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कला-संस्कृति | स्त्रीकाल | Page 9

क्या ऐसे ही होगी ‘थियेटर ओलम्पिक 2018’ की तैयारी ?

कविता  भारतीय रंग महोत्सव के शेष दो दिन बचे हैं . कथाकार और सांस्कृतिक पत्रकार कविता नाट्य प्रेमियों का ध्यान खीच रही हैं इस ओर मंडी...

स्त्री के अकेलेपन का दर्द है दोपहरी

रेणु अरोड़ा  दोपहर का समय स्त्री के जीवन का ऐसा समय होता है जब अपनी दिनचर्या से थोड़ी फुर्सत पा वह अपनी सखी-सहेलियों और पड़ोसिनों...

मालिनी अवस्थी से बातचीत

लोकगायिका मालिनी अवस्थी से संजीव चंदन की बातचीत. मालिनी ने लोक गीतों की विधा , अपने करियर विवाह , परिवार , स्त्री -अधिकार पर बात...

स्त्री संवेदना का नाटक गबरघिचोर

संजीव चंदन स्त्री की यौनिकता पुरुष प्रधान समाज के लिए हमेशा से चिंता का विषय रही है. अलग –अलग समय में यह चिंता रचनाकारों की...

रतन थियाम का रंगकर्म : कला की विभिन्न विधाओं की समेकित अभिव्यक्तियों के समुच्चय...

मंजरी श्रीवास्तव इस समीक्षात्मक आलेख में  युवा नाट्य समीक्षक मंजरी श्रीवास्तव ने ‘मैकबेथ’ के बहाने राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय सोसाइटी के अध्यक्ष रतन थियाम  की पूरी...

अठारह साल का हुआ भारत रंग महोत्सव

 राजेश चन्द्र ( तीन सप्ताह तक चलने वाले भारतीय रंग महोत्सव का कल उदघाटन हुआ , राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय सोसाइटी के अध्यक्ष रतन थियाम के...

उम्र भर इक मुलाक़ात चली जाती है

असीमा भट्ट  'रेमो'  (Remo farnandis: the great singer) के घर गई तो ऐसा लगा 'अन्ना केरेनिना' अपना प्यार ढूंढने आई है... पुराना घर, ढेर सारी पुरानी...

ब्राह्मणवाद ने की बाजीराव-मस्तानी की हत्या

चंद्र सेन संजय लीला भंसाली की एक और दुखान्त प्रेम-कहानी- बाजीराव-मस्तानी। हर फिल्म निर्देशक की अपनी एक खासियत होती है। भंसाली  को भव्य-सेट और प्रेम...

ताकि बोलें वे भी, जो हैं सदियों से चुप

अनिल अनलहातु  विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में हिन्दी एवं अंग्रेजी की कविताएं प्रकाशित. “प्रतिलिपि” कविता सम्मान’2015. संपर्क :analhatukavita@gmail.com, 08986878504 (आज मनु स्मृति दहन  दिवस  के  दिन , भारतीय ...

परिवर्तनगामी चेतनाकी संवाहक प्रस्तुति… ‘सपने हर किसी को नहीं आते’

हनीफ मदार उदारीकरण के प्रभाव में वर्तमान दौर से उपजी सामाजिक उथल-पुथल जिसके कारण विभिन्न सामाजिक तबकों की विविधता भरी जिंदगियों में तरह - तरह...
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लोकप्रिय

रजनी दिसोदिया की आलोचना पुस्तक का लोकार्पण

इस किताब में सलीके से कही गयी बातों को हमें कक्षाओं में लेकर जाना चाहिए। जाति के मुद्दे को पाठ्यक्रम में न लाना भी एक साज़िश है। लेखिका की दृष्टि दलित या स्त्री विमर्श तक नहीं बल्कि कहीं अधिक व्यापक है। उनकी विनम्र शैली लोगों को जोड़ने का काम करती है। इन लेखों में ताऱीख भी देनी चाहिए जिससे उनकी वैचारिक यात्रा को पाठक समझ सके। यह पुस्तक दलित चेतना को विस्तार देती है।
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