चोरी- छिपे देवदासी प्रथा आज भी जारी

मनोरमा सिंह

कर्नाटक के नए बने जिले विजयनगर जो पहले बेल्लारी का हिस्सा था के कुडलिगे ताल्लुके में रह रही 22 साल की रुद्रम्मा (बदला हुआ नाम ) तक पहुंचना आसान नहीं था और ना ही उससे बात कर पाना। लगभग महीने भर की कोशिशों के बाद उससे बात करना संभव हो पाया था और वो भी स्थानीय युवक मेघराज की मदद से जो कन्नड़ के साथ थोड़ी हिंदी और थोड़ी अंग्रेजी भी जानते थे। बात शुरू करने से पहले मेघराज ने सचेत कर दिया था आपको जल्दी करना होगा क्योंकि रुद्रम्मा को अपनी माँ कृष्णम्मा ( बदला हुआ नाम, उम्र 40 साल ) के साथ खेत पर मजदूरी के लिए भी जाना है।

रुद्रम्मा से हम उसकी आगे की कहानी जानने की उम्मीद लिए मिल रहे थे जब फ़रवरी के आखिरी हफ्ते में उसे महिला एवं बाल कल्याण विभाग के तहत आने वाली संस्था देवदासी निर्मूलन केंद्र के लोगों की मदद से, स्थानीय पुलिस- प्रशासन द्वारा देवदासी बनने से बचा लिया गया था। प्रोग्राम ऑफिसर गोपाल नायक भी उसे बचाने की मुहीम में शामिल थे और हमारे साथ बातचीत में भी साथ थे। गौरतलब है कि कर्नाटक देवदासी समर्पण निषेध अधिनियम 1984 (2010) के तहत देवदासी प्रथा तभी से अवैध और दंडनीय अपराध है। लेकिन सरकार और कानूनी एजेंसियों की लापरवाही के साथ-साथ प्रचलित सामाजिक-सांस्कृतिक मान्यताओं के कारण उत्तरी कर्नाटक के कई हिस्सों में यह जारी है।

लेकिन फ़रवरी से जुलाई आने तक में उसकी कहानी बिल्कुल बदल चुकी थी, रेस्क्यू के समय जिस लड़के के साथ प्रेम और उसकी शादी की बात थी, उससे उसका अलगाव कुछ दिनों बाद ही हो गया था और अब रुद्रम्मा इस बारे में ज्यादा बताना नहीं चाहती बहुत कुरेदने पर उसने कहा लड़के के परिवार में इस रिश्ते को लेकर तनाव हो गया था, उनके लिए एक पूर्व देवदासी की बेटी को अपने घर की बहु रूप में स्वीकार करना मुश्किल हो रहा था और मेरे लिए भी ये तनाव ज्यादा समय तक झेल पाना मुश्किल हो रहा था, अब ठीक है मैं मजदूरी कर रही हूँ और परिवार का सहयोग कर रही हूँ।
लेकिन रुद्रम्मा ने पहले इस तरह अपने जीवन को नहीं सोचा था, कुछ साल पहले तक वह पढ़ने जाया करती थी, लेकिन आठवीं क्लास तक ही पढ़ सकी ,डांस और ड्रामा में उसे ख़ास रूचि थी, इसलिए नृत्य और अभिनय सीखने के लिए उसने एक इंसीट्यूट में दाखिला लिया, दो दिन सीखने भी गई लेकिन इंसीट्यूट में सिखाने वाले शिक्षक का व्यवहार उसे लेकर शालीन नहीं था, इंसीट्यूट के और आसपास के लड़के भी उसकी पृष्ठभूमि और उसकी माँ के सेक्स वर्कर होने का पता चलते ही उस पर टिप्पणियां करने लगे,फब्तियां देने लगे। उसने इंसीट्यूट जाकर सीखने के बजाय घर में रहना ज्यादा पसंद किया लेकिन अब भी उसे अफ़सोस है कि बाकी लड़कियों की तरह उसके लिए पढ़ना और नाचना, गाना सीखना एक सामान्य बात क्यों नहीं हो पायी?

फिर भी रुद्रम्मा के लिए स्कूल जाने के वो दिन सबसे खूबसूरत हैं, उसने बताया कि उसकी किसी भी देवदासी की लड़की से दोस्ती नहीं है बल्कि गांव की सम्मानित घरों की लड़कियां ही उसकी दोस्त रही हैं और रुद्राम्मा कुछ दिन इंसीट्यूट में उन्हीं के साथ के बदौलत डांस और ड्रामा सीख पायीं क्योंकि उसकी सभी दोस्त उसे इन बातों पर ध्यान नहीं देने और अपना काम करने को कहती थीं। लेकिन उम्र के साथ धीरे -धीरे समाजिक विभाजन स्पष्ट होने लगता है जहाँ अभी भी उसकी नियति लगभग तय है, बेशक जिसकी सीमाएं जाति, पेशा और परिवार की पृष्ठभूमि है। लेकिन रुद्रमा बहुत दृढ़ता से कहती है सामाजिक स्तर पर ये चक्र टूटना चाहिए, देवदासियों की बेटियों को चाहे कुछ हो जाए वापस देवदासी प्रथा का हिस्सा कभी नहीं बनना चाहिए,उन्हें सेक्स वर्कर बनने के बजाय मेहनत और सम्मान का कोई भी और काम करना चाहिए।

बहरहाल, रुद्रम्मा के विवाह के लिए अब एक दूसरा लड़का देखा जा रहा है क्योंकि कृष्णम्मा चाहती है कि जल्दी रुद्रम्मा की भी शादी हो जाए, बतौर पूर्व देवदासी उन्हें अपनी बेटी के जल्दी शादी नहीं करने के सामाजिक खतरे के बारे में मालूम है, रुद्रम्मा के लिए देर होने पर उन्होंने पहले उससे छोटी 19 साल की अपनी दूसरी बेटी जाह्नवी की शादी कर दी है जो फ़िलहाल दावणगेरे में रहती है, कृष्णम्मा की तीसरी बेटी अभी दस साल की बच्ची है और चौथी क्लास में पढ़ती है। लेकिन उसकी पढाई को लेकर कृष्णमा बहुत उम्मीद में नहीं दिखी, लॉक डाउन ने पहले ही खाने-पीने लायक आमदनी पर भी असर डाला है ऐसे में ऑनलाइन पढाई , स्मार्ट फोन और इंटरनेट उनकी क्षमता से बाहर की बात है। वो ये भी जानती है कि कानून व सरकार की तमाम कोशिशों के बावजूद सच ये है कि अब भी देवदासियों की बच्चियों का विवाह सामान्य विवाहों जैसा नहीं है, किसी लड़के को पसंद आने पर आपसी सहमति से विवाह हो जाता है और बाद में पुरुष की रूचि नहीं रहने पर आपसी सहमति से ही मौखिक आधार पर अलगाव भी हो जाता है, कोर्ट कचहरी जाकर तलाक नहीं होता इसलिए गुजाराभत्ता देने जैसी जिम्मेदारी भी तय नहीं होती है।

उनकी नाउम्मीदी की वजह भी साफ है, उन्हें सरकार की ओर से कोई मदद नहीं मिलती, कृष्णम्मा की साठ साल की माँ होगाम्मा को भी नहीं, जिसका पूरा जीवन इस प्रथा में ही गुजरा है उन्हें देवदासी पेंशन मिलनी चाहिए थी, उनके पास अपने खेत नहीं हैं,गांव में एक कमरे का कच्चा -पक्का सा घर है जिसमें पांच -छः सदस्यों का परिवार रहता है, लॉकडाउन से पहले आधे -आधे पर दूसरे के खेत पर खेती करने से फसल का तय हिस्सा उन्हें मिल जाता था। एक और विकल्प कॉफी के बागानों में काम करने का भी था लेकिन कोरोना के कारण काम और रोजगार मिलना आसान नहीं है, फिलहाल 120 रूपये की दिहाड़ी पर वो अपनी बेटी के साथ दूसरे के खेतों में काम करती है।

होगम्मा को 60 साल की पूर्व देवदासी होने पर भी पेंशन क्यों नहीं मिलती? इसपर गोपाल नायक कहते हैं, जिला प्रशासन की ओर से देवदासी पट्टी तैयार की जाती है, यह सरकार की ओर से एक दस्तावेजी व्यवस्था है, इस पट्टी में दर्ज़ नामों को 45 साल की उम्र से अधिक होने पर लगभग 1500 रूपये प्रति माह की पेंशन मिलती है, इस पट्टी में नाम के लिए कई सवालों का जवाब देना होता है और इसी आधार पर उनका नाम दर्ज़ होता है गोपाल नायक कहते हैं हो सकता है इसी वजह से उन्हें पेंशन नहीं मिल रही, क्योंकि उनका नाम ही नहीं दर्ज़ है।
कृष्णम्मा थोड़ी थोड़ी हिंदी बोलना जानती है, अपनी बेटी को देवदासी बनाने के सवाल पर अब वो इंकार कर देती हैं और कहती हैं मेरी बेटी डांस और ड्रामा सीखने को बोली थी दो दिन सीखने जाने के बाद छोड़ दिया, मैं उसकी शादी करना चाहती थी और उसने झूठ बोला था। जबकि फ़रवरी के आखिरी हफ्ते में रुद्रम्मा इस वजह से ख़बरों में थी कि उसने पुलिस को चुपके से ये जानकारी दे दी थी कि उसे उसकी माँ और परिवार के द्वारा देवदासी प्रथा में डाला जा रहा है। समय रहते पुलिस और प्रशासन ने मिलकर उसे देवदासी के तौर पर स्थानीय मंदिर को सौपे जाने से पहले बचा लिया। मौके से उसे बचाने के लिए रेस्क्यू टीम ने छापेमारी की तैयारी की। छापे के तीन दिन बाद कृष्णम्मा ने लिखित में पुलिस को ये आश्वासन दिया था कि वो अपनी बेटी को प्रत्यक्ष या परोक्ष किसी भी रूप में देवदासी प्रथा से नहीं जोड़ेगी। और ये कहानी भी सामने आयी थी कि रुद्रम्मा पड़ोस के ही एक लड़के से प्यार करती थी, लड़का और वो दोनों शादी करना चाहते थे जबकि दोनों ओर के परिवार इस विवाह के खिलाफ थे, लड़के के परिवार के लिए ये सामाजिक प्रतिष्ठा का सवाल था तो लड़की के परिवार के लिए परिवार के भविष्य और उनकी संपत्ति के रुद्रम्मा के पति और उसके परिवार द्वारा बाद में कब्ज़ा कर लिए जाने का। इस फैसले की एक वजह इसका आधार धार्मिक होना भी है, खासतौर पर पहले से देवदासी की परंपरा वाले परिवार के लिए। शायद ये भी एक वजह रही हो कृष्णम्मा और होगम्मा द्वारा रुद्रम्मा को देवदासी प्रथा में डालने का फैसला करने के पीछे।
हमारे साथ द न्यू इंडियन एक्सप्रेस के स्थानीय पत्रकार किरणकुमार बलन्नानवर भी थे जिन्होंने फ़रवरी में बहादुर रुद्रम्मा की कहानी को रिपोर्ट किया था और वो भी कुछ ही महीनों में रुद्रम्मा की कहानी बिल्कुल बदल जाने से हैरान थे।
कुडलिगे में जब किसी लड़की को देवदासी प्रथा में डाला जाता है तो इसकी शुरुआत मारम्मा मंदिर में पूजा -पाठ,अनुष्ठान और देवदासी लड़की के द्वारा प्रस्तुत नृत्य और गीत से होता है, मंदिर को समर्पित किये जाने और भगवान से शादी के बाद वो बिना किसी भविष्य के उच्च जातियों के पुरुषों की सेवा के लिए उनकी सेक्स गुलाम या बंधुआ बन जाती हैं। नयी बनी देवदासी से मंदिर के पंडित समेत उच्च जाति का कोई भी पुरुष संबंध बना सकता है। पिछले कुछ सालों से जिला प्रशासन ने मंदिर में इस तरह के किसी भी रीति -रिवाज के पालन पर रोक लगाया है लेकिन जिले के कुछ मंदिरों में चोरी -छिपे फिर से इनका पालन करने और पूर्व देवदासी की बेटियों को इस परंपरा के नाम पर बंधुआ सेक्सवर्कर बनाने की कोशिश की जाती है। रूद्रम्मा को मंदिर भेजे जाने पहले रेस्क्यू कर लिया गया था।

स्थानीय पत्रकार किरणकुमार बलन्नानवरन बतातें हैं कि विजयनगर जिले के केवल हुडलिगे ताल्लुका के तहत 120 गांव आते हैं और इन्हीं गांवों में ही लगभग तीन हज़ार पूर्व देवदासियां हैं, इस ताल्लुके के ब्लॉक 16 में 320 पूर्व देवदासियां हैं। इन सबके पुनर्वास की जिम्मेदारी सरकार की है। 90 प्रतिशत देवदासी अनुसचित जनजाति से ही आती हैं 7 -8 प्रतिशत अनुसूचित जनजाति से और 2 -3 प्रतिशत अन्य पिछले वर्ग की जाति से, ब्राह्मण और उच्च जातियों की लड़कियां देवदासी नहीं बनायी जाती।
राज्य सरकार के देवदासी बचाव और पुनर्वास से जुड़े गोपाल नायक पूर्व देवदासी की कई ऐसी लड़कियों की कहानी जानते हैं जो एक सामान्य लड़की की तरह पढ़ना नौकरी करना और विवाह करना चाहती हैं लेकिन एक छोटे से गांव, कस्बे या शहर के दायरे में उनकी पहचान उनकी मां से होते हुए पुरानी पीढ़ियों तक स्थापित होती है और उन्हें उससे अलग पहचान की स्वीकृति नहीं मिलती जो अंततः उन्हें एक अलग किस्म के शोषण व्यवस्था में डाल देता है। वो ये भी बताते हैं कि देवदासी का भाई एक सामान्य जीवन जीता है और उसकी पत्नी को भी देवदासी प्रथा में नहीं शामिल किया जाता, वो सम्मान का जीवन जीती हैं। इस परंपरा की जिम्मेदारी केवल बेटियों पर होती है।

बहरहाल, कर्नाटक सरकार के राज्य में देवदासी परंपरा ख़त्म हो जाने और जो पूर्व देवदासियां थीं उनका पुनर्वास कर दिए जाने के दावों के बावजूद राज्य सरकार द्वारा 2008 में किये गए सर्वेक्षण और कर्नाटक राज्य महिला विकास निगम (केएसडब्ल्यूडीसी) के अभी के आकंड़ों में भी देवदासियों की मौजूदा संख्या लगभग 40,600 है। पिछले 18 वर्षों में कोई नया सर्वेक्षण नहीं हुआ है। लेकिन 2018 में एक विदेशी गैर सरकारी संस्था और और कर्नाटक राज्य महिला विश्वविद्यालय द्वारा किए गए एक अध्ययन में कर्नाटक राज्य में देवदासियों की वास्तविक संख्या 80,000 से अधिक पायी गई, जिसमें से उत्तरी कर्नाटक की 20% से ज्यादा देवदासी 18 वर्ष से कम उम्र की हैं।ये आंकड़ा अपने आप में इस बात का बयान है कि सरकारी योजनाओं और कागजों में दर्ज़ पुनर्वास जमीन पर किस तरह से क्रियान्वित हुए हैं।

हालांकि कर्नाटक सरकार ने साल 2019-20 के दौरान देवदासियों के पुनर्वास के लिए ₹830 लाख आवंटित किए इसमें से राज्य भर में 589 देवदासियों के लक्ष्य के मुकाबले 440 देवदासियों पर ₹622 लाख खर्च किए गए। राज्य में लगभग 30,130 देवदासी पेंशन योजना के लिए पात्र हैं, देवदासियों के पेंशन योजना के लिए ₹4.77 करोड़ आवंटित किए गए। साथ ही सरकार की ओर से पांच लाख से कम सलाना आय और अनुसूचित जाति की देवदासी के बेटे के विवाह पर तीन लाख और बेटी की शादी के समय पांच लाख रूपये की सहयोग राशि दी जाती है अगर शादी के 18 महीने के दौरान आवेदन किया गया हो।

बहरहाल, इन आकड़ों के बीच ये भी सच है कि होगम्मा को पेंशन नहीं मिलती और राज्य में अस्सी हज़ार से ज्यादा देवदासियां हैं और सबसे बड़ी बात रूद्रम्मा जैसी लड़कियां जो पूर्व देवदासी की बेटी है उनकी अब भी समाज की मुख्यधारा में स्वीकार्यता सहज नहीं है, उन्हें पढाई, प्रेम, शादी, शौक, हुनर सबके साथ समझौता करना ही होता है जैसे रुद्रम्मा ने खेत पर मजदूरी करने के लिए जाने के लिए हमसे बीच में ही विदा ले ली।

(यह रिपोर्ट थॉमसन रॉयटर्स फाउंडेशन द्वारा मीडिया कौशल विकास कार्यक्रम के तहत संचालित ” ट्रैफिकिंग एंड स्लेवरी ” के अंतर्गत की गई रिपोर्टिंग का हिस्सा है।)

साभार- दैनिक भास्कर

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