रूपा गुप्ता

डॉ. मुन्नी गुप्ता द्वारा अनूदित एवं संपादित पुस्तक ‘एक विदुषी की आत्मकथा’ मूल रूप से बंगला में कुमारी (श्रीमती) मानदा देवी द्वारा लिखित है। बंगला में यह पुस्तक सन् 1929 में ‘शिक्खिता पतितार आत्मचरित’ के नाम से प्रकाशित हुई थी। मुन्नी गुप्ता ने बंगला शीर्षक के ‘शिक्खिता’ (शिक्षिता) को विदुषी के अर्थ में लिया है। बंगला शीर्षक में आए ‘आत्मचरित’ के लिए हिन्दी में ‘आत्मकथा’ का प्रयोग कृति के शीर्षक को अद्यतन बनाने के लिए किया गया है।

इस पुस्तक के मूल कथ्य पर समय-समय पर लिखे गए अनुवादिका और संपादिका मुन्नी गुप्ता के कई विचारोत्तेजक आलेख भी इसमें शामिल हैं। बारह अध्यायों की मूल पुस्तक के अनुवाद के साथ उस पर लिखे गए ग्यारह आलेख भी हैं जिनमें वेश्या और उसके जीवन पर सभी कोणों से विचार है। ‘इतिहास के प्रिज़्म में वेश्यावृत्ति और संस्कृति’, ‘राजतंत्र मुक्ति-संघर्ष के दरमियान वेश्यावृत्ति’, ‘वैश्विक आँकड़ों में दर्ज़ वेश्यावृत्ति’, ‘आज़ादी के आसपास : वेश्यावृत्ति और लेखन’ आदि आलेख वेश्यावृत्ति के इतिहास की किरचें सामने रखते हैं तो ‘अपने होने को दर्ज़ करना भी वुमेन आइडेंटिटी है’, ‘यामा’ और ‘मानदा के बहाने औरत होने की तकलीफ़’, ‘उत्तर आधुनिकता के आईने में रेडलाईट’ आदि लेख वेश्या जीवन के नर्क का कारण पितृसत्तात्मक सोच की हिप्पोक्रेसी की बखिया उधेड़ देते हैं।

पुस्तक के कथ्य पर आने से पहले एक अवांतर बात।
मूल पुस्तक की लेखिका का नाम बंगला में जिस प्रकार लिखा जाता था। अनुवाद में बिल्कुल वैसा ही रखा गया है – कुमारी (श्रीमती) मानदा देवी। हिन्दी में यह प्रश्न उठ सकता है कि कुमारी है तो श्रीमती कैसे है? और श्रीमती है तो कुमारी क्योंकर हुई। स्त्री-पुरुष संबंधी वैचारिक भेदभाव सभ्यता की अस्थि-मज्जा तक इतने गहरे धँसा हुआ है कि यह स्त्री शुभाकांक्षियों और सुधारकों को हताशा भाव से भर देता है, ठीक वैसे ही जैसे सबसे पुराना पेशा कहे जाने वाले वेश्यावृत्ति के उन्मूलन की असंभाव्य स्थिति घोर निराशा से भर देती है और ऐसा विश्व की रूढ़िवादी और आधुनिक कहलाने वाली दोनों सभ्यताओं के साथ आश्चर्यजनक रूप से समान है।
विवाहित हो या अविवाहित, पुरुष के नाम के साथ सम्मान सूचक शब्द हिन्दी में ‘श्री’ और अंग्रेज़ी में ‘मिस्टर’ है। स्त्री के लिए उसकी वैवाहिक स्थिति को स्पष्ट करना अनिवार्य है, इसलिए हिन्दी में अविवाहिता के लिए कुमारी (अथवा सुश्री) और विवाहिता के लिए श्रीमती है। इसी प्रकार अंग्रेज़ी में क्रमश: ‘मिस’ या ‘मिसेज़’ है। ‘फ़ेस सेविंग’ (Face Saving) के लिए एक शब्द मिस (Ms) भी प्रयुक्त होता है, किंतु स्त्री चाहे ‘डॉक्टर’ हो या ‘डॉक्टरेट’ उसे वहाँ भी अपनी वैवाहिक नियति घोषित करनी पड़ेगी। एक दम्पति के नामों के उदाहरण से समझें – मान लीजिए पति का नाम है राम कुमार और पत्नी का नाम है सीता कुमारी। दोनों डॉक्टर हों या डॉक्टरेट (पीएच.डी.), नाम इस प्रकार लिखा जाएगा –
पति- डॉक्टर राम कुमार (Dr. Ram Kumar)
पत्नी – डॉक्टर (श्रीमती) सीता कुमारी (Dr. (Mrs.) Sita Kumari)
अब मान लिया जाए कि एक स्त्री सीता कुमारी और एक पुरुष विष्णु कुमार हैं, दोनों अविवाहित हैं और डॉक्टर या डॉक्टरेट हैं। इनका नाम इस प्रकार लिखा जायेगा –
स्त्री – डॉ. (कुमारी) सीता कुमारी (Dr. (Miss) Sita Kumari)
पुरुष – डॉ. विष्णु कुमार (Dr. Vishnu Kumar)
एक और अद्भुत स्थिति है। आपके ऊबने और स्त्रीवाद के विरोधियों के चिढ़ने का ख़तरा उठाते हुए वह भी बता दूँ। मैं अगर अपना नाम लिखूँ तो मुझे डॉ. (श्रीमती) रूपा गुप्ता (Dr. (Smt.) Rupa Gupta) या प्रोफ़ेसर (श्रीमती) रूपा गुप्ता (Prof. (Smt.) Rupa Gupta) लिखना होगा। ‘क्यों भाई?’ मैंने वर्षों पहले क्लर्क से पूछा था, ‘एटा ई नियॉम’ (यही नियम है), उसने मुझे टका-सा जवाब पकड़ाया। ‘ऐसा नियम क्यों है?’ – मेरे इस धृष्ट प्रश्न पर वरिष्ठ आयु के उन बाबू ने सच्चा उत्तर पकड़ाया था, “ना होले कि कोरे बोझा जाबे जे आपनी मेये मानुष” (नहीं तो यह कैसे समझ में आयेगा कि आप स्त्री जाति की हैं?)।

अविश्वसनीय किंतु सत्य कि मैंने उनसे कोई बहस नहीं की। स्त्री को केवल एक चुटकी सिंदूर लगा कर सदा अपनी वैवाहिक स्थिति घोषित करने से चक्र पूरा नहीं होता, क्योंकि कागज़ पर डॉक्टर रूपा गुप्ता (Doctor Rupa Gupta) लिखने पर सिंदूर की उपस्थिति-अनुपस्थिति पता नहीं चलती !
इसलिए ‘एक विदुषी पतिता की आत्मकथा’ की लेखिका का नाम कुमारी (श्रीमती) मानदा देवी है। यहाँ पर ‘देवी’ शब्द पर विचार नहीं किया जायेगा, वह फिर कभी। अपने एक आलेख ‘आत्मकथा’ में ‘दोशीज़ा’ : ‘कथा के भीतर नीम – पोशीदा’ ‘विदुषी’ ‘औरत’ और ‘वेश्या’ होने के मायने में मुन्नी गुप्ता ने आलेख के शीर्षक से जुड़े स्त्री पदों पर विस्तार से विचार किया है।

स्त्री लेखन की जन्मलग्न से ही आलोचकों ने उसे किसी पुरुष द्वारा लिखे जाने के आरोप का विरोधी ग्रह बिठा दिया था। सन् 1929 ई. में ‘एक विदुषी पतिता की आत्मकथा’ की लेखिका कुमारी (श्रीमती) मानदा देवी के साथ भी यही हुआ था (पता नहीं कब तक होता रहेगा!) उस ज़माने में तो ऐसा और अधिक होता था क्योंकि तब एकाध पुरुष ने स्त्री छद्म नाम से लेखन कर दिया था। अत: इस पुस्तक के आने पर कई आलोचकों ने इसको किसी स्त्री द्वारा लिखे जाने पर प्रश्न खड़े कर दिए। लेखिका पतिता, किंतु शिक्षिता भी थी, इसलिए पतिता द्वारा लिखे जाने पर संशय व्यक्त करते आलोचकों को उसने पतितों की लेखन क्षमता उद्धृत करते हुए प्रश्न पकड़ा दिया।

पुस्तक के दूसरे संस्करण में उसका विधिवत् उत्तर दिया, “मेरी यह जीवनी खुद मैंने लिखी है अथवा मेरी ओर से किसी पुरुष ने लिख दी है, इसे लेकर कुछ लोग झूठमूठ मगजमारी कर रहे हैं। औरतों के सम्बन्ध में पुरुषों के मन में जो तरह-तरह की हीन धारणाएँ जड़ीभूत हैं, उसके कारण ही स्त्री के लिए आज जरूरी हो गया है कि वह दुनिया के सामने समानाधिकार की माँग रखे और मैं भी खुद को ऐसा करने से रोक नहीं पा रही। यदि आलोचक केवल यह सोच रहे हैं कि क्या एक ‘पतिता’ में किताब लिखने की क्षमता हो सकती है तो इसके जवाब में कहा जा सकता है – यदि ‘पतितगण’ किताब लिख सकते हैं या पत्रिका का संपादन कर सकते हैं तो पतिताएँ क्यों नहीं कर सकतीं?” (पृ. 45)

भारतीय नवजागरण में स्त्री उद्धार का बंगाल को जो अतिरिक्त श्रेय दिया जाता रहा है उसका लाभ यहाँ के वेश्या समाज को नहीं मिला था। यहाँ तक कि कवि माइकल मधुसूदन द्वारा कलकत्ता के थियेटरों में स्त्रियों की अनुपस्थिति को पुरुषों द्वारा पूरा करने पर वेश्याओं को अभिनय क्षेत्र में लाने के विरोध ईश्वरचंद्र विद्यासागर द्वारा किये जाने की बात कही जाती है। वैसे जो अभिनेत्रियाँ दूसरी पृष्ठभूमि से पहले-पहल अभिनय के क्षेत्र में आईं उनकी छवि भी सदैव बिगाड़ी गई। कालांतर में फ़िल्मी पर्दे पर स्त्री को जिस भी सजे-धजे रूप में प्रस्तुत किया गया उसका एकमात्र संबंध उसकी देह से रहा चाहे वह ‘गंगा की तरह पवित्र’ रही नायिका हो अथवा कम कपड़ों में सदैव पुरुष को लुभाती और बदले में ‘चरित्रवान’ नायक द्वारा धिक्कारी जाती सहनायिका या खलनायिका हो। उतने ही कम या उससे भी कम कपड़ों में बड़ी संख्या में नाचती जूनियर आर्टिस्टों की क्या गिनती!

पुरुषों की तुलना में बहुत कम अधिकार सम्पन्न स्त्रियों में वेश्या के तो अधिकार ही नहीं रहे। उनके लिए किसी धर्म, किसी महात्मा का हृदय नहीं पसीजा। मुन्नी गुप्ता अपनी पुस्तक के समर्पण में यह बात एक मार्मिक उक्ति से स्पष्ट की है, “मैं आपको/कभी नहीं मिल पाऊँगी/ ईसा मेरे प्रभु/ आप एक वेश्या की खातिर/तो नहीं आ सकेंगे न/और मैं अब एक बदनाम औरत हूँ” (वेश्या एविलन रो का उपाख्यान, बतेलि बेख्त, अनुवादक – वीणा भाटिया)
तो वेश्या वह प्राणी है जिसे करुणा से भरा ईश्वर भी नहीं छूता। न ही घोर पूँजीवादी व्यवस्था में स्त्री, दलित, आदिवासी तथा अन्यों के लिए राह बनाता दिखता उत्तर आधुनिक काल कोई ‘स्पेस’ बनाता है। वेश्या का ‘टाइम’ सदैव एक जैसा दमघोंटू है। ‘उत्तर आधुनिकता के आईने में रेडलाईट’ आलेख में मुन्नी गुप्ता इस संबंध में कुछ आँकड़े देती हैं, “रेड लाइट एरिया की संख्या में बहुत तेज़ी से इज़ाफा हो रहा है और इसकी बाज़ार माँग को देखते हुए वुमेन ट्रैफिकिंग (स्त्री तस्करी) में भी काफी बढ़ोतरी हुई है। कम श्रम में अधिक आमदनी और स्त्री की बढ़ती माँग से आज दलालों की संख्या भी अधिक बढ़ी है।

आर्थिक विवशता और लाचारी में अपनाया गया यह पेशा आज के समय में और अधिक विस्तार पा रहा है। राष्ट्रीय महिला आयोग 1995-96 के अनुसार भारत के महानगरों में 10 लाख से भी अधिक वेश्याएँ हैं और इसमें पिछले कुछ वर्षों की तुलना में 25-30% इज़ाफा हुआ है। अनुमानित आंकड़े के मुताबिक पूरे देश में 02 मिलियन से भी अधिक संख्या में स्त्री देह कर्मी, यौनकर्मी हैं, जिसमें से अधिकांश की उम्र 18 से कम या यूँ कहे तो 14-15 के आस-पास है। जिस रफ़्तार से यह बाज़ार फैल रहा है यह भविष्य के लिये चिंताजनक है ख़ासकर औरतों के लिये।” (एक विदुषी पतिता की आत्मकथा, पृ. 32) अनुवादिका मुन्नी गुप्ता ने अपने विस्तृत चिंतन में इस बात पर राहत जताई है कि सुप्रीम कोर्ट ने हस्तक्षेप कर वेश्यावृत्ति को वैध करार नहीं दिया है। अन्यथा दुनिया के कुछ देश जैसे अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, स्वीडन, नीदरलैंड सहित यूरोप के अधिकांश शहरों में यौन-व्यापार वैधता प्राप्त कर चुका है। भारत में इसे अपराध माना जाता है। ऐसा अपराध जिससे सभी परिचित हैं जिसकी रोकथाम के लिए कोई कुछ नहीं करता। अपने इसी आलेख में मुन्नी गुप्ता 1996 की ही एक ओर भयावह रिपोर्ट की चर्चा करती हैं, “फैक्ट्स एन डीटेल डॉटकॉम की रिपोर्ट जिसे Robert I Friedman ने 1996 में तैयार किया था। इसके मुताबिक मुम्बई में एक लाख से अधिक कमर्शियल सेक्स वर्कर प्रति वर्ष काम कर रही हैं। ये इस बात को दर्शाता है कि यह ‘एशिया का सबसे बड़ा सेक्स बाज़ार’ है, जिस्मफ़रोशी में पेशेवर 2 मिलियन महिलायें और 2 लाख 75,000 पेशेवर सेक्सकर्मी झुग्गी-झोपड़ी और कोठे-कोठी में रहकर इस धंधे से जुड़े हुए हैं। 10 मिलियन कमर्शियल सेक्स वर्कर अनयूनिफाइड तरीके से जिस्मफ़रोशी के धंधे में लगे हुए हैं। तक़रीबन तीस लाख महिलाएँ हैं, जिनमें 35.47% नाबालिग लड़कियाँ 18 साल से कम उम्र की हैं। एक और तथ्य अन्य निजी सर्वेक्षण में दर्ज़ हैं, जिसके अनुसार यह संख्या दो करोड़ से ऊपर है। केवल मुम्बई में क़रीब दो लाख महिलाएँ देह व्यापार से रोटी-रोज़ी चलाती हैं।” (वही, पृ. 34)

नवजागरण में अग्रणी विवेकानन्द-विद्यासागर-रवीन्द्रनाथ की भूमि बंगाल की अवस्था इस मामले में और भी खराब है। फ़ील्डवर्क पर आधारित मधु कांकरिया ने अपने उपन्यास ‘सलाम आखिरी’ में कलकत्ते में वेश्यावृत्ति के फैलते जाल और वेश्याओं की नारकीय स्थिति के लोमहर्षक चित्रण की पुष्टि यह पुस्तक भी करती है, “कलकत्ते का ‘सोनागाछी’ एशिया का सबसे बड़ा दूसरा देह व्यापार का केन्द्र है। पूरे देश में देह व्यवसायियों की जो संख्या है, उसमें 26% हिस्सा आन्ध्र प्रदेश और पश्चिम बंगाल से माना जाता है। कुछ आंकड़े यह बताते हैं कि केवल कलकत्ते में इसके कुछ खास-खास मोहल्ले हैं, जिनमें साठ हज़ार यौनकर्मी हैं। इनमें से बड़ी संख्या नेपाली और बांग्लादेशियों की है। देश की सीमा में बेधड़क धड़ल्ले से कन्या तस्करी का धंधा चल रहा है। दोनों मुल्कों की सरकारें तरक्की के सूचकांक तय करने में लगी हुई हैं। इनमें से बहुतों को फुसलाकर, झांसा देकर, लोभ दिखाकर, झूठे सब्ज़बाग दिखाकर घरों से भगाया जाता है। केवल कलकत्ते में प्रेमचंद बोड़ाल स्ट्रीट, मुंशीगंज रोड, सोनागाछी, कालीघाट की कोई गली अथवा बारूईपुर के किसी अँधेरे इलाके में कान लगाकर सुनें तो ज़रूर किसी मजबूर नाबालिग की सिसकियाँ सुनाई पड़ जायेगी।” (वही, पृ. 35)
सो वेश्याओं की दुखगाथा बहुत पुरानी है। उस करुणास्पद कथा में ‘एक विदुषी पतिता की आत्मकथा’ बस यही नया कोण जोड़ती है कि यह कथा स्वयं को पतिता कहने पर बाध्य एक वेश्या मानदा कह रही है। प्रेम, भूख और अपराध किसी का भी शिकार हो जो बच्ची, लड़की या स्त्री कोठे पर पहुँचा दी जाती है उसका कोई भी द्वार फिर तथाकथित सभ्य समाज की ओर नहीं खुलता। उस गलाज़त भरी ज़िंदगी की दरिंदगी सहती उन स्त्रियों की बेज़ुबानी मानदा की आत्मकथा की शक्ल में बंगला भाषा में सन् 1929 ई. में शाया हुई। “अफ़साने को बारह हिस्सों में रखा गया। बाल्यावस्था, किशोरावस्था, पलायन, भ्रम दूर हुआ, पाप का रास्ता, देह-विक्रय, समाज का चित्र, अग्नि खेल, कीचड़ के घेरे में, अभिनव पथ, मिस मुखर्जी, टी-पार्टी और गार्डेन पार्टी। लेखिका अपनी ज़िन्दगी का मज़मून इन्हीं में सिलसिलेवार कहती है। यह स्ववृत्तांत पढ़ते हुए जरा भी एहसास नहीं होता कि इसे किसी मामूली स्त्री ने लिखा है वो भी – एक वेश्या। ऐसा लगता है पूरी दास्ताँ किसी मंझे हुए कलमकार की रूमानी, फंतासी और जादुई कलम से निकली है। इस आत्मचरित दास्ताँ का ढंग इतना मंझा हुआ है कि यह किस्सागोई एक सिटिंग में अपने अंत तक जाने के लिए बाध्य करती है। इसमें जो रवानगी इस्तेमाल हुई है वो सीधे-सीधे पढ़ने वाले के भीतर जगह बनाने में जरा भी वक्त नहीं लेती।” (वही, पृ. 38)

एक संभ्रात ब्राह्मण घराने में पैदा हुई मानदा का बचपन सामान्य बालिकाओं जैसा ही था। वह पैदायशी वेश्या नहीं थी। उसके परिवार वाले कलकत्ते के रईस परिवार के प्रतिष्ठित लोग थे। अपने माता-पिता की लाड़ली सुख-सुविधा सम्पन्न, कलकत्ते के बेथून स्कूल की छात्रा अच्छी गायिका, स्वदेशी सभा में पिता के कहने पर गीत प्रस्तुत करने वाली, ब्रह्म समाज के उपासना मंदिर जाने वाली, बंकिमचन्द्र के उपन्यास पढ़ने वाली मानदा की माँ की मृत्यु के पश्चात् उसके पिता ने दूसरा विवाह कर लिया। मानदा की पढ़ाई चलती रही किंतु पिता का सानिध्य कम होता गया। पुराने शिक्षक की जगह एक सज-धज वाले अविवाहित शिक्षक आए – मुकुल बंद्योपाध्याय। मानदा के साथ पढ़ने वालों में नन्द दादा थे। जिनके कहने पर मानदा ने चाकू चलाना सीखा था। मानदा को मुकुल ने अपनी कविता की पुस्तक ‘झरना’ दिखाई, पहले से ही प्रतिभा सम्पन्न मानद के हृदय में प्रेम की तान छेड़ दी वह भी साहित्य रचना करने लगी और पिता के उद्योग पर पत्र-पत्रिकाओं में छपने भी लगी। मानदा के शिक्षक मुकुल के ही मित्र निकले रमेश बाबू जो पहले से ही उसके दूर के मुँहबोले भाई और कालांतर में उसके ‘सर्वनाश’ के कारण थे। स्वयं रमेश बाबू के सर्वनाश के कारण शराब, जुआ और उसके लिए किया जाने वाला गबन आदि थे।

इस आत्मकथा में आत्मकथा के लिए सर्वाधिक आवश्यक तत्त्व ‘ईमानदारी’ भरपूर मात्रा में है। मानदा ने अपने अंदर प्रेम ही नहीं वासना के भी सुलगने की स्पष्ट स्वीकारोक्ति दी है। सम्पन्न परिवार, विमाता का चालाक व्यवहार, पिता की बेटी के प्रति लापरवाही और खुला वातावरण मिलकर मानदा को सुख के उस संसार में धकेल देते हैं जो उसके घर छोड़ने का कारण बनते हैं। घर छोड़ने के पश्चात् जिन नारकीय परिस्थितियों से मानदा का सामना होता है, उससे भी अधिक रमेश बाबू की वास्तविकता की भयावहता उसे सन्न कर देती है। एक दिन अपनी सहेली कमला के पत्र से उसे रमेश बाबू और अब रामस्वरूप अय्यर बने उस कपटी का मकड़जाल पता चलता है जिसके प्रेम ने उससे सब छीन लिया, “वह कमला की चिट्ठी थी, चिट्ठी पढ़ते ही मुझ पर वज्रपात हुआ। रमेश दा जिस ऑफिस में नौकरी करते थे, वहाँ के खजाने से उन्होंने तीन हजार रुपए चुराए थे। उन्होंने चार महीने की छुट्टी का जो जिक्र किया वो बिल्कुल झूठ था। रमेश दा के खिलाफ उस कंपनी ने पुलिस में शिकायत दर्ज की है। गिरफ्तारी का परवाना भी निकल चुका है। भले ही मेरे पिता ने मेरे अपहरण का जिक्र किसी से नहीं किया था लेकिन मेरे मामा (नन्द दादा के पिता) ने पुलिस में रपट लिखवा दी थी। इसी बीच पुलिस ने हमारे घर मुकुल दा के निवास, कमला के घर, रमेश दा की बोर्डिंग एवं उनके घर जाकर तलाशी ली है। कमला और मुकुल दा के पास से पुलिस ने रमेश दा के बंबई और काश्मीर के पते को छानबीन में तलाश लिया था। गुप्तचर पुलिस रमेश दा के पीछे लग गई।
मेरा शरीर भय से थर-थर काँपने लगा। इसके बाद रमेश दा को लेकर मेरे मन में भयंकर गुस्सा और हिंसा पनपी। मैं कुछ नहीं समझती हूँ इसलिए ही वे मुझे लगातार धोखा देते जा रहे थे। मैंने उन्हें जी-जान से प्यार किया, भरोसा किया – इसके बदले ऐसा जघन्य व्यवहार ! मैं हैरान थी।” (वही, पृ. 123-124)
हैरान-परेशान गर्भवती मानदा ने जब रमेश से इसके बारे में पूछा तो उन्होंने अपने वे त्याग गिनवा दिए जो उन्होंने उसके लिए किए थे। पर अब तक मानदा के सामने रमेश का चरित्र स्पष्ट हो गया था, ‘चोर, लम्पट, विश्वासघातक, मिथ्यावादी और शराबी’ (वही, पृ. 126) इसके बाद मानदा के बचे-खुचे गहने बिके, बात-बात पर उसे लात-घूँसे-थप्पड़ मिले, कमला से पैसे मँगवाए गए, सौतेली माँ से मिला उपहार सोने का हार रमेश की प्रोफेसरी की प्रवंचना के लिए गिरवी रखा गया और उससे मिले रुपए समाप्त हो जाने पर रमेश बाबू द्वारिकाधीश के दर्शन को गई मानदा को छोड़ निकल भागे। जाते-जाते मानदा के लिए एक रोचक खत छोड़ गए, “मानू ; अब तुम्हारे साथ रहना मुश्किल है। तुमने मुझे चोर, लम्पट और शराबी कहा, तुम मुझसे नफरत करने लगी हो, जहाँ नफरत और संदेह हो वहाँ प्यार के लिए कोई जगह नहीं। तीन हज़ार रुपए दफ़्तर में कैश जमा कर मेरी चोरी की बदनामी खत्म हो जाएगी। दो-चार लड़कियों को घर से बाहर निकालने के बावजूद मैं समाज में सर ऊँचा उठाकर चलूँगा और शराब पीना वह तो सम्पन्नता का लक्षण है। तुमने खुद अपना भला नहीं समझा। अब तुम्हारी मुक्ति असंभव है। मैं भी देखूँगा, तुम्हारे मन में जो नया-नया नीति ज्ञान जागा है, वह कितनी दूर तक तुम्हारी रक्षा कर सकता है। मैं जा रहा हूँ। मुझे खोजने की कोशिश मत करना।” (वही, पृ. 129)

यह नवजागरण कालीन बंगाल है लेकिन क्या तब और क्या अब मानदा की मुक्ति असंभव है। फिर भी मानदा ने स्वयं को भार मुक्त और स्वतंत्र अनुभव किया। परिस्थितियों के थपेड़े खाती मानदा मथुरा से वृंदावन आ गई जहाँ उसके घर के आस-पास कई बंगाली स्त्रियाँ रहती थीं जिनमें अधिकांश विधवाएँ थीं।
फिर मानदा को एक महीने में ही घर छोड़ना पड़ा। पास में पैसे नहीं, भीख माँगनी आती नहीं। एक बंगाली सज्जन ने उसे एक आश्रम पहुँचाया जहाँ के महंत भी बंगाली थे, किंतु वहाँ स्त्रियाँ नहीं रहती थीं। महंत ने मानदा के मन में छिपे अदमनीय प्रलोभन से उसे सचेत कर घर लौट जाने की सलाह दी, साथ ही उसके पिता को पत्र भी लिखा। पिता ने उसे स्वीकारने से साफ मना कर दिया उन्होंने लिखा कि उनकी बेटी मर चुकी है। कृशकाय, रोगिणी कठोर श्रम करती मानदा ने उत्तर में महंत जी से बस इतना कहा, ‘बाबा जी मैं महापापिन हूँ। समाज में मेरे लिए कोई जगह नहीं, पिता ने मुझे छोड़ दिया है लेकिन मुझ जैसी पाप में फँसी पतिता स्त्रियों के पाँव में जो पुरुष अपना मान, सम्मान, धन, तन-मन सब कुछ लुटाते हैं, उनकी ओर एक बार देखिये। उनको तो समाज ने सर पर बैठाकर रखा है। वे कवि और साहित्यकारों की शक्ल में मकबूल हैं। सियासी, देश सेवक के रूप में हैसियत से पहचाने जाते हैं। धनियों, संपत्ति और प्रतिपतिशाली के रूप में सम्मानित हैं। यहाँ तक कि तमाम ऋषि मुनि भी ऐसी औरतों के चरणों में अपना सबकुछ लुटाने को तैयार रहते हैं। वे भी समाज के ऊँचे आसनों पर बैठे हैं। उनके बारे में सब कुछ जानते हुए भी समाज उनके बारे में अपना मुख बंद ही रखता है। कोर्ट, कचहरी, कारपोरेशन, गुरुगीरी की राह में उनको कोई बाधा नहीं और हमने अपने बचपन में अक्ल खोकर कब कहीं एक भूल कर दी थी, उसके लिए बीते बारह सालों से अपने जीवन को अपमान की धधकती आग में जलाती आ रही हूँ। यही तो है आपके समाज की सोच।’ (वही, पृ. 132-133)
एक मृत संतान को जन्म देकर और भी रोगिणी हो कर मानदा ‘उद्धार’ आश्रम पहुँची जहाँ उसे समझ में आया कि जो औरतें अपनी मर्जी अथवा अपने कलंक के कारण घर से बाहर निकलती हैं, उनके लिए भोजन और वस्त्र सबसे बड़ी मुश्किल नहीं होती। “मैंने यह गौर किया कि इन धंधों और नौकरियों में जिन महिलाओं ने आसरा पाया हैं, उनमें से भी ज्यादातर उसी राह पर चल रही हैं, जिस राह पर अमूमन पतिता औरतें चलती हैं। इसका कारण जाहिर तौर से यह है कि वे शादीशुदा जिंदगी के संयम से गुजरकर नहीं आती। पानवालियाँ, मेस-बोर्डिंग-होटल या गृहस्थ घरों में झाड़-पोछ करनेवालियाँ, बाजार में सब्जी-फल-मछली बेचनेवालियाँ, रसोईदारिन, कारखाने की मजदूरिनें, मसाला बिनने-साफ़ करने वालियाँ, थियेटर अभिनेत्रियाँ, कीर्तनवालियाँ, रोगियों की परिचारिकाएँ, संगीत शिक्षिकाएँ, प्रसूति दाईयाँ, डाक्टरनियाँ, रेल अथवा टेलिफोन दफ्तर की कर्मचारी आदि अपनी निजी कोशिशों से सोचे-समझे अर्थ लेकर जी सकती हैं अगर ये चाहे तो पवित्रता से जिंदगी बसर कर सकती हैं, मगर अक्सर हर किसी के साथ सही समय पर ऐसा नहीं होता। अपने लम्बे अनुभव के दम पर ही मैं यह कह पा रही हूँ।” (वही, पृ. 137-138)

उद्धार आश्रम भी ‘देह विक्रय’ का केन्द्र था। अपने ‘गुप्त प्रेमी’ की सहायता से भोजन-वस्त्र की चिंता से मुक्त ऐसी सभी आश्रमवासिनों ने उन्हें उनसे विवाह कर लेने के लिए कहा जिसके लिए कोई भी प्रेमी तैयार नहीं था। एक ओर मानदा के मन में यह ख्याल आया कि छिप कर क्यों, खुल कर अपने रूप-यौवन को बेचा जाए, दूसरी ओर उसने नर्स का प्रशिक्षण लेना चाहा। काफी कुछ सीखा भी किंतु किसी का भी उसके गुप्त प्रेमी ने पीछा नहीं छोड़ा। अंत में मानदा और उसकी सहेली राजबाला ने ब्राह्मो बनने का फैसला किया। राजबाला ने मानदा को बताया था कि ‘ब्रह्म समाज सबको खुले दिल से ग्रहण करता है। अगर हमने यह धर्म स्वीकार कर लिया तो हमारे लिए पुनर्विवाह पुन: सहज हो जाएगा। लेकिन हमने अंत में जाना कि यहाँ भी बाधाओं की कमी न थी।’ (वही, पृ. 141)
चार युवतियाँ, नहीं नहीं, चार पतिताएँ कार्नवालिस स्ट्रीट के ब्रह्म समाज उपासना मंदिर बड़ी आशा से पहुँची। वहाँ के प्रमुख सफेद बालों और दाढ़ी वाले कृष्ण कुमार मिश्र को पाँव छूकर प्रणाम किया। ‘उद्धार’ आश्रम और अपनी स्थिति बताई तथा ‘ब्रह्म धर्म’ ग्रहण करने की अदम्य लालसा को उनके सामने रखा।
उन्होंने कहा, “आप लोगों की रक्षा का उपाय अकेले मेरे द्वारा संभव नहीं होगा। समाज के अन्य लोगों से भी पूछने की जरूरत है। इसके बाद उन्होंने एक अन्य वृद्ध सज्जन को पास बुलाया। हमारे बारे में सारी जानकारी पाने के बाद उन्होंने नफरत की नजर के साथ आपत्ति की, नहीं-नहीं यह कैसे संभव है? इनका पूर्व जीवन कलुषित है। पापमय है। ब्रह्म समाज में अब क्या पाप प्रवेश करेगा? हम नाउम्मीद होकर लौटने लगे। उनसे विदा लेते समय हमने पुन: प्रणाम किया तो श्री कृष्ण कुमार मित्र ने तो प्रणाम ले लिया मगर दूसरे सज्जन जिनका नाम हेम्ब्रम बाबू था, न न कहते हुए कई कदम पीछे हट गए।” (वही, पृ. 141)
अब ‘उद्धार’ लौटना भी संभव न रहा।
असली बात यही है, “लौटना भी संभव न रहा।” तंत्र तथाकथित पतिता के विरुद्ध इतना सन्नद्ध है कि उसे वापस नहीं लौटने देता तथाकथित अपतिताओं के समाज में। एक पतिता जब स्वयं बाज़ार के ‘योग्य’ नहीं रहती तो दूसरी स्त्री को इसी धंधे में खींच लाती है, क्रम चलता रहता है पात्र बदलते रहते हैं – मानदा, रानी, राजबाला, कालीदासी आदि-आदि। इनके इस पेशे में आने के कारण, परिस्थितियाँ आदि लगभग समान हैं और एक समानता है इनके ग्राहकों में सभी तरह के पुरुष हैं, “ये लुके-छिपे ढंग से वेश्यालयों में कदम रखते हैं, इनके आगमन का मूल कारण वासनापूर्ति मात्र है। गीत-संगीत अथवा अन्य किसी प्रकार के मनोरंजन से इन्हें कोई लेना-देना नहीं। ये रात के अँधेरे में आते हैं और अँधेरा रहते ही चले जाते हैं। दूसरी ओर लोक-समाज में भी अपनी मान-मर्यादा और सुनाम को बचाए रखते हैं। कवि, साहित्यकार, समाज सुधारक, नामवर वकील, स्कूल शिक्षक, कॉलेज प्रोफ़ेसर, राजनैतिक नेता, उपनेता, सरकारी दफ्तर के बड़े कर्मचारी, ब्राह्मण, महामहोपाध्याय पंडित, विद्याभूषण, तक… आदि उपाधि प्राप्त अध्यापक, पुरोहित, महंत और छोटे-मोटे व्यवसायी ये सभी इसी श्रेणी के हैं।” (वही, पृ. 153)

उधर समाज में सुधार के प्रयासों के अंतर्गत युवकों को वेश्यालयों से रोका जा रहा था तो लाख बंदिशों के उपरांत वेश्याएँ भी राष्ट्रीय आंदोलन से जुड़ रही थीं। उनके बाहरी समाज से सम्पर्क का एक साधन थियेटर भी बन रहा था। इस बाहरी यात्रा में भी उन्हें आदर्श की बात करने वाले किंतु व्यवहार में अत्यंत नीच प्रकार के लोग मिले। स्त्री को नर्क मानने वाले पुरुष उसके आकर्षण से बच नहीं पाते किंतु तथाकथित पतिताएँ जो मस्तिष्क से सजग और विदुषी थीं उनके दृष्टिकोण का परिष्करण हुआ। पतिताओं की सम्पत्ति अंतत: सरकार जब्त कर लेती है क्योंकि उनक कोई परिवार कोई जाति नहीं होता या कोई संतान नहीं होती। आधुनिक पश्चिमी समाज एक मार्ग सुझा पाया है क्योंकि “वहाँ तो औसतन बीस छात्राएँ शादी के पहले ही संतान ग्रहण करती है। इसके लिए उन्हें समाज से तो निकाला नहीं जाता है।” भारतवर्ष शिकार को ही नर्क भेज देता है। उस समय का भारत शारदा विवाह बिल से जूझ रहा है। मानदा का यह निष्कर्ष कटु चाहे जितना लगे किंतु स्त्री के प्रति अपने दुर्व्यवहार के प्रति आश्वस्त और गर्वित भारतीय समाज से वह अंत में कहती है, “हाय रे हिन्दू नारी आज तुम्हारी ये क्या दुर्गति देख रही हूँ ! तुम लोगों को जो देख रही हूँ सारे भारत को सोनागाछी में बदल देने पर ही संतोष होगा। … जो पुलिस के हाथ में हिन्दुओं के यौन व्यापार को सौंपना चाहते हैं, वे देश के घोर शत्रु हैं।” (वही, पृ. 206)
आत्मकथा के अंत में मानदा जो आर्थिक आत्मनिर्भरता उपलब्ध कर चुकी है यह पेशा छोड़ने में सफल रहती है। यह अलभ्य सौभाग्य कितनों को प्राप्त है !!!

“यह आत्मकथा उनकी करुण कथा है, जिनके प्रति समाज संवेदन शून्य है । समाज में हर स्तर पर तिरस्कृत स्त्रियों की अंतर्निहित संवेदना को अनुवादिका ने अपने मूल भाषा के प्रति सघन संलग्न भाव को अनुवाद में मिला दिया है। वास्तव में यह एक संवेदनशील शोषिता की आत्मकथा का एक संवेदनशील अनुवादिका द्वारा उससे भी अधिक संवेदनशील पाठ है, जिसमें यह देखा जाना रह गया कि पुनर रचना कहलाने वाली अनुवाद विधा की प्रक्रिया में अनुवादक का स्त्री होना कितना महत्वपूर्ण है। इस महत्वपूर्ण कृति के अनुवाद और फिर उस अनुवाद के संदर्भ को स्त्री के विभिन्न प्रश्नों के साथ लगातार आलेखों के माध्यम से चर्चा में रखने के लिए मुन्नी गुप्ता को केवल साधुवाद देना अपर्याप्त होगा , क्योंकि अभी उनसे ऐसी कई कृतियों के सामने लाए जाने की आशा है।

लेखिका का परिचय- हिंदी विभाग वर्धमान विश्वविद्यालय गुलाबबाग,
वर्धमान -713104 पश्चिम बंगाल

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