कला-संस्कृति

सांस्कृतिक ढकोसलों पर कुठाराघात करती फिल्म : ‘ क्वीन ‘

डॉ. महेश गुप्ता डॉ. महेश गुप्ता डा महेश गुप्ता कवि और कलाकार हैं . रंगमंच से भी इनका जुड़ाव रहा है , हिन्दी और गुजराती में...

ऐ साधारण लड़की ! क्यों चुनी तुमने मौत !!

संजीव चंदन सोचता हूँ , क्यों जरूरी हैं तुम्हारे इस मृत्यु के चुनाव पर लिखना, तब –जबकि भारत में 19 से 49 की उम्र तक...

‘अनारकली आॅफ आरा’ : आंसुओं से उपजी आग और भरोसे की उम्मीद

मृणाल वल्लरी    राष्ट्रगान के वक्त खड़े होने की ड्यूटी पूरी करने के बाद जब आप खींचती हुई एक खास जमीनी मंचीय आवाज के साथ दुष्यंत...

सांस्कृतिक राष्ट्रवादियों को बेचैन करने वाले नाटकों का पाठ आयोजित

रंगमंच की लोकप्रिय पत्रिका समकालीन रंगमंच द्वारा 27 जून को आयोजित नाट्य पाठ सह परिचर्चा मुक्तधारा ऑडिटोरियम में विचारोत्तेजक बातचीत के साथ संपन्न हुई।...

अठारह साल का हुआ भारत रंग महोत्सव

 राजेश चन्द्र ( तीन सप्ताह तक चलने वाले भारतीय रंग महोत्सव का कल उदघाटन हुआ , राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय सोसाइटी के अध्यक्ष रतन थियाम के...

जोहरा आपा तुम्हें लाल सलाम!

स्वतंत्र मिश्र स्वतंत्र मिश्र अपनी प्रतिबद्ध पत्रकारिता के लिए जाने जाते हैं. उनकी सरोकारी पत्रकारिता के लेखन का एक संकलन 'जल, जंगल और जमीन :...

‘पार्च्ड’ के जवाब , ‘पिंक’ से कुछ सवाल : स्त्रीवाद के आईने में...

सरोज कुमार सीनियर सब एडिटर, इंडिया टुडे. संपर्क :krsaroj989@gmail.com इस वक्त जब हम 'पिंक ' और 'पार्च्ड'पर बात कर रहे हैं, तो हमारे...

ताकि बोलें वे भी, जो हैं सदियों से चुप

अनिल अनलहातु  विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में हिन्दी एवं अंग्रेजी की कविताएं प्रकाशित. “प्रतिलिपि” कविता सम्मान’2015. संपर्क :analhatukavita@gmail.com, 08986878504 (आज मनु स्मृति दहन  दिवस  के  दिन , भारतीय ...

प्रलेस की एक सदस्या की खुली चिट्ठी :पितृसत्ता के खिलाफ हर लड़ाई में हम...

आरती संजीव जी, इस मुद्दे को आप मुझे व्यक्तिगत भी भेजते रहे हैं, काफी दिनों से पढ़ रही...

एक युवा फिल्मकार की दस्तक: मंजिलें अभी शेष है!

बहरहाल, कहानी इस सौदेबाजी से आगे बढ़ती है एक युवा लेखक अरविंद अपनी नई कहानी 'तस्वीरें' लेकर प्रकाशक के दफ़्तर पहुंचता है । प्रकाशक उसकी कहानी को सुनने में कोई खास रुचि नहीं दिखाता लेकिन अपने अहम को तुष्ट करने के लिए वह बार बार कहानी में हस्तक्षेप करता है और बाज़ार के अनुरूप कहानी में बदलाव की मांग करता है । बाज़ारवाद ने लेखक के सामने ऐसी स्थिति पैदा कर दी है जहाँ या तो वह भूखा मरे या फिर तड़का मारकर बाज़ार के स्स्वादानुसार लिखे। परजीवी प्रकाशक को इसी बाज़ार का दंभ है ।
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