प्रेम अब भी एक सम्भावना है, ‘सैराट’

दिवस  दिल्ली विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग में शोधरत सिनेमा में गहरी रुचि. समकालीन जनमत में फ़िल्मों की समीक्षाएँ प्रकाशित. संपर्क : dkmr1989@gmail.com ‘भारतीय सिनेमा का अधिकांश...

‘महिषासुर और दुर्गा’ प्रसंग: लोकशायर संभाजी से बातचीत

 पिछले दिनों लोकशायर संभाजी भगत का नया अलबम ' ब्लू नेशन'  जे एन यू में रिलीज हुआ. गीत डा. आमोल देवलेकर  ने लिखा है....

नादिया अली का सेक्सुअल क्रूसेड

आशीष कुमार ‘‘अंशु’ आशीष कुमार ‘‘अंशु’ देश भर में खूब घूमते हैं और खूब रपटें लिखते हैं . आशीष फिलहाल विकास पत्रिका 'सोपान'...

कंगना, गैंगस्टर और गुलशन की भाषा बनाम फिल्म जगत का मर्दवाद

दिवस  दिल्ली विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग में शोधरत सिनेमा में गहरी रुचि. समकालीन जनमत में फ़िल्मों की समीक्षाएँ प्रकाशित. संपर्क : dkmr1989@gmail.com कंगना  को संबोधित '...

आधा चाँद : खंडित व्यक्तित्व की पीड़ा

रेणु अरोड़ा रेणु अरोड़ा मिरांडा हाउस, दिल्ली विश्वविद्यालय में असिसटेंट प्रोफेसर हैं. नाटक और रंगमंच में अभिरूची . संपर्क : renur71@gmail.com आधा चाँद— यह शीर्षक...

क्या बिहारी फिल्मों की खोई प्रतिष्ठा वापस लायेगी ‘मिथिला मखान’ ?

इति शरण  इन दिनों बिहारी फिल्मों का मतलब गंदे और भद्दे पोस्टर वाली भोजपुरी फिल्मों को ही समझ लिया गया है। जिनके पोस्टर और नाम...

रील और रीयल ज़िदगी: एक इनसाइड अकाउंट

असीमा भट्ट रंगमंच की कलाकार,सिनेमा और धारवाहिकों में अभिनय, लेखिका संपर्क : asimabhatt@gmail.com प्रत्युषा मर गयी. वह क्यों मरी? क्या हुआ उसके साथ यह अटकलें...

ऐ साधारण लड़की ! क्यों चुनी तुमने मौत !!

संजीव चंदन सोचता हूँ , क्यों जरूरी हैं तुम्हारे इस मृत्यु के चुनाव पर लिखना, तब –जबकि भारत में 19 से 49 की उम्र तक...

प्रवेश सोनी के रेखाचित्र

प्रवेश सोनी  रंगों से बचपन से ही लगाव था ,पत्रिकाओं में आये चित्र कापी करके उनमे रंग भरना अच्छा लगता था |लेकिन निपुणता के लिए...

मैं जनता के संघर्षों के गायक हूँ : संभाजी भगत

'ओ हिटलर के  साथी' जैसे मशहूर गीत के रचनाकार और गायक  तथा  'शिवाजी अंडरग्राउंड इन भीम नगर मोहल्ला ' के नाटककार संभाजी भगत से...
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रजनी दिसोदिया की आलोचना पुस्तक का लोकार्पण

इस किताब में सलीके से कही गयी बातों को हमें कक्षाओं में लेकर जाना चाहिए। जाति के मुद्दे को पाठ्यक्रम में न लाना भी एक साज़िश है। लेखिका की दृष्टि दलित या स्त्री विमर्श तक नहीं बल्कि कहीं अधिक व्यापक है। उनकी विनम्र शैली लोगों को जोड़ने का काम करती है। इन लेखों में ताऱीख भी देनी चाहिए जिससे उनकी वैचारिक यात्रा को पाठक समझ सके। यह पुस्तक दलित चेतना को विस्तार देती है।
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