अनुपम सिंह

वज़ीर खानम एक औरत,एक मुहब्बत,एक मज़बूती,एक स्वाभिमान,एक फूल,एक पैगाम का नाम है।  

उनकी संक्षिप्त कहानी आपके सामने है-
वज़ीर खानम चौदह, पंद्रह की उम्र में मार्स्टन ब्लेक (अंग्रेज) के प्रेम में पड़कर माँ-बाप के खफ़ा होने पर भी देहली से जयपुर चली गईं। और बिना निकाह के ही वज़ीर को दो बच्चे एक बेटा, एक बेटी हुई। लेकिन किस्मत ने बहुत ही कम समय में वज़ीर और ब्लेक को अलग कर दिया। ब्लेक भारतीय उपद्रवियों (अंग्रेजों के शब्दों में ) द्वारा मौत के घाट उतार दिए गए। और वज़ीर को अपने दोनों बच्चों (जिसे ब्लेक के भाई-बहन ने वज़ीर को नहीं दिया )को छोड़  जयपुर से देहली वापस आना पड़ा। अपने स्वाभिमान की ख़ातिर वज़ीर देहली आ तो गयीं लेकिन वापिस अपने पिता के घर नहीं गयीं। दो बच्चों की माँ, विधवा वज़ीर तब कुल 19 साल चंद दिनों की थीं।

वज़ीर जब देहली लौटीं तब तक उनके खूबसूरती की चर्चा देहली के राजघरानों, शायरों और सामान्य लोंगो के बीच फैल चुकी थी।

अपनी चाल से बिलियम फ्रेजर ने वज़ीर को अपनी एक पार्टी में आमंत्रित किया। जिसमें मिर्ज़ा नौशा (ग़ालिब)भी थे। जहाँ उनकी मुलाक़ात नवाब शम्सुद्दीन अहमद खाँ बहादुर से हुई। जिसकी ‘खूबसूरत रौबदार शख्शियत शिष्ट लबो लहजा’ देख फिर से प्रेम के सूत्र में बंध गयीं वज़ीर। जिसकी पहल खुद नवाब शम्सुद्दीन अहमद खाँ ने की थी।

जल्दी ही बिलियम फ़्रेजर को अपनी चाल पर पानी फिरता नज़र आया और वह सारी पर्देदारी,तहज़ीब भूल  बत्तमीजी पर उतर आया। तब वज़ीर खानम ने नवाब शम्सुद्दीन अहमद खां के प्रेम और सरपरस्ती में खुद को महफ़ूज पाया। और अपने तीसरे बच्चे नवाब मिर्जा (जो बाद में दाग़ देहलवी कहलाये) को जन्म दिया।

बिलियम फ़्रेजर ने सिर्फ वज़ीर खानम से ही बेअदबी नहीं की बल्कि अपनी अंग्रेजी हुकूमत के मद से चूर होकर नवाब शम्सुद्दीन अहमद खां से भी बत्तमीजी की। उनकी बहनों पर व्यंग कर कीचड़ उछाला। जिसे नवाब बर्दाश्त नहीं कर सके। और एक दिन फ़्रेजर मौत के घाट उतार दिया गया। जिसका बदला साइमन फ़्रेजर ने नवाब को फांसी दिलवाकर पूरा किया। उस समय नवाब बत्तीस बरस के थे। और इक्कीस, बाइस बरस की वज़ीर खानम दुबारा से अपना प्रेम खो चुकी थीं।  सुरक्षा का घेरा टूट चुका था । सरपरस्ती का साया उठ चुका था।

दो ख़ुद से दूर बच्चों का वियोग! दो प्रेमियों की मौत का तोड़ने वाला वियोग! सिर्फ नवाब मिर्ज़ा को ही देख जीने का हौसला बटोर रही थीं वज़ीर खानम।

लेकिन जिंदगी यहीं नहीं रुकी। कुछ महीनों बाद ही वज़ीर के लिए फिर से मोहब्बत का पैगाम आया । वज़ीर को शंका थी कि यह मोहब्बत नहीं मतलब है। “मोहब्बत भी एक तरह का मतलब है”।  (उम्दा खानम-वज़ीर की मझली बहन)

वज़ीर की उलझन सुलझने का नाम नहीं ले रही ।बेटा नवाब मिर्ज़ा बड़े हो रहे थे। नवाब शम्सुद्दीन अहमद की याद ‘चिराग़े-लौह’ की तरह रोशन थी। ब्लेक  साहब और  बच्चे वज़ीर से छीन लिए गए थे।’अल्लाह मैं उन बच्चों को किस तरह पालती-पोषती? पराए बच्चों को सब टेढ़ी आँख देखते हैं। पराई बीबी सबको भाती है’। उलझनों की बाड़ खिंच गयी थी।और ज़िंदगी फ़रेब कर रही थी। कि मिर्ज़ा आगा तुराब अली की सौगात वज़ीर के दरवाज़े पहुंच गई।

जिंदगी ने फिर से रुख़ बदला और वज़ीर का निकाह मिर्ज़ा आगा तुराब अली से हो गया। अब वज़ीर खानम ‘वज़ीर बेगम’ हो गईं। शेरो-शायरी कहते-लिखते जिंदगी गुज़र रही थी कि वज़ीर को चौथी संतान हुई जिसका नाम शाह मुहम्मद आगा मिर्ज़ा पड़ा। लेकिन जल्दी ही किस्मत ने फिर से पाशा पलटा। वज़ीर से फिर सब कुछ छिन गया। आगा मिर्ज़ा तुराब अली हाथियों और घोड़ो की खरीद के लिए सोनपुर (बिहार) गए थे। लौटते समय ठगी का शिकार हुए और मार दिए गए। सास और ननद के तानों ने वज़ीर को हबेली छोड़ने के लिए मजबूर कर दिया लेकिन वज़ीर ने शाह मुहम्मद आगा मिर्ज़ा को तमाम शर्तों के साथ अपने साथ ही रखा।

वैसे तो वज़ीर खानम का अभी पूरा जीवन ही बाक़ी है। लेकिन उसका एक अहम हिस्सा और भी है। वज़ीर अपने दो बच्चों के साथ अपना वैधब्य काट ही  रही थीं। उनके बेटे नवाब मिर्ज़ा (दाग देहलवी) की ख्याति शायरी की दुनिया में बढ़ रही थी।  खानम की बहनें और नवाब मिर्ज़ा भी चाहते थे कि उनकी माँ जो अभी एक जवान औरत हैं, खुश रहें। चाहें तो किसी से फिर से मोहब्बत कर लें, निकाह कर लें। लेकिन सही व्यक्ति कौन है जो उनकी माँ की देह का नहीं, मोहब्बत का तलबगार हो।

इसी बीच नवाब शम्सुद्दीन अहमद खां के छोटे भाई ज़ियाउद्दीन अहमद ख़ान (शम्सुद्दीन जियाउद्दीन में मिल्कियत को लेकर झगड़ा था। जियाउद्दीन ने अंग्रेजों से मुखबिरी की थी) की नज़र भी वज़ीर पर पड़ी। लेकिन वज़ीर ने साफ़ कर दिया कि इस बाग का फल उनके लिए नहीं है। लेकिन जियाउद्दीन को यह बात खटकती थी कि कोई औरत चुनाव और पसंद के सवालों से सरोकार रखे। तल्ख बातों से जल्द ही उठकर चलते बने जियाउद्दीन। लेकिन मुलाक़ात के बेफ़ायदा रहने का असर बना रहा उन पर।

वज़ीर के लिए जो चौथा पैगाम आया वह मुग़ल बादशाह बहादुर शाह ज़फर, नवाब जीनत महल के छोटे बेटे मिर्ज़ा फ़तहुलमुल्क बहादुर (मिर्ज़ा फ़खरू) का था। रिश्ते का पैगाम उनकी बड़ी बहन अकबरी खानम लायी थीं। वैसे वज़ीर अपने बच्चों के लिए ही अधिक चिंतित थीं। खासकर नवाब मिर्ज़ा जो बड़े गए थे। वज़ीर कहने लगीं की अब तो बेटे की उमर है निकाह करने की, अब मैं खसम न करूँगी। अपने बच्चों को अपने से दूर कर महल में दुल्हन बन न रहूंगी। बड़ी बहन ने खूब समझाया। वज़ीर ने नवाब मिर्ज़ा से भी सलाह ली। नवाब मिर्ज़ा तो हमेशा से माँ की खुशी चाहते थे। उन्हें किसी कीमत पर कोई एतराज न था रिश्ते से। खूब सोच -समझकर वज़ीर ने अपनी शर्तों के साथ रिश्ते के लिए हाँ कह दिया। साल बीतते-बीतते वज़ीर ने बेटे मिर्ज़ा खुर्शीद आलम को जन्म दिया। जिसे प्यार से खुर्शीद मिर्ज़ा बुलाया गया। वज़ीर को लगा जो कुछ उससे छीना गया था वह इस दौलत के आगे तुच्छ है जो अब उसे हासिल है। वज़ीर को लगा अब अच्छे दिन-रात यूं ही रहेंगे।

लेकिन एक दिन शोर उठा कि ज़िल्ले-इलाही का मिज़ाज़ नासाज़ है। और फिर से वज़ीर का चमन उजड़ गया । वे एक बार फिर से साजिशन महल से अपने तीनों बच्चों समेत बाहर कर दी गयीं।
वज़ीर का  कथन-“नींद तो सूली पर भी आ जाती है”।

                                ।। वज़ीर खानम बनाम आज की औरत।।

वज़ीर खानम को अलग-अलग दृष्टिकोण से देखने पर जिंदगी के अलग-अलग रंग दिखाई देते हैं। अलग मायने दिखाई देते हैं। जिससे अलग-अलग निष्कर्षों पर पहुंचा जा सकता है।

वज़ीर खानम की जिंदगी पर आप यहां से अफसोस ज़ाहिर कर सकते हैं कि कुल तैंतीस, चौंतीस की उम्र में चार बार विधवा होने वाली औरत हैं वज़ीर खानम। जिनके कुल चार पतियों और प्रेमियों से पांच बच्चे पैदा हुए।

लेकिन यह भी कह सकते है कि चार बार किस्मत द्वारा जिंदगी की लकीर काटने के बाद भी वज़ीर खानम प्रेम में पड़ जाने और जिंदगी बसाने वाली औरत थीं।  जिंदगी पर प्रतिबंध कभी नहीं लगाया वज़ीर खानम ने।

वज़ीर खानम बचपन में कैसे सोचती थीं ,उसकी एक बानगी यह भी है -“सुनिए ,मैं शादी-वादी नहीं करूंगी। वज़ीर ने समझाने वाले लहजे में कहा। क्यों? क्यों नहीं करोगी शादी? और न करोगी तो क्या करोगी? लड़कियां इसलिए तो होती हैं कि शादी-ब्याह हो घर बसे … बच्चे पैदा करें। शौहर और सास की जूतियाँ खाएं। चूल्हे चक्की में जल-पिसकर वक्त से पहले बूढ़ी हो जाएँ , वज़ीर ने मखौल उड़ाने के अंदाज में कहा”।

वज़ीर कहती हैं – “मैं नहीं बनती किसी की पुतला-पुतली। मेरी सूरत अच्छी है, मेरा ज़हन तेज है, मेरे हाथ-पाँव सही हैं। मैं किसी मर्द से कम हूँ? जिस अल्लाह ने मुझमें ये सारी बातें जमा कीं उसको कब गवारा होगा कि मैं अपनी काबिलियत से कुछ काम न लूँ? बस चुपचाप मर्दों की हवस पर भेंट चढ़ जाऊँ?”

वज़ीर खानम हर बार अपने बच्चों को पालने-पोषने और खुद के लिए स्थायित्व की तलाश एवं चाहे (प्रेम किये जाने) जाने की ख्वाहिश के हाथों मजबूर भी दिखाई दीं। लेकिन वज़ीर का भरोसा प्रेम में ही अधिक था।

वज़ीर खानम अपने शर्तों पर जिंदगी जीने वाली औरत थीं। वज़ीर की बहसें, उनकी हाज़िर जवाबी, उनकी खूबसूरती! जिसका बयान करने भर भाषा नहीं है मेरे पास। जिसे आप “कई चांद थे सरे-आसमां” पढ़कर ही महसूस कर सकते हैं । वज़ीर की जेहनियत की एक दूसरी बानगी देखिये। यह बात तब की है जब वज़ीर जिंदगी का  बहुत सारा कड़वा चख चुकी थीं। वे अपने बेटे नवाब मिर्ज़ा से कहती हैं –“आप मेरे जिगर के टुकड़े हैं लेकिन अव्वल और आखिर  तो आप मर्द हैं । मर्द जात समझती है कि सारी दुनिया के भेद और और तमाम दिलों के छुपे हुये कोने उस पर ज़ाहिर हैं या नहीं भी हैं तो न सही लेकिन वह सबके लिए फैसला करने का हकदार है। मर्द ख़्याल करता है कि औरतें उसी ढंग और मिज़ाज की होती हैं जैसा उसने अपने दिल में ,अपनी बेहतर अक्ल और समझ के बल पर गुमान कर रखा है”। इस पर नवाब मिर्जा कहते हैं – “लेकिन …लेकिन … शरीयत भी तो कहती है कि मर्द औरत से बरतर है….. हमारी किताबें तो यही कहती हैं ,हमारे बुजुर्ग तो यही सीखते हैं”। वज़ीर फिर कहती हैं –“आपकी किताबों के लेखक मर्द ,आपके काज़ी ,मुफ़्ती- बुजुर्ग भी कौन ,सबके सब मर्द”। मैं शरई हैसियत नहीं जानती ,लेकिन मुझे बाबा फ़रीद साहब की बात याद है कि जब जंगल में शेर सामने आता है तो कोई यह नहीं पूछता कि शेर है या शेरनी। आखिर हज़रत राबिया बसरी भी तो औरत थीं”। अपने बेटे से यह तीखी बहस वज़ीर के स्त्री-बोध को समझने में मदद करता है और यह बात साफ हो जाती है कि स्त्री के शोषण और गुलामी की प्रक्रिया को वज़ीर खूब समझती थीं।

कितनी ही लडकियों की कहानी दर्ज़ है मेरी डायरी में।

मैं कितनी ही ऐसी लड़कियों से मिलती हूँ जिनकी उम्र बाइस,पच्चीस,अट्ठाईस, तीस, पैंतीस है। जो जिंदगी का एक अध्याय पूरा कर चुकी हैं। जिनकी जिंदगी का एक पार्ट खेला जाकर पटाक्षेप हो गया है। और उन्होंने अपने को ज़ब्त कर लेने को सोचा है। क्योंकि उनके पास एक, दो बच्चे हैं। अब उनकी जिंदगी उन्हीं बच्चों के लिए है। उन्हीं बच्चों से है। ससुराल वालों ने भी मदद से हाथ खींच लिया। बाप ने जिसे भारी बोझ समझ सिर से उतार फेंका था, वही बोझ फिर से सिर पड़ता है। हालांकि! यह निम्न मध्य वर्ग और निम्नवर्ग की स्त्रियों का संकट अधिक है। वहां जीवन में भी कम संकट नहीं है। लेकिन यह संकट जीने के तरीके और नज़रिए का भी उतना ही है। आज उच्च वर्ग में कम से कम विधवा होना जीवन का इतना बड़ा अभिशाप नहीं है। पैसा है, नए सम्बंध हैं और जीवन भी।

उनसे दबे लहजे में पूछने पर कि अभी तो तुम 26 साल की हो दूसरा ब्याह क्यों नहीं कर लेती ? उनका जवाब की कौन मेरे बच्चों के साथ मुझे अपनाएगा।  वज़ीर की बात याद आती है कि-‘पराए बच्चों को सब टेढ़ी आँख देखते हैं। पराई बीबी सबको भाती है’।

कितना सुंदर होता कि हमारा समाज एक अधिक खुला समाज होता। बच्चे सिर्फ बच्चे होते। औरतें मजबूर न होतीं शादी करने के लिए।  अभिशप्त न होती विधवा होने के बाद अकेले जीवन जीने के लिए।  भला ! बीस, बाइस की उम्र भी कोई उम्र होती है अकेले जीने के लिए । वैधव्य के लिए।

हालांकि कभी इसी समाज में 10 साल की बच्ची भी  समाज द्वारा वैधव्य जीने के लिए मज़बूर की जाती थी। आज वह संकट तो नहीं है लेकिन कोई विधवा लड़की पुनःविवाह के पूर्व नैतिक दबाव से आज भी गुजरती है। क्योंकि विधवा लड़की शादी न करे तो उसे प्रोत्साहित किया जाता है। और एक लड़की शादी न करने का फैसला खुद से करे तो उसे हतोत्साहित किया जाता है।

लेकिन वज़ीर खानम यह शर्त रखती थीं कि मेरे साथ मेरे बच्चों को भी अपनाना होगा।  हर बार ऐसा ही हुआ। उनके बच्चों की परवरिश के लिए, उनकी तालीम के लिए रकम बांधी गयी। उस समय के समाज में या मुस्लिम समाज में शायद आसान रहा होगा यह। लेकिन एक खुला समाज हर किसी को जीने की अधिक सहूलियत देता है।

जिंदगी क्या है? जिंदगी के सही मायने क्या हैं? पता नहीं! लेकिन ऐसा न हो कि हम किसी गलत निष्कर्ष पर पहुँचें। कौन कह सकता है कि कौन अधिक सुखी है? मुझ जैसी लड़कियां, वज़ीर खानम जैसी लड़कियां या वे लड़कियां जो 25 साल में विधवा होकर अपने बच्चे के लिए ही जी रही हैं।

लेखकीय संपर्क :- anupamdu131@gmail.com

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