सिर्फ महिलाओं का सरोकार नहीं है नारीवाद

वसीम अकरम

वंचनाएं और दर्जाबंदी, ये समाज में ऐसी बे‍ड़ि‍यां हैं जो अक्सर महिलाओं के पांवों में बांध दी जाती रही हैं। सदियां गुजर गईं मगर वंचनाओं ने आज तक आधी दुनिया का पीछा नहीं छोड़ा। कोई ऐसा क्षेत्र नहीं, कोई ऐसी जगह नहीं जहां महिलाएं किसी न किसी रूप में वंचनाओं की शिकार न हों। यह भी एक हद तक सच है कि वंचनाओं ने ही महिलाओं के सर्वांगीण विकास को रोक रखा है और उन्हें नारीदवाद पर विमर्श करने के लिए मजबूर कर दिया है। इसकी एक सबसे बड़ी वजह है समाज की पितृसत्तात्मक व्यवस्था, जिसमें वो बचपन से लेकर बुढ़ापे तक के अपने जीवन में अपने ही बुनियादी अधिकारों से महरूम रहती हैं। ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर महिलाएं हर चीज को अपने हक के नजरिए से क्यों न देखें? इसी नजरिए ने कभी नारीवादी सिंद्धांतों की नींव डाली थी और अब इस किताब ‘नारीवादी निगाह से’ का सूत्रपात भी इसी नजरिए से हुआ है। लेकिन यह भी याद रहे कि नारीवाद का सरोकार सि‍र्फ महिलाओं से नहीं है, बल्कि इसका दायरा एक ऐसे सत्ता-संरचना से है, जो स्त्री और पुरुष जैसी अस्मिताओं की रचना करके महिलाओं को पितृसत्ता के तमाम ‘तंत्रों’ में फिट करता है। नारीवाद का कन्सर्न भी यही है कि समाज में हर किसी के मन में लोकतांत्रिकता की मजबूत विचारधारा का प्रस्फूटन हो और आधी दुनिया अपने अधिकार से कभी वंचित न हो।

राजकमल प्रकाशन से आई ‘नारीवादी निगाह से’ किताब जेएनयू की प्रोफेसर निवेदिता मेनन की अंग्रेजी किताब ‘सीइंग लाइक ए फेमिनिस्ट’ का हिंदी संस्करण है। इसका अनुवाद नरेश गोस्वामी ने किया है और अब यह किताब पूरी तरह से संशोधित और संवर्धित रूप में हिंदी में हमारे सामने है। ‘नारीवादी निगाह’ एक तरह से महिलाओं के‍ लिए तय गई दर्जाबंदी को तोड़ने का नजरिया है। हालांकि, इसके अनुवाद में कठिन शब्दों के भावानुवाद के बजाय शाब्दिक अनुवाद से काम चलाया गया है, जो आम पाठक के लिए पढ़ने में थोड़ी मुश्किल खड़ी करती है। दरअसल, अंग्रेजी में यह किताब एक बड़े शोध का नतीजा है, जिसमें दुनियाभर के नारीवादी सिद्धांतों का जिक्र है, शायद यही वजह है कि अनुवादक के लिए इसका भावानुवाद मुश्किल रहा होगा। फिर भी यह हिंदी पाठकों के लिए एक जरूरी किताब है।

कोई भी सिद्धांत जब प्रतिपादित होता है तो उसकी अपनी जटिलताएं भी उसके साथ चली आती हैं। नारीवादी सिद्धांत की भी अपनी जटिलताएं हैं। लेकिन, इस किताब में प्रोफेसर निवेदिता मेनन ने नारीवादी सिद्धांतों की जटिलतम अवधारणओं को अपने व्यावहारिक प्रयोगों से अच्छी तरह से जोड़कर देखा-परखा है। महिलाओं के अधिकारों और वंचनाओं को लेकर सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक प्रक्रियाओं की एक परिपक्व समझ के दायरों में निवेदिता जी एक सार्थक बहस भी खड़ी करती हैं। ऐसा नहीं है कि निवेदिता ने नारीवादी नजरिए को बहुत तंग करके या कोई दायरा बनाकर अपनी बात को एकपक्षीय रहने दिया है, बल्कि उन्होंने तो पितृसत्ता पर महिलाओं के विजय घोष की अवधारणा को भी नकारा है और समाज में स्त्री-पुरुष की बराबरी भरी अस्मिताओं की प्रासंगिकता भी बताई है, जो एक लोकतांत्रिक देश के बेहतर भविष्य के लिए जरूरी है। गैर-बराबरी का समाज ही तो भेदभाव और दर्जाबंदी की बे‍ड़ि‍यां इजाद करता है। नारीवादी निगाह से इन बेड़ि‍यों को तोड़ देने से पूरा समाज ही प्रगतिशील और उन्नत हो जाएगा।

नारीवाद की शुरुआत भारत में कब हुई, इसका ठीक-ठीक समय तो मालूम नहीं है, लेकिन नारीवादी विषयों के अध्येता कुछ विद्वानों का मानना है कि भारत में नारीवाद की शुरुआत 19वीं सदी में हुई है। जैसे-जैसे समाजों में साक्षारता बढ़ती गई और महिलाओं ने खुद को शैक्षिक बनाना शुरू किया, वैसे-वैसे उनमें जागरूकता भी बढ़ती गई और वे पुरुष-सत्तात्मक समाज से अपने अधिकारों को लेकर सवाल करने लगीं। इन सवालों के जवाब भी एक हद तक इस किताब में मौजूद हैं, लेकिन अभी उन जवाबों को धरातल पर उतरने में बेशुमार मुश्किलें हैं। सबसे पहली चीज कि पुरुष खुद को जिस विशेषाधिकार के तहत देखता है, उसमें इस बात की गुंजाइश नहीं बचती है कि वह स्त्री को उसके अधिकार सौंप दे, क्योंकि इसके लिए उसे अपने विशेषाधिकार त्यागने होंगे। और दुखद यही है कि पुरुष कभी इस त्याग की भावना में बहने की कोशिश नहीं करते या शायद करना ही नहीं चाहते। हालांकि, यह कोई मुश्किल काम नहीं है, लेकिन समस्या इसी बात की है कि आसान चीजों को हम कहां हल कर पाते हैं!

कहने को तो हम एक बड़े लोकतंत्र में रहते हैं, लेकिन क्या हमारा मानस लोकतांत्रिक है? किसी भी देश की व्यवस्था भले ही कहने को पूरी तरह से लोकतांत्रिक हो जाए लेकिन अगर उसका अंदरूनी समाज और उसकी छोटी इकाइयां पितृसत्तात्मक हैं, तो वह देश कभी पूर्ण रूप से सच्चे अर्थों में लोकतांत्रिक हो ही नहीं सकता। डॉक्टर भीमराव आंबेडकर ने भी यही कहा था- ‘मैं किसी समाज की उन्नति को इस आधार पर मापता हूं कि उस समाज में महिलाओं की प्रगति कितनी हुई है।’ जाहिर है, महिलाओं की प्रगति के बिना किसी भी समाज की प्रगति असंभव है। नारीवादी नजरिए में यह प्रगति जरूरी है और इस प्रगति में जिस तरह की जाति-आधारित या राजनीतिक-सामाजिक बाधाएं विद्यमान हैं, उन पर बहस खड़ी करना आज के समय में बहुत जरूरी हो चला है।

वंचना किसी भी प्रकार की हो, वह प्रगति को बाधित करती ही है। जो महिलाएं वंचनाओं को तोड़कर आजाद हो जाती हैं, उनकी हालत बाकी महिलाओं से कहीं बहुत बेहतर बन जाती है और वो अपने अधिकारों के साथ बेहतर जीवन जीने लगती हैं। दहेज उन्मूलन को लेकर बड़ी-बड़ी बातें ये समाज करता तो है, लेकिन धरातल पर हालात अब भी नहीं बदले हैं। विडंबना तो यहां तक है कि थोथी आधुनिकता के बहाने भी आदिम सामाजिक व्यवस्था का संरक्षण जारी रहता है, जिसमें यौन हिंसा से लेकर तमाम तरह की सामाजिक-राजनीतिक और आर्थिक दुश्वारियों को महिलाएं झेलने के लिए मजबूर बना दी जाती हैं। भारत एक जाति-प्रधान देश है। इस प्रधानता ने तो महिलाओं के खिलाफ हिंसा और वंचना को उनके जीवन का हिस्सा तक बना दिया है। क्या इस मसले पर एक ठोस सामाजिक-राजनीतिक रणनीति और बहस-विमर्श की दरकार नहीं है?

नोबेल विजेता अर्थशास्त्री प्रोफेसर अमर्त्य सेन का मानना है कि ‘इस तथ्य से ज्यादा यूनिवर्सल ट्रूथ कोई और नहीं है कि देश और दुनिया के लगभग हर क्षेत्र में जो भी व्यक्ति या समूह वांछनीय है, उसकी सीमाएं पहले से तय रहती हैं।’ ऐसे में वस्तुकरण की अवधारणा मजबूत हो जाती है जो स्त्री-देह के प्रस्तुतीकरण या बाजार में खरीद-बिक्री की चीज बनाने की ओर ले जाती है। ये विसंगतियां हैं, पेचीदगियां हैं। नारीवादी नजरिए से देखने का अर्थ यही है कि मुख्यधारा तथा नारीवाद के बीच की पेचीदगियों को दूर किया जाए। देह की निर्मिति, जाति-आधारित राजनीति के जरिए मुख्यधारा के नारीवाद की आलोचना, समान नागरिक संहिता, घरेलू श्रम का नारीवादीकरण, पितृसत्ता की छाया में पुरुषत्व का निर्माण, यौनिकता और यौनेच्छा जैसे मुद्दों की पड़ताल करती यह किताब एक बेहतर और बराबरी की सोच वाले समाज के निर्माण में महत्वपूर्ण योगदान दे सकता है, बशर्ते इस किताब में दर्ज नारीवादी मुद्दों-मसलों पर एक बड़ा विमर्श खड़ा किया जाए। यह कोई छोटा काम नहीं है, इसमें काफी वक्त लग सकता है। लेकिन इतना जरूर है कि इससे समाज अपनी प्रगति को तेज करने में कामयाब रहेगा।

देश और दुनियाभर में विवाह की संस्था को लेकर भी नारीवादियों के द्वारा अनेक सवाल उठाए जाते रहे हैं। समाज की सशक्त इकाई ‘परिवार’ की पड़ताल करते हुए निवेदिता मेनन सवाल उठाती हैं कि अगर विवाह जीवन का अंत है तो उसे जीवन का उद्देश्य कैसे माना जा सकता है? यह सवाल इसलिए उठा है, क्योंकि विवाह-रूपी संस्था ने महिलाओं के लिए बड़ी-बड़ी वंचनाएं खड़ी की है। स्त्री-पुरुष देह के बीच एक भौतिक खाई तो खींच दी गई है लेकिन उन दोनों के बीच जो आत्म है, वह न मर्द है और न औरत। इस आत्म को लेकर कोई विमर्श क्यों नहीं करता? क्या यही वजह नहीं कि जाति के बाहर प्रेम-विवाह करने वाले लोगों के आत्म को यह समाज समझ नहीं पाता और उनके साथ हिंसा पर उतर आता है? इस आत्म को समझना जरूरी है। इसलिए नारीवाद सिर्फ महिलाओं का सरोकार नहीं है, बल्कि पूरे समाज का सरोकार है। प्रोफेसर निवेदिता ने नारीवादी राजनीति और सत्ता के जेंडर-आधारित रूपों की कार्य-प्रणाली को समझने पर ज्यादा जोर दिया है, क्योंकि अमूमन आमफहम समझ में सिर्फ महिलाओं के हितों की बात करने को ही लोग नारीवादी समझ बैठते हैं। तो जरूरी ये है कि पहले इस किताब को पढ़ी जाए, फिर कोई राय बनाई जाए। हालांकि, मेरा यकीन है कि नारीवादी विमर्शों को ताकत देने में यह किताब एक महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।

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पुस्तक – नारीवादी निगाह से
लेखक – निवेदिता मेनन
प्रकाशक – राजकमल प्रकाशन
मूल्य – 299 रुपए (पेपरबैक)

लेखक युवा पत्रकार हैं,
संपर्क- talk2wasimakram@gmail.com

 

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