यह उग्रता इतनी ‘मोहक’ भी नहीं

देवयानी भारद्वाज

(स्त्री दर्पण के समारोह पर उपजे विवाद के बहाने )

उस दिन महादेवी वर्मा की पुण्यतिथि थी और स्त्री दर्पण की शुरुआत का एक वर्ष पूरा हो रहा था। मुक्तिबोध की भी पुण्यतिथि थी, लेकिन आयोजकों ने इस अवसर पर महादेवी की याद करना उचित समझा। इक्कीसवीं सदी की स्त्री कवियों पर केन्द्रित अंक, स्त्री दर्पण का वार्षिकोत्सव है तो स्त्रियाँ अपनी पुरखिन को याद करें। सारी औरतें एक ठिकाने इकट्ठा हो जाएँ और साहित्य का बाकी संसार अपने सरोकारों के साथ यथावत चलता रहे। यह देखना दिलचस्प है कि अपने तमाम आयोजनों को स्त्री दर्पण के पेज पर साझा करने वाले विमल कुमार जी ने इस सालाना जलसे के आयोजन को साझा करते ही पेज से हटा दिया। हालांकि एकाध जगह और साझा किये जाने के कारण यह ऑनलाइन उपलब्ध रहा और मैं यह टिप्पणी लिख सकी। इस अवसर पर शिवदान सिंह भदौरिया और सविता सिंह ने भी अपनी बात रखी और सविता जी के वक्तव्य में महादेवी से लेकर अब तक की स्त्री कविता पर एक विहंगम दृष्टि और विश्लेषण देखने को मिलता है, जिसे उन्होंने अधिक व्यवस्थित रूप से ‘परिंदे’ पत्रिका में अपने आलेख में भी प्रस्तुत किया है। इसे पढ़ते हुए आपको यह महसूस होता है कि स्त्री कविता पर अपेक्षित गंभीरता के साथ विचार किया गया है। लेकिन यहाँ मैं पत्रिका की समीक्षा या कार्यक्रम की रिपोर्ट नहीं लिख रही हूँ, बल्कि कार्यक्रम की मुख्य अतिथि मैत्रेयी पुष्पा के वक्तव्य पर चल पड़ी बहस के बहाने कार्यक्रम के कुछ पहलुओं के बारे में अपनी बात कहना चाहती हूँ। यह बात मुझे कहना इसलिए भी ज़रूरी लगने लगा कि मैत्रयी जी की बातों को कई लोगों ने अपने-अपने ढंग से प्रस्तुत करने का प्रयास किया है, मुझे उपयुक्त यह लगता है कि उन्होंने जो कहा उसे यथावत पढ़ा और सुना जाए और उनसे सहमति या असहमति व्यक्त की जाए। इससे अधिक ज़रूरी मुझे यह भी लगता है कि अशोक वाजपेयी ने उस दिन मंच से जो कहा और पत्रिका में शामिल उनके साक्षात्कार पर किसी ने नज़र क्यों नहीं डाली। यह भी दिलचस्प है कि जहां कार्यक्रम का पूरा विडियो फेसबुक पर उपलब्ध है, कार्यक्रम के अध्यक्ष अशोक वाजपेयी की बात को क्यों रेकॉर्ड और अपलोड नहीं किया गया है?

इस कार्यक्रम के आयोजक बेहतर जानते हैं कि उन्होंने कोई भी निर्णय क्या सोच कर लिया होगा, लेकिन संभवतः हम स्त्रियों को यह ज़रूर समझना होगा कि हम किस तरह की राजनीति का इस्तेमाल हो जाती हैं और क्यों? परिंदे पत्रिका के लिए रचनाएँ भेजने का अनुरोध शायद मार्च में आया था और 11 सितंबर के आयोजन के लिए सहमति अगस्त के आखिरी सप्ताह में ली गई। ‘स्त्री दर्पण’ के पेज पर कार्यक्रम संबंधी सूचनाएँ साझा की जानी शुरू हो गई थीं, लेकिन 11 सितंबर को जो पोस्टर साझा किया गया, उसमें मैत्रेयी जी के मुख्य अतिथि होने का उल्लेख था, इससे पहले कभी उनका ज़िक्र नहीं आया। पहले भी उल्लेख होता तो भी मैं उस कार्यक्रम में शामिल होती, लेकिन बाद में पता चला कि कुछ मित्रों ने इस कारण भी कार्यक्रम का बहिष्कार किया। मुझे स्त्रियों के लिए मंच उपलब्ध कराने के प्रयासों पर न हंसी आती है, न रोना। हमारी तो आदत ही रही है कि जब मर्द बैठक में इकट्ठा हों तो हम डायनिंग टेबल के आस-पास या चौक में बैठ कर धनिया साफ कर लेती हैं, खाने की तैयारी कर लेती हैं और अपने सुख-दुख कह लेती हैं। निर्देश तो बैठक से ही जारी किए जाते हैं। बहरहाल आगे कुछ भी कहने से पहले थोड़ी चर्चा इस बात की करते हैं कि उस दिन मंच पर क्या हुआ। मैत्रयी जी के पहले भी कुछ वक्ता और कार्यक्रम की संचालक मेधा महादेवी वर्मा की कविता ‘नीर भरी दुख की बदली’ और ‘शृंखला की कड़ियाँ’ का ज़िक्र कर के चुकी थीं। कार्यक्रम समाप्ति की ओर था। सभी कवि अपनी कविताएं पढ़ चुकी थीं और अन्य वक्तव्य इससे पहले हो चुके थे, अंत में मैत्रेयी पुष्पा और उनके बाद सिर्फ अशोक वाजपेयी का बोलना शेष रह जाता था।

पिछले कुछ दिनों में मैत्रयी पुष्पा के साथ सोशल मीडिया पर कई लोगों का जिस तरह का वाद-विवाद चल रहा था, उसे देखते हुए आयोजकों को संभवतः यह सबसे सुरक्षित लगा हो कि उनका वक्तव्य इतना देर से हो कि उस पर कोई विवाद न हो पाये, लेकिन मैत्रेयी जी भी जानती थीं कि उन्हें कौन सी बातें यहाँ कहनी हैं, जैसे के अन्य लोग जानते थे कि मंच पर बैठे वरिष्ठ जनों के सामने उन्हें कौनसी कविताएं सुनानी हैं और क्या बातें कहनी हैं। मैत्रेयी जी ने जो कहा वह इस प्रकार है,

“आज हम बात महादेवी वर्मा की करने वाले थे लेकिन मुझे ऐसा लगता है कि महादेवी वर्मा को तो हमने छोड़ दिया बीच में ही। तो मैं उन्हें प्रणाम करते हुए अपनी बात शुरू करती हूँ। उनकी पुण्य तिथि है। हमने उन्हें शुरू में ही उन्हें पढ़ लिया था। पहली कविता उनकी पढ़ी ‘मैं नीर भरी दुख की बदली’ तो हम लड़किया आपस में सोचती थीं कि यह कवयित्री तो बहुत दुखी हैं। यह इतनी क्यों दुखी हैं? तो हमारे टीचर ने हमें डांटा। वे कहते तुम मूर्ख हो, यह रहस्य की बात है। उन्होंने बताया यह तो यह रहस्यवाद है। कुछ आया होगा समझ में। फिर हमने शृंखला की कड़ियाँ पढ़ीं, तो उनमें हम रमे।

आज जब हम स्त्री विमर्श की बात करते हैं तो लोग तुरंत सीमोन द बोउवार का नाम लेते हैं, महादेवी वर्मा का नाम हम नहीं लेते। मुझे लगता है कि सुभद्रा कुमारी चौहान को तो हम भूल ही जाते हैं। मेरी बात कड़वी लग सकती है, लेकिन मैं कह फिर भी देती हूँ। हम जो भी नारीवाद पढ़ते हैं तो हम विदेशी लेखकों को देखते हैं, उनको मानते हैं। हम हमारे यहाँ नहीं देखते कि हमारे यहाँ भी नारीवाद हुआ है …. तो हम उनको भी पढ़ें कि उनमें कितना स्त्री विमर्श है। कविता और लेखन ही नहीं मैं तो लोक गीतों में भी स्त्री विमर्श देखती हूँ। वे तो ग्रामीण स्त्रियाँ थीं, वे तो लिखना-पढ़ना नहीं जानती थीं लेकिन उसमें भी स्त्री विमर्श है …।  हम जो स्त्री विमर्श करते हैं वह बड़े गुस्से से करते हैं।  हम गुस्से में बात करती हैं लेकिन गुस्से से तो संहार ही होगा … गुस्से से बात नहीं बनती है। हम प्यार से भी बहुत कुछ बदलते हैं, इतना याद रखिएगा। प्यार हमारी रणनीति होती है …। हम कहते हैं न कि पुरुष हमें समझते ही नहीं! लेकिन वो प्यार तो समझता है, ऐसी बात नहीं है। तो मैंने बड़ा विवादित लेखन किया है वो आप जानते हैं, लेकिन घर में मैं कैसे रही हूँ वो आप नहीं जानते। मैं बड़े प्यार से रही हूँ, मैं लड़ाई-वडाई कभी नहीं करती… मैं अपने पति से कभी नहीं लड़ी …”

अशोक जी (मंच पर ही पास की कुर्सी से) – बाहर लड़ती हैं …

मैत्रेयी जी – नहीं बाहर भी नहीं … किसी से नहीं लड़ती मैं … तो प्यार से ही जीत लिया।

अशोक जी – हारे हुए से क्या लड़ना ….

मैत्रेयी – हारे हुए आपके कहने से क्या हम मान लेंगे कि वे हारे हुए हैं? लेकिन हमारा हक हमारे पास है तो मैं तो प्यार से पराजित करती हूँ। ऐसी रणनीतियाँ बनानी पड़ती हैं। तो हमारा स्त्री विमर्श भी ऐसा होना चाहिए । हर चीज कोई एकदम से नहीं बदल जाती तो देखिये … हम एकदम से तोड़ तो सकते हैं लेकिन जोड़ नहीं सकते। जोड़ने में तो वक़्त लगता है और थोड़ा नहीं बहुत वक़्त लगता है। तो धैर्य रखना पड़ता है और वह धैर्य कोई रखे तो ठीक है। मैं कोई सिखाने तो नहीं आई किसी को, लेकिन मैं यह कह रही हूँ की गुस्सा करें, युद्ध करें तो उससे तो संहार ही होता है। महादेवी वर्मा ने भी यह बातें कही हैं। आप देखिये शृंखला की कड़ियाँ में तो वे कई बार नर्म पड़ जाती हैं। यह उनसे शिकायत भी हो सकती हैं …लेकिन जो धीरे–धीरे चलता है तो वह टूटता नहीं है। मेरा स्त्री विमर्श तो इसी पर चलता है कि चार कदम आगे और फिर जरा आँख दिखाई तो दो कदम पीछे हो लिए और ज़रा मौका मिले तो फिर से चल देंगे … मेरा स्त्री विमर्श तो ऐसा ही कहता है कि यहाँ समझौता न करें तो यहाँ निभाव मुश्किल हो जाएगा।

पुरुष कोई एकदम से तो नहीं बदल जाएगा। संस्कार तो हम ही देते हैं, जब हम माँ बनते हैं तो संस्कार तो हम ही देते हैं। हम कभी नहीं कहते कि बेटे बहू की बात मानना, वो जैसे कहे वैसे चलना। हम कहते हैं कि ‘बहू की बात मानने लगा है’। मेरी साथ की दोस्त हैं, उनकी यह शिकायत आती है, और बड़े प्यार से शिकायत करती हैं, “यह लड़का हमारा है तो बड़ा अच्छा लेकिन अब न बाहर जाए तो बहू की तरफ ही देखता है मेरी तरफ नहीं देखता …।” तो मैं कहती हूँ कि तूने बहुत देख लिया अब बहू को ही देखने दे …. तो एक कंपीटीशन हो जाता है वहाँ पर। स्त्री विमर्श का एक यह भी बहुत बड़ा मुद्दा है कि जो बराबर की स्त्री है, आप लोग उसको भी बढ़ावा दें। … गाँव में तो बहुत देखी हैं। एक किस्सा सुनाती हूँ, नाम नहीं लूँगी। हम चंडीगढ़ से आ रहे थे साथ में तो वे मुझसे कहने लगीं, “देखिए मैत्रेयी जी मेरा एक ही लड़का है, अभी तो उसकी शादी नहीं हुई है लेकिन उसकी शादी हो जाएगी तो मैं कैसे रहूँगी।” तो मुझे लगा कि तुम तो बड़ी गंवार निकली। हमारे यहाँ गाँव में एक रिवाज है कि लड़का जब ब्याहने जाता है तो माँ कुएं में पाँव लटका कर बैठ जाती है, फिर लड़का लौट कर आता है और कहता है कि माँ तू कुएं में मत कूद, मैं बहू लाऊँगा तो वो तेरी ही सेवा करेगी। लेकिन … एक हमारा देवर आया और उसने कहा, “माँ तू कुएं में कूदती है तो अभी कूद जा। मुझे पता है कि बहू आएगी तो तू उसको बहुत परेशान करेगी। तुझसे नहीं गिरा जाए तो मैं मारूँ धक्का।”

रश्मि भारद्वाज (श्रोताओं में से) – लेकिन उसे कहना चाहिए न कि वो खुद ही सेवा करेगा … हमारे यहाँ एक यह भी रिवाज है कि दामाद जब आता है तो सास उसको लोढ़ी दिखती है और कहती है कि मेरी बेटी को तंग किया तो इससे मारूँगी …

मैत्रेयी जी – बढ़िया रिवाज है यह भी । हमारे यहां नहीं है यह, हमारे घर में तो सास दामाद के पाँव पूज लेती हैं … अशोक जी भी मेरे पड़ोसी है …तो मैं यह बता रही थी कि वो लिखी पढ़ी थीं तो मैं औरों से क्या उम्मीद करूँ … गाँव में जो स्त्रियाँ है उनसे क्या उम्मीद करूँ। जब वो यह कह रही हैं कि मेरा इतना प्यारा बेटा है, इसकी शादी हो जाएगी तो मैं क्या करूंगी। मैं कहती हूँ, “उसकी शादी ही मत करना।” तो यह समझदारी होनी चाहिए । इतनी सहानुभूति तो होनी चाहिए। स्त्री विमर्श थोड़ा घर में भी तो कीजिये। यह जो लड़ाई-झगड़े हैं यह सब भी स्त्री विमर्श में ही आते हैं। यहाँ लेकिन परिवार का तो विरोध है स्त्री विमर्श में। बस मैं और मेरा पति, पति न मिले तो बस ‘मैं हूँ स्त्री’ लेकिन हम एक समाज में रहते हैं, उसमें परिवार भी होता है ….

सविता सिंह (मंच पर पास की कुर्सी से) – मैत्रेयी जी यह स्त्री विमर्श नहीं है, यह सत्ता का विमर्श है

मैत्रेयी जी – सत्ता किसकी !

सविता सिंह – पितृसत्ता …

मैत्रेयी जी – पितृसत्ता क्या है … अपने बनाए हुए हैं … आप मान रही हैं तो है पितृसत्ता, काहे की पितृसत्ता! मैं तो नहीं मानती …

श्रोताओं में से  – आप तो कह रही थीं कि चुप रहना चाहिए… अगर मान लीजिये हसबेंड अब्यूज़िव है तो चुप ही रहना चाहिए ?

मैत्रेयी जी – तो आप भी अब्यूज़िव हो जाएंगे? यही तो ऑप्शन नहीं है न!

अणु शक्ति सिंह (श्रोताओं में से) – अब्यूज़िव होना ऑप्शन नहीं है लेकिन छोड़ना तो ऑप्शन है न … देयर इज़ ऑल्वेज़ आ वे आउट!

मेधा (मंच पर आ कर) – मुझे लगता है हमें मैत्रेयी जी को अपनी बात पूरी कर लेने देनी चाहिए, फिर हम उनसे सवाल-जवाब कर सकती हैं।

मैत्रेयी जी – हम मान लेते हैं कि पितृसत्ता है, किसी ने कहा और हमने मान लिया कि यह पितृसत्ता है तो यह हमारे मानने पर है कि क्या हम मानते हैं … (श्रोताओं से आ रही आवाज़ों को सुनते हुए ) आप लोग ज्यादा नहीं सुन पाएंगे मुझे मालूम हैं मैं यही समाप्त करती हूँ …

मेधा –यहाँ सबके अलग विचार होंगे और स्त्री विमर्श आज जहां पहुंचा है हम स्त्री विमर्श में पेडागोजी ऑफ लव की भी बात करते हैं लेकिन आप जो कह रही हैं कि हम सदियों तक चुप रहेंगे और तिरिया चरित्र से निभा लेंगे यह स्त्री विमर्श नहीं… स्त्री विमर्श का बहुत व्यापक फ़लक है, बहुत अच्छे से समझने की ज़रूरत है। मैत्रेयी जी को बहुत-बहुत आभार, समय कम है तो अब मैं अशोक वाजपेयी जी को अध्यक्षीय भाषण के लिए आमंत्रित करती हूँ।

स्त्री दर्पण के कार्यक्रम का इससे आगे का विडियो उपलब्ध नहीं होता। क्या अशोक वाजपेयी का भाषण रेकॉर्ड करने लायक नहीं था? क्या स्त्री दर्पण को अशोक वाजपेयी ऐसे मेहमान नहीं लगते कि उनकी बात भी सबको सुनने के लिए उपलब्ध हो? या अशोक वाजपेयी नहीं चाहते कि उन्होंने उस मंच से जो कहा उसे बाकी लोग भी सुनें? जबकि कार्यक्रम का शुरू से अंत तक पूरा विडियो मुसलसल उपलब्ध है, तब उनकी बातों का उपलब्ध न होना मुझे हैरान करता है। मैत्रयी जी को जिस तरह बार-बार बीच में टोका गया, मुझे लगता है कि यह एक अप्रिय स्थिति हुई जिससे बचा जा सकता था। इसकी शुरुआत भी अशोक जी करते हैं, जब वे चुहल करते हुए उनकी बात को काटते हैं। किसी भी वक्ता के लिए बार-बार टोके जाने पर अपनी बात को व्यवस्थित ढंग से कहना मुश्किल हो सकता है। खासतौर से जब कोई स्त्री बोल रही हो तो उसकी बात को बीच में ही काट देना परिवारों में ही नहीं, प्रोफेशनल दुनिया में भी आम है, लेकिन अपने समय के दिग्गज साहित्यकारों से थोड़ी अधिक विनम्रता की उम्मीद की जाए तो क्या यह ‘अतिरेक’ कहा जाएगा?

मैत्रेयी जी के उस दिन वक्तव्य को सुनते हुए मैंने सोचा क्या मैत्रेयी पुष्पा स्त्री-विरोध की बात कर रही थीं? और मुझे लगा कि नहीं, वे उन नानी-दादी की तरह बात कर रही थीं जो यह कहती हैं कि “यहाँ समझौता न करें तो यहाँ निभाव मुश्किल हो जाएगा।” वे मेरी तरह भी बात कर रही थीं, जब वे कह रही थीं कि लड़कों को संस्कार तो हम ही देती हैं, क्या हम उन्हें अन्य स्त्री को बराबरी का सम्मान देने के लिए तैयार करती हैं? लेकिन मेरी असहमति उनसे हो जाती है कि जब वे ‘परिवार में औरत को तो समझौता करते हुए ही चलना है’ का उदाहरण पेश करती हैं। मुझे लगता है फिर तो लड़कियां चुप रहना ही सीखेंगी और लड़के मनमानी करना। जहां ज़रूरत हो वहाँ परिवार में भी अपनी आवाज उठानी पड़ेगी, नारिवाद कोई ऐसा सिद्धान्त नहीं है जिसे आप भाषण से पढ़ा दें, इसे तो व्यवहार में लाना पड़ेगा। यहाँ उनकी और मेरी राह अलग हो जाती है।

लेकिन पितृसत्ता क्या एक तरह से काम करती है? वह तो तरह-तरह से घेरती है। जरा सी सावधानी हटी, और हम उसकी गोद में जा गिरते हैं। परिवार में बुजुर्ग के हाथ में जब तक सत्ता रहती है, मान भी रहता है लेकिन जब वे अप्रासंगिक होने लगते हैं तो हम उनके प्रति असहिष्णु भी होने लगते हैं। मुझे लगता है कि उस दिन हमारे पास एक बुजुर्ग महिला कथाकार को सामने मंच पर बैठे सुनने का धैर्य नहीं था। पितृसत्ता सिर्फ पुरुष के खोल में नहीं आती, जिसको भी लगता है कि उसके पास ताकत है, उसकी आवाज़ ऊंची है, वह यदि कमजोर की आवाज़ को दबा दे, पितृसत्ता का चरित्र यही है। और मुझे इस बात पर संदेह हुआ कि उस दिन कहीं मैत्रेयी जी के विरोध में हमारा चरित्र पितृसत्तात्मक तो नहीं हो गया था? इसके बाद जब सोशल मीडिया पर मैत्रेयी जी युवा स्त्रियों को ‘चवन्नी-अठन्नी’ कहती हैं तो वे भी उसी पितृसत्ता के हाथ में तो नहीं खेलने लगती हैं? जबकि जब हम अशोक वाजपेयी के उन वक्तव्यों पर तालियाँ बजा रहे थे कि इक्कीसवीं सदी कि स्त्रियाँ इस पीढ़ी के पुरुषों से कहीं अधिक प्रयोग कर रही हैं और कहीं आगे की कविता लिख रही हैं। तो क्या यह प्रश्न उनसे नहीं पूछा जाना चाहिए कि उनके मंचों पर इन स्त्रियों के प्रतिनिधित्व का प्रतिशत कितना है? क्या स्त्रियों को एक कोने में समेट देने वाले आयोजन में, जहां कोई भी युवा पुरुष कवि मौजूद न हो, इस तरह का वक्तव्य देकर चले जाने से यह मान लिया जाएगा कि आप वही कह रहे हैं जो आप मानते हैं? मुझे उनकी बजाय मैत्रयी पुष्पा का वक्तव्य अधिक सच्चा लगा।

इतना ही नहीं, अशोक जी का भाषण तो ऑनलाइन उपलब्ध नहीं था लेकिन मिलती-जुलती बातें उन्होंने पत्रिका में अपने साक्षात्कार में भी कही हैं। वे स्त्रियों की कविता में ‘नई निर्भीकता’ और उसके बहुल रूपों की सराहना करते हुए कहते हैं “उनमें मोहक उग्रता है”। इस एक वाक्य पर मेरा माथा ठनक जाता है। लेकिन वे यहाँ नहीं ठहरते वे कहते हैं “उसकी राजनीति पुरुष सत्ता को चुनौती देती है, और समकक्षता का इसरार करती है। पर सौभाग्य से वह सत्ताकामी नहीं है।” उनका उग्रता में ‘मोहकता’ देखना और सत्ताकमी न होने में ‘सौभाग्य’ देखना, पितृसत्ता की वह दुधारी तलवार है, जिससे औरतों को संभल कर चलना है। वे गला भी रेत दें, हमें खबर भी न हो – इस मासूमियत के साथ इन मंजे हुए सत्ताधीशों कैसे लड़ेंगे हम!

मैं फिर मैत्रेयी जी की बात की ओर लौटती हूँ। इस कार्यक्रम के बहाने मुझे लगता है कि कुछ शब्दों के निहितार्थ पर भी हमें चर्चा कर लेनी चाहिए। स्त्री विमर्श, नारीवाद और स्त्री विषयक रचना हम इन सारे शब्दों को समानार्थक शब्दों की तरह इस्तेमाल करते हैं, लेकिन क्या यह वास्तव में समानार्थी शब्द हैं? मैत्रेयी पुष्पा जब कहती हैं कि लोक गीतों में भी स्त्री विमर्श है, तो इस बात से कौन इनकार कर सकता है, लेकिन क्या हम यह कह सकते हैं कि लोक गीतों की विषय-वस्तु नारीवादी है? अधिकांशतः हम पाएंगे कि वे गीत स्त्रियों को आपस में जोड़ते तो हैं, लेकिन एकजुट नहीं करते। वे उन्हें अपने अन्याय का प्रतिकार करने के लिए एक-दूसरी के साथ खड़े होना नहीं सिखाते। लोक गीत स्त्री के दुखों को कहते हैं, उसकी कामनाओं को भी कहते हैं लेकिन वे उस सामाजिक ताने-बाने को छेड़ते नहीं। यहाँ तक कि प्रेम भी स्त्री को मुक्त नहीं करता। ताकतवर का प्रेम और आश्रित का प्रेम अलग-अलग ही रहता है। मीरा और अक्का महादेवी तो प्रेम ही कर रही थीं, और हिन्दी का नारीवादी विमर्श कब इनकार करता है उनके अवदान को मानने से। लेकिन स्त्रीवाद की लड़ाई तो प्रेम के उस स्वरूप से है जिसमें स्त्री चेरी बनी रहे और उसकी देह, उसकी कामना और उसके श्रम सभी पर नियंत्रण किसी और का रहे। क्या किसी भी शोषण के तंत्र से सिर्फ प्यार के रास्ते जीता जा सकता है? अंततः मीरा भी प्रभु में विलीन हो गईं और अक्का महादेवी भी। हमारा लोक स्त्री को जीने की राह कहाँ दिखाता है, वह तो उसकी मृत्यु का जश्न मनाता है। मैत्रयी जी जिस प्रेम की बात करती हैं, उसे तो खुद महादेवी वर्मा ने भी कहाँ माना। अकारण तो आजीवन अकेले रहना नहीं चुना होगा उन्होंने!

यह बात ठीक है कि महादेवी वर्मा ‘शृंखला की कड़ियाँ’ लिखते हुए बीच-बीच में नर्म पड़ जाती हैं लेकिन वे कहती हैं कि “अन्याय के प्रति में स्वभाव से असहिष्णु हूँ अतः इन निबंधों में उग्रता की गंध स्वाभाविक है, परंतु ध्वंस के लिए ध्वंस के सिद्धान्त में मेरा विश्वास कभी नहीं रहा।” वे यह भी कहती हैं कि “भारतीय नारी जिस दिन अपने सम्पूर्ण प्राण प्रवेग से जाग सके उस दिन उसकी गति को रोकना किसी के लिए संभव नहीं। उसके अधिकारों के बारे में यह सत्य है कि वे भिक्षावृत्ति से न मिले हैं न मिलेंगे, क्योंकि उनकी स्थिति आदान-प्रदान योग्य वस्तुओं से भिन्न है।” हम जान सकते हैं कि महादेवी नर्म पड़ कर भी आज से लगभग 80 साल पहले आज हम जहां खड़े हैं, उससे बहुत आगे की बात कह रही थीं। इतना ही नहीं, मैत्रेयी जी जिस पश्चिम के खिलाफ महादेवी को खड़ा करने की कोशिश करती हैं, स्वयं महादेवी की पुस्तक में बार-बार उसी पश्चिमी समाज में औरतों की स्थितियों का ज़िक्र आता है। वे लिखती हैं कि “जो अन्य प्रगतिशील देशों की स्त्रियाँ हैं, वे इस निष्कर्ष तक पहुँच चुकी हैं कि स्त्री के लिए घर उतना ही आवश्यक है जितना पुरुष के लिए।” मेरा मानना यह है कि कोई भी देश और समाज सिर्फ अपने अतीत की ओर देखते रह कर बदलाव की कामना नहीं कर सकता। अतीत से भी हम सीखते हैं और अपनी आस-पास की दुनिया से भी। नारीवादी विमर्श में तो इस बीच कई लहरें आ कर बीत गईं और आज दुनिया भर में नारीवादी विमर्श के दायरे का जिस तरह फैलाव होता जा रहा है उसमें निश्चय ही मैत्रेयी जी जैसे लेखकों का भी महत्वपूर्ण योगदान रहा है। लेकिन आज यदि वे किसी बिन्दु पर रुक जाना चाहती हैं तो उसी मान के साथ उन्हें सुन लेने में हर्ज नहीं, जैसे हम अपनी दादी-नानी को सुन कर प्यार से गले लगा लेती हैं। यह भी पितृसत्ता की कारस्तानी है कि हम एक-दूसरी के खिलाफ हो जाएँ। ऐसे में हमारे लिए यह ज़रूरी हो जाता है कि हम थोड़ा और सब्र रखना सीखें। जब मैत्रेयी जी घर लौट कर ‘चवन्नी-अठन्नी खनकने’ की बात करने लगती हैं तो उस धैर्य का उदाहरण वे भी पेश नहीं करतीं जिसकी उम्मीद वे युवतर स्त्रियों से करती हैं।

उस शाम इंडिया इंटेरनशनल सेंटर के उस हाल में सबसे ज्यादा तालियाँ अशोक वाजपेयी के भाषण पर बजीं। लगभग हर वाक्य पर ताली। वे कह रहे थे कि इक्कीसवीं सदी में स्त्रियाँ कमाल की कविता लिख रही हैं। वे कविता की विषय-वस्तु और भाषा में इस तरह के नवीन प्रयोग कर रही हैं जैसा इस पीढ़ी के पुरुषों में देखने को नहीं मिलता। लेकिन स्त्रियों ने अभी-अभी अपनी बात कहना सीखी है तो थोड़ा अतिरेक हो सकता है। मैं पूछना यह चाहती हूँ कि जिस देश में लड़कियों को जन्म लेने के लिए लड़ना पड़ता है, बराबर की रोटी के लिए लड़ना पड़ता है, बराबर की शिक्षा के लिए लड़ना पड़ता है, अपना पैसा कमाने, अपनी संतान को जन्म देने या न देने, अपना साथी चुनने, यहाँ तक कि क्या पहनना है यह तक चुनने के लिए लड़ना पड़ता है, वहाँ उनका आक्रोश आपको अतिरेक नज़र आता है तो यह सीमा उस रचना की है या आपकी दृष्टि की? आप तो उस धार को ‘मोहक’ कह कर उसकी धार को कुंद कर देना चाहते हैं। यही तो करती आई है न पितृसत्ता हमेशा से! बेटियाँ ज्यादा लाड़ली हैं, लेकिन जायदाद सारी बेटों को जाएगी। इसीलिए तो कहीं आप आश्वस्त नहीं कि ”उसकी राजनीति सौभाग्य से सत्ताकामी नहीं।” उन्होंने कहा स्त्रियाँ सिर्फ स्त्री विषयक कविताएं न लिखें बल्कि अपने आस-पास की दुनिया पर भी निगाह रखें। यह वैसा ही था जैसे किसी मंच से राजनेता कहे कि साहित्यकार और मीडिया सिर्फ बुराई को ही न देखें बल्कि सकारात्मक बातों को भी लिखें। जब तमाम सत्ता प्रतिष्ठानों के शीर्ष से औरतों को यह बताया जाता है कि उनके लेखन के विषय क्या हों तो यह पूछने का मन करता है कि ‘इतना एंटाइटलमेंट आपके पास आता कहाँ से है?’ किसी भी मंच पर छह कवियों की बारह-तेरह कविताओं को सुन कर आप यह कैसे तय कर पाते हैं कि उनकी कविता के विषय का दायरा क्या है? मुझे अशोक जी समेत अनेक पुरुष कवियों की स्त्री विषयक कविताएं याद आती हैं और में यह कहना चाहती हूँ कि कृपया आप स्त्री विषयक कविताएं लिखना बंद करें और सुनें कि औरतें कह क्या रही हैं। थोड़ा सा अपनी कुर्सी छोड़ें, आज अगर औरतें सत्ताकमी नहीं हैं तो कल वे उस पर भी दावा करेंगी। लेकिन इसके लिए औरतों को ज्यादा सजग रहना पड़ेगा, एक-दूसरी के खिलाफ खड़े होने से पहले यह शिनाख्त करनी होगी कि बंदूक किसी ने उनके कंधे पर उनके ही खिलाफ तो नहीं तान रखी है!

देवयानी साहित्यकार हैं और राजनैतिक सामाजिक विषयों पर टिप्पणीकार भी हैं। 

 

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here