फैंड्री : एक पत्थर जो हमारे सवर्ण जातिवादी दिलों में धंस गया है

पूजा सिंह पत्रकार. पिछले १० वर्षों में तहलका , शुक्रवार, आई ए एन एस में पत्रकारिता . संपर्क :aboutpooja@gmail.com यह टिप्पणी (मैं इसे समीक्षा नहीं...

दिग्गज स्त्रीवादी समानांतर सिनेमा की एक बड़ी सख्सियत कल्पना लाजमी का निधन !

राजीव कु. सुमन प्रसिद्ध फिल्मकार 64 वर्षीय कल्पना लाजमी (1954 - 2018) का मुंबई के कोकिलाबेन धीरूभाई अंबानी अस्पताल में २३ सितम्बर २०१८ रविवार की सुबह...

स्त्रीसत्ता, लोकायत दर्शन और क्रान्ति की गति

आशिष साहेबराव पडवळ स्त्री-वर्ग-जाति के मुद्दों पर काम करनेवाली मानव मुक्ति मिशन नामक संगठन के सोशल मीडिया का महाराष्ट्र प्रभारी. संपर्क: aanvikshiki.edit@gmail.com मो.8888577071 दर्शन काल का...

वासना नाजायज नहीं होती: लिपिस्टिक अंडर बुर्का बनाम बुर्के का सच

कुमारी ज्योति गुप्ता कुमारी ज्योति गुप्ता भारत रत्न डा.अम्बेडकर विश्वविद्यालय ,दिल्ली में हिन्दी विभाग में शोधरत हैं सम्पर्क: jyotigupta1999@rediffmail.com ‘लिपिस्टिक अंडर माय बुर्का’ स्त्री जीवन...

स्त्रियों ने रंगमंच की भाषा और प्रस्तुति को बदला: त्रिपुरारी शर्मा

बहू और काठ की गाड़ी जैसे चर्चित नाटकों की लेखिका और नाट्य निदेशक त्रिपुरारी शर्मा से स्त्रीकाल के लिए रेणु अरोड़ा, हिन्दी की असिस्टेंट...

बलात्कार पर नजरिया और सलमान खान

आशीष कुमार ‘‘अंशु’ आशीष कुमार ‘‘अंशु’ देश भर में खूब घूमते हैं और खूब रपटें लिखते हैं . फिलहाल विकास पत्रिका 'सोपान' से...

रंगमंच में हाशिये की सशक्त आवाज़ है ईश्वर शून्य का रंगकर्म

राजेश चन्द्र दिल्ली का रंगमंच संख्यात्मक दृष्टि से बहुत उल्लेखनीय रहता आया है, क्योंकि यहां महीने में औसतन तीस से पचास नाटक मंचित होते हैं...

कल्पना पटोवारी द्वारा गाया गया और नवल कुमार द्वारा लिखित गीत कॉमनवेल्थ गेम्स में...

अागामी 4-15 अप्रैल के बीच अस्ट्रेलिया के गोल्ड कोस्ट शहर में कॉमनवेल्थ गेम्स के समारोह में प्रतियोगिता में शामिल सभी देशों की ओर से...

सावधान ! यहाँ बुर्के में लिपस्टिक भी है और जन्नत के लिप्स का आनंद...

संजीव चंदन  पुरुषों के मुकाबले हमारी यौनिकता अधिक दमित है. हमपर आचरण के जितने कड़े नियम आरोपित किये गये हैं उतने कभी भी पुरुषों पर...

परिवर्तनगामी चेतनाकी संवाहक प्रस्तुति… ‘सपने हर किसी को नहीं आते’

हनीफ मदार उदारीकरण के प्रभाव में वर्तमान दौर से उपजी सामाजिक उथल-पुथल जिसके कारण विभिन्न सामाजिक तबकों की विविधता भरी जिंदगियों में तरह - तरह...
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लोकप्रिय

कुछ अल्पविराम

लेडी श्रवण कुमार-भारतीय समाज की इस विडंबना की ओर संकेत किया है जहां पुरूष कोई कार्य करता है तो उसे समाज उसकी सराहना करता है। श्रवण कुमार की सेवा भक्ति का जिक्र हर एक की जुबान पर मिलता है। मगर हमारे देश में महिलाएं सेवाकर्म बरसों से करती आ रहीं हैं। मगर घर-परिवार हो या समाज सबने उसके योगदान को नजरअंदाज किया है।