समकालीन स्त्री लेखन और मुक्ति का स्वरूप

रेनू दूग्गल

भारतीय समाज में स्त्रियों की ऐतिहासिक स्थिति संतोषजनक नहीं रही यद्यपि वैदिक काल में स्त्रियों की सामाजिक स्थिति अत्यन्त उन्नत थी। इस काल को स्त्रियों का स्वर्णीय काल माना गया हैं। वैदिक साहित्य के अध्ययन से पता चलता है कि आत्म-विकास , शिक्षा-विवाह, सम्पत्ति आदि विषयों में प्रायः पुरूषों के समान थी, परन्तु बाद के कालों में स्त्रियों की प्रस्थिति में उत्तरोत्तर गिरावट आती गई। स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात संवैधानिक सरकारी महिला संगठनों एवं महिला आन्दोलनों के माध्यम से स्त्रियों की सामाजिक स्थिति में काफी सुधार हुआ।
आज का सबसे प्रमुख प्रश्न स्त्री मुक्ति और स्त्री अस्मिता केे स्वरूप का है। क्या स्त्री को उसकी अस्मिता का बोध ही उसकी मुक्ति की तरफ पहला कदम है ? या अस्मिता का अर्थ है-स्त्री में इस एहसास का होना कि वह स्वयं में पुरूष के समकक्ष एक ईकाई है। वह गुलाम नहीं है, इसलिए उसे समान अधिकार चाहिए। अर्थात स्त्री को अपने अधिकार का बोध होना ही उसकी सोच में मूल परिवर्तन का कारण है। नारी की सबसे बड़ी अशान्ति है उसकी आर्थिक पराधीनता, यों तो समस्त नारियों के आर्थिक अधिकार से दरकिनार किया गया किन्तु गांव की मध्यवर्गीय स्त्रियां तो बिल्कुल ही पराधीन है। वे पराधीन बेटी, बहू, माँ, दादी बनकर जीवन यापन कर लेती है, और आर्थिक बेबसी के कारण पुरूषों का अत्याचार सहती रहती है। उनका किसी प्रकार का कोई आर्थिक अधिकार न के बराबर होता है यहां तक कि उनकी दैनिक उपयेाग की वस्तुएं भी पुरूष खरीदते है।1  समाज का निर्माण तभी संभव है जब स्त्री-पुरूष दोनों के आपसी मेल हो। हमारे इसी समाज की महत्वपूर्ण ईकाई समझी जाने वाली स्त्री जिसने समाज का निर्माण स्वयं अपने गर्भ से किया हो उसी स्त्री की स्थिति अपने ही समाज में निकृष्ट और कष्टप्रद है। उसकी अवस्था आज भी परम्परा से ऊपर उठकर आगे नहीं बढ पायी है। पुरूषों की व्यवस्था ने उसे बांध रखा ही है, आगे के लिए उसकी दशा-दिशा भी निर्धारित कर रखी है।
यदि हम प्राचीन ग्रंथों में अनेक उदाहरण देखे जिससे स्पष्ट होता है कि पितृसत्तात्मक समाज ने अपने विकृत सोचों से नारियों को संस्कार रूपी बन्धनों में जकड़कर अपनी पुरूषवादी विकृत मानसिकता का परिचय दिया है। जिसके उदाहरण स्वरूप अनुसुइया प्रसंग से स्त्रियों की पतिव्रत्य की परीक्षा हमारे पितृसत्तात्मक समाज की नकारात्मक सोच है। इसके अलावा कौशल्या, सुमित्रा आदि स्त्रियां जहाँ बहुविवाह के कारण सामाजिक यातनाएं सहती है वही निरपराध अहिल्या देवराज इन्द्र को कामेच्छा और गौतम ऋषि के शाप के कारण पाषाण-शिला में परिगत होने के लिए बाध्य होती है। इस सच को भी नकारा नहीं जा सकता है कि पित्रसतात्मक समाज में स्त्रियां पराजित और अपमानित होने के लिए अवतरित हुई है। कभी पिता के घर में, कभी पति के घर में, कभी पुत्र के समक्ष ।2
नारी मुक्ति विश्वस्तर पर नारी-समाज का नारा दिया गया है। भारतीय समाज के सन्दर्भ में महत्वपूर्ण विषय यह है कि भारतीय स्वतंत्रता होने के बावजूद भी स्त्री दमन के प्रति हमारा उन्नतिशील समाज की जड़ रवैया यथावत हैं आपसी समझ की आयातित अवधारण ने स्त्री की दशा और दिशा बदलने में कोई सकरात्मक भूमिका अदा नहीं की है। यही नहीं प्रतिरोध करने वाली स्त्रियों को सत्ता के अविश्वास और विसंगतियों का सामना करना पड़ रहा है। सामंतवादी विचारधारा से ग्रस्त पुरूष-वर्चस्व का समाज स्त्री रचनाकारों की चुनौतिपूर्ण सहभागिता को बताकर लेखन के खिलाफ विभूषित कर अपने से कमतर साबित करने में निरन्तर प्रत्यनशील रहा है।3
हमारे अनुसार, स्त्री लेखन पुरूष वर्चस्व के सामने अपने अधिकारों के लिए कटिबद्ध लेखन है। वह अपने आप के लिए उन समस्त अधिकारों की मांग करती है, जिसके बिना अस्मिता अंधेरे में है। वह पुरूषवादी समाज में पुरूषों से प्रतिस्पर्धा करके आगे नहीं जाना चाहती बल्कि मात्र बराबरी का हक चाहती है। यद्यपि ध्यान देने योग्य बात है कि समकालीन स्त्री लेखन अपने पथ से भटकता नजर आ रहा है। समकालीन स्त्री लेखन जो स्त्री विमर्श के अन्तर्गत लिखा जा रहा है, उसका मूलभूत अन्तर ही यह है कि वह भारतीय परम्परा का स्वभाविक विकास न होंकर पश्चिमी नारी आन्दोलन से प्रेरित है। इसलिए एक ओर वह अपनी सामाजिक परम्परा से कट जाती है और दूसरी ओर समकालीन समाज की विषमताओं परस्पर तादात्म्य नहीं हो पाता उसके केन्द्र में भी स्त्री और परिधि पर भी स्त्री जो एक साथ छोटी भी और बड़ी भी है। छोटी इसलिए कि इस लेखन में सामान्य भारतीय नारी की छवि विलुप्त दिखती है और बड़ा इसलिए कि वह वैश्विक सन्दर्भ लिए हुए है।
स्त्री लेखन और विमर्श दो अलग धराएं है। स्त्री लेखन में व्यापकता है, वह अपने समाज के प्रति सचेत, विसंगतियों से असहमत एवं उन्हें बदलने के लिए कृतसंकल्प है। इस कड़ी में सुभद्रा कुमारी चैहान व महादेवी वर्मा को उदाहरण स्वरूप देख सकते है। इनकी ही रचनाओं से स्त्री को सम्पूर्ण रूप में अभिव्यक्ति प्राप्त हुई। पत्र-पत्रिकाओं के माध्यम से वे व्यापक रचनात्मक संसार से जुड़ी है, स्वयं पत्रिकाएं भी प्रकाशित की। इन्कलाब में सुभद्रा कुमारी चैहान ने स्त्री क्रान्ति को प्रतिबिंम्बत करने का प्रत्यन्न किया हैं उन्होंने अपनी लेखनी से महिला सशक्तिकरण को प्रतिस्थापित करने का प्रत्यन्न किया हैं। जनजागरण में जब महिलाओं के लिए स्कूल नहीं थे उस समय उन्होंने प्रयाग महिला विद्यापीठ की स्थापना की। श्रीमती चौहान का स्वरूप वीर काव्य के प्रणेता उन वीरों का रहा है। स्त्री लेखन में बलिदान का तेवर सुभद्रा कुमारी चैहान की एक पंक्ति से स्पष्ट है-
‘‘सबल पुरूष यदि भीरू बने तो
हमको दे वरदान सखी।
पन्द्रह कोटि असहयोगियां
दलहा दे ब्रह्मण्ड सखी
खाना पीना सोना जीना
हो पापी का भार सखी
मर-मर कर दें पापों का
हम जगती का छार सखी।।


आज के स्त्री विमर्श की सबसे बड़ी उपलब्धि स्त्री विमर्श ने स्त्री का पदार्थीकरण रोका, स्त्री विमर्श ने नारी को वस्तु से व्यक्ति बनने का समझ पैदा की। कहना न होगा कि सदियों से हमारे महान आचार्य व दार्शनिकों ने भी इन स्त्रियों के लिए कटु शब्दों का ही प्रयोग किया। स्त्रियों के लिए कहा गया है कि वह अनुपजाऊ पुरूष है। किसी ने कहा कि सृष्टिकर्ता ने नारी को रचते समय बिस्तर घर, जेवर, अपवित्र इच्छाएं, ईर्ष्या, बेईमानी और दुर्व्यवहार दिया और किसी ने यह भी कहा कि जो पुरूष कायर व अपवित्र होते है वह अगली पीढ़ी में स्त्री बन जाते हैं।4
आज के हिन्दी कथा साहित्य का स्त्री विमर्श मात्र स्त्री अस्मिताओं को केन्द्र में रखकर लिखा जा रहा है। उसमें भी दाम्पत्य जीवन की समस्याओं को प्रमुखता से उठाया गया है। यदि दूसरे शब्दों में कहा जाय कि आज का स्त्री विमर्श एकांगी होता चला जा रहा है तो अतिश्योक्ति नहीं होगी। यदि वर्तमान की राजनीति, सामाजिक, सांस्कृतिक विसंगतियों को अंगीकार करते हुये व्यापक फलक से जोड़कर स्त्री विमर्श को प्रस्तुत किया जाय तो इसका तेज कहीं और ज्यादा होगा। इसी कारण कहीं-कहीं से स्त्री विमर्श वर्तमान दशा और दिशा पर आपेक्ष भी लगते रहे है। लेकिन उन समस्त अन्तर्विरोधों के बावजूद भी स्त्री विमर्श ने नारी में आत्म गौरव का भाग जगाया है।
हिन्दी कथा लेखिकाओं ने अपने कथा लेखन से वर्तमान नारी की अनेक समस्याओं को प्रकाशित किया है जैसे-दाम्पत्य जीवन में दरार और विघटन, उनका आर्थिक, शारीरिक और मानसिक शोषण, उनको समान अधिकार न मिलना, उनको निकृष्ट मानना, उन्हें विकास का पर्याप्त अवसर न मिलना, उनकी अस्मिता पर प्रश्न चिन्ह उठाना आदि। चित्रा मृदुगल के उपन्यास ‘एक जमीन अपनी’ की नायिका अंकिता अपने आपको किसी भी हालात में नियति के हाथो छोड़ने को तैयार नहीं है। कर्मठता के सहारे अपने सम्पूर्ण जीवन को बदल देने की उसमे साहस है। यह उपन्यास स्त्री विमर्श की सकारात्मक अभिव्यक्ति है। इसी क्रम में नासिरा शर्मा के ‘ठीकरे की मंगनी’ की नायिका महरूख एक पढ़ी लिखी सजग महिला है। अपने चारो ओर के माहौल से लड़कर वह अपनी जिन्दगी को बेहतर ढंग से ढालना चाहती है, उसमें कई मुद्दे उपन्यास के हाशिए और आधुनिकता का तनाव, खानदानी रियायते और नया पैदा होता नौदोलटिया वर्ग, भारतीय मुस्लिम समाज में नारी की बदलती हुई स्थिति और बहाव के नाम पर पश्चिमीकरण की अंधी दौड आदि सवालो पर वह संजीदगी से सोचती है।5
इस उपन्यास से एक बात स्पट है कि नारी को अपनी लड़ाई स्वयं लड़नी होगी और काफी धैर्य के साथ लड़नी होगी। मैत्रेयी पुष्पा अपने उपन्यास ‘‘वेतवा बहती रही’’ के माध्यम से बुन्देलखण्ड की साधारण स्त्री के उत्पीड़न व यातना के सन्दर्भों को उद्घाटित करती है। मैत्रेयी पुष्पा का मानना है कि सहना और जूझना ही मानो भारतीय समाज की स्त्रियों की नियति बन गयी हो। अशिक्षा रूढ़ियों और अंधविश्वासों वाले समाज में उर्वशी और मीरा अपनी यातना में अकेली नहीं है। मृदुला गर्ग के उपन्यासों का मुख्य प्रतिवाद अभिजात वर्गीय नारी के स्वातंत्रय, प्रेम, विवाह, वैवाहिक जीवन की एकरसता, ऊब, ताजगी की तलाश में पर पुरूष की ओर झुकाव तथा प्रेम की अनुभूति के सूक्ष्म विश्लेषण के माध्यम से मानव जीवन की सार्थकता की तलाश इत्यादि है। उनके समस्त उपन्यासों में इन तत्वों के सूत्र संदर्भित होते है। मेहरून्निसा परवेज के उपन्यासों का केन्द्रिय विषय निम्नमध्यवर्गीय नारी जीवन की त्रासदी है। प्रेम, विवाह, तलाक, पतियों का निकम्मापन, अवैध संबंध, परिव्यक्ता नारी का अकेलापन जीने के लिए अवांछित स्थितियों का स्वीकार, नारी जीवन की विवशता के अत्यन्त मार्मिक चित्र मेहरून्निसा परवेज ने अंकित किये हैं।6

वर्तमान स्त्री लेखन में स्वतंत्रता, समानता और न्याय जैसे मूलभूत अधिकारों के लिए संघर्षरत और सक्रिय स्त्री रचनाकार स्त्री-हितो की चर्चा स्वयं करना चाहती है और अपनी अस्मिता को प्रकाशित करना चाहती है। स्त्री लेखन समाजिकता और दैहिकता के प्रश्नो को समान लेकर चलते हुऐ पितृसत्ता पर ठीक उन्हीं तर्को से प्रहार कर रहा है, जो उसके लिए भी अपनी पहचान के सवाल हैं। भूमंडलीकरण और बाजारीकरण व्यवस्था के अंतर्विरोधो के उपस्थित रहते उसका संघर्ष और चुनौती बहुकोणिय और ज्यादा जटिल हो जाता है। इसलिए तमाम विरोधी परिस्थितियों के बीच खड़ा होना और अपनी पहचान बनाना आज स्त्री के लिए दोहरी लड़ाई है। इन दोनों स्तरों पर सतर्कता से खडे रहने के लिए ज्यादा तर्कसंगत,दृढ़  व्यक्तित्व जैसे साहस अपेक्षित है। स्त्री चेतना को केवल भावनात्मक कसौटी पर नही, बल्कि बौद्धिकता के मापदंड पर स्त्री साहित्य परखता है। समकालीन परिदृश्य में बड़ी संख्या में स्त्री रचनाकर स्त्री के सच और स्वप्र को जिस यर्थाथवादी दृष्टिकोण, गहराई, प्रमाणिकता और विश्वनीयता से लिख रही है वह हिन्दी लेखन में अभूतपूर्व है। इनके लेखन के केन्द्र में स्त्री जीवन की ज्वलंत और भयावह समस्याएं है, उन मर्यादाओं की तीव्र आलोचना है, जिन्होंने हमेशा स्त्री समाज का खुला दमन और शोषण किया। वर्जीनिया बुल्फ ने कहा है ‘स्त्री का लेखन स्त्री का लेखन होता है स्त्रीवादी होने से बच नहीं सकता। अपने सर्वोत्तम में यह स्त्रीवादी ही होगा। इस अर्थ में हिन्दी का स्त्रीवादी साहित्य स्त्री को व्यवस्था की गुलामी से मुक्त करके उसे एक आत्मनिर्णायक स्वतंत्र व्यक्ति की अस्मिता के रूप में स्थापित करने का महत्वपूर्ण और सार्थक प्रयास है।
निष्कर्ष रूप में कहा जा सकता है कि आज के स्त्री विमर्श साहित्य संस्कृति की व्यापकता से महिला रचनाकारों ने अपनी रचनाओं के माध्य से स्त्री जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में हो रहे शोषण एवं अत्याचार के विरूद्ध क्रान्तिकारी कदम उठाये। परम्पराओं और रूढ़ियों से वह अपना दामन छुडाना चाहती है। वह वर्जनाओं की दीवारों से बाहर निकलकर अभिव्यक्ति  करना चाहती है। महिला लेखिकाएं न केवल पुरूष वर्चस्व का दलदल खत्म करना चाहती हैं, अपितु स्त्री प्रश्न के सभी मुखौटो को खोलकर रख देना चाहती है। उनकी स्पष्ट समझ है कि पुरूष ने स्त्री की जिस एक वस्तु को मारा, कुचला या पालतु बनाया है। समकालीन स्त्री मुक्ति की वास्तविक समस्या पर विचार करने के लिए यह जरूरी है कि स्त्री पुरूष सबको एक साथ बैठना एवं संवाद होना जरूरी है। इसके लिए केवल स्त्रियां ही जिम्मेदार नहीं है, बल्कि पुरूष का भी बराबर का हिस्सा है। मुक्ति दोनों की जरूरी है-चाहे वह स्त्री हो या पुरूष। मुक्ति पाने के लिए संघर्ष दोनों को ही करना पडेगा।
संदर्भ सूची –
1. वर्तमान साहित्य, रामघाटरोड, अलीगढ़, मार्च 2011, पृ0 39
2. समयांतर, जून-2011, अंक-9, पृ0 54
3. वर्तमान साहित्य, मार्च 2011, पृ0 63
4. वही, पृ0 53
5. हिन्दी उपन्यास का विकास, मधुरेश, सुमित प्रकाशन, इलाहाबाद, 2011, पृ0 226
6. हिन्दी का गद्य साहित्य, डा0 रामचन्द्र तिवारी, विश्वविद्यालय प्रकाशन, वाराणसी, 2009, पृ0 268-69

सह-आचार्य
हिन्दी-विभाग,
श्रीगुरू नानक देव खालसा काॅलेज देव नगर,
करोल बाग, दिल्ली
दिल्ली विश्वविद्यालय

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here