‘दहेज ले लो दामाद जी’ तथा अन्य कवितायें

मधुलिका बेन पटेल

1.  संवाद
झांसी की रानी सीरियल पर
एक आंख गाड़े
हाथ लपर लपर बेल रहे रोटियां
और चल रहा
संवाद
‘अरे लड़ाई सरकार धोखा देगी ओनखे
लखमीबाई के पते नाहीं कुछु’
रोटियां झपक कर तवे पर से
होती हुई बरतन में
छपक से कूद कर आ रही
ए त्तेरी के… इहे त खंझटी बा…
ओ त्तेरी भला लखमीबाई के मारे खातीन
तलवार ले ले बा…
…उत्त…ऊँ हूँ….
ब्रेक-‘केशकिन आयुर्वेदिक तेल से
सिर्फ पुराने बाल झड़ना नहीं
नए बाल उगना भी शुरू हो जाते हैं’
रोटियों के बिलने, सिंकने में
तेजी आ जाती है अब
मन दौड़ता है
इतिहास के पन्नों पर
झलकारी बाई लक्ष्मीबाई से होते हुए दुर्गा भाभी
के कारनामों की कहानियां
गीत की तरह फूटने लगती हैं
…इसलिए तो कहते हैं

लड़कियां न किसी से कम थीं
न अब हैं
ये सब घर में रखने और ढकोसला
निभाने की बातें काम नहीं आती…
‘अरे…ऊ जेनकर पिछवरवां घर हे
ओनकरे घरे क कुलि लड़कियन छछकी हइन
आठ बजे तक छुछुआत रहेन सब’
बस सहसा ठप हो जाता है
संवाद।
अठारहवीं सदी से इक्कसवीं सदी तक
स्त्रियों के संघर्ष का शानदार इतिहास
एकबारगी पिछवाड़े के घर की लड़कियों
के चरित्तर बखान में डूबने सा लगता है
तवे पर रखी रोटियां जल जाती हैं
मन राख राख सा हो जाता है
जीभ पर सतियों की उड़ती राख
जम जाती है
और मन सिहर जाता है
सत्रहवीं …अठारहवीं….उन्नीसवीं सदी
कब…कहाँ…कैसे…
…इक्कीसवीं सदी..
अभी तक क्यों….
भीतर ही भीतर तेजाब जैसा कुछ
खदबदाने लगता है
…और टी वी पर दौड़ता रहता है
लक्ष्मीबाई का घोड़ा।

2.  शमशान
शमशान सी ख़ामोशी थी
और कहा उन्होंने –
तारीखों में इसे ‘अमन’ लिखना
जुबाँ पर ठोंकी गयी कीलें

कहा उन्होंने –
उसके बयान
‘मुकद्दर में चमन’ लिखना
हर रात रौंदते खवातीनों को
और कहते-
अख़बारों में इसे ‘बहन’ लिखना
वहशियत उनकी सरेआम थी
लहूलुहान सरे राह थी
वे कहते –
इसे मेरी ‘अदब’ लिखना
बेहिसाब कंगाली के दौर थे
और कहा उन्होंने-
इसे ‘अशर्फियों की खनक’ लिखना
दरक रही थी धरती
दरक रहे पहाड़
खा रही थी पछाड़े नदियाँ
उड़ चुकी थी
बदहवास हर एक चिड़िया
गायब थी
रंगीन तितलियाँ
नालियों में उतरा रही थी
नन्हीं बच्चियां
कहा उन्होंने –
इसे मेरा वतन लिखना।

3. बहू की डायरी
नानी के जाने के बाद
कुछ नहीं बदला
बस परिवार में एक सदस्य
कम हो गया
रोज अलग से सानी गयी
दूध रोटी, दाल रोटी की कटोरी
किनारे रख दी गयी

आधे फ़ीट की ऊंचाई वाली खाट
उदास हो गयी
होती रही बुवाई
निराई गुडाई
खेतों से तोड़ कर लाई गई
सब्जियां
लद कर जाती रहीं बाजार
मिट्टी के चूल्हे पर
खोए की शक्ल में
बदलता रहा दूध
पकता रहा खाना
छौंक लगती दाल
छौंक से याद आया-
अब नहीं खाँसता कोई
छौंक के बाद
नानी ही थी
जिनके गले पर
मिर्ची की गंध उड़ कर
बैठ जाती
कुछ नहीं बदला नानी के जाने के बाद
बस घर में सुंघनी आनी बन्द हो गयी
सुंघनी नानी की आत्मा
की साथिन थी।
नानी की धूसर सफेद साड़ी
अब नहीं सूखती
न गीली होती है।
घर में गोदने से भरे हाथ
अब नहीं दिखते
न सुनाई पड़ती है उनकी
गोदना गोदाने के समय की दर्द
भरी कहानी
कहा करती थी नानी-
बहुत छोटी थी मैं
जब लोगों ने जबरन
ढकोसले का दाग उमर भर के
लिए दे दिया
तब मैंने कहा था-

पुरुषों को भी जबरन
गोदना गोद देना चाहिए
गर वे अपनी स्त्रियों को
गोदना गोदायें।
तब झुर्रीदार चेहरे पर
हँसी खेल गयी थी
नानी बोली-
आज की औरत है तू
पुरुषों को पकड़ कर गोद दे गोदना
तब छत पर खिलखिलाई थी
मिली जुली हंसी
नीम के पेड़ों से उड़ी थी
कबूतरों  की टोली
बही थी ठंडी हवा
नानी के जाने से कुछ तो नहीं बदला
बस अजिया सास और
उनकी नतोली बहू की
मिली जुली खिलखिलाहट
दुबारा कभी सुनाई नहीं देगी
इस धरती पर
न नानी के कांपते डोलते डगमगाते
पांव उतरेंगे सीढ़ियों से
और न उनकी खाट बिछेगी
नानी का अक्स टँगा है
दीवार पर एक धूसर माला पहने
नहीं बदला कुछ नानी के जाने के बाद
पर बहुत कुछ बदल गया उनके जाने के बाद।

4. दहेज़ ले लो दामाद जी!
दहेज़ ले लो दामाद जी!
दहेज़ ले लो…
बड़े रौब से अपने शौक
के भंडार की चिट दे दो
एसी फ्रीज़ टीवी
बेड बक्सा अलमारी ले लो

सोफा तकिया सक़ियायदि किसी लड़के का दहेज मांगना गलत है तो किसी लड़की का भारी पैसा जमीन जायदाद देखकर लड़के से शादी करना कहाँ तक सही है? - Quora
रजाई ले लो
टी सेट डिनर सेट
ये सेट वो सेट ले लो
कपड़ा सपड़ा
उलेन सूती रेशमी ले लो
दो पहिया चार पहिया भी लो
अपने गुरूर की खातिर
डायमंड रिंग ले लो
तरकारी के भाव
किलो किलो सोना ले लो
बैंक के सारे नोट ले लो
जो कमाई न कर सको
वो सब दहेज़ में ले लो
ब्याह के नाम पे
घर लूट लो दामाद जी
दहेज़ ले लो दामाद जी!
दहेज़ ले लो…
घर – बार
छान – छप्पर
गाय भैंस ले लो
बच्चों के दो जून की
रोटी ले लो
भौजाई की जली कटी ले लो
बेटी की माँ की आँखों का पानी ले लो
बाप की दमड़ी ले लो
दादा की ठठरी ले लो
भाई की चमड़ी ले लो
दामाद जी !
दहेज़ ले लो दामाद जी
दहेज़ ले लो।

5. साँच के त आंच बा

साँच के त आंच बा
ए भइया ई कब क बात बा
साँच के त आंच बा।
रतिया दिनवा हम खटनी
पैर में बेवाई फटनी
फूंस के जइसन
खुरदुर हमर हाथ भइनी
सगरो धरती गोड़नी बोअनी
तबो नून रोटी के मजबूर भइनी
ए भइया एहर आवा
एगो बात बा
अनवा धनवा अ
सगरे रहिया जनवा बिलात बा
साँच के त आंच बा
असपताल घुड़साल भइनी
परचा ख़ातिन ठुसम ठूस
धक्कम धुक्कम ठेलम पेल
ए वारड ऊ वारड
मूत जांच खून जांच
अट्टी पट्टी ओतल बोतल
अरजरी सरजरी
अकटर डकटर सब देखनी
मन भर दवाई क
करजा ले क बिल भरनी
अइसन हाल बेहाल
देखी क लगनी
हमरे बचुआ नइखे
सगरो देस बेमार बा
साँच के त आंच बा।
अपटी कपटी राजा भइनी
गन्ही जी क सत्य अहिंसा
सरेरहिया लहू लुहान कइनी
ओरी चोरी छीना झपटी
खुल्लेआम डकइती

रोज रोज मार काट क
कीच मचऊनी
हतास जनन अपने गरे
फ़ांस लगउनी
ओली गोली इहाँ
आम बात बा
ए भइया बोला
ई कब क बात बा
सांच के त आंच बा।

कवयित्री परिचय –
सहायक प्राध्यापक
हिन्दी विभाग  
तमिलनाडु केन्द्रीय विश्वविद्यालय 
तिरुवारूर  610005
ben.madhulika@gmail.com

 

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