कहानी: फेसबुक और पाप

अनामिका अनु

सर्वेश उपाध्याय बड़े आलोचक, उपन्यासकार, लेखक और कवि हैं। उन्होंने चार दशक पत्रकारिता को दिया है। तीस किताबें लिखी हैं और आधे दर्जन से अधिक किताबों का संपादन किया है।

साढे़ छह फुट के पचहत्तर साल के सर्वेश जी जब जवान थे तो बड़ी संख्या में लोग उन्हें देखने और सुनने आया करते थे। राजनीतिशास्त्र में एम ए और पी एच डी सर्वेश जी बड़े शौक से कपड़े खरीदते हैं और उससे भी ज्यादा सलीके से कपड़े पहनते हैं । पत्नी दिल्ली विश्वविद्यालय में अँग्रेज़ी पढा़ती हैं । दोनों की इकलौती बेटी रक्षन्दा उपाध्याय देश के बड़े समाचार पत्र में चीफ एडीटर है।

सर्वेश जी आजकल कुछ नहीं करते। पिछले दस सालों से उनकी बदली ज़बान और तहज़ीब ने उन्हें उथले बुजुर्गों में शामिल कर दिया है जो हमेशा फेसबुक पर लगे रहते हैं। खूबसूरत लेखिकाओं से हँसी-ठिठोली करके उनका दिन काटता है। उनकी बढ़ती फूहड़ता के कारण लोग उन्हें गंभीरता से नहीं लेते हैं।

उनकी एक बहुत बुरी आदत है , रात के बारह बजे के बाद शराब में टुन्न होकर फेसबुक पर पोस्ट लिखने की जिसमें निरर्थक बातें होती हैं। कभी सरकार को गाली देते हैं,कभी प्रशासन, कभी लेखक, कभी कवि, कभी दक्षिणी पंथियों को तो कभी वामपंथियों को। समान भाव से सबों को गाली देने की यह अद्भुत क्षमता उन्हें अमूमन पाँच-सात पैग लगाने के बाद आ जाती है। आजकल वे मध्यममार्गी लोगों को भी गालियाँ देने में सिद्धहस्त हो गये हैं। स्त्री विमर्श, दलित विमर्श, आदिवासी विमर्श न जाने कौन-कौन से विमर्शों की हवा निकाल चुके सर्वेश जी की एक दिन ऐसी हवा निकली कि पीचके आम सा मुँह लिए बैठे रहते हैं दालान पर।

अट्ठारह-अट्ठारह घंटे फेसबुक, मैसेंजर, व्हाट्स अप पर रहने वाले उपाध्याय जी अब उस फोन को छूते भी नहीं हैं जिसे वे सोते वक़्त सिरहाने में रखकर ही सोते थे। ग़ुसलख़ाने भी हाथ में मोबाइल लेकर जाने वाले उपाध्याय जी आजकल गुमसुम रहते हैं और फोन को छूना तो दूर उसे चार्ज भी नहीं करते। उन्होंने अपनी मोबाइल छज्जे के स्टोर बाॅक्स में ‘ स्वीच आॅफ’ करके रख दी है । आजकल किचन गार्डन में हरी मिर्च उगाते हैं हालाँकि आजकल उनका किचन में प्रवेश निषिद्ध है।

उनका एक ही जिगरी दोस्त था जो मन के सुख दुःख के साथ कुरकुरे, चिप्स आदि बाँटा करता था, वह था उनका नाती गोलू। आजकल वह गोलू भी मौन हड़ताल किए है। अच्छा खासा उछलता-कूदता ,बोलता रहता है पर नानू को देखकर अपनी माँ के कमरे में भाग जाता है। मजाल कि एक कुरकुरे का टुकड़ा नानू को दे दे।

घर में यह आलम हफ्ते भर से है। पर उपाध्याय जी के चेहरे पर सदियों का दुख लेकर आयी है। हफ्ते भर में रंगे बाल सफेद होने लगे हैं, चमकते चेहरे पर चिंता की गंभीर रेखाएं और झुर्रियां आ गयी हैं ,ताजमहल से खंडहर हो गये हैं।

हुआ यूँ कि एक हफ़्ते पहले उनकी बेटी ने फेसबुक पर एक पोस्ट पढ़ी जिसमें एक लेखिका ने लिखा था कि किस तरह विधवा जानकर उपाध्याय जी सहानुभूति जताने के बदले प्रेम पत्र लिख -लिख कर उन्हें परेशान करते हैं।

लेखिका एक जमाने में उनकी सहपाठी थी,तब से जनाब उनके पीछे पड़े हैं ।पर तमाम हथकंडे अपनाने के बावजूद वह उपाध्याय जी को नहीं मिली और उनकी शादी एक बड़े चित्रकार से हो गयी।तीन साल पहले जब उनके पति का देहावसान हो गया, तब से उपाध्याय जी ने लेखिका के घर आना जाना बढ़ा दिया है। बेचारी लेखिका करे तो क्या करे। शुरू शुरू में परिचित जानकर गेट खोल देती, बाद में जब वह उपाध्याय जी की नियत से आहत हुई तो उन्होंने उनसे दूरियां बरतनी शुरू की।अब लेखिका जी उपाध्याय जी के बीस बार काॅल बेल बजाने पर भी दरवाज़ा नहीं खोलती हैं। जब लेखिका ने परेशान होकर घर का दरवाजा खोलना बंद कर दिया तो जनाब मैसेंजर पर पाँच पैग पी पी कर प्रेम पत्र रात के दो तीन चार बजे भेजते रहें। कभी-कभी एक रात में दस बारह मैसेज भेजते। लेखिका जी की दोनों बेटियाँ विदेश में रहती हैं।लेखिका ने बेटियों से मदद मांगी। बेटियों ने फेसबुक पर उपाध्याय जी को ब्लाॅक करने का उपाय बताया।

इसके बाद लेखिका जी ने एक पोस्ट फेसबुक पर लिखी जिसमें उपाध्याय जी की इकलौती बेटी को टैग किया।उपाध्याय जी की पत्नी फेसबुक का इस्तेमाल नहीं करती थी, पूरे दिन व्यस्त रहती हैं। उन्हें इन बातों की कोई खबर ही नहीं थी। बेटी ने जब टैग किए गए पोस्ट को पढ़ा तो शर्म से गड़ गयी। उसे अपने पिता की इस हरकत पर बेहद ताज्जुब हुआ। संभलती संभालती आऍफिस से घर पहुँची और रो कर माँ को सब बात बतायी।

उपाध्याय जी की पत्नी ने जब ये जाना और वह पोस्ट पढ़ी तो उसके पाँव तले जमीन खिसक गयी। एक स्वाभिमानी और आत्मनिर्भर महिला को बहुत ठेस पहुँची।

उपाध्याय जी का रसोई में प्रवेश बंद हो गया। उन्हें बरामदे से सटे कमरे में विस्थापित कर दिया गया और घर के सभी सदस्यों को उनसे बातचीत न करने का आदेश मिला। घर में कुल पाँच लोग, दमाद जो प्राइवेट कंपनी में मैनेजर हैं , बेटी, नाती और पत्नी। उपाध्याय जी को छोड़कर सब अपने काम में इतने व्यस्त रहते थें कि किसी को कभी इनकी जासूसी करने या फोन छूने की फुरसत ही नहीं थी। परिवार के सब सदस्य दिन भर घर से बाहर अपने काम पर और ये दिन भर फेसबुक पर। सब समय से खा पीकर सो जाते, सबों को सवेरे काम पर जाना होता ये पूरी रात फेसबुक और मैसेंजर-मैसेंजर खेलते रहते। किसी को कोई भनक नहीं लगी कि जनाब कौन-कौन से गुल खिला रहे हैं।

भला हो उस लेखिका का जिसने हिम्मत कर इनकी बेटी को अपनी पोस्ट से टैग किया और उपाध्याय जी की सच्चाई सामने आयी।

सच्चाई सामने आने के बाद परिवार वालों ने बलपूर्वक उनका मोबाइल फ़ोन छिनकर उनके फेसबुक और मैसेंजर को चेक किया। क्या रंगीन मिजाज़ वाली मखमली शायरी, किसी को इनबाॅक्स में मधुबाला, किसी को नरगिस, तो किसी को माधुरी कहकर क्या नज़ाकत से प्रेम परोसा गया था रात के हर पहर में।

घर के तीनों वयस्क सदस्य उनके मैसेज पढ़कर हतप्रभ थें।

एक परेशान, स्वाभिमानी और सुंदर चरित्र की महिला को क्या- क्या लिखकर भेजा था महान आलोचक और दर्जनों किताब के लेखक श्रीमान सर्वेश उपाध्याय ने।

पत्नी के मुँह से बस एक ही बात निकली

इतना पढ़-लिख कर क्या? जब भली स्त्रियों को रात-बिरात, पहर दोपहर तंग करने का धंधा ही करना था।

उपाध्याय जी पिछले दस सालों से इन कर्मों में संलिप्त थें। किसी को कानों-कान खबर नहीं हुई। लेकिन कहते हैं न एक दिन पाप का घड़ा फूटता है सो हफ़्ते भर पहले वह ऐसा फूटा की जीवन भर एक गीलापन तन-मन में महसूस हुआ। कभी आँख उठाकर

नहीं देख पाऐंगे। फेसबुक पर इस पोस्ट के बाद सबों ने उनकी खूब थू-थू की। सब पंथ वालों ने इनकी बहुपंथी आलोचना की।

बड़े तो बड़े छोटा नाती गोलू भी इनके पास नहीं आ रहा है।

रोज एक पैकेट ब्रेड खरीद कर लाते हैं। रसोई ,फ्रिज सब में ताले लगे हैं।ब्रेड कच्चा ही खा जाते हैं, नाती कभी-कभी पूछ लेता है –

“नानू ब्रेड सेंक क्यों नहीं लेते”

वे रसोई पर लगी कुंडी को देखकर सहम जाते हैं।

आजकल आत्मकथा और संस्मरण बिल्कुल नहीं पढ़ते। कई लेखकों की आत्मकथाओं में उपाध्याय जी की जवानी के दिलफेंक किस्सें एक लाइन, पाँच, लाइन, एक अनुच्छेद या कभी-कभी एक पेज ,दो पेज में भी मिल जाते हैं।

जब भी किसी मित्र, सहयोगी, पहचान वाले की आत्मकथा या संस्मरण बाज़ार में आती है ,सबसे डरे उपाध्याय जी ही रहते हैं। आलोचना तो कब की करनी छोड़ दी। कहानी-कविता सब रूठी है। पत्रकार विवादों पर इंटरव्यू लेने को बेकरार पर ये न देने की कसम खाएं आउटहाउस में पड़े रहते हैं। न मित्र आते हैं, न ये किसी के घर जाने लायक मुँह रख पाए हैं। कभी कोई दोस्त मिल भी जाता है तो पत्नी को ओट कर ऐसे खड़ा हो जाता है मानो उपाध्याय जी उनकी पत्नी को नज़र लगा देंगे।

लेखिका प्रसंग के बाद पत्नी बेटी के दबाव में उपाध्याय जी को फेसबुक पर सभी महिलाओं से क्षमा माँगनी पड़ी जिन पर उन्होंने आपत्तिजनक टिप्पणियाँ की थीं या जिन्हें मैसेज कर-कर के परेशान कर रखा था।

आजकल पोस्टमैन संस्मरण या आत्मकथा की जो भी किताबें लाता है ,उपाध्याय जी पोस्टमैन से नहीं लेते हैं और उसे वापस ले जाने को कहते हैं।

आत्मकथा या संस्मरण से सबसे ज्यादा वही घबराता है जो अतीत से डरा हुआ होता है।

आज की सतर्कता और सावधानी कल का सुकून बन सकती है। शब्द की उल्टी आसान है। क्षरित शब्दों से किसी को चोट पहुँचना और भी आसान। पर शब्दों की गरिमा बनाए रखना और इसके प्रयोग पर ध्यान देकर बोलना दुर्लभ।

कम बोलने वाले इसलिए कम नहीं बोलते कि उनके पास शब्दों की दरिद्रता है बल्कि इसलिए कि वे इसका मोल जानते हैं। ह्यूमर और अश्लीलता की रेखा का फ़र्क समझे बिना टिप्पणी करते रहना,सलाह देना और कटाक्ष करना महज बेवकूफ़ी है। कठोर और क्रूर शब्दों के प्रयोग से बचना चातुर्य या धूर्तता नहीं है बल्कि ज्ञान है,परिस्थिति का सम्मान है। बेवजह बोलने से कहीं अच्छी है अर्थपूर्ण चुप्पी । वक़्त पर बोला गया एक सही शब्द अनवरत वाचलता का सबसे सुकोमल और सटीक उत्तर है।

कांड के बाद से उपाध्याय जी ने अपना फेसबुक अकाउंट बंद कर रखा है। पीते तो आज भी हैं पर रातों में रसपिरतिया के बदले निर्गुण गाते हैं ।

फेसबुक गड़े पाप उखाड़ता है…

परिचय – अनामिका जी लेखिका एवं कवयित्री हैं तथा भारत-भूषण अग्रवाल सम्मान से सम्मानित हैं। 

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