कला-संस्कृति

प्रवेश सोनी के रेखाचित्र

प्रवेश सोनी  रंगों से बचपन से ही लगाव था ,पत्रिकाओं में आये चित्र कापी करके उनमे रंग भरना अच्छा लगता था |लेकिन निपुणता के लिए...

जाघों से परे ‘पार्च्ड’ की कहानी: योनि नहीं है रे नारी, वह भी मानवी...

संजीव चन्दन  रिहाई के 3 दशक बाद 8 वें दशक में अरूणा राजे की फिल्म थी रिहाई. यह फिल्म प्रवासी मजदूरों के गांव में पीछे छूट...

पारदर्शी अधोवस्त्र में कास्टिंग का आमंत्रण: मर्दवादी कुंठा या स्त्री सेक्सुअलिटी का...

सुशील मानव  पिछले दिनों कलाकारों के लिए कास्टिंग कॉल के एक विज्ञापन में सिर रहित अधोवस्त्र में स्त्री की तस्वीर पर कुछ रंगकर्मियों, कलकारों, साहित्यकारों...

सावधान ! यहाँ बुर्के में लिपस्टिक भी है और जन्नत के लिप्स का आनंद...

संजीव चंदन  पुरुषों के मुकाबले हमारी यौनिकता अधिक दमित है. हमपर आचरण के जितने कड़े नियम आरोपित किये गये हैं उतने कभी भी पुरुषों पर...

सामंती हवेलियों में दफ्न होती स्त्री

शिप्रा किरण सहायक प्राध्यापक, हिन्दी विभाग बाबासाहेब भीमराव अम्बेडकर विश्वविद्यालय लखनऊ. संपर्क:kiran.shipra@gmail.com साहित्य के फिल्मी रूपांतरण की कड़ी में यूँ तो कई फ़िल्में आईं हैं किन्तु कुछ ही...

रंगमंच में हाशिये की सशक्त आवाज़ है ईश्वर शून्य का रंगकर्म

राजेश चन्द्र दिल्ली का रंगमंच संख्यात्मक दृष्टि से बहुत उल्लेखनीय रहता आया है, क्योंकि यहां महीने में औसतन तीस से पचास नाटक मंचित होते हैं...

फैंड्री : एक पत्थर जो हमारे सवर्ण जातिवादी दिलों में धंस गया है

पूजा सिंह पत्रकार. पिछले १० वर्षों में तहलका , शुक्रवार, आई ए एन एस में पत्रकारिता . संपर्क :aboutpooja@gmail.com यह टिप्पणी (मैं इसे समीक्षा नहीं...

रंग रेखाओं में ढली कविता

रेखा सेठी  ( सुकृता पॉल कुमार  की पेंटिंग और  कविताओं से परिचय करा रही हैं आलोचक रेखा सेठी. ) सुकृता पॉल कुमार अंग्रेज़ी में कविता लिखने...

स्वराजशाला: राजनीति की रंगशाला

अश्विनी नांदेडकर और सायली पावसकर  “मैं बदलाव हूँ..मैं मेरे देश का बदलाव हूँ, मैं मेरे देश की मालिक हूँ, मैं युवा हूँ.. इसी संकल्पना से...

उम्मीदों के उन्मुक्ताकाश की क्वीन

नीलिमा चौहान पेशे से प्राध्यापक नीलिमा 'आँख की किरकिरी ब्लॉग का संचालन करती हैं. संपादित पुस्तक 'बेदाद ए इश्क' प्रकाशित संपर्क : neelimasayshi@gmail.com. एंड दे...
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लोकप्रिय

रजनी दिसोदिया की आलोचना पुस्तक का लोकार्पण

इस किताब में सलीके से कही गयी बातों को हमें कक्षाओं में लेकर जाना चाहिए। जाति के मुद्दे को पाठ्यक्रम में न लाना भी एक साज़िश है। लेखिका की दृष्टि दलित या स्त्री विमर्श तक नहीं बल्कि कहीं अधिक व्यापक है। उनकी विनम्र शैली लोगों को जोड़ने का काम करती है। इन लेखों में ताऱीख भी देनी चाहिए जिससे उनकी वैचारिक यात्रा को पाठक समझ सके। यह पुस्तक दलित चेतना को विस्तार देती है।
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