतान, प्रभा (ले.), स्त्री और वैश्वीकरण, वैश्वीकरण के दौर में, जोशी रामशरण (सं.), समयांतर प्रकाशन, नई दिल्ली
7-दुबे, अभय कुमार (सं.) भारत का भूमंडलीकरण, वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली
8-सिंह, अमित कुमार, भूमंडलीकरण और भारत, परिदृश्य और विकल्प, सामयिक प्रकाशन, नई दिल्ली
9-गुरव, रमिता (ले.), मीडिया और स्त्री, पांडे आलोक (सं.), संवेद, मार्च 2011,
10-खेतान, प्रभा, भूमंडलीकरणः ब्रांड संस्कृति और राष्ट्र, सामयिक प्रकाशन, नई दिल्ली

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