सिर्फ साजिशें ( कवितायें )

मणिबेन पटेल

सिर्फ साजिशें 

1.
वर्षों पहले कामगारों के लिए
कहा था अज्ञेय ने
जो पुल बनाएंगे
वह अनिवार्यता पीछे रह जाएंगे …
इतिहास में बंदर कहलाएंगे
संभलो!
ऐ दुनिया के चालाक कौमों
समझने लगे हैं तुम्हारी कारस्तानियों को वे
जिनको सदियों से तुमने बंदर बनाया
अपने इशारों पर नचाया
अपने ही मद में चूर
अंतहीन सीढ़ियों पर चढ़ते मठाधीशों
जरा ठहरो!
 पीछे मुड़ो और देखो
उन लहूलुहान हजारों हथेलियों को
कटीली राहों पर जो
तुम्हारे पांव तले बिछ गई थी
 उनको भूलना
खुद को भूलने जैसा है
कोड़े बरसाना उन पर
अपनी आत्मा को छलनी करने जैसा है
ऐ मरी हुई आत्माओं के
निरर्थक पुतलों
जरा ठहरो
आधार स्तंभों को अपने
जंजीरों में मत जकड़ो
बदस्तूर बढ़ते तुम्हारे जुल्मों से
एक दिन
धरती की छाती फट जाएगी
भरभरा कर गिर पड़ेंगी 
तुम्हारी लंका की दीवारें
प्रेम रस से पगे शबरी के बेर खा कर
उसकी संतानों का वध करने वालों
सुनो !
अब इतिहास में सिर्फ तुम्हारी शौर्य गाथाएं नहीं
बल्कि हजारों शंबूकों
और चिता की आग में झुलसती
सीताओं की चीखों का भी
हिसाब दर्ज किया जाएगा।

2.
खामोश हो जाती हैं
तर्क करती हुई
अक्सर लड़कियां
जब कहते हैं वे
औरत हो तो अपनी हद में रहो’।
कट जाती है
पिता की ऊंची नाक
भाइयों की चौकन्नी नजरों से बचाकर
जब भगा‘  ली जाया करती हैं
उनकी बेटियां।
अपनी अनगिनत चालों से
मेमना बनाने की चाहत में
नाकाम पतियों द्वारा
छोड़ दी जाती हैं
आजाद ख्याल पत्नियां।
बेशक!
पुरुषों की कुछ प्रोगेसिव जमातों ने
दे रखी है छूट
अपनी पत्नियों को
कहीं भी आने – जाने की
सुहाग चिह्नो को न लगाने की।
मासूम प्रेमी जोड़ों से
वसूली करता
खाकी वर्दीधारी
अपनी तिरछी नजर गड़ाए
कह उठता है अक्सर
छोड़ रहा हूं लड़की समझकर
 न्याय की गद्दी पर बैठे लोग
नहीं पता जिन को
मतलब न्याय का
हक की लड़ाई में शामिल
 महिलाओं के लिए
चिंतित हो कह उठते हैं
क्यों रखा जा रहा है
 सर्द रातों में इन्हें
दिल्ली की सड़कों पर
तहस-नहस हो जाया करती हैं
कोशिशें
कुछ मक्कार अंधियारे शब्दों से
हमारी छोरियां छोरों से कम हैं के
चौड़ी छाती कर
कहने वाले लोगों से।
तमाम फैसले खुद लेती लड़कियां
सराही जाती हैं
वे अक्सर
पुरुषों के कंधे से कंधा मिलाकर
चलने वाली कही जाती हैं
नाकाम करती हजारों साजिशें
लड़ती भिड़ती
आगे बढ़ती
खुद ही खुद के सपने बुनती
हार जाती हैं
जब वे पुरुषों से ही तौली जाती हैं ।

कवयित्री ने जनेवि से हिंदी विषय में शोधकार्य किया है। डी.यू. के कॉलेजों में कुछ वर्षों तक अध्यापन  भी किया है। 

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