विशाखा मुलमुले की कविता ‘नदी के तीरे’ तथा अन्य कवितायेँ

विशाखा मुलमुले
1 ) रोटी , रेणुका और मैं

हमारे मिलने का समय एक ही होता है अक्सर

वह जब आती है मेरे घर
मैं बना रही होती हूँ रोटियाँ
वह अपने घर से रोटियां बनाकर
उज्ज्वल भविष्य के लिए
निकलती है कमाने रोटी
वह आंध्रप्रदेश से तेलंगाना होते हुए
आई है महाराष्ट्र में रोटी कमाने
मैं छत्तीसगढ़ से मध्यप्रदेश होते हुये
अब महाराष्ट्र में बना रही हूँ रोटी
रोटी अपने ही तरह हमें घुमा रही है
धरती के चकले पर
हम घूम – घूम कर बना रहीं हैं
अपने – अपने हिस्से की रोटियां
मैं रोटी बनाते समय हिन्दी गीत गुनगुनाती हूँ
वह झाड़ू को थामे मराठी भाव गीत गाती है
मेरे सुख की रोटी पकती है हिंदी में
उसके मेहनत की रोटी मराठी में
मैं मराठी भाषी रोटी पर घी के लिए हिंदी की शरण में जाती हूँ
वह तेलगु भाषी रोटी संग साग के लिए मराठी की शरण में आती है
रोटी हमें सर्वभाषी बनाती है
रोटी हमें जीना सिखाती है
हमनें कुछ हद तक अदल – बदल लिए हैं
अपने खान – पान भी
अब वह इडली डोसा के एवज में खाती है भाखरी
और मैं भाखरी के एवज में बदलाव के लिये खाती हूँ इडली
पर तृप्ति हम दोनों को गेहूँ की रोटी खाकर ही मिलती है
रोटी हमें सर्वाहारी बनाती है
रोटी हमें जूझना सिखाती है
रोटी के इर्दगिर्द बुनी इस कविता में
दोनों पात्रों के नाम मैंने बताए ही नहीं
तो ,
उसका नाम है रेणुका और साधु है उसका पुरुष
कलयुग में निर्व्यसनी स्त्री को मान देने वाला
मेरा नाम है विशाखा और साधु है मेरा भी पुरुष
कलयुग में निर्व्यसनी स्त्री को मान देने वाला
हम दोनों के घर में हर दिन महकती है सुख की रोटियाँ
2 ) नदी के तीरे
किशोरवय बेटा पूछता है अक्सर !
कैसे देख लेती हो बिन देखे
कैसे सुन लेती हो परिधि के बाहर
पिता तो देखकर भी अनदेखाकैसे झाँक लेती हो मेरे भीतर

 

सुनकर भी अनसुना
और पहचान कर भी अनजान बनें रहते हैं
मैं कहती हूँ , पिता है पर्वत समान
जो खाते है बाहरी थपेड़े
रहते हैं मौन गम्भीर
देते हैं तुम्हें धीर
मैं उस पर्वत की बंकिम नदी
टटोलती हूँ तुम्हारे समस्त भूभाग
आजकल की नहीं यह बात
इतिहास में है वर्णित
सभ्यताएं पनपती है नदी के तीरे !
3 ) इतिहास में
दिवसावसान के कुछ क्षणों पहले
चहक भरी पुकार लिए आती हैं नन्हीं गौरैया मेरे घर के आंगन में
उनकी चहक भूख के लिए और मेरी भूख चहक के लिए
हम दोनों के मध्य रहते हैं कई कपोत
कपोत कल्पना में नहीं , वास्तविक
भूख मिटाने की प्रतिस्पर्धा लगी होती है
दिनभर कपोतों और गौरैया के मध्य
बाहुबली अक्सर ही विजय प्राप्त करतें है
स्त्रीयों की तरह गौरैया भी रह जाती हैं केवल साक्षी
हमारे युग के इतिहास में स्त्रियाँ एवं गौरैया
दर्ज होंगी केवल गवाह के तौर पर
भूख मिटाने के किसी साधन के तौर पर
स्त्रियाँ जो स्वयं विलुप्ति के कगार पर खड़ी थी
बचाती रहीं विलुप्त होती गौरैया की प्रजाति को
स्त्रियां जिन्हें मिलती रहीं अब भी गौरैया की उपमाएँ
पर अफ़सोस ! बाहुबली ही लिखेंगे कलयुग का लेखा
और कुछ दो पन्नों में सिमट जाएगा हमारा इतिहास
4) और स्वतंत्रता फिर हाथ से निकल गई
तय की हम सखियों ने मिलने की जगह
मुक़र्रर किया दिन
अपने अपने पंथ का चुनाव किया
उत्साहित हुईं
भविष्य के सपने देखे
चार दिनों के स्वातंत्र्य की उम्मीदें भी पाली
पर बस एक समय एक साथ स्वतंत्रता का
बिगुल नहीं फूंका
कुछ ने ऐन मौके पर हाथ खड़े कर दिये
कुछ ने सम्पूर्ण स्त्रीजाति को ताक पर रख
केवल अपने क्षेत्र का पालन व संरक्षण किया
अंततः सन 1857 के स्वातंत्र्य आंदोलन की तरह
हम एकजुट न हुईं
और स्वतंत्रता हाथ से निकल गई
जबकि कमल और रोटी के तर्ज पर
हमनें पहुँचाये  व्यापक सन्देश
थे वे इस युग के पर थे रोटी के ही अधीन
संदेशों को बदलना ही था स्त्रियोचित संदेशों में
इस बार भी , हम बस रोटियां बाटती और बनाती रह गईं
मन का कमल तपिश में कुम्हलाता गया
हम मौकापरस्त न हुईं
और स्वतंत्रता फिर हाथ से निकल गई
परतंत्रता हमारे गुणसूत्रों में क्या कुंडली मार पैठ गई
जबकि , जब बापू चल रहे थे लाठी टेक
नमक सत्याग्रह का था वह समय
हम दौड़ रहीं थी पीछे ख़ून का नमक किये
बापू की लाठी न होने पर , बनी हम लाठी , दिया अपना कंधा
एक दिन भाग ही गए विदेशी देश छोड़
बच्चे , बूढे , जवान सबको मिली स्वतंत्रता
मवेशी , हवा , पंछी तो पहले ही थे स्वतंत्र
हम भारत माता की जय में अटक गईं
हम सोने की चारदीवारी में देवी
मिट्टी की चारदीवारी में बनी रहीं भोग्या
चारों खानों से चित्त हुईं हम
अचानक ही कच्छपों में बदलने लगी
समेटने लगी ख़ुद को अपनी ही देह में
और स्वतंत्रता दाएँ – बाएँ से गुज़र गई
 5) स्वाद का मनोविज्ञान

उसके शरीर में अंदरूनी चोटे थी

अनेक अदृश्य घाव मन पर बने रहते थे
वह खाने में हल्दी बहुत मिलाती थी
कुछ ज़ख्म खुले ही रह जाते थे
उस पर चमड़ी की परत जम ही नहीं पाती थी
वह लाल मिर्च से घबराती थी
खाने में मिर्च कम वापरती थी
वह दिन – रात खटती रहती थी
पोर – पोर से पसीना झरता था
उसके  खाने में नमक हमेशा ही अधिक रहता था
खेत- खलिहान से घिरा था उसका मायका
साग – सब्जी दूब की तरह मिल जाती थी
बचपन हरियल था उसका
बीते दिनों की याद में अनजाने में
वह खाने में धनिया बहुत डालती थी
गरम मिज़ाज के थे इस घर के लोग
बात – बात पर तनतनाते थे
वह गरम मसाला चुटकी भर ही डालती थी
वही मसालेदानी
वही पंच फोरन
वही मसाले
फिर भी हर स्त्री के भोजन का स्वाद क्यों होता अलग
इसके पीछे का क्या यही है रहस्य ?
 6) नमकीन नदी – स्त्रियाँ
स्त्रियाँ जानती हैं कीमियागिरी
वे धागे को मन्नत में
काजल को नज़र के टीके में
नमक को ड्योढ़ी में रख
इंतज़ार काटना जानती हैं
वे मिर्ची और झाड़ू से उतारती हैं बुरी बला
अपनी रसोई में खोज लेती हैं संजीवनी
कई बीमारियों का देती हैं रामबाण इलाज
अपनी दिनचर्या के वृत्त में भी
साध लेती हैं ईश्वर की परिक्रमा
माँग लेती हैं परिवार का सुख
कभी – कभी वे ओढ़ती हैं कठोरता
दंड भी देती हैं अपने इष्ट को
रहते हैं वे कई प्रहर जल में मग्न
सारे संसार को झाड़ बुहार
आहत होती हैं अपनो के कटाक्षों से
तब , तरल हो रो लेती हैं कुछ क्षण
दिखावे के लिए काटती हैं ‘प्याज’*
है ना ! प्रिय स्वरांगी*
प्याज के अम्ल से तानों के क्षार की क्रिया कर
वे जल और नमक बनाती हैं ,
जिसमें तिरोहित करती हैं अपने दुःख
बनती जाती हैं नमकीन
तुम पुरुष , जिसे लावण्य समझते हो !
7) निर्भया

उसने समय के परे लौट के देखा

आसमां में किया सुराख़
ज़मीं पर झाँक के देखा
अपने छिन्न – भिन्न वजूद को फिर से आंक के देखा
क्या , लगा है कुछ पैबंद
यह सोच के देखाक्या स्त्री कभी पुरुष के बराबर हो सकती है? | ड्रूपल
पर अफसोस !
शर्मनाक था और भी मंजर
शून्य को ताके बस कई समूह साथ खड़े थे
उसके नाम की तख्तियां हाथ में लिए खड़े थे
मोमबत्तियाँ पिघल पिघलकर दम तोड़ चुकी थी
आग को ज्वाला न बनते देख मिट चुकी थी
अब तो हर उम्र की स्त्रियाँ उसे बेबस दिखीं
कई अबोध उम्र में दुष्कर्म का शिकार हो चुकी थी
जो जिंदा बची बस लाश बनकर रह गईं
धर्म , अधर्म , नीति , निगाहों , वस्त्रों का मुद्दा बन गईं थी
कुछ विकृत मानसिकताएँ इंसानियत का बलात्कार करता रही
दरिंदों , पिशाचों की श्रेणी में समाज को ढकेलती रही
यह सब देख ,
वह क्रोधित , झटपटाती हुई सुराख़ पाट चली
पुनर्जन्म का विचार सिरे से पुनः त्याग चली ..
कवयित्री का परिचय – विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में कविताएँ, लेख, लघुकथाएं प्रकाशित।

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