अर्चना लार्क
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1. धरती का चक्कर

धरती का एक चक्कर लगा कर लौटी हूँ
एक कोने से दूसरे कोने तक बीच के रास्ते
छवियाँ साथ चलती रही हैं
एक कपड़े का घर ओस से भीगा हुआ
बच्चे जन्म और मृत्यु के बीच हैं
जिनकी मां माइनस तापमान से जूझती मर चुकी है
घास-फूस-कपड़े के कई घर किसी और के सिपुर्द हो चुके हैं
रात जितनी अँधेरी है उससे ज्यादा अँधेरी दिख रही है

कुछ दूरी पर एक परिवार
जिसने अनगिनत रिश्तों को अपमानित किया है
घर का लड़का सुदूर यात्राओं पर है
और माँ को अपने सूरज के लिए
किसी चाँद की तलाश है

थोड़ी दूर खड़ी एक बस में भगदड़ मची है
एक लड़की जो निर्वस्त्र कर दी गई है
सड़क पर पीठ के बल पडी हुई बेहोश है
एकाएक सारी दुनिया नंगी हो गई है

धरती का एक चक्कर लगा लौट आई हूँ
एक लड़की ने
प्रेम की दुनिया बसाने की ख़ातिर एक प्रस्ताव रखा है
मुहल्ले में उसका नाम शूपर्णखा पड़ गया है

सोचती हूँ अगर कुछ लौट कर आता है
तो पहले उन बच्चों की माँ लौट कर आये
उनके लिए एक घर आये और खाने को रोटी आये
लड़की को उसका प्रेम मिले
जिसमें वो एक संसार बसा सके
मुझे थकने के बाद एक अच्छी नींद मिल सके
कुछ शब्द मिलें जिनके भीतर दुनियां सुंदर लगे।

2. मृत्यु अचानक नहीं आती

वक़्त की मार अंतर्मन को निचोड़ लेती है
कुछ बातें खौलती ही नहीं हौलती हैं
और जीना मुहाल कर देती हैं

कितना जरूरी हो जाता है कभी कभी जीना
बचपन को छुपते देखना
सबकुछ बदलते देखना

कितना कुछ हो जाता है
और कुछ भी नहीं होता

अभिनय सटीक हो जाता है
सपाटबयानी विपरीत

दिशाएँ बदल जाती हैं
रात से सुबह
सुबह से रात हो जाती है

पृथ्वी अपनी धुरी पर चक्कर लगाती तटस्थ सी हो जाती है!

समय सिखाता है गले की नसों को आंसुओं से भरना
और एकांत में घूँट घूँटकर पीना

कितना कुछ पीना होता है
कितना कुछ सीना होता है

जीवन में तुरपाई करते गाँठ पड़ जाती है
ये सीवन उधड़ने पर ही पता चलता है

जीवन दिखता है
और जीना नहीं हो पाता है.
कितना कुछ घट जाता है
शोर बढ़ता ही जाता है.

बुढ़ापे की लकीर और गहरी होती जाती है।

3. एक मिनट का खेल

एक मिनट का मौन
जब भी कहा जाता है
हर कोई गि न रहा होता है समय
और फिर मौन बदल जाता है शोरगुल में
एक मिनट का मौन गायब हो जाता है
सिर्फ एक मिनट में
अपने शव के पास उमड़ी भीड़ को देख
व्यक्ति और मर जाता है
मृत्यु वाकई पहला और अंतिम सत्य है
और माफ करें मुझे मरने में ज़रा समय लग गया।

4. परछाइयां

नारों से आबाद शहर में
मुझे खूब सपने आते हैं
बचपन दिखता है जिसके गाल धंसे हुए हैं
चिढ़ाते हुए मुंह लपलपाती जीभ
पसीने से तरबतर शरीर
घर निकाला
घास की एक झोपड़ी
एक दो तीन चार की गिनती
मां की रोटी से सुगंध उठती है
दादी कौओं के लिए रोटी निकालती हैं
गर्मियों की शाम
मां एक झपकी में ही नींद पूरी कर लेती हैं
और रसोई घर में बदल जाती हैं
सपने के भीतर सपना चला आता है
धप्प कहते दोस्त
पेड़ पर ऊपर नीचे करते हैं
मां के आंचल से लुकाछिपी करते हैं
क से कबूतर अ से अमरूद के बीच
शब्दों को पिरोते हुए
नारों से आबाद शहर में
एकाएक ढह जाता है घर
सड़क, बैनर, स्त्री एकाकार हो गए हैं
बचपन के खेल के मैदान में किसी ने रख दी हैं लाठियां
कुछ नए किस्म के अपराधी
जिनके हाथ में कागज़ नहीं है
अपनी हज़ार परछाइयों के साथ टहलते हैं
खून से लथपथ मेरी आंख में।

5. वृद्ध बेरोजगारी
लाठी का मूठ कसकर पकड़ती
हिलती- डुलती
हांफते विचारों का ताना बाना बुनती चूक जाती है

मरे सवालों पर ढेर होती
सत्ता भत्ता पर अट्टहास करती है
ख्वार पड़े जीवन को स्मृति चिन्ह मान
चौभर के दर्द में छुपाती
जानती है
उनके मस्तिष्क में उगे दांत अब नुकीले हो चुके हैं
वो उठेंगे और बोल उठेंगे
ज़्यादा सोचना ठीक नहीं
विचारों के मलवे के बीच
वो चीखेंगे हम आपके साथ हैं

खुसफुसाहट से दृश्य बदल जाएगा
अभिनेता अभिनेत्रियों की स्वर लहरियां तरेर उठेंगी
आपने बहुत जिया आपने बहुत किया
पर पाया कम से कम
चरित्र की बात पर घर घर रामायण का पाठ होगा
उनकी खातिरदारी होगी जिनसे कुछ मालूमात के टुकड़े पर नमक छिड़कना रह गया होगा

वो हंसेंगे
जीवन मंत्र सिर्फ कुछ शब्दों के बीच कटकटाएगा
दो बेटा हो तो जीवन तर जाए
विवाह के निहितार्थ
सिंदूर मांग में पड़ते ही
स्त्री की संपूर्ण मांग पूरी होती है
अंतिम रस्म अदायगी से पीछे न मुड़ने की कसम खाती बेटी
सारे दुःख से भिड़ने की कुव्वत जुटाती आगे बढ़ेगी
मां सुंदर सुघड़ बेटी को ससुराल सौंप
अन्य लड़कियों पर व्यंग्य कसेगी
मेरी बेटी निर्जला व्रत में माहिर थी
उसे उंगली पर रटे थे व्रत त्योहार और मेरे संस्कार
वो धीरे बोलती थी
ऐसे चलती मानो चींटी
सिर झुकाए झुकाए खड़ी रही बरसात में
उफ्फ तक न किया

विवाह में अपनी पसंद नहीं होती
बेटी और किस्मत के बीच एक बार फिर प्रतिस्पर्धा होगी
देखते देखते बेटी ‘है’ से ‘थी’ हो जाएगी
धार्मिक कट्टरता के बीच
स्त्रियों को घर में कैद कर
उनकी उस थोड़ी आज़ादी को रौंद दिया जाएगा

कट्टरता के बीच स्त्री एक बार फिर महल की बेगमों का पद प्राप्त करेगी
फिर अपनेपन की संवेदना ढुलकेगी
शिक्षा जितनी कम हो, मन उतना कम बहकता है
एक उम्र चाहिए बच्चे के लिए
और जीवन में कुछ बनो न बनो, मां बनना सबसे बड़ा पद है
एक पति चाहिए यात्रा के लिए
और धन, दो से ही पूरा होता है
त्याग समर्पण भाव फिर संतुलित हो उठेगा
शिक्षा उतनी जितने में गृहशोभा पढ़ी जा सके
सावित्री की तरह दूसरे इलाक़े की प्राणी बनना नैतिक
और उद्गार में कुछ शब्द सीखना होगा

लड़कियां जानती हैं विवाह बुरा नहीं
चंद तरीके बुरे होते हैं
कुटिलता सिर्फ दो राष्ट्रों के बीच नहीं सधती
किसी से बात हो तो जिगर निकाल दो
फिर थोड़ा व्यंग्य कर दिमाग़ का अगला भाग झुका दो

फिर बात भी पते से ओझल किसी भटके हुए जीव स्वरूप होगी
मिर्च से होंठ सी सी करेंगे
और कोर तीखी टेर लेंगे
इस बीच संसद की बहसों में तमाम बिल पास होंगे
कई फाड़ दिए जाएंगे
नौकरी आएगी और चली जाएगी
कोई स्थाई नौकरी पाते ही मेहनत की चौपाई पढ़ेगा

नई किताबों का ढेर लगेगा
किसी पंक्ति पर वाहवाही होगी
कोई एक, बड़ा लेखक बन मुस्कराएगा
पुरस्कारों का अंबार लग जाएगा
किसान जन को रोटी और बाज़ार का ज्ञान दिया जाएगा
तमाम आंदोलनों को नए कान से सुना जाएगा
सब नया नया होगा
और कुछ भी नहीं होगा

जब तक सब अपने होने को साबित कर रहे होंगे
वृद्ध बेरोजगारी के बीच से ई की मात्रा हट चुकी होगी
अब चेहरे की झुर्री के बीच उम्र की गिनती शुरू होगी
कोरोना की दूसरी लहर से बचे पुन: जगराता करेंगे
खुद पर बीती तो कोरोना
नहीं तो नई चाल

मौतों के आर्तनाद के बीच
शुद्ध लाभकारी विज्ञापन जोरों पर होंगे
धार्मिक यात्राएं ढोल नगाड़े के बीच
पुरखों को एक बार और खुश करने निकल चुकी होंगी
ज्ञान की यात्रा अंग्रेज़ी भाषा का ठिकाना ढूंढेगी
हिंदी भाषा के लिए दिवस
एक दिन का होगा
गंवार की पदवी मिलेगी
रोज़गार शून्य हो जाएगा

हिंदी भाषा के ज़बरन उच्चारण के साथ
बेटी के जन्म-मृत्यु
इच्छा-अनिच्छा
सुख -दुख
शिक्षा -रोज़गार -पद
प्यार -नफरत से कहीं ज्यादा महत्त्वपूर्ण
महान संदेशा कोई कहलवाएगा
संस्कारहीन, निर्गुणी, वाचाल
बहेतू लड़कियां
आधी उम्र बीतते
अपने अपने घर की हुईं
समाज एक बार फिर अपने पुण्यों का घड़ा भरता
शयन कक्ष की तरफ बढ़ता चला जाएगा।

6. अमेरिका

मेरे बचपन की आंखों ने अमेरिका को हमेशा चमक से भरा पाया
मामा जो अमेरिका वाले मामा कहे जाते
उनके उपहारों से मेरा बचपन और रंगीन हो जाता
मैं यह मानती कि एक देश है जहां सब सुंदर है

बड़ी हुई तो स्वतंत्र स्त्रियों को देख अमेरिका के प्रति और नत हो जाती
एक रोज़ मैंने अखबार में एक ख़बर देखी
एक अमेरिकी स्त्री राष्ट्रपति पद की उम्मीदवार थी
वह उत्साहित स्त्री पद तक नहीं पहुंच पायी
यह सब इक्कीसवीं सदी में हुआ
जबकि हमारे देश और पड़ोसी मुल्क की स्त्री सक्षम शासक रह चुकीं

फिर भी मेरी आंखों ने अमेरिका को ताकतवर स्त्री समाज से नवाज़ा
लगा कि चमक होती नहीं
जबरन दिमाग़ की बारीक नसों में ठूंसी जाती है
क्रांति जहां से शुरू हुई वह देश एक स्त्री शासिका न दे सका
और हमारी आंखें आज भी चुंधियाती हैं
अमेरिका का गुणगान करते हुए हम भूलने लगे हैं हिरोशिमा, नागासाकी, रीग्नोमिक्स, इराक, अफगानिस्तान

एक धड़ा जो हमेशा आंखों से बचाकर रखा गया वे अश्वेत हैं
एक बच्ची श्वेत पुलिस से पूछती है – क्या आप मुझे भी गोली मार देंगे!
क्या मेरा भी गला घोंट दिया जाएगा?

अमेरिकी ने कभी ये नहीं दिखाया
कि घुटन के साथ जीना क्या होता है

वो जानलेवा फांस ही होगी जब माइकल जोसेफ जैक्सन
जोसेफ से अलग हो जाता है
नए शरीर में आने पर आत्मा नहीं बदलती

माइकल के डांस स्टेप में मुझे एक भाव नज़र आता है
जैसे पैरों को ऊपर कर हैट को नीचे करता माइकल बार बार मुंह मोड़ लेता है
जैसे एक जगह स्थिर हो कितना झुक सकते हैं
माइकल के डांस में मुझे आनंद नज़र नहीं आता
मुझे लगता है जैसे उसकी अश्वेत आत्मा चीखती है
जो गोरी खोल में पहचान को छुपाता है और श्वेत से स्वीकृति पाता है

ये अमेरिका है जिसकी चमक के पीछे
अनगिनत जॉर्ज फ्लायड
अनगिनत अश्वेत जन की लाश शामिल है
अमेरिका की चमक में मुझे खूनी रंग दिखता है।

7. जंगल जल रहा है

मैं बुखार में हूं
और विचारों का ताप बढ़ता ही जा रहा है
मुझ पर जुर्माना लद गया है
और घाव से भर गए हैं खाली हाथ।

किसी ने ललकारा है
एक किलोमीटर पर नौकरी
उसके आगे ही बैंक

मुझे कुछ नजर नहीं आ रहा है
सतत भ्रमित हूं मैं
पछतावे पर पछतावा ढंकती जा रही हूं
हारती जा रही हूं
अभी अभी मैंने एक नौकरी हारी है
एक घर
एक सफ़र
देखते देखते कई रिश्ते हार गई हूं।

8. युद्ध के बाद की शांति

पृथ्वी सुबक रही थी
खून के धब्बे पछीटे जा रहे थे
न्याय व्यवस्था की चाल डगमग थी

युद्ध के बीच शांति खोजते हुए हम घर से घाट उतार दिए गए थे

वह वसंत जिसमें सपने रंगीन दिखाई दिए थे
बचा था सिर्फ स्याह रंग में
खून के धब्बे मिटाए जा चुके थे

पता नहीं क्या था
जिसकी कीमत चुकानी पड़ रही थी
चुकाना महंगा पड़ा था
हर किसी की बोली लग रही थी
हर चीज की क़ीमत आंक दी गई थी
हम कुछ भी चुका नहीं पा रहे थे

सपने में रोज़ एक बच्चा
दिखता था
जो समुद्र के किनारे औंधे मुंह पड़ा था
एक बच्चा खाने को कुछ मांग रहा था
तमाम बच्चे अपनों से मिलने के लिए मिन्नतें कर रहे थे
उसे युद्ध के बाद की शांति कहा जाता था

दो खरगोश थे जिनकी आंखें फूट गई थीं
एक नौजवान अपनी बच्ची से कह रहा था
मुझ जैसी मत बनना मज़बूत बनना मेरी बच्ची
यह वह वक्त था
जब प्रेमियों ने धोखा देना सीख लिया था
खाप पंचायतें बढ़ती जा रही थीं

उस दिन मेरी फोटोग्राफी को पुरस्कार मिला था
मेरी गिरफ़्तारी सुनिश्चित हो चुकी थी
मैंने कहा यह कोई सपना नहीं
मेरे होने की क़ीमत है जिसे मुझे चुकाना है।

कवयित्री दिल्ली विश्वविद्यालय में असिस्टेंट प्रोफेसर के रूप में सेवारत हैं। 
संपर्क – larkarchana1@gmail.com

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