आपसी सहयोग और एकजुटता से खड़ा हुआ बहनापे का आंदोलन कैसे महाराष्‍ट्र के पचास गांवों में फैल गया

लेखक : संकेत जैन
संपादन : अंकिता आनंद
इलस्‍ट्रेशन : विकास ठाकुर

 

“मैं पढ़-लिख नहीं सकती, लेकिन मुझे ये पता है कि कानूनी मुकदमा कैसे लड़ना है,” ये कहना है 67 वर्ष की अक्‍काताई तेली का, जो महाराष्‍ट्र के कोल्‍हापुर जिले में स्थित शिरोल की रहने वाली हैं.

जिंदगी के शुरुआती दिनों में आसपास के लोगों ने अक्‍काताई को चेताया कि अपनी लड़ाई बहुत सोच-समझकर चुनना. हुआ उसका ठीक उलटा. अक्‍काताई ने हरेक लड़ाई को लड़ना चुना. आज तीन दशक बाद 2021 में वह कहती हैं, “किसी औरत पर वो सब न गुजरे, जो मुझ पर गुजरी है. इसलिए मैं हर औरत की लड़ाई लड़ती हूं.”

अक्‍काताई ने घरेलू और यौन हिंसा करने वाले मर्दों को न्‍यायालय के कटघरे तक पहुंचाकर तकरीबन 1000 ग्रामीण औरतों की मदद की है. आपसी सहयोग और मदद से खड़ा हुआ बहनापे का यह आंदोलन पश्चिमी महाराष्‍ट्र के कोल्‍हापुर और सांगली जिले के तकरीबन 50 गांवों में फैल चुका है.

आंकड़े कहते हैं कि हिंदुस्‍तान में औरतों को सबसे ज्‍यादा खतरा अपने पति से होता है और उस परिवार से, जहां वो ब्‍याही गई हैं. वर्ष 2019 का सरकारी आंकड़ा कहता है कि औरतों के साथ होने वाली हिंसा के 30 फीसदी मामले ऐसे हैं, जिसमें “क्रूरता करने वाला उनका पति या कोई रिश्‍तेदार” था.

और ये सारे भयावह आंकड़े जुटाने का काम जो कानूनी तंत्र करता है, वो खुद घोंघे की चाल से चलता है. वो भी तब, जब हिंसा की रिपोर्ट की गई हो. अक्‍काताई की कहानी इस बात को बड़े अक्षरों में रेखांकित करती है कि इन बाधाओं को पार करने के लिए सामाजिक सहयोग और एकजुटता कितनी जरूरी है.

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फोटो: संकेत जैन, 2021; ग्राफिक डिजाइन : गैब्रिएला रेमिरेज

वो पहली शुरुआत

ये 1990 की शुरुआत की घटना है. एक दिन अक्‍काताई जयसिंहपुर कस्‍बे के पास अपनी फलों की दुकान लगाकर बैठी थीं. तभी उन्‍होंने देखा कि एक दादी फूट-फूटकर रो रही हैं. पूछताछ करने पर उन्‍हें पता चला कि वहीं के रहने वाले एक शख्‍स ने उनकी पांच साल की पोती के साथ बलात्‍कार किया है. जिस अतीत को वो इतने समय से भूलने की कोशिश कर रही थीं, वो अचानक मानो उनकी आंखों के सामने आकर खड़ा हो गया. अक्‍काताई भागकर एक स्‍थानीय अधिकारी के पास गईं. वो उनके इलाके का विधायक था. वो कहती हैं, “मैंने उन्‍हें पूरी बात बताई और कहा कि पुलिस को फोन कर दीजिए.”

अपने अतीत के तजुर्बे से वो जानती थीं कि खुद सीधे पुलिस के पास जाने का कोई नतीजा नहीं होगा. कोई मदद नहीं मिलेगी. लेकिन वो जो जनता का चुना हुआ विधायक था, उसने भी केस में कोई दिलचस्‍पी नहीं दिखाई. जब और कोई रास्‍ता नहीं बचा तो वो खुद पुलिस थाने पहुंच गईं. वो कहती हैं, “जवाब में ना तो मैं सुनूंगी ही नहीं.” खुद अक्‍काताई को भी अचंभा ही हुआ, जब पुलिस ने उनकी शिकायत दर्ज कर ली और मामले की तफ्तीश शुरू की. अब वो गर्व से भरकर कहती हैं, “पांच साल तक चला मुकदमा. सिविल कोर्ट का आदेश हुआ और उस अपराधी को जेल हो गई.”

इस जीत से अक्‍काताई को प्रेरणा मिली कि वो एक पूरा आंदोलन खड़ा कर सकती हैं.

विश्‍व स्‍वास्‍थ्‍य संगठन के मुताबिक पूरी दुनिया में हर तीसरी औरत हिंसा की शिकार है. मोटे तौर पर आंकड़ों में यह बात कहें तो तकरीबन 73.6 करोड़ महिलाएं हिंसा की शिकार हैं. अक्‍काताई सहयोग और एकजुटता की ताकत से इस भयावह स्थिति को बदलना चाहती थीं.

उन्‍हें पता था कि भारत में कानूनी लड़ाई लड़ने में सालों-साल लग जाते हैं. वर्ल्‍ड जस्टिस प्रोजेक्‍ट की 2020 की रूल ऑफ लॉ इंडेक्‍स रिपोर्ट में दुनिया के 128 देशों में भारत 69वें नंबर पर है. इस देश की अदालतों में 4 करोड़ मुकदमे लंबित हैं. अक्‍काताई इन मुल्‍तवी हो रखे आंकड़ों में एक और आंकड़ा नहीं होना चाहती थीं.

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फोटो: संकेत जैन; ग्राफिक डिजाइन : गैब्रिएला रेमिरेज

कहानी के पीछे भी एक कहानी थी

इस कहानी की शुरुआत होती है 1963 से. वो याद करती हैं, “मैं 9 साल की थी. मेरी दादी ने उस आदमी के परिवार से 500 रु. ले लिए और उससे मेरा ब्‍याह कर दिया.” उनका पति महादेव उनसे उम्र में 14 साल बड़ा था और देसी दारू का धंधा करता था और खुद भी “पानी की तरह दारू पीता था.”

वो कहती हैं, “वो आधी रात से लेकर सुबह तक मुझे पीटता. यह सिलसिला 20 साल तक चलता रहा. एक बार उसने समुदाय के किसी आदमी को जान से मार डाला और उसे जेल हो गई. उसने तो दारू पीने के लिए रसोई के बर्तन-भांडे तक बेच डाले थे.” अक्‍काताई ने 12 साल की उम्र से फल बेचने, खेतों में मजदूरी करने और तंबाकू की फैक्‍ट्री में मेहनत करने का काम शुरू कर दिया था, ताकि जो चार पैसे हाथ में आएं, वो भी महादेव छीन ले. अक्‍काताई कहती हैं, “अब तो मुझे याद भी नहीं कि कितनी रातें हमने भूखे पेट सोकर काटी हैं.” वो याद करती हैं कि कैसे महादेव ने न सिर्फ उनका जीवन, बल्कि दो छोटी बेटियों का बचपन भी तबाह कर दिया था.

तमाम कोशिशों के बावजूद वो लौटकर अपने मायके नहीं जा सकीं क्‍योंकि तलाक लेने और पति का घर छोड़ने वाली औरत के माथे पर समाज की नजरों में हमेशा के लिए एक कलंक लग जाता है. आज भी अकसर इस देश की औरतों को उनका परिवार और समाज यही कहता है कि शादी में चाहे कितनी भी तकलीफ क्‍यों न हो, उसे आखिरी सांस तक उस शादी में ही रहना चाहिए. अक्‍काताई के साथ होने वाली हिंसा का अंत उनकी पति की मौत के साथ ही हुआ. 80वें दशक के आखिर में बेतहाशा दारू पीने के कारण महादेव की मौत हो गई.

“इस समाज ने ये तय कर रखा है कि औरतों को हर तरह का दुख-अत्‍याचार सहना ही है. मैं इसे बदलना चाहती थी.”

 

अक्‍काताई की पहली कानूनी लड़ाई

इस न्‍यायिक व्‍यवस्‍था के साथ अक्‍काताई की पहली लड़ाई 1990 में शुरू हुई, जब अन्‍याय हद के पार हो गया और सब्र का बांध टूट गया. वो याद करती हैं, “महादेव की मौत के बाद मेरे साथ होने वाली मारपीट तो बंद हो गई, लेकिन मेरे सास-ससुर ने मेरी जिंदगी नर्क करने में कोई कसर नहीं छोड़ी.” बिना अक्‍काताई को पूछे-बताए और उनके हस्‍ताक्षर के बिना ससुराल वालों ने महादेव की दो एकड़ जमीन बेच दी. वो कहती हैं, “मैं पुलिस के पास गई, लेकिन किसी ने मेरी कोई मदद नहीं की.”

अक्‍काताई सिर्फ पहली कक्षा तक ही पढ़ी थीं. उसके आगे उन्‍होंने कोई पढ़ाई नहीं की थी, जिसके चलते उन्‍हें कठिन चुनौतियों का सामना करना पड़ा. वो कहती हैं, “मैं अकेले ही जयसिंहपुर की कचहरी में गई.” वहां कोर्ट के अधिकारियों ने उन्‍हें बताया कि उन्‍हें सरकार की तरफ से वकील भी मिल सकता है. ससुराल वालों ने वो जमीन चार अलग-अलग लोगों को बेची थी, जिससे मामला और पेचीदा हो गया था. इसका मतलब था चार दबंगों के साथ लड़ना, जो ताकतवर ऊंची जाति से ताल्‍लुक रखते थे.

उसी समय अक्‍काताई की मुलाकात वकील धनाजीराव जगदाले से हुई, जो जयसिंहपुर के रहने वाले थे.

“उनकी लगन और हिम्‍मत ने न सिर्फ उन्‍हें संपत्ति का मुकदमा जीतने में मदद की, बल्कि उनके जैसी और तमाम औरतों को भी आगे आने का हौसला दिया.”

– धनाजीराव जगदाले, एडवोकेट

अपना पहला मुकदमा जीतने में तकरीबन 16 साल लग गए. वह कहती हैं, “मुश्किलें बढ़ती ही गईं. गुंडे रात दो बजे आकर मुझे डराते-धमकाते.”

अक्‍काताई स्‍थानीय मीडिया के पास भी जा पहुंचीं. वो याद करती हैं, “गांव के अखबार में खबर छपती तो और औरतों का भी हौसला बढ़ता. मैं चाहती हूं कि और ढेर सारी औरतें आगे आएं और अपनी लड़ाई लड़ें. एका में बहुत बल है.” इस तरह उनको समुदाय की कम-से-कम 50 औरतों की मदद मिली.

एकजुट आंदोलन का निर्माण

जब भी अक्‍काताई के पास घरेलू हिंसा की शिकार कोई औरत आती है, सबसे पहले तो वो उसे ढांढस बंधाती हैं. वह कहती हैं, “कई बार जब औरत की जान को खतरा होता है तो मैं उसे अपने घर में शरण देती हूं.”

भारत में घरेलू और यौन हिंसा का शिकार होने वाली 77 फीसदी औरतें कभी इसके बारे में बात नहीं करतीं. इस हालात को बदलने के लिए उन्‍होंने अपना फोन नंबर अपने घर के बाहर दीवार पर लिखा हुआ है. वो कहती हैं, मेरा घर औरतों के लिए SOS Center है. मेरे पास रात के दो बजे भी पीडि़त औरतों के फोन आते हैं.”

अपना फोन नंबर सार्वजनिक करने का नतीजा ये हुआ है कि फोन पर उन्‍हें जान से मारने की धम‍कियां भी मिलती हैं. वह समझाती हैं, “मुझे किसी चीज से डर नहीं लगता. मैं हमेशा अपने बगल में हंसिया रखकर सोती हूं. अब तो स्‍थानीय लोग भी मेरे काम को समर्थन देने लगे हैं.” उन्‍होंने ऐसी धमकियों के खिलाफ कानूनी कदम भी उठाया है.

स्त्रियों के साथ हिंसा के बहाने कुछ भी हो सकते हैं. उसने लड़की पैदा की, दहेज, पति शराबी है, ससुराल वाले बहू को पसंद नहीं करते, विवाहेतर संबंधों का शक, औरत ने किसी पड़ोसी या परिवार के बाहर के किसी मर्द से बात कर ली और ऐसी तमाम वजहें. मारपीट किसी भी बात पर हो सकती है.

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फोटो: संकेत जैन; ग्राफिक डिजाइन : गैब्रिएला रेमिरेज

न्‍याय की लड़ाई

कोई भी शिकायत आने पर अक्‍काताई सबसे पहले महिलाओं और बच्‍चों के लिए बनाई गई सरकार की विशेष सेल में जाकर शिकायत दर्ज करती हैं और सारे कानूनी कागज हासिल करती हैं, जिसका आगे चलकर कोर्ट में इस्‍तेमाल होगा.

वह कहती हैं, “हर मुकदमा 8 से 10 साल चलता है.” अनबायस द न्‍यूज से भारतीय न्‍याय व्‍यवस्‍था की चुनौतियों के बारे में बात करते हुए वकील गौतमन रंगनाथन कहते हैं:

“सालों-साल लंबित पड़े मुकदमे लंबे समय से चला आ रहा संकट है. इसकी दो मुख्‍य वजहें हैं, न्‍यायिक नियुक्तियों की कमी और बुनियानी संसाधनों और इंफ्रास्‍ट्रक्‍चर का न होना.”

दिल्‍ली स्थित वकील नलिनी कहती हैं, “मैं जिला न्‍यायालयों के अपने सहकर्मी वकीलों से अकसर सुनती हूं कि न्‍यायाधीश भी बहुत सारे दबावों के बीच काम करते हैं. कहीं कोई उन्‍हें रिश्‍वत देने की कोशिश कर रहा होता है तो वहीं कोई और उन्‍हें धमकियां दे रहा होता है.”

इसके अलावा कानूनी लड़ाई इतनी महंगी और मानसिक यंत्रणा देने वाली है कि इस डरकर ही कई बार लोग बीच रास्‍ते हार मान लेते हैं. वह कहती हैं, “बहुत सारे लोगों को तो कानूनी प्रणाली और उनके कानूनी हक के बारे में कुछ पता ही नहीं है.”

शारीरिक और मानसिक प्रताड़ना

इस बात से उन्‍हें रेखा की याद आती है, जिसकी उन्‍होंने मदद की थी. रेखा कहती हैं: “मेरे पति के घरवालों ने मुझसे झूठ बोला और कहा कि वो बस कंडक्‍टर है, जबकि वो जुआरी था.” शादी के एक साल के भीतर रेखा को पता चला कि उसके पति का शादी से बाहर किसी और औरत के साथ रिश्‍ता है. जब उसने अपने पति से इस बारे में जवाब-तलब करना चाहा तो वो मारपीट पर उतर आया. रेखा कहती हैं, “आठ साल तक उसने मेरे साथ हिंसा की, मुझे दुख दिया. यहां तक कि उसके घरवाले भी मुझे मानसिक रूप से प्रताडि़त करते थे.”

एक बार जब रेखा कुछ दिनों के लिए अपने मायके आई तो उसकी मुलाकात अक्‍काताई से हुई, जिन्‍होंने उसे भरोसा दिलाया कि अब वह सुरक्षित है. कोई भी शिकायत दर्ज करने से पहले अक्‍काताई आमतौर पर दोनों पक्षों से बातचीत करती हैं और उसके बाद ही कोई कदम उठाती हैं. अक्‍काताई कहती हैं, “रेखा के पति ने हमें धमकी दी और यहां तक कि मेरे साथ भी बदतमीजी की.”

उन्‍होंने गांव वालों से विस्‍तार से बात करने के साथ इस मामले की छानबीन शुरू की. इस तरह उनकी तफ्तीश शुरू हुई. अक्‍काताई कहती हैं, “मुझे उसके अवैध रिश्‍ते और जुए की लत के बारे में सबकुछ पता चला और यह भी कैसे उसने वहां के एक स्‍थानीय नेता का सहारा लेकर रेखा का मुंह बंद करने की कोशिश की.”

न्‍याय की लंबी राह

मुकदमा दायर करने से पहले अक्‍काताई ने दो महीने तक रेखा से कई बार लंबी-लंबी बातचीत की. वह कहती हैं, “हमने सबसे पहले तो सिविल कोर्ट में मुकदमा दायर किया. हमने कहा कि रेखा के पति ने उससे झूठ बोला, उसे धोखा दिया और वह रेखा को प्रतिदिन शारीरिक और मानसिक रूप से प्रताडि़त करता है.” पहला फैसला आने में तीन साल लगे, लेकिन फैसला रेखा के पक्ष में आया. रेखा कहती हैं, “कोर्ट ने उसे मुझे हर महीने 5000 रु. गुजारा-भत्‍ता देने का आदेश दिया.”

रेखा के पति ने सिविल कोर्ट के फैसले को जिला न्‍यायालय में चुनौती दी, जो रेखा के सुदूर गांव से 50 किलोमीटर दूर था. वह कहती हैं, “हर महीने मुकदमे की सुनवाई होती, जिसमें कम-से-कम आठ घंटे लगते. लेकिन उस मुकदमे का फैसला भी मेरे पक्ष में आया और इस बार तो कोर्ट ने उस पर जुर्माना भी ठोंक दिया.” इसके बाद उसके पति ने कुछ रिश्‍तेदारों से साठ-गांठ की और रेखा को कुछ पैसे देकर फुसलाने की कोशिश की कि वो उसे तलाक दे दे. अक्‍काताई कहती हैं, “मुझे तो हर बार सबसे ज्‍यादा सदमा इस बात से होता है कि कैसे मर्द को लगता है कि सबकुछ वही तय कर सकता है.”

पिछले पांच सालों में रेखा कई कोर्ट-कचहरियों के 100 से ज्‍यादा चक्‍कर लगा चुकीं. हर सुनवाई में रेखा और अक्‍काताई की एक दिन की कमाई चली जाती है.

अक्‍काताई ने रेखा से कहा कि जब तक पैसे का सारा मामला तय न हो जाए, उसे तलाक मत देना. अक्‍काताई पूछती हैं, “सारी जमीन-जायदाद उसके पति के नाम पर है. लेकिन कानून में तो बीवी-बच्‍चों का भी हक है न. हम अपना हक कैसे छोड़ सकते हैं.?” भारत में इस बात को लेकर कोई सही-सही आंकड़ा उपलब्‍ध नहीं है कि महिलाओं का कितनी जमीन पर मालिकाना हक है. वर्ष 2018 की लैंड रिपोर्ट कहती है कि औसतन 12.9 फीसदी जमीन महिलाओं के नाम है.

अक्‍काताई कहती हैं, “कोर्ट ने जो उसे महीने का गुजारा-भत्‍ता देने को कहा था, वो वो भी नहीं देता. हम तलाक नहीं लेंगे.” कई दशकों तक कानूनी लड़ाई लड़ने के बाद उन्‍हें कानूनी की पेचीदगियां भी समझ आने लगी हैं. वो कानूनी प्रक्रिया की बारीकियां कैसे समझती हैं, यह बताते हुए वह कहती हैं, “मैं वकील से तब तक सवाल करूंगी, जब तक बात मुझे ढंग से समझ में न आ जाए.”

“आप देखना कि जिस दिन कानून तक पहुंचने का रास्‍ता आसान हो जाएगा, ढेर सारी औरतें तलाक का रास्‍ता चुनेंगी. ज्‍यादातर शादियां टूट जाएंगी और उन्‍हें टूट ही जाना चाहिए.”

– रेखा, जिन्‍होंने न्‍याय पाने के लिए 8 साल तक इंतजार किया

 

मददगार क्‍या कर सकते हैं

73 वर्ष के नारायण गायकवाड़ कोल्‍हापुर के जंभाली गांव में रहते हैं. उन्‍होंने अक्‍काताई को शुरू से मुकदमे लड़ते हुए देखा है. वह कहते हैं, कई बार बहुत भयानक दबाव और लाल फीताशाही के चलते अक्‍काताई आपा खोने लगती हैं. तब मैं मुकदमे को आगे बढ़ाने में उनकी मदद करता हूं. नारायण ने अक्‍काताई की अनेकों बार मदद की है और यह सुनिश्चित किया है कि स्‍थानीय पुलिस कम-से-कम मुकदमा तो दर्ज कर ले.

एकजुट होना और समूह बनाना बहुत जरूरी है, वरना पीडि़ता अपनी लड़ाई देर तक नहीं लड़ पाएगी.
– अक्‍काताई तेली

एडवोकेट धनाजीराव जगदाले कहते हैं, “अकसर अपराधी का मुकदमा लड़ रहे वकील सुनवाई की तारीख आगे बढ़ाते रहते हैं. मुकदमा लंबा खिंचने पर पीडि़ता पर यह मानसिक दबाव बनता है कि वह पीछे हट जाए.”

एडवोकेट गौतमन रंगनाथन का मानना है कि हमें यह बात याद रखनी चाहिए कि आज हमारे पास घरेलू हिंसा के खिलाफ जो कानून है, उसे हासिल करने में नारीवादी आंदोलन की क्‍या भूमिका रही है. इससे पहले तक घरेलू हिंसा को ऐसे देखा जाता था कि यह घर के भीतर होने वाली बात है और यह मर्द का निजी मामला है. वो इस बात से सहमत हैं कि कानून में सुधार की और उसे बेहतर ढंग से लागू किए जाने की जरूरत है:

“कानून अपनी जगह है, लेकिन महिलाओं की आर्थिक निर्भरता ही वह कारण है, जिस वजह से वे हिंसक परिस्थितियों में रहती हैं. न्‍याय प्रणाली से जुड़े अधिकारियों में लैंगिक संवेदनशीलता और जागरूकता लाने के लिए न्‍यायिक अकादमिक प्रशिक्षण कार्यक्रमों का आयोजन करते रहते हैं, लेकिन ऐसी और ढेर सारी वर्कशॉप हो सकती हैं. प्रताडि़त महिला की सुरक्षा के लिए नियुक्‍त किए गए सुरक्षा अधिकारियों को और ज्‍यादा सजग, जागरूक और मौके पर मौजूद होना चाहिए. तथाकथिक मर्द अधिकार आंदोलन और यह विचार कि स्‍त्री अधिकारों से जुड़े कानून बदलने चाहिए क्‍योंकि उनका गलत इस्‍तेमाल होता है, यह बातें मुख्‍य नरेटिव को पलटने का काम कर रही हैं. हमें इस नरेटिव का भी प्रतिकार करने की जरूरत है.”
अपनी पूरी जिंदगी इस लड़ाई में खपा देने के बाद भी अक्‍काताई थकी नहीं हैं. वह कहती हैं, “अगर मुझे महिला वकील की मदद मिल जाए तो मैं पूरे कोल्‍हापुर को महिलाओं के लिए सुरक्षित बना सकती हूं.”

अक्‍काताई तेली सलाह देती हैं, “जान लगाकर लड़ो. हर चीज पर सवाल करो. मुमकिन है, उन जवाबों से किसी की जिंदगी बदल जाए.”

सबसे पहले ‘अनबायस द न्‍यूज’ में प्रकाशित.

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