जनसत्ता में भावना भड़काती खबर: ‘बेशर्म सेल्फी’!

साम्प्रदायिक तनावों के बीच अखबारों की टिप्पणियाँ और ख़बरें इसमें आग का काम करती हैं. आज जब साम्प्रदायिकता अपने चरम पर है तब अखबारों...

ऐ साधारण लड़की ! क्यों चुनी तुमने मौत !!

संजीव चंदन सोचता हूँ , क्यों जरूरी हैं तुम्हारे इस मृत्यु के चुनाव पर लिखना, तब –जबकि भारत में 19 से 49 की उम्र तक...

समाज का नजरिया बदलने वाली फोटोग्राफर संगीता महाजन

पुष्पेन्द्र फाल्गुन  बोलती तस्वीरों की फोटोग्राफर संगीता महाजन की फोटोग्राफी और उनके इस सफ़र की कहानी कह रहे हैं संवेदनशील साहित्यकार और पत्रकार पुष्पेन्द्र फाल्गुन....

बाबुल मोरा नैहर छूटो जाए…

‘ठुमरी की रानी’ के रूप में आदर प्राप्त शास्त्रीय संगीत गायिका गिरिजा देवी का मंगलवार रात करीब 9 बजे कोलकाता में दिल का दौरा...

ब्राह्मणवाद ने की बाजीराव-मस्तानी की हत्या

चंद्र सेन संजय लीला भंसाली की एक और दुखान्त प्रेम-कहानी- बाजीराव-मस्तानी। हर फिल्म निर्देशक की अपनी एक खासियत होती है। भंसाली  को भव्य-सेट और प्रेम...
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रजनी दिसोदिया की आलोचना पुस्तक का लोकार्पण

इस किताब में सलीके से कही गयी बातों को हमें कक्षाओं में लेकर जाना चाहिए। जाति के मुद्दे को पाठ्यक्रम में न लाना भी एक साज़िश है। लेखिका की दृष्टि दलित या स्त्री विमर्श तक नहीं बल्कि कहीं अधिक व्यापक है। उनकी विनम्र शैली लोगों को जोड़ने का काम करती है। इन लेखों में ताऱीख भी देनी चाहिए जिससे उनकी वैचारिक यात्रा को पाठक समझ सके। यह पुस्तक दलित चेतना को विस्तार देती है।
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