कला-संस्कृति

वृत्तचित्र ‘तेरी जमीं तेरा आसमां’ का प्रीमियर 29 अप्रैल को अमेरिका में

'तेरी जमीं तेरा आसमां' नामक 45 मिनट के वृत्तचित्र की थीम है 'भारतीय नारी! तू आजाद कहां।' इस फिल्म में विभिन्न क्षेत्रों की भारतीय...

पिंक के बहाने ‘अच्छी औरतें’ और ‘बुरी औरतें’

डिसेन्ट कुमार साहू पी.एच.डी समाजकार्य ई-मेल - dksahu171@gmail.com महात्मा गांधी अंतर्राष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय, वर्धा शिक्षा और रोजगार ऐसे कारक हैं जिनके कारण सोशल स्पेस में महिलाओं की...

‘निल बट्टे सन्नाटा’ और घरेलू कामगार महिलायें

जावेद अनीस एक्टिविस्ट, रिसर्च स्कॉलर. प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया से जुड़े स्वतंत्र पत्रकार . संपर्क :javed4media@gmail.com javed4media@gmail.com विदेशों में सभी परिवार “घरेलू सहायक” अफोर्ड नहीं कर...

बहस में डाक्यूमेंट्री

सुधा अरोड़ा/  अरविन्द जैन ( ' इंडियाज डॉटर' डाक्यूमेंट्री के विवाद के दौरान स्त्रीकाल का अपडेट रुका था . उन्हीं दिनों लेखिका सुधा अरोड़ा और स्त्रीवादी...

बलात्कार पर नजरिया और सलमान खान

आशीष कुमार ‘‘अंशु’ आशीष कुमार ‘‘अंशु’ देश भर में खूब घूमते हैं और खूब रपटें लिखते हैं . फिलहाल विकास पत्रिका 'सोपान' से...

क्या ऐसे ही होगी ‘थियेटर ओलम्पिक 2018’ की तैयारी ?

कविता  भारतीय रंग महोत्सव के शेष दो दिन बचे हैं . कथाकार और सांस्कृतिक पत्रकार कविता नाट्य प्रेमियों का ध्यान खीच रही हैं इस ओर मंडी...

बनारस घराने की अंतिम ठसक का विदा-लेख

अभिषेक श्रीवास्तंव  बुधवार की शाम बनारस बेचैन था और कलकत्ता मौन। काल के निरंतर प्रवाह में सदियों से ठिठके हुए ये दो शहर जो हमेशा...

प्रेम अब भी एक सम्भावना है, ‘सैराट’

दिवस  दिल्ली विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग में शोधरत सिनेमा में गहरी रुचि. समकालीन जनमत में फ़िल्मों की समीक्षाएँ प्रकाशित. संपर्क : dkmr1989@gmail.com ‘भारतीय सिनेमा का अधिकांश...

बाबुल मोरा नैहर छूटो जाए…

‘ठुमरी की रानी’ के रूप में आदर प्राप्त शास्त्रीय संगीत गायिका गिरिजा देवी का मंगलवार रात करीब 9 बजे कोलकाता में दिल का दौरा...

मंच पर स्त्री

मोना झा बिहार में रंगमंच का एक जाना पहचाना नाम है मोना झा का . ढाई दशक की रंगमंच की अपनी यात्रा में मोना ने...
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लोकप्रिय

रजनी दिसोदिया की आलोचना पुस्तक का लोकार्पण

इस किताब में सलीके से कही गयी बातों को हमें कक्षाओं में लेकर जाना चाहिए। जाति के मुद्दे को पाठ्यक्रम में न लाना भी एक साज़िश है। लेखिका की दृष्टि दलित या स्त्री विमर्श तक नहीं बल्कि कहीं अधिक व्यापक है। उनकी विनम्र शैली लोगों को जोड़ने का काम करती है। इन लेखों में ताऱीख भी देनी चाहिए जिससे उनकी वैचारिक यात्रा को पाठक समझ सके। यह पुस्तक दलित चेतना को विस्तार देती है।
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