स्त्री सम्मान और अधिकार का ढाई हजार साल पुराना अभियान ‘अंजलि कम्म’

ए. के. पंकज 

स्त्री को सम्मान देने वाले पहले भारतीय दार्शनिक मक्खलि गोसाल हैं। जब महावीर और बुद्ध अपने संघों में स्त्रियों का निषेध किए हुए थे, औरतों को दासी, गणिका और नगरवधू बनाकर उनकी सामाजिक स्थिति हमेशा के लिए गिरायी जा रही थी, तो वह मक्खलि गोसाल ही थे जिन्होंने पहली बार स्त्रियों को ‘अंजलि कम्म’ (हाथ जोड़कर अभिवादन) किया। मक्खलि के इस अंजलि कम्म अभियान का संदेश बहुत स्पष्ट था कि समाज में पुरुष और स्त्री दोनों बराबर हैं और समाज में जिस सुनियोजित ढंग स्त्रियों की स्थिति गिरायी जा रही है वे उसके सख्त खिलाफ हैं। ‘अंजलि कम्म’ स्त्री सम्मान व अधिकार अभियान चलाकर आजीवक तीर्थंकर मक्खलि गोसाल ने स्त्रियों की पुरखा स्थिति (समाज एवं गण-संघ में सभी स्तरों पर समानता) को बचाने का जो अथक प्रयास और संघर्ष किया वह इतिहास के अंधेरे में है। वहीं, इसके बरक्स पिछले कुछ शकों में विश्व भर के अध्येताओं ने जैन एवं बौद्ध ग्रंथों का हवाला देते हुए यह सिद्ध करने का जी-तोड़ प्रयास किया है महावीर और बुद्ध ही स्त्री- मुक्ति के प्रबल समर्थक रहे हैं और इन दोनों के संघों में औरतों का प्रवेश था जहां उन्हें पूरी स्वतंत्रता प्राप्त थी।
परंतु प्राचीन जैन एवं बौद्ध ग्रंथ हमें बताते हैं कि महावीर और बुद्ध दोनों ने ही अपने आरंभिक समय में स्त्रियों को दीक्षा देने के उपयुक्त नहीं समझा था। आगे चलकर इन्होंने औरतों को अपने साथ जरूर लिया पर भिक्षुणी संघों के मुख्य संचालक अथवा नियंत्रक पुरुष ही होते थे, महिलाएं नहीं। जबकि आजीवक मक्खलि गोसाल  की मतानुयायी औरतें उतनी ही स्वतंत्र थीं, जितने उनके पुरुष। ‘अंजलि कम्म’ द्वारा औरतों के सम्मान व बराबरी के अधिकार के लिए चलाया गया अभियान तथा आजीवकों द्वारा स्त्रियों को दीक्षा दिए जाने के खिलाफ जैन और बौद्ध दोनों ही ग्रंथों में मक्खलि गोसाल का उपहास तो किया ही गया है, गाली-गलौच तक की निंदनीय भाषा से भी परहेज नहीं किया गया है।
जैन धर्म में स्त्रियों की स्थिति क्या थी इस पर जैन विद्वान डॉ. सागरमल का कहना है, ‘आगम युग में भिक्षुणी संघ की व्यवस्था को भिक्षुसंघ से अधिक नियन्त्रिात नहीं पाते हैं। भिक्षुणी संघ अपने आन्तरिक मामलों में पूर्णतया आत्मनिर्भर था, गणधर अथवा आचार्य का उस पर बहुत अधिक अंकुश नहीं था, किन्तु छेदसूत्र एवं आगमिक व्याख्या साहित्य के काल में यह नियन्त्रण क्रमशः बढ़ता जाता है। इन ग्रंथों में चातुर्मास, प्रायश्चित्त, शिक्षा, सुरक्षा आदि सभी क्षेत्रों में भिक्षुक वर्ग का प्रभुत्व बढ़ता हुआ प्रतीत होता है। फिर भी बौद्ध भिक्षुणी संघ की अपेक्षा जैन भिक्षुणी संघ में स्वायत्तता अधिक थी। किन्हीं विशेष परिस्थितियों को छोड़कर वे दीक्षा, प्रायश्चित्त, शिक्षा और सुरक्षा की अपनी व्यवस्था करती थीं और भिक्षु संघ से स्वतन्त्र विचरण करते हुए धर्माेपदेश देती थीं जबकि बौद्ध धर्मसंघ में भिक्षुणी को उपोसथ, वर्षावास आदि भिक्षुसंघ के अधीन करने होते थे।’ (डॉ. सागरमल जैन अभिनंदन ग्रंथ, पार्श्वनाथ विद्यापीठ, वाराणसी, 1998, पृ. 555)
फिर वे यह भी कहते हैं, ‘आगे चलकर आगमिक साहित्य में न केवल उसके तन ढंकने की व्यवस्था की गयी, बल्कि शील सुरक्षा के लिए उसे ऐसे वस्त्रों को पहनने का निर्देश दिया गया, जिससे उनका शील भंग करने वाले व्यक्ति को सहज ही अवसर उपलब्ध न हो। इसी प्रकार शील सुरक्षा की दृष्टि से भिक्षुणी को अकेले भिक्षार्थ जाना वर्जित कर दिया गया था। भिक्षुणी तीन या उससे अधिक संख्या में भिक्षा के लिए जा सकती थी। साथ में यह भी निर्देश था कि युवा भिक्षुणी वृद्ध भिक्षुणी को साथ लेकर जाए। जहाँ भिक्षु 6 किलोमीटर तक भिक्षा के लिए जा सकता था, वहीं भिक्षुणी के लिए सामान्य परिस्थितियों में भिक्षा के लिए अति दूर जाना निषिद्ध था। इसी प्रकार भिक्षुणियों के लिए सामान्यतया द्वार रहित उपाश्रयों में ठहरना भी वर्जित था। इन सबके पीछे मुख्य उद्देश्य नारी के शील की सुरक्षा थी। क्योंकि शील ही नारी के सम्मान का आधार था। अतः उसकी शील-सुरक्षा हेतु विविध नियमों और अपवादों का सृजन किया गया है।’ (वही, पृ. 562)
आम तौर पर बौद्ध धर्म के बारे में भी यह धारणा बहुप्रचलित है कि वह जेंडर और सेक्सुअलिटी के मामलों में ज्यादा उदार है। पिछली एक सदी के दौरान इस विषय पर अनेक पुस्तकें लिखी गई हैं जिन सबका सार यही है कि बुद्ध स्त्रियों के सवाल पर कितने आधुनिक और पवित्र हैं। तब भी अनेक मूल बौद्ध ग्रंथ हमें उस बुद्ध के बारे में जानकारी देते हैं जो स्त्रियों को लेकर बहुत ही अनुदार हैं। स्त्रियों के प्रति उनमें भी वही नजरिया व्याप्त है जो तत्कालीन सामंती समाज में है। पुरुषवादी सत्ता के अनुरूप उनकी मान्यता भी स्पष्ट है, ‘भिक्षुओं! काले सांप में पांच दुर्गुण हैं। अस्वच्छता, दुर्गंध, बहुत सोने वाला, भयकारक और मित्रद्रोही (विश्वासघाती)। ये सारे दुर्गुण स्त्रियों में भी हैं। वे अस्वच्छ, दुर्गंधयुत, बहुत सोने वाली, भय देने वाली और विश्वासघाती हैं।’ (अंगुत्तरनिकाय. पांचवा निपात, दीघचारिका वग्गो, पठण्हसुत्त 5/23/9) वे यह भी कहते हैं कि कोई ‘स्त्री बुद्ध नहीं बन सकती। केवल तभी बन सकती है जब पुरुष का जन्म ले ले।’ (अंगुत्तरनिकाय, एककनिपात, असंभव वग्गो, द्वितीय वर्ग, 1/15/1) इसलिए जब वे स्त्रियों को संघ में प्रवेश की अनुमति देते हैं तो उनका साफ निर्देश है कि –
1. भले ही भिक्षुणी सौ साल की ही क्यों न हो, वह अपने से छोटे उम्र के भिक्षु को नमस्कार करेगी। उसके आते ही उठ जायेगी।
2. किसी भी स्थिति में स्त्री भिक्षुणी किसी भिक्षु का अनादर न करे, उसे सलाह न दे, न उसको अपशब्द कहे।
3. भिक्षु को कोई भिक्षुणी कभी भी उपदेश न करे। केवल भिक्षु ही भिक्षुणी को उपदेश दे सकता है।
(अंगुत्तरनिकाय, आठवां निपात, गोतमीवग्गो, गोतमीसुत्त)
उपरोक्त उद्धरणों का आशय सिर्फ यह है कि जैन मत या बौद्ध मत दोनों ही आरंभ में उसी स्त्री विरोधी धारणा के शिकार रहे हैं जो उस समय के सामंती समाज में मौजूद थी। इस सोच से निकलने में उन्हें काफी समय लगा पर तब भी वे इससे पूरी तरह मुक्त नहीं हो पाए। जैसा कि हम जैन एवं बौद्ध दोनों ही भिक्षुणी संघों पर लगाए गए प्रतिबंधों को देखते हैं। दोनों महानायकों ने अपने भिक्षु संघ में स्त्रियों को स्वीकार किया पर उसी पुरुष नजरिए, निर्देश और सावधानी के साथ जिससे भिक्षु संघों का ‘शील’ अपवित्र न होने पाए। क्योंकि स्त्रियों की शील की तुलना में उन दोनों के लिए ‘जिन’ और ‘बुद्धत्व’ की शुचिता ज्यादा महत्वपूर्ण थी। हालांकि इसमें कोई संदेह नहीं कि तत्कालीन समाज के स्त्री विरोधी वातावरण में दोनों के ही भिक्षुणी संघों में महिलाओं को ‘कुछ’ ज्यादा अधिकार हासिल थे जिसे उन्होंने परिवार और समाज को ठुकरा कर निर्वासित अथवा एकाकी जीवन के पुरस्कारस्वरूप प्राप्त किया था। समाज के भीतर तनिक भी स्त्री-स्वतंत्रता दिला पाने में न महावीर और न ही बुद्ध सफल हो पाए थे। और, भिक्षुणी संघ में भी अपने मन और देह की स्वामिनी स्त्रियां स्वयं नहीं थीं, बल्कि उन पर भिक्षु पुरुषों का पूरा नियंत्रण था।
‘अंजलि कम्म’ का स्त्री सम्मान व अधिकार अभियान चलाने वाले आजीवकों का विचार स्त्री-स्वातंत्रय को लेकर क्या था इस बारे में मुकम्मल जानकारी का अभाव है। इस संबंध में कोई प्राथमिक स्रोत उपलब्ध नहीं हैं क्योंकि जैन व बौद्ध ग्रंथों में आजीवकों और उनके सबसे बड़े नेतृत्वकर्ता मक्खलि गोसाल का जो चित्र मिलता है वह एकतरफा है और बेहद संक्षिप्त भी। आजीवकों से जुड़े सभी प्रसंग प्रायः उन्हें हीन दिखाने के लिए वर्णित किए गए हैं। इससे हमें आजीवक मतावलंबियों में स्त्रियों की स्थिति क्या थी, इस बारे में कोई स्पष्ट सूत्र या मजबूत संकेत नहीं मिलते। यहां तक कि बरुआ (1920) और बाशम से लेकर 21वीं सदी के अध्येता पियोट्र बालिस्विच (2000) के आजीवक संबंधी गंभीर अध्ययन भी कोई रोशनी नहीं डाल पाते। इसलिए पूर्ववर्ती विद्वान अध्येताओं की तरह हमें भी जैन और बौद्ध गं्रथों में वर्णित झूठी या सच्ची कहानियों के संदर्भ पर ही निर्भर रहना पड़ेगा। जिनसे इस बात पर रोशनी पड़ सके कि स्त्री के संबंध में आजीवकों का नजरिया क्या था।
बौद्ध ग्रंथ ‘थेरीगाथा’ में वर्णन है कि उपक नाम का एक आजीवक श्रमण किसी बहेलिए की बेटी चापा से प्रेम करता था। जिससे शादी करने के पश्चात उपक उसी के घर में रहने लगा था। लेकिन बाद में उपक अपनी पत्नी के बार-बार के उलाहने से तंग आकर घर छोड़ देता है। इसी तरह कल्हण की ‘राजतरंगिनी’ में भी एक आजीवक का प्रेम संबंध वेश्या के साथ बताया गया है जो उसी के घर में रहता था। स्वयं आजीवकों के तीर्थंकर मक्खलि गोसाल कुंभकार स्त्री हलाहल के साथ रहते थे। मक्खलि की इस प्रेयसी को बौद्ध एवं जैन ग्रंथों में ‘हलाहल’ यानी जहर कहा गया है। महावीर का स्पष्ट मत है कि मक्खलि और उनके आजीवक अनुयायी ‘स्त्रियों के गुलाम’ हैं। बुद्ध का भी यही मानना है कि मक्खलि गोसाल और उनके आजीवक मतावलंबी किसी साधारण गृहस्थ की तुलना में स्त्रियों को लेकर कहीं ज्यादा ‘कामासक्त’ हैं।
इन वृतांतों से यही सिद्ध होता है कि जैन, बौद्ध एवं ब्राह्मण धर्म में स्त्रियों के प्रति लगभग एक ही दृष्टि थी। ये तीनों धर्म स्त्रियों के प्रति उतने ही अहिष्णु थे जितना कि उस समय का समाज था। लेकिन मक्खलि गोसाल के आजीवक मत में स्त्रियों का पूरा सम्मान था। उन्हें भी पुरुषों की ही तरह ‘इंसान’ माना जाता था। इसलिए हमें जैन एवं बौद्ध ग्रंथों में ऐसे अनेक आजीवक मिलते हैं जो समाज के श्रमण, कारीगर, किसान, वैश्य, श्रेणिक आदि वर्गों के स्त्रियों सहित ‘वेश्या’ माने जानी वाली स्त्री से भी प्रेम का संबंध बनाने में नहीं हिचकते। और न ही इसके लिए आजीवक श्रमण संघ उन्हें कोई दंड देता है या उनका सामाजिक बहिष्कार करता है। परंतु जैन एवं बौद्ध दोनों संघों में स्त्री से संबंध रखने वाले भिक्षुओं एवं भिक्षुणियों को कड़े से कड़ा दंड देने की कई कथाएं मौजूद हैं।
इस संदर्भ में सनातनधर्मी मित्र कह सकते हैं कि उनके यहां स्त्रियों का स्थान सदैव पूजनीय रहा है। अपनी इस धारणा के पक्ष में वे यह रटा-रटाया श्लोक दोहरा सकते हैं- ‘यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः’। पर हम जानते हैं कि वेद, उपनिषद, माहाकाव्यों और ब्राह्मण-ग्रंथों में स्त्रियों की अमानुषिक अवमानना जिस कदर और जितनी संख्या में हुई है, उसके दाग धो पाने में इस तरह के श्लोक नितांत अक्षम हैं। इसी तरह से भिक्षुणी संघों में औरतों के ‘स्व’ का दमन करने वाले जैन एवं बौद्ध संघ की उदारता भी बेमानी है। ढाई हजार साल पुराने भारत में एक आजीवक ही हैं जो औरत को स्त्री इच्छा, स्वतंत्रता और अधिकार सहित एक संपूर्ण ‘इंसान’ के रूप में स्वीकार करते हैं, उसे अंजलि कम्म करते हैं!

लेखक का परिचय-
लेखक आदिवासी अधिकार के प्रबल प्रवक्ता हैं
और वरिष्ठ साहित्यकार हैं।
जौहर दिसूम खबर के संपादक
Email: akpankaj@gmail.com

 

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here