भारती वत्स

क्या अच्छे लोगों को अधिकार है
बुरे लोगों को जलाने का? क्या हम अच्छे हैं!!!!

होली, एक तरंग पैदा कर देती है हर व्यक्ति में, जहां समाज में मौजूद उच्चता की श्रेणियां खारिज सी हो जाती हैं। हालांकि बाजार अलग तरीकों से इन पर्वों को मैनेज कर रहा है । सामान्यतः ये पर्व प्रकृति के समरस रागों की अभिव्यक्तियां हैं जो ऋतुओं के परिवर्तन के प्रतीकात्मक संकेत है आल्हाद, समरसता ,भक्ति और प्रेम को अपने में समेटे ये पर्व समाज की सामुदायिकता को निर्मित करते है, जहां सामुदायिकता ख्त्मप्राय है। यह सब जानते-बूझते ,लिखते हुये लगातार ये अनुभव हो रहा क्या वाकई इतना ही सच है?या और भी बहुत कुछ है जिसे हम केन्द्र में लाना जरूरी नहीं समझते या इतने अनुकूलित हो गये हैं कि कुछ खटकता ही नहीं?
बाजार मे बिकती पिचकारियां और रंग के होने के महत्व को तो मैं अपनी बेटी को समझा पा रही थी परन्तु होलिका और प्रहलाद की कहानी का जवाब देना मुश्किल ही नहीं असंभव सा था, क्या धार्मिक मूल्य हमे हिंसा के प्रति इस कदर अभ्यस्त कर देते हैं और क्या उसी मानसिक अनुकूलन/अभ्यास/जडता का परिणाम है कि हम आज भी एक औरत को ज़िंदा जलाने के वीभत्स कृत्य को समारोह पूर्वक बकायदा कर्मकांडो के साथ आयोजित कर आनंदित होते हैं?क्या किसी की,एक विचार या भाव के प्रति आस्था दूसरे विचार या भाव के व्यक्ति को उसे जला देने का अधिकार दे देती है? क्या हम सब हमेशा हिरण्यकश्यप बने रहेंगे? और एक स्त्री को हथियार बनाते रहेंगे? प्रतीक भले ही भक्ति और ज्ञान की अक्षुण्णता को बनाए रखने का है परंतु उसका अंत हिंसा में है, एक स्त्री को दहकती आग में डालने में है । हमारी जड़ों में उपस्थित” वैदिकी हिंसा ,हिंसा न भवति” की सोच हिंसा को घटना,काल और व्यक्ति सापेक्ष बना उसकी अमानवीयता को भयंकर अपचयित कर देती है और हम मनुष्य की रागात्मक, सामुदायिक, सहिष्णुतामय अनंत संभावनाओं को तार्किकता, अवसरवादी, शब्दाडंबर में समेट कर उस तरफ खड़े हो जाते हैं जहां हमारी सुरक्षा छतरियां खड़ी होती है पर इस बीच एक सुंदर,सभ्य ,विराट मानवीय आकांक्षाओं को खो देते हैं।
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तमाम धर्मो में हिंसा किसी न किसी रूप में उपस्थित है, यहां तक की बौद्ध विचार जो अहिंसा की मूलभूत अवधारणा पर आधारित है उसके मतावलंबी भी हिंसा से पूरी तरह मुक्त नहीं है, इस संदर्भ में श्रीलंका की एक लोककथा प्रसिद्ध है ,जब एक बौद्धराजा साम्राज्यवादी युद्ध के बाद भयानक मौतों को देख पछताता है कि बौद्ध होते हुए ये मैंने ये क्या किया तब धर्माचार्य उसे समझाते हैं कि असल में इस युद्ध में दो ही लोग मारे गये हैं जो बौद्ध थे ,बाकी जो लोग मारे गये उनकी चिंता आपको नहीं करना चाहिए।ये हिंसा की सांस्कृतिक भूमि है ,जो अच्छे ,बुरे ,वध और हत्या, ( यहां याद कीजिए सती परंपरा को , जहां एक जीवित जलती स्त्री के लोमहर्षक दृश्य को लोग बिना किसी विचलन के देखते हैं) के अंतर को हमारे अंदर बहुत गहरे स्थापित करती रही है और अंततः सामाजिक स्वीकृति को हासिल कर लेती है। दुनिया में हुई क्रांतियां और उत्पीडितों के संघर्ष में हिंसा एक आस्था से भरा हुआ कर्म है इस अर्थ में वह पवित्र मानी जाती है परन्तु हम जिन मानवीय आकांक्षाओं से भरे और निर्मित दुनिया की बात कर रहे हैं (जो आपको एक यूटोपीया लग सकता है )के आधार यानि जड़ों में ही असमानता,उत्पीड़न ,शोषण के बीज, कारण, परिस्थितियों की असंभावता की बात कर रहे हैं, यहां गांधी को याद कर सकते हैं क्योंकि उनकी अहिंसा की धारणा किसी धार्मिक विश्वास से नहीं जन्मती बल्कि उसके केन्द्र में मनुष्य है । यही कारण है कि गांधी की अहिंसा,सत्य,प्रेम ,संयम का भाव वैयक्तिक मुक्ति की बात नहीं करता बल्कि उसे सामूहिक मुक्ति में रूपांतरित करता है जो मनुष्य की जीवनशैली के अभिन्न हिस्से की तरह जीवन मूल्य बन जाता/सकता है। दरअसल अहिंसा के मूल में कौन सा भाव है, वह भाव निर्धारित करता है कि अहिंसा का भावबोध हमारे साथ,हमारी अंतर्निहित आकांक्षा की तरह अभिन्न होगा और उसका सामाजिक सरोकार होगा या वैयक्तिक मुक्ति की तरह किसी पहाड़ पर मोक्ष की आकांक्षा में तिरोहित हो जायेगा ।यदि दारुण दुखों, घनीभूत संवेदनाओं के मध्य जन्मी करुणा और प्यार से यह बोध सृजित होगा तो वह समाज सापेक्ष होगा, वहां पर हिंसा की द्वैतता भी नहीं होगी। यही कारण है की गांधी की अहिंसा में कोई दुविधा या द्वैतता नहीं है। अतः हिंसा भले ही मनुष्य का नैसर्गिक भाव है परंतु अहिंसा को सांस्कृतिक, सामाजिक भाव की तरह गहरे रुप में अपनाया जा सकता है।

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पारंपरिक अनुष्ठानों को हम सांस्कृतिक पहचान मानते हैं और उन्हें बनाये रखने की जड़वादी सोच को प्रशनांकित करने की सोच भी नहीं पाते इस तरह अपने मनुष्य होने के मानवीय भाव को ,ज्ञान को, दकियानूसी ,पोंगापंथी सोच में कैद कर महान परंपराओं को ढोने वाले खच्चर बने रहते हैं।
होलिका दहन के बहाने ही सही हमें कुछ नैसर्गिक सवालों पर सोचना ही होगा क्योंकि वह सिर्फ एक परंपरा के निर्वाह की बात नहीं है ,बल्कि पीढ़ी दर पीढ़ी एक स्त्री के प्रति समाज के रवैये और सोच के हस्तांतरण की बात है दूसरी बात बहुसंख्य या सत्तावादी ताकत ही तमाम परंपराओं और आचार संहिताओं को तय करती है और हम कलपुर्जों की तरह उनके नट बोल्ट कसने में लगे रहते हैं क्या यह बात हमें भयभीत नहीं करती कि हम कैसी पीढ़ी तैयार कर रहे हैं इस तरह की हिंसक परंपराओं को आगे बढ़ाते हुए,और ये अधिकार हमें किसने दिया? चाहे वह रावण हो या होलिका ।बिटिया स्मैरा का ये भोला सवाल कि क्या अच्छे लोग बुरे लोगों को जला सकते हैं? क्या वाकई हम अच्छे लोग हैं ?

लेखिका विगत 33 वर्ष से अध्यापन कर रही हैं
हवाबाग महाविद्यालय, जबलपुर
लगभग 70 शोधपत्रों एवं कविताओं का प्रकाशन
Ebook- मरी जाएं मलहारें गाएं
http://Pothi.com
और सामाजिक कार्यकर्ता भी हैं ।

 

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