कला-संस्कृति

कल्पना पटोवारी द्वारा गाया गया और नवल कुमार द्वारा लिखित गीत कॉमनवेल्थ गेम्स में...

अागामी 4-15 अप्रैल के बीच अस्ट्रेलिया के गोल्ड कोस्ट शहर में कॉमनवेल्थ गेम्स के समारोह में प्रतियोगिता में शामिल सभी देशों की ओर से...

पेंटिंग में माँ को खोजते फ़िदा हुसेन

डा. शाहेद पाशा  मकबूल फ़िदा हुसेन ने अपनी कलाकृतियों में स्त्री को दर्शाते हुए न जाने कितने ही ऐसे चहरों को रंगा है, जिसकी दुनियाँ...

वासना नाजायज नहीं होती: लिपिस्टिक अंडर बुर्का बनाम बुर्के का सच

कुमारी ज्योति गुप्ता कुमारी ज्योति गुप्ता भारत रत्न डा.अम्बेडकर विश्वविद्यालय ,दिल्ली में हिन्दी विभाग में शोधरत हैं सम्पर्क: jyotigupta1999@rediffmail.com ‘लिपिस्टिक अंडर माय बुर्का’ स्त्री जीवन...

मेरा एक सपना है ! (मार्टिन लूथर किंग का उद्बोधन,1963)

 मार्टिन लूथर किंग, जूनियर  प्रस्तुति और अनुवाद : यादवेन्द्र    ‘मेरा एक सपना है’, 1963 में वाशिंगटन मार्टिन लूथर किंग, जूनियर द्वारा दिया गया प्रसिद्द भाषाण है, जो उन्होंने...

स्त्री संवेदना का नाटक गबरघिचोर

संजीव चंदन स्त्री की यौनिकता पुरुष प्रधान समाज के लिए हमेशा से चिंता का विषय रही है. अलग –अलग समय में यह चिंता रचनाकारों की...

जाघों से परे ‘पार्च्ड’ की कहानी: योनि नहीं है रे नारी, वह भी मानवी...

संजीव चन्दन  रिहाई के 3 दशक बाद 8 वें दशक में अरूणा राजे की फिल्म थी रिहाई. यह फिल्म प्रवासी मजदूरों के गांव में पीछे छूट...

रंडी, या रंडी से कम और हाँ, बीबी से भी बलात्कार हक़ नहीं

अखिलेश कुमार बी.एच.यु. से इतिहास में स्नातक कर रहे है संपर्क:akhileshfssbhu@gmail.com मैंने पहली बार जब 'ना' कहा तब मैं 8 बरस की थी, "अंकल नहीं .....

उम्र भर इक मुलाक़ात चली जाती है

असीमा भट्ट  'रेमो'  (Remo farnandis: the great singer) के घर गई तो ऐसा लगा 'अन्ना केरेनिना' अपना प्यार ढूंढने आई है... पुराना घर, ढेर सारी पुरानी...

जातिरूढ़ सास ‘अनारो’ की भूमिका में मैं अपनी सास को कॉपी कर रही हूँ

स्टार भारत का लोकप्रिय धारवाहिक 'निमकी मुखिया' अपनी ड्रैमेटिक सीमाओं के बावजूद ग्रामीण समाज की जाति व्यवस्था और महिला मुखिया के संघर्ष पर बना...

लिपस्टिक अंडर माय बुर्का : क़त्ल किए गए सपनों का एक झरोखा

ज्योति प्रसाद सुनिए, कहानी की शुरुआत पर ध्यान दीजिये। यह किसी लड़की के जीवन में वहीं से शुरू हो जाती है जब दाई या नर्स क्या...
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लोकप्रिय

रजनी दिसोदिया की आलोचना पुस्तक का लोकार्पण

इस किताब में सलीके से कही गयी बातों को हमें कक्षाओं में लेकर जाना चाहिए। जाति के मुद्दे को पाठ्यक्रम में न लाना भी एक साज़िश है। लेखिका की दृष्टि दलित या स्त्री विमर्श तक नहीं बल्कि कहीं अधिक व्यापक है। उनकी विनम्र शैली लोगों को जोड़ने का काम करती है। इन लेखों में ताऱीख भी देनी चाहिए जिससे उनकी वैचारिक यात्रा को पाठक समझ सके। यह पुस्तक दलित चेतना को विस्तार देती है।
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