होलिका दहन की क्रूरता

भारती वत्स क्या अच्छे लोगों को अधिकार है बुरे लोगों को जलाने का? क्या हम अच्छे हैं!!!! होली, एक तरंग पैदा कर देती है हर व्यक्ति में,...

ब्राह्मणवाद ने की बाजीराव-मस्तानी की हत्या

चंद्र सेन संजय लीला भंसाली की एक और दुखान्त प्रेम-कहानी- बाजीराव-मस्तानी। हर फिल्म निर्देशक की अपनी एक खासियत होती है। भंसाली  को भव्य-सेट और प्रेम...

स्त्री के अकेलेपन का दर्द है दोपहरी

रेणु अरोड़ा  दोपहर का समय स्त्री के जीवन का ऐसा समय होता है जब अपनी दिनचर्या से थोड़ी फुर्सत पा वह अपनी सखी-सहेलियों और पड़ोसिनों...

रंडी, या रंडी से कम और हाँ, बीबी से भी बलात्कार हक़ नहीं

अखिलेश कुमार बी.एच.यु. से इतिहास में स्नातक कर रहे है संपर्क:akhileshfssbhu@gmail.com मैंने पहली बार जब 'ना' कहा तब मैं 8 बरस की थी, "अंकल नहीं .....

थियेटर ऑफ रेलेवेंस – स्वराजशाला

राजेश कासनियां  थियेटर ऑफ रेलेवेंस के बारे में एक शोधार्थी, एक अभिनेता का अनुभव, जिसने इसकी एक कार्यशाला में भाग लिया : मैंने 1 से 5 जुलाई...

मोदी, केजरी को महिला कलाकार की ललकार: जान देंगे लेकिन जगह नहीं छोड़ेंगे !

'मेरे पति को उनकी कला के लिए राष्ट्रपति ने सम्मानित किया था और हमने 50 से अधिक देशों में भारत की लुप्त होती कला...

एक युवा फिल्मकार की दस्तक: मंजिलें अभी शेष है!

बहरहाल, कहानी इस सौदेबाजी से आगे बढ़ती है एक युवा लेखक अरविंद अपनी नई कहानी 'तस्वीरें' लेकर प्रकाशक के दफ़्तर पहुंचता है । प्रकाशक उसकी कहानी को सुनने में कोई खास रुचि नहीं दिखाता लेकिन अपने अहम को तुष्ट करने के लिए वह बार बार कहानी में हस्तक्षेप करता है और बाज़ार के अनुरूप कहानी में बदलाव की मांग करता है । बाज़ारवाद ने लेखक के सामने ऐसी स्थिति पैदा कर दी है जहाँ या तो वह भूखा मरे या फिर तड़का मारकर बाज़ार के स्स्वादानुसार लिखे। परजीवी प्रकाशक को इसी बाज़ार का दंभ है ।

जोहरा आपा तुम्हें लाल सलाम!

स्वतंत्र मिश्र स्वतंत्र मिश्र अपनी प्रतिबद्ध पत्रकारिता के लिए जाने जाते हैं. उनकी सरोकारी पत्रकारिता के लेखन का एक संकलन 'जल, जंगल और जमीन :...

न्याय के भंवर में भंवरी

मंजुल भारद्वाज 25 सालों से रंगमंच में सक्रिय. फाउंडर थियेटर ऑफ़ रेलेवेंस. संपर्क :09820391859 स्त्री-अधिकार की मुखर नायिका सावित्रीबाई फुले के स्मृति दिवस (10...

फिल्म तो हिट होती रहेंगी, माहवारी स्वच्छता को हिट करें

क्वीलिन काकोती आज मैं अपना सैनिटरी पैड खरीदने एक फार्मेसी गयी. दुकानदार के अलावा तीन अन्य पुरुष और एक महिला वहां खड़े थे। मैंने पैड...
309FollowersFollow
691SubscribersSubscribe

लोकप्रिय

समकालीन स्त्री लेखन और मुक्ति का स्वरूप

रेनू दूग्गल भारतीय समाज में स्त्रियों की ऐतिहासिक स्थिति संतोषजनक नहीं रही यद्यपि वैदिक काल में स्त्रियों की सामाजिक स्थिति अत्यन्त उन्नत थी। इस काल...
Loading...