*‘मिस टनकपुर हाजिर हो’ : यथार्थवादी कॉमेडी

जावेद अनीस एक्टिविस्ट, रिसर्च स्कॉलर. प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया से जुड़े स्वतंत्र पत्रकार . संपर्क :javed4media@gmail.com javed4media@gmail.com भारत में एक बार आप राजनीति और सरकार पर...

फिल्म पद्मावती पर सेंसर किये जाने की स्त्रीवादी मांग

अरविंद जैन  फिल्म पद्मावती के खिलाफ एक ओर तो समाज के भीतर परंपरावादी ताकतों और सत्ता तन्त्र के गठजोड़ के साथ उग्र प्रदर्शन  इतिहास और फिक्शन के...

छोरा होकै छोरियों से पिट गया?

नवीन रमण सोशल एक्टिविस्ट, हरियाणा की सामाजिक विसंगतियों पर निरंतर लिखते हैं. संपर्क :9215181490 दंगल फिल्म को लेकर भावुक और क्रांतिकारी दोनो तरह की समीक्षाओं को पढ़ने...

युवाओं के गायक संभाजी समाज बदलने के गीत गाते हैं

कुसुम त्रिपाठी स्त्रीवादी आलोचक.  एक दर्जन से अधिक किताबें प्रकाशित हैं , जिनमें ' औरत इतिहास रचा है तुमने','  स्त्री संघर्ष  के सौ वर्ष ' आदि चर्चित...

मालिनी अवस्थी से बातचीत

लोकगायिका मालिनी अवस्थी से संजीव चंदन की बातचीत. मालिनी ने लोक गीतों की विधा , अपने करियर विवाह , परिवार , स्त्री -अधिकार पर बात...

उन्नीसवें भारत रंग महोत्सव में स्त्रियों की भागीदारी

मंजरी श्रीवास्तव एक लम्बी कविता 'एक बार फिर नाचो न इजाडोरा' बहुचर्चित.नाट्य समीक्षक,कई नाट्य सम्मान की ज्यूरी में शामिल. संपर्क : ई मेल-manj.sriv@gmail.com पिछले...

अनारकली आरावाली 24 मार्च से

अनारकली आॅफ आरा देश भर में 24 मार्च को रीलीज़ हो रही है. नील बटे सन्नाटा के बाद स्वरा भास्कर की यह महत्वाकांक्षी सोलो...

मंच पर स्त्री

मोना झा बिहार में रंगमंच का एक जाना पहचाना नाम है मोना झा का . ढाई दशक की रंगमंच की अपनी यात्रा में मोना ने...

वृत्तचित्र ‘तेरी जमीं तेरा आसमां’ का प्रीमियर 29 अप्रैल को अमेरिका में

'तेरी जमीं तेरा आसमां' नामक 45 मिनट के वृत्तचित्र की थीम है 'भारतीय नारी! तू आजाद कहां।' इस फिल्म में विभिन्न क्षेत्रों की भारतीय...

द्रौपदी ! भारतीय सेना बलात्कारी नहीं,राष्ट्रवादी है (?!)

21  सितंबर को हरियाणा केन्द्रीय विश्वविद्यालय के अंग्रेज़ी विभाग ने महाश्वेता देवी को श्रद्धांजलि देने के लिए एक कार्यक्रम आयोजित किया. इए मौके पर...
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रजनी दिसोदिया की आलोचना पुस्तक का लोकार्पण

इस किताब में सलीके से कही गयी बातों को हमें कक्षाओं में लेकर जाना चाहिए। जाति के मुद्दे को पाठ्यक्रम में न लाना भी एक साज़िश है। लेखिका की दृष्टि दलित या स्त्री विमर्श तक नहीं बल्कि कहीं अधिक व्यापक है। उनकी विनम्र शैली लोगों को जोड़ने का काम करती है। इन लेखों में ताऱीख भी देनी चाहिए जिससे उनकी वैचारिक यात्रा को पाठक समझ सके। यह पुस्तक दलित चेतना को विस्तार देती है।
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