बिहार की सावित्रीबाई फुले कुन्ती देवी की कहानी

इस किताब में कुन्ती देवी-केशव दयाल मेहता की पुत्री पुष्पा कुमारी मेहता ने अपने माता-पिता की जीवनचर्या के बहाने भारत के निर्माण की जटिल प्रक्रिया को अनायास तरीके से दर्ज किया है. यह एक ऐसी कहानी है, जो अपनी ओर से कुछ भी आरोपित नहीं करती

पहली महिला कुली, दलित महिला आंदोलन नेत्री जाईबाई चौधरी

जाई बाई चौधरी के द्वारा चलाए गए शिक्षा अभियान और उसके प्रति उनकी अप्रतिम अद्भुत समर्पण भावना का पता प्रसिदध दलित साहित्यकार कौशल्या बैसन्त्री की विश्वप्रसिद्ध आत्मकथा दोहरा अभिशाप के कई पन्नों में लिखा हुआ मिलता है। कौशल्या बैसन्त्री अपनी आत्मकथा में एक जगह लिखती है - जाई बाई चौधरी नाम की अछूत महिला ने नई बस्ती नामक जगह पर लड़कियों के लिए एक स्कूल खोला था।

अतीत और वर्तमान को समझने की दिशा में एक प्रयास : रोमिला थापर के...

" 1961 में ‘अशोका एंड द डिक्लाइन ऑफ द मौर्यास’ (अशोक और मौर्यों का पतन) के प्रकाशन के साथ ही, रोमिला थापर प्राचीन भारत...

खुर्राट पुरुष नेताओं को मात देने वाली इंदिरा प्रियदर्शिनी

ऋचा मणि दिल्ली विश्वविद्यालय में इतिहास पढ़ाती हैं और जेएनयू से पीएचडी कर रही हैं. संपर्क : maniricha@gmail.com इंदिरा गांधी की जन्मशती पर विशेष इंदिरा गाँधी (19 नवंबर...

स्त्री -पुरुष समानता के अग्रदूत डा.आम्बेडकर

अनंत अनंत स्वतंत्र पत्रकार एवं शोधार्थी हैं. fanishwarnathrenu.com का संचालन एवं संपादन करते हैं. संपर्क newface.2011@rediffmail.com और 09304734694 डा. आम्बेडकर  दलितों -पिछड़ों के मुक्तिदाता...

महिला आरक्षण : मार्ग और मुश्किलें

संजीव चंदन दूसरे देशों की तुलना में भारतीय महिलायें कम से कम एक मामले में भाग्यशाली रहीं हैं और वह यह कि उन्हें आजादी के...

महात्मा फुले के अंतिम दिनों की दुर्दशा का जिम्मेवार कौन?

आखिर में उन्होंने जोतीराव-सावित्री का घर सौ रूपए में बेच डाला | इसके बाद ये दोनों खड़कमाल आली के फुटपाथ पर रहने लगे | आगे चलकर बेटी का विवाह एक विधुर के साथ हुआ लेकिन बहु को मात्र भीख मांगकर अपना गुजर बसर करना पड़ा | १९३३ में जब उसकी मृत्यु फुटपाथ पर हुई तब एक लावारिस के रूप में पुणे नगरपालिका ने उनका अंतिम संस्कार किया | जिस काल में यह ह्रदयविदारक घटनाएँ फुले परिवार के साथ घटित हो रही थी उस समय में सत्यशोधक आन्दोलन जेधे और जवलकर के कब्ज़े में था |

90 प्रतिशत ग्रामीण अब्राह्मणों को भूल जाना पतन का कारण : डा. आंबेडकर

बाबा साहब डा. आंबेडकर के परिनिर्वाण दिवस पर उनका  एक जरूरी व्याख्यान "मित्रों ,जहाँ तक मैंने अध्ययन किया है , मैं कह सकता हूँ कि...

महात्मा फुले का क्रांतिकारी स्त्रीवाद

ललिता धारा आम्बेडकर कालेज आॅफ कामर्स एण्ड इकानामिक्स, पुणे के गणित व सांख्यिकी विभाग की अध्यक्ष और संस्थान की उपप्राचार्या. ‘फुलेज एण्ड वीमेन्स क्वश्चन...

वह भविष्य का नेता था लेकिन राजनीति ने उसे तुष्टिकरण में फंसा दिया (!)

लाल बाबू ललित  परिस्थितिजन्य मजबूरियों के कारण राजनीति में पदार्पण को विवश हुआ वह शख्स अपनी मस्ती में अपनी बीवी, अपने बच्चों  और अपने पेशे...
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रजनी दिसोदिया की आलोचना पुस्तक का लोकार्पण

इस किताब में सलीके से कही गयी बातों को हमें कक्षाओं में लेकर जाना चाहिए। जाति के मुद्दे को पाठ्यक्रम में न लाना भी एक साज़िश है। लेखिका की दृष्टि दलित या स्त्री विमर्श तक नहीं बल्कि कहीं अधिक व्यापक है। उनकी विनम्र शैली लोगों को जोड़ने का काम करती है। इन लेखों में ताऱीख भी देनी चाहिए जिससे उनकी वैचारिक यात्रा को पाठक समझ सके। यह पुस्तक दलित चेतना को विस्तार देती है।
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