समकालीन दलित लेखिकाओं की कहानियों में स्त्री

कविता पासवान

स्त्रीवादी लेखन का प्रमुख नारा है कि ‘पर्सनल इज पॉलिटिकल’ यह नारा स्त्री के संघर्षों, व्यक्तिगत अनुभवों और सत्य का खुलासा स्त्री की जुबानी करने का पक्षधर है ताकि उसकी त्रासद स्थितियों का बोध समाज को हो सके। स्त्री लेखन जब अपने वैयक्तिक अनुभवों की अभिव्यक्ति की बात करता है तब रचना की नायिका के साथ स्त्री रचनाकार को जोड़कर देखना पाठक के लिए आसान हो जाता है। क्योंकि “स्त्री जब लिखती है तब अपने निजी जीवन और निजता को दांव पर लगा रही होती है। अपने घर–परिवार और समाज का भय और प्रतिक्रिया का डर अवचेतन रुप से उसकी कलम को संचालित कर ‘सेल्फ सेंसर’ का काम करता है।”1 ऐसे में यदि दलित कहानियों में स्त्री की बात की जाए तो समकालीन दलित कहानियों में स्त्री के अनेक स्वर हैं। इन दलित कहानियों में चेतना के धरातल इकहरे नहीं है। क्योंकि हिंदी दलित कहानियां जाति के अलावा, सामाजिक न्याय, साम्प्रदायिक विसंगतियों, प्रशासनिक घालमेल और शोषण के बारीक तंतुओं को भी पकड़ती हुई अपने कैनवास में सतरंगी कोलाज प्रस्तुत करती है। अतः हम कह सकते हैं कि दलित कहानियों की कथ्यभूमि पहले से ज्यादा विस्तृत और आन्दोलनधर्मी हुई है। जिनमें सुशीला टाकभौरे, रजनी तिलक, कुसुम मेघवाल, रजत रानी मीनू, कौशल पंवार, कावेरी, पुष्पा आदि स्त्री कहानीकार शामिल हैं।

सुशीला टाकभौरे की ‘टूटता वहम’ कहानी – संग्रह में वाल्मीकि समाज से जुड़ी कहानियाँ हैं। ‘अनुभूति के घेरे’ संग्रह में ‘घर भी तो जाना है’, बंधी हुई राखी’, ‘कैसे कहूँ’ उनके जीवन के अनुभव व्यक्त करते हैं। उन्होंने अपनी कहानियों में दलित समाज और स्त्री दोनों की स्थिति, शोषण, अन्याय के साथ–साथ समस्या के समाधान एवं समाज में परिवर्तन को भी चित्रित किया है। ‘जन्मदिन’, ‘संघर्ष’, ‘छौआ माँ’, ‘सिलिया’ आदि शिक्षा पर बल और बेटा–बेटी में अंतर को मिटाने का प्रयास ‘गलती किसकी है’, ‘सही निर्णय’ कहानियाँ दर्शाती हैं। शिक्षा व्यक्ति तथा समाज के लिए एक आधार रुप में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। जिस प्रकार मनुष्य के जीवन के लिए ऑक्सीजन आवश्यक है उसी प्रकार अस्तित्व के लिए शिक्षा। शिक्षा व्यक्ति को बुद्धि तथा चेतना से सम्पन्न करती है। यही कारण है कि प्राचीन भारतीय समाज में स्त्री तथा दलित को शिक्षा से दूर रखा गया, परन्तु आज की स्त्री शिक्षा के महत्व को जानती है क्योंकि वह जानती है कि इसके द्वारा ही गुलामी की बेड़ियों को तोड़ा जा सकता है। इसलिए ‘सिलिया’ कहानी की नायिका सिलिया भी दृढ़ संकल्प करती है कि “मैं बहुत आगे तक पढूंगी, पढ़ती रहूंगी, उन सभी परम्पराओं का पता लगाऊंगी जिन्होंने हमें अछूत बना दिया है। मैं विद्या, बुद्धि और विवेक से अपने आपको ऊँचा साबित करके रहूंगी, किसी के सामने झुकूंगी नहीं, न ही कभी अपना अपमान सहन करुंगी… मैं शादी नहीं करुंगी, मुझे बहुत आगे तक पढ़ना है।”2

अनीता भारती एक सक्रिय कार्यकर्ता और चर्चित लेखिका हैं। ‘एक थी कोटेवाली तथा अन्य कहानियाँ’ उनकी कहानी–संग्रह है तथा इसके अतिरिक्त उनकी अनेक कविता–संग्रह और संपादित पुस्तकें हैं। ‘एक थी कोटेवाली’ उनकी चर्चित, संक्षिप्त और असरदार कहानी है। दलित शिक्षिका गीता का चयन एक विद्यालय में होता है। यहाँ शिक्षिकाओं का पूरा स्टॉफ ‘कोटेवालियों’ और ‘गैर कोटेवालियों’ में बंटा रहता है। गीता सुबह पहले पीरियड से ज्वॉइन करती है और हर पीरियड की घंटी के साथ इन दोनों समूहों में उसकी जाति को लेकर कयास, पूर्वाग्रह और तनाव बढ़ता चला जाता है। गीता की मेरिट और आकर्षक व्यक्तित्व भी कोई धारणा कायम करने में बाधा बनते हैं। कहानी और उसका तनाव आठवें तथा अंतिम पीरियड तक चरम पर पहुँच जाता है। गीता अम्बेडकरवादी है, यह जानते ही गैर दलित शिक्षिकाओं का पारा चढ़ जाता है। गीता का साथ पाकर ‘कोटेवाली शिक्षिका’ उनका कड़ा और तार्किक जवाब देती है और सबकी जाति बताती है। यह कहानी दर्शाती है कि कार्यस्थल पर यौन–उत्पीड़न रोकने वाले नियम व समितियाँ तो बनी हैं किन्तु जातिगत भेदभाव को रोका जा सके ऐसा कोई मैकेनिज्म भी तो होना चाहिए। गैर दलित समाज किसी व्यक्ति की जाति जानते ही निर्मम और पक्षपाती हो जाता है। गैर दलित वर्ग शहरी परिवेश में उत्पीड़न की गंवई हरकत तो नहीं करता किन्तु संकेतों, कटाक्षों, शब्दों और शारीरिक भंगिमाओं के द्वारा वह ऐसा माहौल बना देता है कि बर्दाश्त नहीं होता, तब जाति–व्यवस्था और इसके पैरोकारों के प्रति दलितों में आक्रोश पनपना स्वाभाविक ही लगता है। अनीता भारती अपनी रचनाओं के माध्यम से दलित स्त्रीवाद की मुहिम चलाए हुई हैं। वे दलित स्त्री के प्रश्न को अपने ढंग से उठाती हैं। उनकी प्रस्तुत कहानी दलित स्त्री के कार्यस्थल यानी स्कूल में व्याप्त जातिगत विसंगतियों को बेनकाब करती है।

रजनी दिसोदिया ने कम परन्तु सार्थक कहानियाँ लिखी हैं। उनकी ‘चारपाई’ कहानी–संग्रह में ‘ताड़का वध’ कहानी बहुत महत्वपूर्ण है। कथावाचक कॉलेज शिक्षक है। उसके घर (फ्लैट) के सामने सौमित्र रहता है जो सेना में अधिकारी है। उसके पिता की मौत नक्सलवादियों के द्वारा किए गए बारूद सुरंग विस्फोट में हुई थी। अब सौमित्र की भी पोस्टिंग नक्सल प्रभावित क्षेत्र में ही हो जाती है। कथावाचक तथा सौमित्र के परिवार में तनाव का वातावरण है। हर फोन, हर आवाज़ पर कुछ अनिष्ट की आशंका होती है। कहानी में जर, जंगल, जमीन का विमर्श भी चलता रहता है। पक्ष–विपक्ष के विचार भी कौंधते हैं। कथावाचक की कालोनी में चल रही रामलीला में ‘ताड़का वध’ के संवाद सुनाई पड़ते हैं। आदिवासी, नक्सल, पुलिस, राजनीति, मुख्यधारा और हाशिए का ऐसा कोलाज बनता है कि ‘ताड़का वध’ तो हो जाता है लेकिन सवाल खड़ा रह जाता है–  “हाय चाची ताड़का रोटी कौन पकाएगा? हाय चाची ताड़का रोटी कौन खिलाएगा?”3 मुख्यधारा के लिए कानूनी, न्यायिक और नैतिक जीत ‘ताड़का वध’ की तरह है लेकिन आदिवासियों के लिए अस्तित्व और अस्मिता का प्रश्न, रोटी का सवाल है।

दलित कहानियाँ मात्र व्यक्तिगत या जातिगत दुःख–दर्द को ही बयान नहीं करती, बल्कि इनमें वृहद सरोकार, समान संघर्ष और अस्मिता का विस्तार नज़र आता है। दलित कहानी मात्र शहरी–ग्रामीण परिवेश में जातिगत उत्पीड़न तक सीमित न रहकर आदिवासियों, मानवतावादियों के संघर्ष में सहभागी होकर उसे मज़बूती और विस्तार भी देती है। मिथकों का रचनात्मक उपयोग दलित कहानियों भरपूर दिखाई देता है। ध्यान देने योग्य बात यह है कि दलित कहानीकार मिथकों का उपयोग अपने ढंग से कर रहे हैं। मिथक मूल निवासियों की संवेदना से जुड़े हैं। जिसके कारण प्राचीन देव न्याय आज अन्याय की श्रेणी में आ गया है। हम कह सकते हैं कि यह एक प्रकार से ब्राह्मणवादी वैचारिकी को पलट देने का उपक्रम है। स्वराज प्रकाशन से ‘समकालीन भारतीय दलित महिला लेखन’ 2011, खंड एक में पुष्पा भारती की कहानी ‘जूता’ छपी थी। लघुकथात्मक रूप में सारगर्भित कहानी ‘जूता’ में मार्क्सवाद और अम्बेडकरवाद का रचनात्मक कोलाज दिखाई पड़ता है। मोची रामखिलावन जूते–चप्पल गांठकर इतने पैसे कमाना चाहता है कि अपने भाई की शादी में जाने के लिए अच्छे कपड़े और जूते खरीद सके। वह बाज़ार से जूते खरीद सके इतना तो नहीं कमा पाता लेकिन जो कमाता है उससे चमड़ा, रंग और जूता बनाने का सामान ले आता है, और रातभर खटकर वह बहुत अच्छा एक जोड़ी जूता तैयार कर लेता है। जूता इतना शानदार बन जाता है कि एक ग्राहक मिन्नतें कर बारह सौ रुपए में खरीद लेता है। बारह सौ में घर भर की जरूरतें पूरी हो जाएंगी, यह सोचकर रामखिलावन जूता बेच देता है। अगले दिन जब किसी सस्ते जूते की तलाश में वह कनॉट प्लेस जाता है और एक बड़े शोरुम के शोकेस में अपने जूते को दोगुने रेट की चेपी लगे देखकर हैरान रह जाता है। यह कहानी एक दलित स्त्री द्वारा, दलित पुरुष श्रमिक के श्रम और अधिक मूल्य को हड़प लेने की साजिश को चित्रित करती है। यह कहानी संकेत देती है कि हाशिए के समाज, उसकी कला–संस्कृति और धरोहर को किस प्रकार बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ और कॉरपोरेट घराने लूट रहे हैं। यह कहानी बहुत बड़ा प्रश्न भी खड़ा करती है कि दिल्ली और अन्य महानगरों में लगने वाले ‘हाट और हस्तशिल्प मेले’ लोक कलाकारों, श्रमिकों और कारीगरों को कितना मेहनताना और श्रम का लाभ दे पाते होंगे ?

रजत रानी ‘मीनू’ की 2012 में प्रकशित ‘हम कौन हैं ?’ कहानी–संग्रह में अम्बेडकरवादी विचारधारा की सशक्त अभिव्यक्ति है। इस संग्रह में कुल बारह कहानियाँ हैं जो भारत की सभी विभेदों की जड़ बनी हुई हमारी जातिव्यवस्था, स्त्री–शोषण तथा जातीय अहंकार की भावना को अभिव्यक्त करती है। इसमें जाति–व्यवस्था द्वारा शोषित–पीड़ित निम्न जातियों को आत्मालोचन के लिए प्रेरित करने वाली कहानियाँ हैं। ‘रिश्ता’ कहानी जहाँ एक ओर पारिवारिक संघर्ष को अभिव्यक्त करती है तो वहीं दूसरी ओर निम्न जातियों में भी जातिगत ऊँच–नीच की गहराई तक फैले हुए जहर की मार्मिक अभिव्यक्ति है। कहानी में नीता और विनीता सौतेली बहनें हैं। उसके पिता विनीता की शादी में नीता को केवल इसलिए आमंत्रित नहीं करते कि उसने अपनी मर्जी से चमार जाति के लड़के से शादी की है जबकि वे जाटव जाति के हैं लेकिन दोनों ही जातियां अनुसूचित जाति में सम्मिलित हैं। केवल आर्थिक विषमता के कारण एक ही जाति के भिन्न–भिन्न स्तर हैं। नीता अपने पति ऋषिकांत से इस संबंध में कहती है– “वही तो मैं सोच रही हूँ कि हमारी शादी तो अंतरधर्मीय और अंतरजातीय भी नहीं थी। पहली पसंद भी मम्मी–पापा की ही थी। बस्स वर्ग का अंतर है। हम भूमिहीन वर्ग के हैं और वे कृषि संपन्न नौकरीपेशा। इसी सुपीरियरिटी भाव के कारण चमार से जाटव बन गए हैं। ऐसा कोई काम नहीं किया, जिससे मेरे परिवार की नाक नीची हुई हो।”4 वर्तमान समय में, जाति–व्यवस्था तथा जातिगत ऊँच–नीच ने भी समाज में अपना स्वरुप बदल लिया है। जातिगत ऊँच–नीच तथा शोषण के नए आयामों का भी यथार्थ चित्रण रजत रानी ‘मीनू’ की कहानियाँ करती हैं। इनकी ‘वे दिन’, ‘धोखा’ कहानियाँ सदियों से स्त्री पर हो रहे शोषण, अन्याय और अत्याचार की दास्तान की मार्मिक अभिव्यक्ति है।

रजनी तिलक दलित नारीवादी आंदोलन की एक सशक्त आवाज हैं। वह लेखक–कवि होने के साथ–साथ एक कर्मठ संगठनकर्ता भी हैं। उन्होंने तमाम तरह के धार्मिक और पितृसत्तात्मक आडंबर से न सिर्फ अपने को दूर रखा, बल्कि अपने तमाम साथियों को भी तार्किक जीवन जीने और पितृसत्ता और जाति की जकड़नों के खिलाफ निर्णायक लड़ाई लड़ने के लिए लगातार प्रेरित किया। उनकी आत्मकथा ‘अपनी जमीं, अपना आसमां’ काफी प्रशंसित हुई थी। इसमें उन्होंने उत्तर भारतीय दलित महिला के साथ होने वाले भेदभाव, अत्याचार को उसी सहजता से रखा, जिस सहजता से वह अपने भाषणों में देती थीं तथा लोगों को जातिवाद से लड़ने को कहती थीं। उनकी नई कहानी–संग्रह ‘बेस्ट ऑफ करवाचौथ’ काफी विचारोत्तेजक है। इसमें उन्होंने पूरी बेबाकी से अपने अनुभवों को, खासतौर से पितृसत्ता से टकराने वाले जीवन संघर्षों को चित्रित किया है और सामाजिक आंदोलनों की भी पड़ताल की है। इस संग्रह से साफ पता चलता है कि वह सिर्फ अंबेडकरवादी विमर्श तक ही सीमित नहीं थी, इससे बाहर समाज के बड़े बदलावों से भी जुड़ी हुई थीं।

राजस्थान की प्रख्यात लेखिका एवं समाज सेविका के रूप में कुसुम मेघवाल ने अपनी रचनाओं और लेखों के माध्यम से राजस्थान के दलित समाज एवं स्त्रियों की समस्याओं और जातिगत भेदभाव को बहुत ही मार्मिक ढंग से अपनी रचनाओं में चित्रित किया है। कुसुम मेघवाल की ‘अंगारा’ कहानी–संग्रह के सभी नारी–पात्र विद्रोही स्वरुप में सामने आए हैं उन्होंने इस संग्रह की भूमिका में स्पष्ट लिखा भी है कि यदि “नारी को अपने मान–सम्मान, स्वाभिमान के साथ जीना है, उसे अपना अस्तित्व बचाना है, सदियों से चली आ रही इस सड़ी–गली, ब्राह्मणवादी, शोषणपरक, अन्यायपरक, अमानवीय पुरुष प्रधान सामाजिक व्यवस्था को बदलना है तो उसे क्रांति ज्वाला फूलन की तरह अपने हाथों में बेलन की जगह हथियार उठाने होंगे।”5 अतः अपनी कहानी–संग्रह ‘जुड़ते दायित्व’ में उन्होंने स्पष्ट किया है आपाधापी के इस युग की विकृतियों से न तो हिंदी का लेखक वर्ग बचा है न ही प्रकाशक वर्ग। इस आपाधापी की विकृतियों ने नए लेखकों के भविष्य पर जो प्रश्न चिन्ह खड़ा किया वह अपने स्थान पर विद्यमान है। एक तरफ बाजार घटिया फुटपाथी बाजारू पुस्तकों से भरा पड़ा है तो वहीं दूसरी तरफ रचनाधर्मी लेखकों की कृतियां प्रकाशन की बाट जोहते–जोहते निराश हो चुके हैं। जिसे लेखिका ने इस कहानी में साहित्य की विशेषता बताते हुए लेखक और उसकी कृति की आधुनिक समय में क्या स्थिति हो गई है को सहज रुप में चित्रित किया है।

कौशल पंवार की 2017 में प्रकाशित एकमात्र रचना ‘जोहड़ी’ (कहानी–संग्रह) है। इस कहानी–संग्रह की अधिकतर कहानियाँ नायिका प्रधान है जो दलित स्त्रियों के साहस, स्वाभिमान, हीनताबोध से मुक्त और विद्रोह की भावना से युक्त है। कहानी में समस्त घटनाओं का केन्द्रीय स्थल ‘जोहड़ी’ है। गाँव को महामारी से बचाने वाला जोहड़ी वाला बाबा इसी के किनारे आकर रहने लगता है कहानी की नायिका ‘बतेरी’ अनपढ़ है, लेकिन समाज की पाठशाला में उसे अनुभव ज्ञान प्राप्त हो गया है जिसके कारण वह निडर और तार्किक हो गई है। कई बार भूतों के डर से बतेरी की सहेलियाँ दोपहर को जोहड़ी पर जाने से मना करती हैं तो बतेरी कहती है कि “ये तो जाण–बुझ के बनाया गया ढकोसला है, कोई भूत–वूत नहीं होता।”6 बतेरी का परिवार अछूत होने के कारण इस बाबा के दर्शन दूर से ही कर सकता था। बाबा झोपड़े के बाहर निकलकर प्रसाद ले लिया करता और मोर के पंखों से बने झाड़ू से झाड़ देता था ताकि उस झाड़ू से दूसरी महिलाएं अछूत न हो जाएँ। दलित स्त्री, दलित होने के कारण जहाँ जातिभेद झेलती है वहीं उसे स्त्री होने के कारण अन्य उत्पीड़नों का भी सामना करना पड़ता है। जो सुरक्षा गैरदलित स्त्रियों को मिली है वह उससे वंचित हैं। उसकी आर्थिक स्थिति पुरुष वर्ग को शोषण का अवसर देती है। बतेरी और उसका भाई रामभेर भट्टा पर काम करते हैं जहाँ घूरती हुई जमींदार की आँखे हैं, बतेरी जब भी जमींदार की तरफ देखती तो घबरा जाती है। इसके अतिरिक्त बदला, सामाजिक भेदभाव, गैरदलितों के पाखण्ड, दलित स्त्रियों पर यौनिक अत्याचार, अंतर्जातीय विवाह आदि जैसे चिर–परिचित मुद्दों पर यह कहानी–संग्रह केंद्रित है।

भारतीय समाज में स्त्री, लिंग तथा जाति भेद के शिकंजे में बुरी तरह जकड़ी है। स्त्री का पूरा जीवन पितृक मूल्यों द्वारा संचालित होता है। जो उनका अनुकूलन करने के लिए पूर्व निश्चित सांचों में ढालता है। इन पितृसत्तात्मक नियमों, जीवन–मूल्यों, दायित्वों और प्रतिबन्धों को झेलते हुए स्त्री उनकी इतनी अभ्यस्त हो गई है कि वह इनके अनुरुप जीवन निर्वाह करना अपना धर्म व कर्तव्य समझने लगती है लेकिन ‘जब उपनिवेशों को अपनी उपनिवेशित स्थिति, मानसिक गुलामी का बोध होता है तभी इतिहास में हाशिए टूटने लगते हैं। नए विमर्श बनने लगते हैं’, और वे अपनी मुक्ति के मार्ग की खोज करने लगते हैं। सुमन प्रभा की कहानी ‘नई दुनिया की तलाश’ ऐसी ही कहानी है जो स्त्री को उसकी गुलामी का एहसास कराती है। जो पितृसत्तात्मक समाज के पुरुषों द्वारा निर्मित मूल्यों, वर्जनाओं, वर्चस्व और प्रभुत्व को चुनौती देती है। कहानी की पात्र सुषमा एक जागरुक तथा चेतनाशील स्त्री है। वह पुरुष मूल्यों को कटघरे में खड़ा करके उसके अन्तर्विरोधों को सामने लाती है। वह पितृक सांचो से अलग एक स्वतंत्र जीवन जीना चाहती है। क्योंकि पितृसत्ता के दोहरे मानदण्डों के प्रति उसमें तीव्र आक्रोश है। वह अपने पिता द्वारा पारम्परिक वेशभूषा ‘धोती’ पहनने के आदेश का विरोध करते हुए कहती है– “आप सभी पुरुष क्या भारतीय नहीं हैं ? जो हमें भारतीयता पर, पारंपरिकता पर डटे रहने की सीख देते हैं ?… आप पुरुष लोग ही तो ज्यादा मॉडर्न बनते हैं पारम्परिक भारतीय परिधान धोती–कुर्ता को बिल्कुल तिलांजलि दे दी। कल से आप भी धोती कुर्ता पहनेंगे और सिर का मुंडन करा लेंगे।… इसी परिधान में ऑफिस जाएंगे। घर आकर भी इसी परिधान में रहेंगे, रात को सोएंगे भी।”7

निष्कर्षतः वर्तमान समय में स्त्री लेखन की एक अलग पहचान बन गई है। स्त्री लेखिकाएँ ज्यादातर नारी–विमर्श एवं दलित–विमर्श को लेकर अपनी रचनाओं का सृजन कर रही हैं। कहानी के क्षेत्र में बंग महिला एवं शिवरानी देवी तथा उपन्यास के क्षेत्र में उषादेवी मित्रा से शुरू हुई उपन्यास एवं कहानी लेखन की यात्रा धीरे–धीरे अत्यंत समृद्ध बनकर अपना विशिष्ट स्थान बना चुकी है। अतः विमल थोरात के शद्बों में कहें तो “भारतीय समाज–व्यवस्था की सबसे आखिरी पायदान पर खड़ी दलित स्त्री के रचनात्मक योगदान को रेखांकित किया जाए, तो तिहरे शोषण की शिकार दलित स्त्री, दग्ध जीवनानुभवों की अभिव्यक्तियों में जाति अपमान, तिरस्कार, यौन हिंसा, पितृसत्ता और गरीबी से मुक्ति के लिए तीखा तेवर अपना रही है। क्योंकि यह जानना भी जरुरी है कि दलित स्त्री–लेखन किस प्रमुखता से मनु निर्धारित नैतिकता और पितृसत्तात्मक व्यवस्था का विरोध कर रही है। अपनी रचनाओं में वह दलित स्त्री के प्रति सवर्ण पुरुष की भोगवादी दृष्टि को किस तरह बदलने का संकल्प भी लेती है और गांव–देहात, जंगल–वनों, पहाड़ों में रहने वाली श्रमिक दलित स्त्री को आत्मसजग बनाने की पहल भी कर चुकी है। जो स्वयं उसके भीतर अपनी सुरक्षा के लिए विपरीत स्थितियों से और दंबगों से लड़ने का, ताप भी पैदा करेगा। वह स्त्री–पुरुष संबंधों की समतावादी व्याख्या करने के साथ ही, दलित स्त्री के तिहरे शोषण की त्रासदी की अभिव्यक्ति द्वारा दलित स्त्री के प्रति नारी मुक्ति आंदोलन के संकीर्ण मध्यवर्गीय नजरिये को भी कुछ हद तक बदलने में कामयाब हो रही है।”8

संदर्भ-ग्रंथः–

  1. लवलीन, स्त्री लेखनः बहुत कठिन है डगर, समय माजरा, जनवरी–फरवरी, 2001, पृ. 99
  2. संघर्ष, सुशीला टाकभौरे, ज्योतिलोक प्रकाशन, दिल्ली, संस्करण- 2006, पृ. 53
  3. रजनी दिसोदिया, चारपाई, स्वराज प्रकाशन, नई दिल्ली, प्रथम संस्करण-2019, पृ. 102
  4. रजत रानी मीनू, हम कौन हैं ?, वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली, प्रथम संस्करण-2012, पृ. 101
  5. कुसुम मेघवाल, अंगारा, सम्यक प्रकाशन, नई दिल्ली, संस्करण-2006, पृ. 06
  6. कौशल पंवार, जोहड़ी, नेशनल बुक ट्रस्ट, नई दिल्ली, प्रथम संस्करण-2017, पृ. 16
  7. दलित महिला कथाकारों की चर्चित कहानियाँ, सं. डॉ. कुसुम वियोगी, पृ. 85-86
  8. दलित साहित्य का स्त्रीवादी स्वर, विमल थोरात, अनामिका पब्लिशर्स एंड डिस्ट्रीब्यूटर्स, नई दिल्ली, संस्करण-2010, पृ.10

लेखिका का परिचय- भारतीय भाषा केंद्र में शोधार्थी, जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय, नई दिल्ली-110067.

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