स्त्री के रंगों की दुनिया

परिमला अंबेकर कलाकारों की कल्पना में कैद स्त्री, कलाकारों के सौन्दर्यबोध की कसौटी स्त्री, कलाकारों के रंगों के लिए कैनवास पर वस्तू बनकर बिखरती स्त्री,...

कला, धर्म, बाजार और स्त्री का द्वंद्व है रंग रसिया

 युवा पत्रकार रूद्रभानु प्रताप सिंह स्त्री और दलित की दृष्टि से हालिया प्रदर्शित फिल्म ' रंगरसिया' देख रहे हैं.  ऐसे समय में जब देश...

प्रतिरोध का सिनेमा उत्सव भी है ,और आंदोलन भी

अनुपम सिंह अनुपम सिंह दिल्ली वि वि में शोधरत हैं. संपर्क :anupamdu131@gmail.com जब  भारतीय संस्कृति के नाम पर सामंतवादी और पुरुषवादी मूल्यों के पुनर्रस्थापन  की...

जोहरा आपा तुम्हें लाल सलाम!

स्वतंत्र मिश्र स्वतंत्र मिश्र अपनी प्रतिबद्ध पत्रकारिता के लिए जाने जाते हैं. उनकी सरोकारी पत्रकारिता के लेखन का एक संकलन 'जल, जंगल और जमीन :...

सांस्कृतिक ढकोसलों पर कुठाराघात करती फिल्म : ‘ क्वीन ‘

डॉ. महेश गुप्ता डॉ. महेश गुप्ता डा महेश गुप्ता कवि और कलाकार हैं . रंगमंच से भी इनका जुड़ाव रहा है , हिन्दी और गुजराती में...
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लोकप्रिय

भवसागर के उस पार मिलना पियारे हरिचंद ज्यू

इस उपन्यास को लिखते हुए मनीषा को बार—बार यह डर सताता रहा कि कभी मैं मल्लिका के बहाने हरिचंद ज्यू का जीवन ही न दोहरा दूं। निश्चित रूप से इस उपन्यास का लेखन मनीषा कुलश्रेष्ठ के लिए बहुत चुनौतीपूर्ण था लेकिन उन्होंने जिस तरह इस उपन्यास में संतुलन कायम किया है, वह पाठकों के लिए हैरानी की बात है। मल्लिका बालविधवा थी और काशी अपनी मुक्ति की खोज में आई थी। उसे क्या मालूम था कि बनारस में न केवल भारतेंदु से उसका परिचय होगा बल्कि उनके प्रेम में वह डूब जाएगी।
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