भूख तथा अन्य कवितायें ( रेनू यादव )

रेनू यादव 

भूख
भूख
कई प्रकार की होती है
सत्ता की, दौलत की, ईज्ज़त की,
शोहरत की, सेक्स की

लेकिन एक भूख ऐसी होती है
जिसके लगने के बाद
अन्य सभी भूख
बेमानी हो जाते हैं ।

भूख भूख होती है

भूख भूख होती है
जिसे मिटाने की क़ीमत
संसद में चल रहे कैंटिन के दाम
से मत आँकों

फुटपाथ पर सोए
उस व्यक्ति से आँको
जिसने एक पपड़ियाई रोटी सुबह खायी थी
और दूसरी
अगली सुबह काम पर जाने से पहले
खाने के लिए बचा रखी है ।

भूख भूख होती है
उसकी क़ीमत किसी मॉल में बिक
रहे सिलबंद चकमक कम्पनी के
नाम से मत आँकों
किसी तराजू पर रखे बटखरे से भी नहीं

उस पहले इंसान से आँकों
जो छः महिने मेहनत करने के बाद
कुदरत की मार से बिछा
पड़ा है खेत में
या उस आखिरी आदमी से आँकों
जो मूसों की बिल से खोद-खोद कर
अनाज टोईया रहा है

भूख भूख होती है
भूख की क़ीमत उस आदमी
से मत आँकों
जिसकी थाली में बनी-बनायी
गरम-नरम रोटी समय से
परोस दी जाती है
उस औरत से पूछो
जो सबका पेट भरने के बाद
आखिरी में चोकर से
अपना पेट भरती है

भूख भूख होती है
भूख की क़ीमत उस गाय से मत आँकों
जिसका पैर छूकर पहली रोटी
समर्पित की जाती है
उस पालतू कुत्ते से भी नहीं
जिसके न्यूट्रिशियन का
खयाल रखा जाता है

भूख की क़ीमत उस गाय से पूछो
जिसने अपनी बछिया को दूध की
बूँद-बूँद लिए तड़पते देखा है
या अनेकों बछड़े जनमाने के बाद
लावारिस बैठी है सड़क पर
किसी मोटर के नीचे
दब जाने की खातीर
या
उस आवारा कुत्ते से पूछो
जो बार-बार दुत्कारे जाने के बाद भी
थूक घोंटकर आँसू पीकर
किसी खटपट की आवाज़
से छटपटाते हाँफते-हाँफते
दौड़े-दौड़े भागा आता है ।

 

तुम्हारा जाना

तुम्हारा जाना भी क्या जाना है
कुछ कुछ मुझमें रह जाना है

जैसे बची रही जाती हैं
तुफान के गुजरने के बाद
तहस नहस झोपड़ियाँ
पेड़ से टूटी हुई डालियाँ
बिखरे तिनके, सूखे पत्ते, जख्मी जड़ें
कली कचनार की क्यारियाँ

जैसे ओले के थपेड़ों से
टीसते घाव
आँसूओं के नूनछार से
गालों का छरछराना
अचानक से बंद करते हुए
दरवाजे से ऊँगलियों का पिस जाना

जैसे फसल की पराल
चूल्हे की बची राख
घर जलने के बाद धुँआता मन
जले कपूर के धब्बे
हवन की भभूत
चिता की अस्थि
या
ठिठकी धूप में
मुँह उचकाता चाँद। 


मुझे चाँद मत कहो

मुझे चाँद मत कहो

अगर कहना ही है चाँद
तो देखो उसके ऊबड़-खाबड़ जमीन को
और मेरी फटी बिवाईयों को
वर्षों से पड़ी चेहरे पर झुर्रियों को
घिसी रेखाओं में समायी कालीख को
और
भागते हाँफते जीवन को
कहो उसकी ऊर्जा की कहानी
जहाँ कदम रखकर भी नहीं रख पाते
उसे देखते ही समुन्दर में फूट
पड़ते हैं ज्वार-भाटे
और
मेरे अंदर के ज्वार-भाटों का
सदियों से सुलगते रहना
और तुम्हारी
पहुँच से दूर होना

उसकी घटती बढ़ती कला में
जुड़ती-छूटती उम्मीदें
उसकी जागने सोने की रहस्यमयता
से टूटती हैं नींदें
और मेरी उनींदों का भी
कभी पूरा न हो पाना

तुम उन सब गुणों को
छोड़कर दागविहीन
चमकती चमक
और दूर खड़े दुधिया चाँद को
चाँद कहते हो

यदि तुम्हें
चमकती चमक
और
दुधिया चाँद को ही
कहना है
चाँद
तो सच कहती हूँ
मुझे चाँद मत कहो !

गुमनाम

गुमनाम होना भी एक पहचान है
और मैं गुमनाम हूँ 

अधजली रोटियों का कच्चापन
पसाया हुआ माड़
साग की अलुणाई
कवर उठाए ऊँगलियों की पियराई
सुड़की हुई चाय का बट्टा
खा कर फेंकी हुई पतरी
जाड़े में ककटा बर्तन
कई दिनों से सड़ता डस्टबिन 

कंघी में फंसे बाल
शीशे पर चिपकी बिन्दी
बलाई लेती सेनूर भरी दीवार
कमीज की चिगूँरन
उखड़े हुए बटन
बिस्तर की सलवट 

मुँह लटकाएँ फूल
छत पर जमें पीपल
रात में घर की बुहारन
घर लौटते कदमों के कीचड़
चाऊर की फटकन
दाल की कंकड़

दातून का चिट्ठा
दऊरी की मूँज
गड्ढे का नर्कट
नहर की बेहा
सड़क में घुली कोलतार
बाज़ार में पिछवाड़े की दुकान
साड़ी में मॉडल की तस्वीर

अऊँसाती गर्मी
घुप्प अन्हार की दृष्टि
गूलर के फूल
भक्क से भभकती ढ़ीबरी
चन्न से चटकता बल्ब
बिना नाम के आख्यान

सब तो गुमनाम ही है
फिर भी होती ही हैं कहीं न कहीं

भला बयार की मासूम छूअन
पानी का रंग
शून्य का विस्तार
गंध का बिखरना
किसने देखा है
किसने पहचाना है भला ? 

कवयित्री भारतीय भाषा एवं साहित्य विभाग (हिन्दी), गौतम बुद्ध विश्वविद्यालय, ग्रेटर नोएडा में फेकल्टी असोसिएट हैं ।
संपर्क – renuyadav0584@gmail.com, renu@gbu.ac.in

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