मुन्नी गुप्ता

राजधानी’ काव्य संग्रह
कवि- अनिल पुष्कर
लोकोदय प्रकाशन, लखनऊ -2019

शास्त्र लिखने के लिए शास्त्र पढ़ना जरूरी नहीं है. इसके उदाहरण हैं वे शास्त्र, जो हमारे सामने हैं. दुनिया भर के संत सूफी फकीरों ने ऐसा बहुत कुछ कहा है अपनी वाणियों और चिन्तन मनन के जरिये जो आगे चलकर दुनिया के लिए एक नई नजीर बनी. बाद में उन प्रवचनों वाणियों को लिपिबद्ध कर एक महत्त्वपूर्ण दस्तावेज़ का रूप दिया गया और वह दस्तावेज़ आज भी दुनिया को रौशनी देते हैं. प्रगतिशील मूल्यों के द्योतक इन वाणियों से आज भी नए मूल्य और नई परम्पराओं की नींव डाले जा रहे हैं और वे एक ऐतिहासिक धरोहर के रूप में हमारे सामने हैं. हमारे बहुत से मनीषियों ने समय-समय पर उन वाणियों पर अपनी बात रखी. उसे दुनिया और मनुष्यों के लिए सार्थक पाठ घोषित किया. ये पाठ जीवन की व्यावहारिक पाठशाला से निकले थे और इनमें दर्ज़ है जीवन का मूल ज्ञान.

आप इतिहास उठाकर देखेंगे तो पायेंगे कि इन  महात्माओं ने अपनी बात कहने के लिए किसी बनी बनाई शास्त्र परिपाटी को न तो आधार बनाया और न ही उसका अनुकरण किया बल्कि समय और समाज की ठोस व्यवस्था और परिपाटी ही उनका आधार बनी. जो देखा, जो पाया वही दर्ज किया. कबीर भी कहते हैं – ‘मैं कहता आंखन देखि.’ आगे जो भी संत, सूफी, महात्मा आये उन्होंने भी आँखिन देखी को ही अपना आधार और सम्बल बनाया. हमारे लोकगीतों का आधार भी तो यही लोक परम्पराएँ ही रहीं, जिसकी खोज आज जोर-शोर से हो रही है. लोक की परम्परा से ही जीवन और जगत की धुरी बनती है. यही लोक की  परम्परा लोक की बुनियाद रखते हैं, लोक की रवायतें रचते हैं, जो सदियों तक चली जाती है. फिर वही टूटती, बनती, गढ़ती आगे बढ़ती जाती है. आप कह लें कि जैसे मिट्टी से जुड़े किसी पौधे या पेड़ को आप पूरी तरह से काट दें लेकिन उसकी जड़ का एक रेशा भी मिट्टी में है तो वह वहीं से खाद पानी लेते-लेते भीतर ही भीतर फैलते-फैलते जहाँ स्पेस पाता है वहीं निकल आता है.

 

हर रचना की अपनी यूनिक पद्धति होती है, यह यूनीकनेस रचना की भाषा, कहन या शैली, जिसमें भी हो वह उसके साथ ही आती है. कई बार रचनाकार एक बिंदु के साथ पूरी रचना को एक नए धरातल पर एक नए नजरिये से रखता है. बहुत से कवियों ने भी एक ही थीम को लेकर पहले से लिखी गई उसी रचना  के समानांतर बिलकुल नए कलेवर, नए मिजाज, नये तेवर और नए चिन्तन बिंदु से चीजों को देखा. दूसरी ओर, हर रचना अपनी परम्परा से अलग अपने समय को अपने नजरिये से दर्ज करता है. आप देखेंगे कि कवि या रचनाकार कई बार परम्परा का अनुसरण अनुकरण करते हुए उससे एक कदम आगे खड़ा हो जाता है और कई बार पहले की परम्परा से दस हाथ आगे बढ़ एक नई बात कहते हुए आगे निकल जाता है और फिर वहीं से एक नई परम्परा का सूत्रपात भी रचना करती है और पुरानी परम्परा के भीतर से नए-पुराने प्रगतिशील मूल्यों को लेते हुए एक नई जमीन की आधारशिला रखते हैं.

इसलिए जरूरी है जब भी, जिस भी समय, जब कभी किसी रचना पर बात की जाय तो रचना की सरसरी व्याख्या के बजाय, एकांगी फतवे देने के बजाय निष्पक्ष रूप से रचना की गुणवत्ता-गहनता और उसमें निहित नए बीज मूल्यों की खोज की जानी चाहिए. इसलिए साहित्य की सभी विधाओं में कविता पर बात करना एक कठिन कार्य है. अधिकांशतः देखा गया है कि कविता पर बात करते हुए आलोचकों ने हड़बड़ी  में या तो अपनी धारणा बनाई या फिर व्यक्तिगत राग-द्वेष से प्रेरित होकर रचना को देखा या फिर उसी में दस तर्क लगाकर दस आलोचक उसी की खिचड़ी पकाते रह गये और कविता पाठकों के लिए एक अबूझ पहेली बनी रही सदियों तक. जब कभी उस असली कविता से होकर हम गुजरते हैं तब यह एक धारणा भी पुख्ता होती है कि कविता तो कह कुछ और ही रही थी, जो कुछ कहा गया इस पर उससे बिलकुल उल्ट और सीधे-सीधे. कई बार कविता-सीधे-सीधे स्पष्ट संवाद करती है बिल्कुल अभिधाई शैली में और कई बार बिम्बों, प्रतीकों, उपमाओं में छिपे उसके असल अर्थ तक पहुँचने के लिए उसके भीतरी खोहों के चक्कर लगाने पड़ते हैं.

युवा कवि और आलोचक अनिल पुष्कर का पहला काव्य संग्रह ‘राजधानी’ इन्हीं कुछ बिन्दुओं की तरफ पाठकों का ध्यान आकृष्ट करता है. यह संग्रह 2019 में लोकोदय प्रकाशन  से छपा. कुल एक सौ बीस पृष्ठों में बावन कविताएँ हैं. संग्रह का शीर्षक ‘राजधानी’ अपने आप में बहुत खुला हुआ है और बहुत कुछ अपने भीतर दबाये भी. ‘राजधानी’ कह देने भर से ही जैसे एक देश के विविध छोर खुलने लगते हैं, वैसे ही यह संग्रह भी अपने भीतर, अपने बाहर की, दुनियाभर के देशों की राजधानी के विविध छोरों को समेटे है अपने में. संग्रह की कुल बावन कविताएँ एक ताल, एक लय की बानगी लेकर नहीं आती बल्कि ये बताती हैं कि हर आदमी आज के समय में अपनी-अपनी राजधानी चाहता है, यानी अपनी ‘राज’ की ‘धानी’ जो हर वर्ग, हर पीढ़ी, हर आदमी का अलग-अलग है. एक ओर जरूरतमंद गरीबों के लिए, भूखों के लिए रोटी की आस ही उसकी राजधानी है, बेरोजगारों के लिए रोजगार की आस ही उसकी राजधानी है, बेघरों के लिए घर की आस ही उसकी राजधानी है दूसरी ओर  नेताओं के लिए संसद का राजमार्ग ही उसकी राजधानी है और राजधानी के केंद्र में बैठे महत्वाकांक्षी लोगों के लिए दुनिया को मुट्ठी में कैद करना ही उसकी राजधानी है. जैसे कि पहलवानों के लिए उसका अखाड़ा ही उसकी राजधानी है, यानी हर आँख की अलग-अलग धानी है यह ‘राजधानी’.

यहाँ इस यात्रा में देश दुनिया की राजधानियों में घट रही घटनाओं पर एक चौकसी देखने को मिलती है. बतौर कवि और बतौर नागरिक उनकी यात्रा, उनकी आवाजाही पूरी दुनिया में है. नजर जितनी लोकल समस्याओं और घटनाओं पर है, उतनी ही पैनी चौकसी ग्लोबल मुद्दों पर भी. यानी एक कवि की वैश्विक यात्रा का लेखा जोखा है यह संग्रह ‘राजधानी’, राजधानियों के भीतर से गुजरते हुए एक नागरिक की आँखों देखा सूरत-ए-हाल का बयाँ है यह ‘राजधानी’.

शुरूआत की तीन कविताओं में कवि का आक्रोश राजधानी के प्रतिनिधि जननायकों, उनकी व्यवस्थाओं सरकारी-गैर सरकारी नीतियों-योजनाओं पर देखने को मिलता है. इस संग्रह की आरम्भिक तीन कवितायें ‘राजधानी एक’, ‘राजधानी-दो’ और ‘राजधानी-तीन’ में कवि ने राजधानी की व्यवस्था की आड़ में चल रहे जननायकों की व्यायामशाळा, अखाड़े और वधशाळा की दरवाजा कविता की चाभी से खोलते हैं और कविताएँ बताती है कि सब कुछ राजधानी के नाक के नीचे ही घट रहा है और इस व्यवस्था का खुला दृश्य ‘राजधानी-दो’ की कविता में बानगी के तौर पर देख सकते हैं –

“यह राजनायकों की व्यायामशाला है/ और अपने अपने गोदामों तक ले जाते/ तेज़ आवाज़ में कुछ कौंधता है/ न्यायपालिका इस वधशाळा की हरम है/ खद्दरधारी वधशाला के दलाल हैं.”

‘राजधानी- एक’ और ‘राजधानी-दो’ में राजनीतिक व्यवस्था की नग्न सच्चाई खुले तौर पर दिखाई देती है और पिछले कुछ दशकों से आज तक समय के हालात को देखते हुए ये कवितायेँ अपने समय की व्यवस्था के लिए एक लोहा है. एक चुनौती है और उसके अपने जोखिम उठाने को भी कवि डटकर खड़ा है यह कहते हुए कि  “यह राजधर्म असल में श्मशान है/ सुना है ये ‘लोक’ और ‘जन’ का महानिर्वाण है.”

‘राजधानी- तीन’ तक आते आते कवि सीधे-सीधे कहता है कि ‘ये राजधर्म लाइलाज दमा है’, जहाँ रहते हुए “आवाम एक अपाहिज बछिया-सी पल रही है/… ये वो भूख है जो इस आबादी से कई गुना बड़ी है. दरअसल ये देश की राजधानी है/ यहाँ भूख हमेशा ऐसे ही आएगी.

जहाँ एक ओर ‘राजधानी’ काव्य संग्रह की पहली तीन कविताएँ एक बड़ा कैनवास खींचती हैं, वहीं दूसरी ओर इस संग्रह की आखिरी कविता – ‘यहाँ जवाब पाने की गुंजाइश नहीं है’ लोकतान्त्रिक व्यवस्था का वो सच किस्सा बयान करती है, जो राजधानियों में घट रहा है और जनता की नाक के नीचे ही सब कुछ चल रहा है लोकतांत्रिक प्रणाली के नाम पर. एक पंक्ति है – ‘आइये आतंकवादी शिविरों में चलें’ इसी सिस्टम का खुला सच है. स्वस्थ लोकतान्त्रिक प्रणाली के नाम पर चल रहे चुनाव प्रणाली के बैलेट बॉक्स से लेकर इलेक्ट्रानिक ईवीएम तक के तरीके तक से जनता अनभिज्ञ नहीं है. सब कुछ खुले तौर पे घट रहा है. चुनाव की इस पूरी प्रक्रिया को इतने सारगर्भित तरीके से न तो धूमिल कह पाये और न ही इसके बाद के किसी और कवि ने, ये कहने का साहस और इतने दुस्साहस तरीके से जितना कि ‘राजधानी’ का कवि कहता है – “मतपेटियों में हत्यारों के लिए खून की थैलियाँ जमा हैं/ थैलियाँ बतायेंगी किस बिरादरी की कितनी हिस्सेदारी है/ ये थैलियाँ वहां तक नहीं पहुँचती/ जहाँ लहूलुहान लोकतंत्र को हत्यारे घसीटे लिए जा रहे हैं/ जहाँ निर्दोष मुवक्किल के खिलाफ सजा-ए-मौत दी गई.“ इन सारी प्रक्रियाओं में मतदाताओं की स्थिति एक मूक दर्शक की है. उसे न सवाल पूछने का अधिकार है, न जवाब पाने का. सब कुछ एक फिक्स्ड तयशुदा सुनियोजित फ्रेम के तहत संचालित होता है और भीतर ही भीतर मत पेटियों को इधर-उधर करने की योजना चलती रहती है.

आज़ादी के बाद की राजनीतिक उलटफेर व्यवस्थाओं में लोकतांत्रिक जन प्रतिनिधि के लिए चुनावी प्रक्रियाओं का आयोजन चुनावी वादे, चुनावी मौसम, चुनावी रंग, चुनाव के दौरान आदमी के वोट की कीमत यानी पूरे चुनावी जो राबदौर हैं, उससे मोहभंग की स्थिति उपजी है. दशकों से लोग चुनावी माहौल को देखते हुए अपना मत देने के बजाय घर में रहते हुए टीवी पर देश दुनिया की सूचनाओं से लैस होना बेहतर समझते हैं. दूसरी ओर लाइन में लगे रहने के बावजूद आपका वोट कास्ट कर दिया जाता है और बिना वोट दिए मतदाता को घर का रास्ता दिखा दिया जाता है. स्वस्थ लोकतान्त्रिक सिस्टम का  हर खम्भा आज चरमरा चुका है, जिसका यहाँ कविताओं में दर्ज़ होना उसकी एक बानगी भर है. आम आदमी की आस्था इन चार खम्भों में से किसी पर नहीं रह गई- न न्यायालयों पर, न सरकारों पर, न व्यवस्थाओं पर, न व्यवस्थाओं को संचालित करने वाली संस्थाओं पर .

आज़ादी के बाद दशकों तक एक उम्मीद आज़ाद सपनों के साथ चलती रही पर धीरे-धीरे राजधानियों के भीतर व्यवस्थाओं के मकड़जाल और व्यक्ति की अवसरवादिता ने आम आदमी के सपनों पर शटर लगा दिया. धूमिल, नागार्जुन, त्रिलोचन, सर्वेश्वर आदि जन कवियों ने अपने समय की इन व्यवस्थाओं के खिलाफ एक रचनात्मक प्रतिरोध तो दर्ज किया ही था लेकिन तब से लेकर आज तक के समय में हम जितने भी अत्याधुनिक हो चुके हों हर मामले में, हमारी व्यवस्थाओं का पहिया भी  चोर पंचर हो गया है. इस संग्रह की एक कविता में आम आदमी की विवशता को कवि ने बड़ी गम्भीरता से उजागर किया है कविता है – “मैं गुनहगार हूँ/ क्यूंकि हत्याएं होते देख रहा हूँ और चुप हूँ/ और वे भी चुप हैं जिनकी हत्यायें होती आ रही हैं/ वे भी चुप हैं / जो अगली पंक्ति लिखे जाने तक मारे जा चुके होंगे.

‘संसद की मण्डी’ कविता में कवि का आक्रोश चरम पर है. जो संसद आज़ादी के बाद भरोसे, आस्था विकास, विश्वास का केंद्र बना, वही बाद में अवसरवादी जननायकों के लिए एक ‘खेल की मण्डी’ में तब्दील हो गिया, जहाँ जन प्रतिनिधि नई-नई योजनाओं के भीतरी-बाहरी उधेड़बुन में लगा रहा. कविता यह बताती है कि वक्त की सुइयों में व्यवस्था हर पल बदलता गया – “एक शहंशाह/ मुल्क की जम्हूरियत को/ हर रोज़ ऐसे ही चरता है/ तब जाकर अंतर्राष्ट्रीय पखवाड़े में/ किसी राष्ट्र का नक्शा विकसित देशों सा दमकता है. “ 

जब राजधानियों के शहंशाह हांक रहे हो राजधानियों को मनमौजपने से, कब्रगाह जिन्दा लाशों से पटता जा रहा हो, दादा-पिता के आँखों के सपने पनियाने लगे हों, अलबत्ता उनका इतिहास भर-भराकर ढह रहा हो,  घटनाओं के दहशत में बेबस जीवन साँसें भर रहा हो, समर के फूलों से धरती लाल होती जा रही हो, लोकसभा के चौखट पर तिलचट्टे की कतारें घुसी हो, इन्कलाब के चेहरे पर देशद्रोह की कालिख पोती जा चुकी हो, अपराध बढ़ सके इसके लिए हमारी नींद पर जहरीले सपनों का छिड़काव किया जा रहा हो, – इन सारी स्थितियों को देखते हुए एकबारगी ये पंक्तियाँ सोचने को हमें विवश करती हैं कि हम सच में क्या राजधानी में बस रहे हैं. मनुष्य की स्मृतियों में बहुत-सी चीजें बसती और गायब होती रहती हैं. पिछला पन्ना भूलता जाता है और नया बहुत कुछ जुड़ता जाता है . लेकिन ‘राजधानी’ संग्रह की ये कवितायेँ आपकी स्मृतियों को नए सिरे से इन सारी घटनाओं का साक्षी होने के लिए विवश करती हैं, जिसमें जीते हुए हम पुरानी घटनाओं को भूल चुके होते हैं. ये कवितायें उन सारी स्मृतियों के कोलाज को फिर से जिन्दा कर देती हैं और एक सवाल हमारे दिमागों में यहीं से कौंधता है बार-बार – “क्या आज़ादी का मतलब मेहनतकश को गुलाम बनाना है/ और गुलामों को दाने दाने का मोहताज बनाना है.

इन कविताओं से गुजरते हुए इस तथ्य से भी वाकिफ होते जायेंगे कि व्यवस्था की इस पोल पट्टी में जननायकों की देख रेख में चल रहे बूचड़खाने में आम आदमी समर्पण में खड़ा है. इस तीन से होते हुए इस यात्रा की यानी संग्रह की अंतिम कविता तक आते-आते यह व्यवस्था ‘आतंकवादी शिविरों’ में तब्दील हो जाती है और जहाँ आकर लोकतांत्रिक ढाँचे की एक ऐसी सच्चाई की ओर कवि के ये शब्द एक सूत्रवाक्य की तरह देखने को मिलते हैं कि ‘यहाँ आकर सवाल और जवाब की  गुंजाइश खत्म हो जाती है.’ लोकतांत्रिक ढांचे का हर एक खम्भा दरारों से दरका हुआ मिलेगा. धूमिल ने अपने समय में जो कहा था, ‘आज़ादी क्या सिर्फ तीन थके हुए रंगों का नाम है/ जिसे एक पहिया ढोता है’ और धूमिल से भी आगे ‘राजधानी’ का कवि कहता है – “रिक्शे पर लदे हुए हम/ यह नहीं जान पाए/ कि रिक्शा चालक की मौत के बाद/ एक पहिया/ राष्ट्रीय ध्वज के बीचो बीच पाया गया/ सफेद रंग का एक टुकड़ा भी जेब में आधा फटा पड़ा था.” 

ये रिक्शा एक देश है और इस पर चढ़े हुए हैं हम सब जन जन. रिक्शा चालक यानी देश चलाने वाला मेहनतकश जब मर गया तब क्या बचा…यह कविता एक गम्भीर सवालिया निशाँ छोड़ जाती है इस देश के चालकों पर कि असल में देश का वास्तविक चालक कौन है- जननायक या रिक्शेवाला यानी मेहनतकश. यह एक कवि का साहसिक कदम है, जहाँ व्यवस्था को पूरी तरह से नंगा करके जस का तस दिखाते हुए जनता को जागृत करते हुए चेताता है और ऐसा कहते हुए कवि बिलकुल डरा हुआ नहीं है बल्कि निडर होकर यह घोषित करते हुए लिखता है कि – “यह लिखते हुए मैं देशद्रोह के दायरे में खड़ा हूँ” 

इस पूरे संग्रह में कवि की यात्रा एक ओर मुक्तिबोध की कविता ‘अँधेरे में’ की याद दिलाती है, अंतर बस इतना है कि वहाँ कविता का नायक या आदमी सपने में या अवचेतन में अपनी भीतरी यात्रा से शहरों और इलाकों के, गश्त लगाते हुए बेचैनी और विवशता से भरा है बस पूरी तरह से चक्कर लगा रहा है और ‘राजधानी’ संग्रह की कविता के कवि की नागरिक यात्रा जागते हुए सजीव सचेत अवस्था में जारी रहती है. एक सोई आँखों का अँधेरा है, एक जगती आँखों का अँधेरा. मूल यही है कि अँधेरा भीतर भी है और बाहर भी. अंधेरा हर ओर है- भीतर भी और बाहर भी. दूसरी ओर इससे गुजरते हुए धूमिल की कवितायेँ  ‘संसद से सड़क तक’,  ‘सुदामा पाण्डे का प्रजातंत्र’ सामने नाच उठता है. कुछ कविताओं में गुस्से और आक्रोश का स्वर धूमिल से भी बहुत आगे का सच बयां करती है– “मैं देख रहा हूँ/ ये मुल्क एक बड़े औद्योगिक घराने में बदल रहा है/ कारोबारी की हिफाजत में कानूनी कड़ाह उबल रहा है…”

आस्था’ कविता में भक्त और श्रमिक, भक्ति और श्रम को लेकर कविता एक बड़ा सवाल करती नजर आती है – “कैसे कहूँ आस्था बलवान है या भगवान !” युद्धों के इश्तहार, ईश्वर कहीं यदि है तो, मुख्यधारा को जिन्दा रखने की खातिर, आदि कविताएँ व्यवस्था को एक सूक्ष्म नजरिये से देखने की एक पैनी नजर की मांग करती है.

‘ओ, लोकप्रिय! देश’ कविता इस कविता संग्रह की लम्बी और महत्त्वपूर्ण कविता है. बारह पृष्ठों में फैली यह कविता एक समय विशेष में दुनिया भर के देशों के भीतर चल रही सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक सांस्कृतिक टकराहटों की शक्लों में दर्ज है. इससे गुजरते हुए आप महसूस करेंगे कि एक नजर में देश दुनिया की खबरें चल रही हैं. एक समय विशेष की ये खबरें हमारे सामने से गुजरते हुए देश-दुनिया के अलग-अलग भू-भागों में घट रही घटनाओं को रख रही है. जैसे – नक्सली हिंसा में कोबरा बटालियन की खबरें, विश्व आर्थिक मंच पर भारत की स्थिति, कुष्ठ रोग केंद्र में सेक्स म्यूजियम को मंजूरी, जंगली जातियों पर गोला बारूद का कहर, लन्दन की नीलामी में गांधी का चरखा चक्र चश्मा की नीलामी, बटालियन ‘ऑफ्फब्लड’ जमीन के नाजायज़ इस्तेमाल आक्रोशित है आदि आदि खबरें मिलती हैं. इसे पढ़ते हुए रघुवीर सहाय की कविताएँ सामने आ जाती हैं. रघुवीर सहाय खबरों की घटना से इतर जो घटना के भीतर घटना थी, उसको कविता में लाते हैं और अनिल पुष्कर की कविता में घटनाओं के साथ देश और उसका काल भी आता है. ये घटनाएँ घटनाओं के भीतर की घटना और भीतर की संवेदना को भी उकेरती है, जो कहीं न कहीं मानवता को मर्माहत भी करती है.

‘ओ, लोकप्रिय देश!’ पर हर आदमी को बात करनी चाहिए. इस एक लम्बी कविता में भू-मंडल का हर छोर खुलता नजर आता है. कवि पूरी दुनिया में भ्रमण करता है, लोकल से ग्लोबल तक की आवाजाही कविताओं में देखी जा सकती है-एक वैश्विक यात्रा .अल्जीरिया, सीरिया, अमेरिका, संयुक्त राष्ट्र संघ, भूटान, सोमालिया यानी विकसित देश और तीसरी दुनिया के देशों की विविध सूरतें न्यूज के हवाले से देखी जा सकती है. यह इस कविता की खासियत है कि कविता रिपोर्ट की शक्ल में आती है- यानी न्यूज की शक्ल में, फिर कविता अपनी बात कहती है और फिर अंत में कविता रिपोर्ट की बात करती है. जोकि शायद कविता की आंतरिक संरचना में यह पहली बार हुआ होगा ऐसा मैं यकीन से कह सकती हूँ. एक बानगी देख सकते हैं यहाँ- “इधर व्हाइट हाउस में हिंसा नियंत्रण पर फैसला आया…/इधर एक दुर्घटना से सदमे में डूबी संसद…/ इधर पवित्र गंगा के किनारे प्यूरीफायर कम्पनी ने गैलनों पानी पिलाया…/इधर सीरिया में युद्ध जारी है…/ये कविता नहीं देश की खबरें बता रही हैं…/कविता चिल्लाई-/ ये कैसा चलन है/अँधेरे की सियासत है/ सियासत बोली- हम अन्धेरा मिटाकर रहेंगे.”

भारत  में जब पहली बार लिब्रलाइजेशन यानी उदारीकरण आया था तब पूरी जमात को यह मालूम हुआ कि जो सूदखोरी, जो कर्ज़ और जो लोगों की सहूलियतें हैं, उनकों पाने के लिए क्या क्या नई नीतियाँ और नए नियम बनाये जा सकते हैं. सरकारों ने उस वक्त बैंकों का राष्ट्रीयकरण यानी बैंको को सरकार के अधीन कर दिया, जिसके कारण हुआ यह कि जो मूलभूत बदलाव पूरी दुनिया में आ रहे थे खासतौर से बाज़ार के लिहाज से और बाज़ार में आ रही चीजें वो जो मनुष्य को आधुनिक समय में बहुत सहूलियतें दे सकें जैसे कार, सोफे, टीवी, फ्रिज, कूलर आदि आदि . मनुष्य ने बैंकों से कर्ज लेकर के बैंकों से सहूलियतें लेकर के इन सारे सामानों को घरों तक लाने में एक साझेदारी निभाई बाज़ार और सरकार के साथ. इसके साथ ही साथ इस उदारीकरण की पाठशाला से जब कवि गुजर रहा था तो उसने देखा तकरीबन बीस वर्षों तक तो चला मगर अब ये एक नये स्वरूप में नहीं आएगा. लोगों की जेब में इतने भी पैसे नहीं थे यानी एक ख़ास तरह का तबका जो आज़ादी के बाद मिडिल क्लास जो तैयार हुआ था. उच्च मध्य वर्ग उसने तो उन सहूलियतों को हासिल कर लिया लेकिन उससे भी बड़ा तबका तादाद में मध्यवर्ग था और निम्न मध्यवर्ग था. उस तक ये सुविधाएं कतई नहीं पहुँच पा रही थी. उसके दो कारण थे एक सरकारी तनख्वाहों का बड़ी मात्रा में न होना और जब ये नहीं था तो बैंकों का राष्ट्रीयकरण में सबसे ज्यादा योगदान इनका ही रहा है. सरकारी नौकर ही थे जिनके बड़ी मात्रा में एकाउंट खुले हुए थे. जितने सरकारी दफ्तर थे नौकरियों के वो सब एकाद बैंकों के हवाले ही थे. ऐसे में एक नए अर्थशास्त्र की जरूरत पड़ी. जहाँ नव उदारवाद आता है कवि ने इस बात का जिक्र किया है अपनी कविता ‘उदारीकरण की पाठशाला में’, “और वे जो उदारीकरण की पाठशाला में हाज़िर हैं/ नया अर्थशास्त्र ले आये हैं.” उदारवाद गया नहीं नये अर्थशास्त्र के साथ नव उदारवादी स्वरूप में सामने आ गया. ढाँचा और सहूलियत भरा हो गया, और खुलापन आ गया, अब पूरी दुनिया में हमारे बाज़ार जाने लगे और सारी दुनिया के लिए भारत के दरवाजे खुल गये और कवि इस बात जिक्र करते हुए  कहता है, “उदारीकरण की पाठशाला में वे पका रहे हैं सपने-मीठे और रसदार/ गुदेदार और रंगीन,/ जिनके फूल ठीक उन मौसमों में खिले/ जब तख़्त पर  मस्जिद और मन्दिर के दावेदार/ याकि शान्ति की बात करनेवाला बिचौलिया/ संसद में शपथ ले रहा है.”  इस नए अर्थशास्त्र को कवि ने इस कविता में समेटकर रख दिया. यह कविता हर उस हिस्से की तरफ मुड़ जाती है, जहाँ कवि सीधे-सीधे कारस्तानी कारगुजारी और सत्ता के जो नये करमचन्द थे उनको देख रहा है. वो कह रहा है, “हम सही समय के इन्तजार में/ निशाना साधने को कठपुतलियों की डोर थामे/ सावधान मुद्रा में खड़े हैं/ वे अधीर लोगों पर फेंकते हैं  कंटीले अपराधों के जाल/ उत्पीड़कों ने तय किये कानून कि/ किस समूह का कितना मांस रोज छांटा जाय/कितने मजलूम पेट काटे जायेंगे/ किसके हिस्से की ज़मीनें लूटी जायेगी/ किन अस्मतों पर दाग छोड़े जायेंगे/…किन पर खंजरों की किस्मत अजमाई जायेगी.”

नई आर्थिक नीति किन किन जमातों के ठिकानों पर हमला करेगी और किन किन के भीतर की खुशियाँ और सहूलियतें छिनने की कोशिश करेगी, नव उदारवाद का यह जो क्रूर चेहरा है कवि ने देख लिया है और बड़ी सहूलियत के साथ कविता में वे इसे दर्ज करते हैं. इस तरह से कवि आगे कहता है कि “हमारे पास सहूलियत आ गई/ तो हमने  क्या किया?/ हमारा वो जो तबका है/ जो तम्बाकू खाने का आदी है लोअर क्लास.” कवि कहता है “हमने तो तम्बाकू की पत्तियाँ रगड़/ चिंताओं को फूँक मार उड़ाया है/ जो निम्न वर्ग है वो तो अक्सर अपनी सारी चिंताएं फूंक मारकर उड़ा देता है.”

इस तरह वे कहते हैं कि “जो हमारी चिंताएं हैं उनकी गंध हमें ही नहीं आ पाती/ अफ़सोस अपने ही सड़े हुए अंगों की गंध नहीं आती/ हमें मालिकों का जुल्म नहीं डराता/ हमें अपनी संतानों की गिनती में कमी नहीं खलती. आखिर कब तक हमारी तकदीर पर फुंफकार मारे बैठा रहेगा ये ईश्वर.”

यानी पहली बार इन जमातों का ईश्वर बन गया सरकारी अमला और प्राइवेटाइजेशन का सबसे बड़ा ईश्वर पूंजीवाद इसकी तरफ इशारा करता है. जो देने वाला दाता है उसी को ईश्वर कहते हैं जो राजा था पहले ईश्वर था. बाद में इन पूँजीपतियों को ईश्वर कहा जाने लगा. कवि कहता है इन पूँजीपतियों से क्या सरोकार रह गया. अंत में एक निष्कर्ष की तरफ ले जाना चाहता है कवि – “हमें बंदूक चलानी होगी, हमें दमन के विरुद्ध अंजाम तक लड़ाई ले जानी होगी, आखिर कब तक हमें गुर्ब्तों का कहर डराएगा. आखिर कभी तो हमारी आँखों में सुबह का नूर आएगा.”

कवि यह जो बंदूक चलाने की बात करते हैं वह सीधे सीधे उस अर्थ की तरफ नहीं ले जाती हमें, आपको एक पल को कुछ और खतरा लग सकता है कि सीधे बंदूक उठाओ और गोली मार दो. कवि का मानना है कि विरोध करने के जो भी तरीके होते हैं सबसे ताकतवर तरीके जिनसे मारा जा सकता है क्रूर व्यवस्था को, वो अपनाओ, और इस प्रक्रिया में वे रचनात्मक प्रतिवाद और हस्तक्षेप को सबल सशक्त पक्ष मानते हुए कविता को बंदूक की तरह उठा लेते  हैं और और वो बंदूक कविता ही है. इस पूरे संग्रह में कवि की कविता एक गोली की तरह ही दगती है-व्यवस्था पर, अवसरवादी जननायकों पर, लोभी नेताओं पर, सूदखोरों पर आदि आदि.  तो कवि ने अपनी बंदूक चला दी. अब जनता अपनी बंदूक चलाए. अपने अपने तरीकों से. हर एक के पास अपने अपने तरीके हैं अपनी-अपनी बंदूकें हैं.

उदारीकरण का यह पाठ पढ़ते पढ़ाते कवि एक दूसरी पाठशाला में जाता है और नव उदारवाद की सबसे स्पष्ट दिखने वाली जो कातिलाना उसकी अदा है, जिसमें हमें सुंदर साफ़ शफ्फाक लड़कियाँ दिखाई देती हैं मगर उनकी तकलीफ कोई नहीं देख पाता क्यूंकि उन्हें एक खास किस्म के माल में खास किस्म की ड्रेस के साथ खड़ा कर दिया जाता है. कवि उसके दर्द और उसकी पीड़ा की ओर संकेत करता है – “तुम्हारे चेहरों पर लगी पालिस/ छुपा देती है झुर्रियां…” यानी वे चमका के चेहरा आती हैं मॉल में और चंद पैसों की नौकरियां “और साथ ही मजबूरियां/ एक ब्रुश की चमकदार परत के भीतर तुम्हारी उम्र पर छाई है/ कुछ पल की रौशनाई.”

रोज़ घंटों खड़ी रहती हैं एड़ियों के बल बारह से पन्द्रह घंटे कोई उनके एड़ियों का दर्द नहीं समझ पाता. वो सिर्फ वो ही देख पाती हैं, जिन्हें दर्द हो रहा है. कवि को वो दर्द दिखाई दे रहा है. नई नव उदारवादी पाठशाला का दर्द और कवि इस तरह पहुँचता है कि “यह उदारीकरण की नई खेंप है/ लड़कियाँ ग्राहकों  के लिए सजे सामानों की तरह खड़ी हैं.”  लड़कियाँ भी अब एक प्रोडक्ट हो गई हैं. उनके पास जान नहीं बची है, प्राण नहीं बचे हैं, जिन्दापना नहीं बचा है जैसे हैंगिंग किये हुए कपड़े टंगे हुए हैं मॉल के भीतर वैसे ही लड़कियाँ उन्हीं कपड़ों के बगल में खड़ी हैं, उन मॉडल्स की तरह जिन्हें कपड़े पहनाये गये हैं वो भी अपने तन को ढके हुए उन्हीं बुतपरस्तों  की तरह खड़ी हैं. बुत बनी हुई. सुंदर बुत. यह उदारीकरण का एक नया क्रूर चेहरा है. जहाँ खून सूख जाता है, जिन्दगी चली जाती है, प्राण नहीं रह जाते. केवल मांस का एक आदमी एक ढाँचा, एक सांचा बना रहा जाता है. यह उदारीकरण का एक समूचा बड़ा भंडार है.

‘भूख की भाषा पढने से पहले’ कविता में कवि की चिंता भूख पर भी है और भूख की भाषा पर भी है और भूख और भाषा को पढने से पहले आने वाले समय पर भी है. यानी कवि तीन-तीन, चार-चार तरह से जागरूक लोगों की तरफ इशारा करता है. एक भूखा आदमी किस तरह बुखार में तप रहा होता है. वो बुखार शरीर का ताप नहीं है, वो बुखार उसकी जिन्दगी का ज्वार है. जो हमेशा उठता रहता है. जैसे चन्द्रमा के जितने करीब आने से समुद्र में ज्वार आ जाता है वैसे ही जिन्दगी में भूख का ताप बढ़ जाने से जिन्दगी में ज्वार आ जाता है. भूख जितने करीब आएगी ज्वार उतने करीब आएगा और यह भूख राष्ट्रीय से अंतर्राष्ट्रीय भूख कैसे बन जाती है. कवि इस तरफ पूरी कविता में जोर देकर के एक संकेत देता है. और इस ओर अंत में पहुँचता है कि भूख के खिलाफ जो अधिकार मनुष्य को मिले हैं उनका पालन और उनका इस्तेमाल उपयोग करना पड़ेगा. जो कि कवि एक निष्कर्ष देकर कहता है कि “क्या राष्ट्र उसकी मौत को सलाम कर­­­ता है?/ भूख और गरीबी की फ़िक्र करता है?“

कवि कहता है दुनिया का कोई राष्ट्र भूखे आदमी की परवाह नहीं करता है और न ही उसकी गरीबी और मौत की परवाह करता है. तो ये ती- भूख, गरीबी और मौत तीनों को भी राष्ट्र की चिंता नहीं करनी चाहिए. इन तीनों को एक ही राष्ट्र में रहते हुए एक नये किस्म का राष्ट्र बनाना चाहिए, वह जिसमें भूख न रहे, वह जिसमें गरीबी न रहे ऐसा राष्ट्र और वह जिसमें भूख और गरीबी से मौत न हो एक ऐसा राष्ट्र. आदमी अपनी जिन्दगी को जीते जीते मरे भूख और गरीबी से न मरे. ऐसा राष्ट्र हो.

इसी तरह की अगली कविता ‘डर क्रोध और भूख’ है, जिसमें “डर आदमी को मार देता है/ क्रोध आदमी को मार देता है/…भूख आदमी को मार देती है/ चिंता आदमी को मार देती है.“ और कवि इस कविता में दार्शनिक पक्ष ले करके व्यावहारिक निष्कर्ष तक पहुँचता है और फिर अंतर्राष्ट्रीय पैमाने से ही वो पेंडुलम की तरफ हिलाता डुलाता चलता रहता है और इसके बाद वह अपना गुस्सा उतारता है तो सीधे उन न्यायपालिकाओं पर कार्यपालिकाओं  पर या विधानपालिकाओं, परिषदों पर जहाँ संसद चल रही है. संसंद कई तरह से चलती है कवि के भीतर भी एक संसद चलती है. धर्म के भीतर भी एक संसद चलती है और संसद इस देश के भीतर भी चलती है इस देश को चलाने के लिए. तो कवि कई तरह के संसदों के भीतर से होकर गुजर जाता है और उनकी खामियां खराबियाँ निकालते हुए आगे बढ़ जाता है कि उसके शीतकालीन सत्रों में क्या क्या होता है. कविताएँ जब आप पढ़ेंगे तब आपको उसकी गहराई  का पता चलेगा और कवि उन मायानगरी के बुतों की भी बात कर लेता है, जिनमें जान और प्राण नहीं हैं फिर भी वो दुनिया मजबूत, सबसे मजबूत और सबसे महत्त्वपूर्ण और सबसे महंगे बुतों में शुमार हैं. हमारे अदाकारों के बुत और कवि इसी तरह से कल जहाँ सूअरबाड़ा था हमारी अपनी-अपनी संसदों की तरफ इशारा करता है, वो संसद केवल और केवल ये संसदें नहीं हैं, जहाँ खेले जाते हैं नेताओं के फैसलों के जो खेल हैं. ये संसद तो हमारे आपके देश में ही नहीं, पूरी दुनिया के तमाम देशों की संसदें हैं, जहाँ हम अपनी-अपनी बैठकों की संसदें भी रखते हैं और इस तरह ‘अंत तक सिर्फ वही बचेंगे’ यह कहते हुए कवि एक खास इशारा कर देता है कि “डरो!/ तुम्हारे पीछे कोई चल रहा है/ तन्त्र चल रहा है/ सरकारें चल रही हैं/ व्यवस्था चल रही है.”

कवि कहता है कि डरो अगर ये चीजें तुम्हारे पीछे चल रही हैं. अगर ये चीजें तुम्हारे आगे चल रहीं होती तो बात बनती, लेकिन तुम्हारे पीछे चल रही हैं ये चीजें यानि तुम्हें डराया जा रहा है. तुम्हें दौड़ाया जा रहा है तुम्हें धमकाया जा रहा है. ये चीजें आगे चलती और मनुष्य पीछे पीछे चलता तो बात थी. तब देश विकसित हो रहा होता. जब आदमी के पीछे चलने लगें सरकारे , किसी व्यवस्था के पीछे चलने लगें सरकारें तो  बड़ा मुश्किल है इस खेल को समझना.

और जो नहीं डरते उनका मरना सुनिश्चित किया जा रहा है यानी इस मौत में एक रहस्य छिपा हुआ है. जो नहीं डरते हैं व्यवस्था से, जो नहीं डरते हैं सरकारों से और जो नहीं डरते तन्त्र से उन्हें मार दिया जाएगा और अंततः सिर्फ वही बचेंगे, सरकार सत्ता और शासकों का दल, जिनके साथ चल रहा है अंत तक सिर्फ वही बचेंगे.

‘राजधानी’ काव्य संग्रह की यात्रा में शामिल होने पर यह एहसास लगातार बना रहता है कि  शास्त्र पैदा करने के लिए शास्त्रों की जरूरत नहीं. शस्त्र चलाने के लिए शास्त्रों की जरूरत पड़ती है, शास्त्र कभी शस्त्र से रचे नहीं गये और शस्त्रों की कभी शास्त्र पढ़ाया न जा सका. इसलिए शस्त्र और शास्त्र एक दूसरे के सामने सशस्त्र खड़े हैं. कभी शास्त्र जीतता है तो कभी शस्त्र. कभी शस्त्र हारता है तो कभी शास्त्र. मगर दोनों एक दूसरे के बगैर कभी सामने नहीं आये. जब-जब भी शास्त्र आये, शस्त्र सामने आ गये और जब जब भी शस्त्र आये शास्त्र सामने खड़े थे. शास्त्रों का जखीरा है और शस्त्रों का जजीरा और दोनों के सामने कायदा है कविता का अलजजीरा. अमूमन तो ये कवितायें सन 2011-2012 की हैं, जो प्रकाशित हुई 2019  में क्योंकि इस संग्रह की कवितायेँ समय-समय पर अपने रचे जाने के समय से आजतक अलग-अलग पत्रिकाओं में छपती रही हैं. इन कविताओं के भीतर हर युग और हर काल का सच, और इस बीच व्यवस्थाओं में के भीतर-बाहर का सच भी छिपा हुआ भी है और मुखरित भी. .

आलोचना वो भी विशेषकर कविता की आलोचना मात्र शब्दों की आलोचना नहीं होती बल्कि शब्दों भावों के गूढ़ अर्थ के साथ साथ कोरे सपाट पन्नों पर फैले अर्थों की भी आलोचना होती है. कविता के साथ. पन्नों के हाशिये और केन्द्रों की भी आलोचना होती है. कविता शब्दों का कोलाज न होकर जीवन, समय और समाज के महीन धागों से बने बुने गये एक नई रचनात्मक काया का हमारी दुनिया में नया प्रवेश होता है नई देह, नए भाव, नई दृष्टि, नये संदेश नये अवतार में. कविता के भीतरी खोहों में गहरी और बहुपक्षीय पैठ जीवन और जगत की इस नई काया को एक नया आयाम देती है एक नई परिभाषा देती है.

‘राजधानी’ संग्रह की पूरी कविताएँ एक ख़ास समय विशेष की नहीं हैं. इन कविताओं से गुजरते हुए आप देखेंगे कि ये कविताएँ एक लम्बी यात्रा की साक्षी हैं. यह सिर्फ एक समय, एक व्यवस्था, एक विचारधारा पर ही सवाल नहीं खड़ा करती बल्कि समय-समय पर अलग-अलग व्यवस्थापकों द्वारा चलाई गई नीतियों और उनकी प्रक्रियाओं पर भी एक गहरी नजर है और दो टुक शब्दों में. किसी एक धारा, विचारधारा, नीतियों-रीतियों से न गुजरते हुए इस संग्रह की कवितायेँ सिर्फ देश के हालात से होकर गुजरती हैं और कविता के कैनवास को तोड़कर एक व्यापक-विस्तृत फलक तैयार करती हैं चेतना का, दृष्टि का, नागरिकता का.

लेखिका का परिचय
मुन्नी गुप्ता
असिस्टेंट प्रोफेसर, हिंदी विभाग, प्रेसिडेंसी विश्वविद्यालय, कोलकाता
Email-munnigupta1979@gmail.com

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