प्रियंका सिंह की कवितायें ( ‘पिता’ तथा अन्य )

प्रियंका सिंह  1. पिता जीवन की आकाश थाली में चमकीले तारे तुमने ही तो बिखेरे जिनकी रोशनी बनी पथ प्रर्दशक हमेशा से संघर्षों की लड़ाई में दीवार की टेक रहे तुम दुखों...

सरोज कुमारी की कवितायें (लिफ़ाफ़ा तथा अन्य )

सरोज कुमारी  कवितायें  1. हाथ में चाय की ट्रे लिए धीरे से खोलती है दरवाजा वे साठ पार की माएं आज भी जल्दी उठ जाती हैं माथे की सलवटों में...

लंबी उम्र का रोमांटिक आदर्शवाद

भारती वत्स करवा चौथ गुजर गई,अब देश के कई हिस्सों में छठ मनाया जा रहा है,थोड़े समय बाद तीज आयेगी ,स्त्रियों के व्रतों की लंबी...

‘प्रसाद की रचनाओं में स्त्री स्वर की अभिव्यक्ति’

पूनम प्रसाद जयशंकर प्रसाद आधुनिक हिन्दी साहित्य के गौरान्वित व महान लेखक हैं।जिनके कृतित्व का गौरव अक्षुण है। उनकी प्रतिभा का निरूपण कविता, कहानी, नाटक,...

इशारा की फिल्मों में स्त्री- छवियां

राजाराम भादू इस समय मुम्बइया सिनेमा में तुमुल कोलाहल व्याप्त है। यद्यपि इसके कई गूढ अभिप्राय और निहितार्थ हैं। इसी के बीच अभिनेत्री कंगना रनौत...

ना तो बम्बई में का बा?

जितेन्द्र विसारिया यदि हमें हमारे घर, गाँव और शहर के आसपास ही शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और आवास की बेहतरीन सुविधाएँ प्राप्त हों, तो महानगरों में...

‘चलत मुसाफ़िर’ भारतीय संस्कृति से रूबरू कराता एक मंच

क्या है चलत मुसाफिर एक प्लेटफोर्म है, उन सभी लोगों के लिए जिनके अंदर घूमक्कड़ी वाला बड़ा कीड़ा है। जो फेसबुक पर 'इफ ट्रैवेलिंग वॉज...

प्रलेस की एक सदस्या की खुली चिट्ठी :पितृसत्ता के खिलाफ हर लड़ाई में हम...

आरती संजीव जी, इस मुद्दे को आप मुझे व्यक्तिगत भी भेजते रहे हैं, काफी दिनों से पढ़ रही...

लेखक संगठनों को समावेशी बनाने के सुझाव के साथ आगे आये लेखक: प्रलेस से...

पिछले कुछ दिनों से लेखिकाएं और लेखक प्रगतिशील लेखक संगठन की कार्यप्रणाली और उसमें ब्राह्मणवादी पितृसत्तात्मक वर्चस्व पर सवाल उठ रहे...

जब प्रलेस के बड़े लेखकों ने पाकिस्तानी महिलाओं से बदसुलूकी की

अब तो दोनों ऐसा शोर मचाने पर उतारू हुए कि दो कलाकारों ने तो कार कर दिया. एक जो हिम्मत करके गाने बैठी तो ‘ फूल नोचो, फूल फेंको’ की जैसे दोनों में बाजी लग गई. इस बार सिर्फ गायिका पर ही नहीं, आसपास बैठे लोगों पर भी फूल बरसने लगे. अब पाकिस्तानी मर्दों में भी कुछ बेचैनी दिखाई दी.ये वे लोग थे जिन्होंने अपनी बहनों, पत्नियों के शौक को दबा देने के बजाय उसे पनपने के मौके दिए थे. इन्हें ख़ुशी थी कि इनके घर की औरतें सर्फ आलिशान बंगलों में बैठकर बनती-संवारती नहीं रहतीं हैं, अपने हुनर को म्हणत और रियाज से निखारने की कोशिश करती हैं.
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समकालीन स्त्री लेखन और मुक्ति का स्वरूप

रेनू दूग्गल भारतीय समाज में स्त्रियों की ऐतिहासिक स्थिति संतोषजनक नहीं रही यद्यपि वैदिक काल में स्त्रियों की सामाजिक स्थिति अत्यन्त उन्नत थी। इस काल...
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