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इतिहास | स्त्रीकाल

राष्ट्रीय आंदोलन में महिलायें और गांधीजी की भूमिका पर सवाल

कुसुम त्रिपाठी स्त्रीवादी आलोचक.  एक दर्जन से अधिक किताबें प्रकाशित हैं , जिनमें ' औरत इतिहास रचा है तुमने','  स्त्री संघर्ष  के सौ वर्ष ' आदि चर्चित...

‘राष्ट्रवादी’ इतिहासकार काशी प्रसाद जायसवाल: एक स्त्रीवादी अवलोकन

रतन लाल  एसोसिएट प्रोफेसर हिन्दू कॉलेज, दिल्ली विश्वविद्यालय, 'रोहित के बहाने' सहित 5 किताबें प्रकाशित.संपर्क : 9818426159 राष्ट्रवादी आंदोलन और राष्ट्रवादी इतिहास लेखन के दौर...

इतिहास से अदृश्य स्त्रियाँ

कुसुम त्रिपाठी स्त्रीवादी आलोचक.  एक दर्जन से अधिक किताबेंप्रकाशित हैं , जिनमें ' औरत इतिहास रचा है तुमने','  स्त्री संघर्ष  के सौवर्ष ' आदि चर्चित...

डा. अम्बेडकर की पहली जीवनी का इतिहास और उसके अंश

संदीप मधुकर सपकाले  डा. अम्बेडकर  की प्रमुख जीवनियों में  चांगदेव भवानराव खैरमोड़े द्वारा लिखित जीवनी (मराठी, प्रथम खंड प्रकाशन 14 अप्रैल 1952), धनंजय कीर द्वारा लिखी...

उसने पद्मावतियों को सती/जौहर होते देखा है ..

विलियम डैलरिम्पल/अनिता आनंद  सती/ जौहर के फिल्मांकन से एक पक्ष अपना अर्थ-व्यापार कर रहा है तो दूसरा पक्ष उससे अपने जाति गौरव को जोड़कर राजनीति-व्यापार....

क्या आप जानते हैं गांधी की पहली जीवनी लेखिका कौन थीं, कब और किस...

संदीप मधुकर सपकाले  महात्मा गांधी की किसी भी भाषा में  पहली जीवनी मराठी में 1918 में लिखी गयी थी. अवंतिकाबाई गोखले द्वारा लिखी गयी इस...

इतिहास के आईने में महिला आंदोलन

निवेदिता मूलतः पत्रकार निवेदिता सामाजिक सांस्कृतिक आंदोलनों में भी सक्रिय रहती हैं. एक कविता संग्रह ‘ जख्म जितने थे' प्रकाशित . सम्पर्क : niveditashakeel@gamail.com  नारीवादी...

वेद का काल निर्धारण , एक नए परिप्रेक्ष्य में : पहली क़िस्त

डा. रति सक्सेना  (वेदों के काल निर्धारण प्रसंग से रति सक्सेना का यह विद्वतापूर्ण लेख वेदकालीन भारत को समझने में मदद करता है - स्त्रीकाल...

पीड़ाजन्य अनुभव और डा आंबेडकर का स्त्रीवाद

डा. भीम राम आंबेडकर के स्त्रीवादी सरोकारों की ओर, क़िस्त तीन शर्मिला रेगे की किताब  'अगेंस्ट द मैडनेस ऑफ़ मनु : बी आर आम्बेडकर्स राइटिंग...

ब्रह्मचारी जीवन जीती औरतों के बीच एक दिन

संजीव चंदन जिस दिन मैं उनके आश्रम में पहुंचा उस दिन मेहमाननवाजी की जिम्मेवारी गुजरात की गंगा बहन की थी. लम्बी, दुबली और हमेशा हंसमुख...
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रजनी दिसोदिया की आलोचना पुस्तक का लोकार्पण

इस किताब में सलीके से कही गयी बातों को हमें कक्षाओं में लेकर जाना चाहिए। जाति के मुद्दे को पाठ्यक्रम में न लाना भी एक साज़िश है। लेखिका की दृष्टि दलित या स्त्री विमर्श तक नहीं बल्कि कहीं अधिक व्यापक है। उनकी विनम्र शैली लोगों को जोड़ने का काम करती है। इन लेखों में ताऱीख भी देनी चाहिए जिससे उनकी वैचारिक यात्रा को पाठक समझ सके। यह पुस्तक दलित चेतना को विस्तार देती है।
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